एक्क च्चिअ वहुआ गहवइस्स महिलत्तणं समुव्वहइ।
अणिमिस—णअणो सअलो वि जीए देवीकओ गामो॥ २९५॥
(एकैव वधूः गृहपतेः महिलात्वं समुद्वहति।
अनिमिषनयनः सकलोऽपि यया देवीकृतो ग्रामः॥)
उत्तमाऽनूढा यथा—(गास. ९५७वे)
पिअदंसणरहसुक्खित्त पहिअ ! अण्णेण वच्चसु पहेण।
गहवइधूआ दुल्लंघवाउरा इह हअग्गामे॥ २९६॥
(प्रियादर्शनरभसोत्सिक्त पथिक ! अन्येन व्रज पथा।
गृहपतिदुहिता दुर्लङ्घवागुरा इह हतग्रामे॥)