११. देवविषयो यथा—(गास. ८४४वे.)
जइ देव्व तुं पसण्णो मा काहिसि मज्झ माणुसं जम्मं।
अह जंमं मा पेम्मं जइ पेम्मं मा जणे जुलहे॥ ३३०॥
(यदि देव त्वं प्रसन्नो मा कुरुष्व मम मानुषं जन्म।
अथ जन्म मा प्रेम, यदि प्रेम मा जने दुर्लभे॥)
अथ मानोपाधिभङ्गाः। ते चाङ्गचक्षुश्चित्तचाटुधैर्यकार्यशक्त्याकारदेशकाल— पात्रसंज्ञाद्युपाधिभ्यो भवन्ति। तत्र —
अण्णत्थपेसि एणेहे ॰ ॰ ॰॥ ३३१॥ (?)
२. चित्तोपाधिर्यथा—(गास. ९०३वे.)