(सङ्केतोत्सुकमना गृहपतिदुहितृकटाक्षसंज्ञापितः/दृष्टः।
गां गतां न वेत्ति गोपालोऽम्बरं दोग्धि॥)
एक्कंगणदुलहे् माणुसम्मि उज्झइ/दथ्थइ जणो णिअंतो वि।
पुणरुत्तदंसआ सिक्किआ हि वरह/हिग्गि पु/चुडुलंहि॥ २०१॥
(एकाङ्गणदुर्लभे मानुषे उज्झति जनो निर्वृतोऽपि।
पुनरुक्त ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰ ॰॥)
१.६. ११ सन्निकृष्टो यथा—(गास. ४. ३५)
बहलअमा हअराई, अज्ज पउत्थो पई, घरं सुण्णं।
तह जग्गेज्ज सअज्झिअ! ण जहा अह्मे मुसिज्जामो॥ २०२॥