कनिष्ठा धीरा प्रगल्भा यथा—(गास. ८७७)
महुएहि किं व पंथिअ॰॥ ३९०॥
कनिष्ठा अधीरा प्रगल्भा यथा—(गास. ४.४८)
अंगाणं तणुआरअ! सिक्खावअ! दीहरोविअव्वाणं।
विणआइक्कमकारअ! मा मा णं पम्हसिज्जासु॥ ३९१॥
(अङ्गानां तनुकारक! शिक्षापक! दीर्घरोदितव्यानाम्।
विनयातिक्रमकारक! मा मा एनां प्रस्मरिष्यसि/विसमरेः॥)
कनिष्ठा ऊढा प्रगल्भा यथा—(गास. २.७)
गोलाअडट्ठिअं पोच्छिऊण गहवइसुअं हलिअसुण्हा।