ण अ सहि अणुणअभणिअं ण देसि पसरं ण होसि मुक्कामरिसा।
कह आ एक्करसं चिअ दूरविंसंवइअ णिट्ठुरं तुह हिअअं॥ १८८॥
(न च सखि! अनुनयभणितं न ददासि प्रसरं न भवसि मुक्तामर्षा।
कथं वा एकरसमेव दूरविसंवदितनिष्ठुरं तव हृदयम्॥)
वीसंभणिव्विसंके विच्छद्धिअकव्अवपं आरंमिजणे।
आसंकिअं पहिअअंलाउज्जंतो अकहणलग्गउअअसो॥ १८९॥
जाव ण लक्खेइ परो जाव ण लब्भइ पिअम्मि परसंघो।