भिडिय पचेल्लिउ सो मरइ॥ ज्जस्स ण लग्गइ लंठि॥ ५॥
(सा उत्पन्ना गोष्ठभुवि नवीना कापि विषग्रन्थिः।
भित्त्वा न पचन् प्रत्युत स म्रियते यस्य न लगति कण्ठे॥)
वाणिधमोडिअच्चरुणखओ दारेएं तु न दिठ्ठ।
माएणजहुके मलडोल्लाहिअ इवइठ्ठ॥ ६॥?
४. वैकल्पिकाभिधानप्रभवा विकल्पाभिधानिकी यथा—
अंबरु अंचि समुद्दु तरि भमडहि डोंगरुआणि।
सहि महु पिउ गउ कलहिअउ जेंव रुच्चइ तेंव आणि॥ ७॥
१. दैवमेवातपत्रं रामं दैवात् अपत्रं शाखिनम्, सानुनि जातं वृक्षम्,अनुजसहितं रामम् — रे।