१. मरणाध्यवसायविद्रवः१, २. शोकतिरस्कारः, ३. शोकलाघवं, ४. शोकविनोदः२, ५. तपस्योद्वेगः३, ६. दैवसम्पद्योगः, ७. त्रिकालद्ृष्टदर्शनं४, ८. तदुपदेशः, ९. सहायस्वीकरणं,५ १०. तदध्यवसायः, ११. प्रत्यूहप्रशमनं, १२. प्रत्याशानुबन्धः, १३. समयप्रतीक्षा, १४. संविधानकप्रकारः, १५. प्रत्युज्जीवनं, १६. पुनस्समागम इत्यनुभावाः षोडश निर्वहणे। (६४+१६=८०) सैषा षोडशकपञ्चकेन अशीतिः।
(१. मुखसन्धौ करुणस्य विभावादयः —१६)
१. मुखसन्धौ व्यसनाभिघातो यथा—(रघु. १४. ३३)
कलत्रनिन्दागुरुणा किलैवमभ्याहतं कीर्तिविपर्ययेण।
अयोघनेनाय इवाभितप्तं वैदेहिबन्धोर्हृदयं विदद्रे॥ ८७॥
कुलशैलौ प्रचलितौ सागरौ शोषमागतौ।
चन्द्रसूर्यौ गतावस्तमहो शोकस्य तीव्रता॥ ८८॥
२. अभिषङ्गाभिभवो यथा—(रघु. १४.५४)