कोइल-मोर-मरालहं कोइ न वाहरइ।
माए न जाणउ माहहे केवं विरहिणि मरइ ॥ १२३b ॥
(कोकिलमोरमरालानां कोऽपि न व्याहरति।
मातर् न जाने माघे कथं विरहिणि मरइ ॥)
दिणहदिवट्ठहो इति स उप्पिज्ज्इउ सुरेविओ।
अवरणेह मिहइ घरुमादालव्च हि दूरे ॥ १२४ ॥
जइविव्गव्डहीजइ विवव्डुरव्हु पहुदुग्गमुतरु अरहीजइ विगहणेसूरु।
विणदीसइ इतो इसु पुरिसु वसदि जहीते धुवट्ठहरहप अट्ठदि ॥ १२५ ॥