कह वि विलग्गालोअण—णीससणुब्भडपिआहिउक्कंठं।
दुल्लहजणाणुरत्तं दूइओ पुण जिआवेंति॥ १०॥
(कथमपि विलग्नालोकननिःश्वासनोद्भटप्रियाधिकोत्कण्ठम्।
दुर्लभजनानुरक्तं दूत्यः पुनर्जीवयन्ति ॥)
कत्तो सन्देससुहं कत्तो सरसाइ मोहणसुहाइ।
चिंतामणि व्व लोअम्मि सा हु दूई जइ ण होइ॥ ९१॥
(कुतः सन्देशसुखं कुतः सरसानि मोहनसुखानि।
चिन्तामणिरिव लोके सा खलु दूती यदि न भवति।)
जइआइरितवेसविअविअसदूल सीसंत।
संगमसुहसमब्भहिअमणरहा होंति संदेसा॥ ९२a॥