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Currently viewing: Parva 8 -
Chapter 8.66
(65 verses)
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Sanskrit Text
अमृष्यमाणो
व्यसनानि
तानि;
हस्तौ
विधुन्वन्स
विगर्हमाणः
।
धर्मप्रधानानभिपाति
धर्म;
इत्यब्रुवन्धर्मविदः
सदैव
।
ममापि
निम्नोऽद्य
न
पाति
भक्ता;न्मन्ये
न
नित्यं
परिपाति
धर्मः
॥
Padaccheda (Word Analysis)
अ + मृष् | व्यसनानि | तानि | हस्तौ | विधुन्वन् | स | विगर्हमाणः
धर्म + प्रधान | अभिपाति | धर्म | इत्य् | अब्रुवन् | धर्म + विद् | सदा + एव
मद् + अपि | निम्नो | ऽद्य | न | पाति | भक्तान् | मन्ये | न | नित्यं | परिपाति | धर्मः
धर्म + प्रधान | अभिपाति | धर्म | इत्य् | अब्रुवन् | धर्म + विद् | सदा + एव
मद् + अपि | निम्नो | ऽद्य | न | पाति | भक्तान् | मन्ये | न | नित्यं | परिपाति | धर्मः