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Currently viewing: Parva 8 - Chapter 8.66 (65 verses)
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Try searching for: dharma, युद्ध, Arjuna, 1.1.5 (verse reference)
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Chapter 8.66

ततोऽपयाताः शरपातमात्र;मवस्थिताः कुरवो भिन्नसेनाः विद्युत्प्रकाशं ददृशुः समन्ता;द्धनंजयास्त्रं समुदीर्यमाणम्
Sanjaya said The broken Kaurava army, when melting away out of fear as wrathful Arjuna began his shots but halted and looked back from a distance at Arjuna's blazing weapon which resembled lightning and was coursing on all sides with increasing energy.
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ततो | ऽपयाताः | शर + पात + मात्र | अवस्थिताः | कुरवो | भिद् + सेना
विद्युत् + प्रकाश | ददृशुः | समन्ताद् | धनंजय + अस्त्र | समुदीर्यमाणम्
तदर्जुनास्त्रं ग्रसते स्म वीरा;न्वियत्तथाकाशमनन्तघोषम् क्रुद्धेन पार्थेन तदाशु सृष्टं; वधाय कर्णस्य महाविमर्दे
Then Karna swallowed up (destroyed) that weapon when it was flying on the sky and which Arjuna had sped with great force for the purpose of putting an end to his enemy in that fearful contest with a downpour of his own fearful arrows.
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तद् | अर्जुन + अस्त्र | ग्रसते | स्म | वीरान् | वियत् | तथा + आकाश | अनन्त + घोष
क्रुद्धेन | पार्थेन | तदा + आशु | सृष्टं | वधाय | कर्णस्य | महत् + विमर्द
रामादुपात्तेन महामहिम्ना; आथर्वणेनारिविनाशनेन तदर्जुनास्त्रं व्यधमद्दहन्तं; पार्थं बाणैर्निशितैर्निजघ्ने
He then, with that mighty weapon he had received from Rama, which was vested with the Atharvan rite, worsted that firy weapon of Arjuna and also struck Partha with many other sharp arrows.
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रामाद् | उपात्तेन | महत् + महिमन् | आथर्वण + अरि + विनाशन
तद् | अर्जुन + अस्त्र | व्यधमद् | दहन्तं | पार्थं | च | बाणैर् | निशितैर् | निजघ्ने
ततो विमर्दः सुमहान्बभूव; तस्यार्जुनस्याधिरथेश्च राजन् अन्योन्यमासादयतोः पृषत्कै;र्विषाणघातैर्द्विपयोरिवोग्रैः
O king, then the fight between Arjuna and the son of Adhiratha assumed attacking each other with their tusks, they went on hitting each other with shafts.
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ततो | विमर्दः | सु + महत् | बभूव | तद् + अर्जुन + आधिरथि | च | राजन्
अन्योन्यम् | आसादयतोः | पृषत्कैर् | विषाण + घात | द्विपयोर् | इव + उग्र
ततो रिपुघ्नं समधत्त कर्णः; सुसंशितं सर्पमुखं ज्वलन्तम् रौद्रं शरं संयति सुप्रधौतं; पार्थार्थमत्यर्थचिराय गुप्तम्
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ततो | रिपु + घ्न | समधत्त | कर्णः | सु + संशा | सर्प + मुख | ज्वलन्तम्
रौद्रं | शरं | संयति | सु + प्रधाव् | पार्थ + अर्थ | अत्यर्थ + चिराय | गुप्तम्
सदार्चितं चन्दनचूर्णशायिनं; सुवर्णनालीशयनं महाविषम् प्रदीप्तमैरावतवंशसंभवं; शिरो जिहीर्षुर्युधि फल्गुनस्य
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सदा + अर्चय् | चन्दन + चूर्ण + शायिन् | सुवर्ण + नाल + शयन | महत् + विष
प्रदीप्तम् | ऐरावत + वंश + सम्भव | शिरो | जिहीर्षुर् | युधि | फल्गुनस्य
तमब्रवीन्मद्रराजो महात्मा; वैकर्तनं प्रेक्ष्य हि संहितेषुम् कर्ण ग्रीवामिषुरेष प्राप्स्यते; संलक्ष्य संधत्स्व शरं शिरोघ्नम्
The noble ruler of Madras, seeing Vaikatana aim that shaft, spoke to Karna and said-"O Karna, think well before you shoot this arrow; it will not reach Arjuna's neck."
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तम् | अब्रवीन् | मद्र + राज | महात्मा | वैकर्तनं | प्रेक्ष्य | हि | संधा + इषु
न | कर्ण | ग्रीवाम् | इषुर् | एष | प्राप्स्यते | संलक्ष्य | संधत्स्व | शरं | शिरस् + घ्न
अथाब्रवीत्क्रोधसंरक्तनेत्रः; कर्णः शल्यं संधितेषुः प्रसह्य संधत्ते द्विः शरं शल्य कर्णो; मादृशाः शाठ्ययुक्ता भवन्ति
The energetic son of Suta, with wrathful look, told the king of Madra, "O Shalya, Karna never takes his aim twice; with warriors like us it must always be fair play in fight.”
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अथ + ब्रू | क्रोध + संरञ्ज् + नेत्र | कर्णः | शल्यं | संधा + इषु | प्रसह्य
न | संधत्ते | द्विः | शरं | शल्य | कर्णो | न | मादृशाः | शाठ्य + युज् | भवन्ति
तथैवमुक्त्वा विससर्ज तं शरं; बलाहकं वर्षघनाभिपूजितम् हतोऽसि वै फल्गुन इत्यवोच;त्ततस्त्वरन्नूर्जितमुत्ससर्ज
O monarch, speaking the words, "You are killed, O Phalguna,” he, desirous of victory, with care let go that arrow which for many years he had cherished with regard.
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तथा + एवम् | उक्त्वा | विससर्ज | तं | शरं | बलाहकं | वर्ष + घन + अभिपूजय्
हतो | ऽसि | वै | फल्गुन | इत्य् | अवोचत् | ततस् | त्वरन्न् | ऊर्जितम् | उत्ससर्ज
संधीयमानं भुजगं दृष्ट्वा कर्णेन माधवः आक्रम्य स्यन्दनं पद्भ्यां बलेन बलिनां वरः
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संधीयमानं | भुजगं | दृष्ट्वा | कर्णेन | माधवः
आक्रम्य | स्यन्दनं | पद्भ्यां | बलेन | बलिनां | वरः
अवगाढे रथे भूमौ जानुभ्यामगमन्हयाः ततः शरः सोऽभ्यहनत्किरीटं तस्य धीमतः
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अवगाढे | रथे | भूमौ | जानुभ्याम् | अगमन् | हयाः
ततः | शरः | सो | ऽभ्यहनत् | किरीटं | तस्य | धीमतः
अथार्जुनस्योत्तमगात्रभूषणं; धरावियद्द्योसलिलेषु विश्रुतम् बलास्त्रसर्गोत्तमयत्नमन्युभिः; शरेण मूर्ध्नः जहार सूतजः
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अथ + अर्जुन + उत्तम + गात्र + भूषण | विश्रुतम्
बल + अस्त्र + सर्ग + उत्तम + यत्न + मन्यु | शरेण | मूर्ध्नः | स | जहार | सूतजः
दिवाकरेन्दुज्वलनग्रहत्विषं; सुवर्णमुक्तामणिजालभूषितम् पुरंदरार्थं तपसा प्रयत्नतः; स्वयं कृतं यद्भुवनस्य सूनुना
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दिवाकर + इन्दु + ज्वलन + ग्रह + त्विषा | सुवर्ण + मुक्ता + मणि + जाल + भूषय्
पुरंदर + अर्थ | तपसा | प्रयत्नतः | स्वयं | कृतं | यद् | भुवनस्य | सूनुना
महार्हरूपं द्विषतां भयंकरं; विभाति चात्यर्थसुखं सुगन्धि तत् निजघ्नुषे देवरिपून्सुरेश्वरः; स्वयं ददौ यत्सुमनाः किरीटिने
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महार्ह + रूप | द्विषतां | भयंकरं | विभाति | च + अत्यर्थ + सुख | सुगन्धि | तत्
निजघ्नुषे | देव + रिपु | सुरेश्वरः | स्वयं | ददौ | यत् | सु + मनस् | किरीटिने
हराम्बुपाखण्डलवित्तगोप्तृभिः; पिनाकपाशाशनिसायकोत्तमैः सुरोत्तमैरप्यविषह्यमर्दितुं; प्रसह्य नागेन जहार यद्वृषः
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हर + अम्बुप + आखण्डल + वित्तगोप्तृ | पिनाक + पाश + अशनि + सायक + उत्तम
सुर + उत्तम | अप्य् | अविषह्यम् | अर्दितुं | प्रसह्य | नागेन | जहार | यद् | वृषः
तदुत्तमेषून्मथितं विषाग्निना; प्रदीप्तमर्चिष्मदभिक्षिति प्रियम् पपात पार्थस्य किरीटमुत्तमं; दिवाकरोऽस्तादिव पर्वताज्ज्वलन्
As the sun, in setting, goes down from the Asta Hills with all the lustre so that handsome, brilliant, adorned diadem of Partha came down to the earth smashed to pieces and burning with that snake's poison.
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तद् | उत्तम + इषु | मथितं | विष + अग्नि | प्रदीप्तम् | अर्चिष्मद् | प्रियम्
पपात | पार्थस्य | किरीटम् | उत्तमं | दिवाकरो | ऽस्ताद् | इव | पर्वताज् | ज्वलन्
ततः किरीटं बहुरत्नमण्डितं; जहार नागोऽर्जुनमूर्धतो बलात् गिरेः सुजाताङ्कुरपुष्पितद्रुमं; महेन्द्रवज्रः शिखरं यथोत्तमम्
O monarch, the snake, by its own prowess, snatched from Partha's head that beautiful ornament of good shape set with precious stones and diamonds, very brilliant to look at and crushed it to pieces as the thunder breaks down mountain tops adorned with fine trees and flowers.
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ततः | किरीटं | बहु + रत्न + मण्डय् | जहार | नागो | अर्जुन + मूर्धन् | बलात्
गिरेः | सु + जन् + अङ्कुर + पुष्पित + द्रुम | महत् + इन्द्र + वज्र | शिखरं | यथा + उत्तम
मही वियद्द्यौः सलिलानि वायुना; यथा विभिन्नानि विभान्ति भारत तथैव शब्दो भुवनेष्वभूत्तदा; जना व्यवस्यन्व्यथिताश्च चस्खलुः
O Bharata, as during a storm a great noise is heard through out the earth, sky, heaven and the waters, so was the sound heard throughout the world at that time and all the people, though they tried to remain steady, became greatly afraid and stumbled.
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मही | वियद् | द्यौः | सलिलानि | वायुना | यथा | विभिन्नानि | विभान्ति | भारत
तथा + एव | शब्दो | भुवनेष्व् | अभूत् | तदा | जना | व्यवस्यन् | व्यथिताश् | च | चस्खलुः
ततः समुद्ग्रथ्य सितेन वाससा; स्वमूर्धजानव्यथितः स्थितोऽर्जुनः विभाति संपूर्णमरीचिभास्वता; शिरोगतेनोदयपर्वतो यथा
The dark young man, Dhananjaya, bereft of his crown, looked beautiful like a mountain without top and being not at all afraid stood his ground after binding his hairs with a white cloth.
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ततः | समुद्ग्रथ्य | सितेन | वाससा | स्व + मूर्धज | अ + व्यथ् | स्थितो | ऽर्जुनः
विभाति | सम्पृ + मरीचि + भास्वत् | शिरस् + गम् + उदय + पर्वत | यथा
बलाहकः कर्णभुजेरितस्ततो; हुताशनार्कप्रतिमद्युतिर्महान् महोरगः कृतवैरोऽर्जुनेन; किरीटमासाद्य समुत्पपात
Crushing down his crown that precious arrows, effulgent like the sun or fire, shot by Karna, the great serpent, who was rendered by Arjuna his enemy, went away.
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बलाहकः | कर्ण + भुज + ईरय् | ततो | हुताशन + अर्क + प्रतिम + द्युति | महान्
महत् + उरग | कृ + वैर | ऽर्जुनेन | किरीटम् | आसाद्य | समुत्पपात
तमब्रवीद्विद्धि कृतागसं मे; कृष्णाद्य मातुर्वधजातवैरम् ततः कृष्णः पार्थमुवाच संख्ये; महोरगं कृतवैरं जहि त्वम्
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तम् | अब्रवीद् | विद्धि | कृ + आगस् | मे | कृष्ण + अद्य | मातुर् | वध + जन् + वैर
ततः | कृष्णः | पार्थम् | उवाच | संख्ये | महत् + उरग | कृ + वैर | जहि | त्वम्
एवमुक्तो मधुसूदनेन; गाण्डीवधन्वा रिपुषूग्रधन्वा उवाच को न्वेष ममाद्य नागः; स्वयं आगाद्गरुडस्य वक्त्रम्
Thereupon Krishna said to Partha in the battle-field “kill the great snake whom you have made an enemy.” Thus spoken to by the slayer of Madhu, the holder of Gandiva bow, ever holding this Naga who, of his own accord, comes against me as if into the mouth of Garuda.
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स | एवम् | उक्तो | मधुसूदनेन | गाण्डीवधन्वा | रिपु + उग्र + धन्वन्
उवाच | को | न्व् | एष | मद् + अद्य | नागः | स्वयं | य | आगाद् | गरुडस्य | वक्त्रम्
योऽसौ त्वया खाण्डवे चित्रभानुं; संतर्पयानेन धनुर्धरेण वियद्गतो बाणनिकृत्तदेहो; ह्यनेकरूपो निहतास्य माता
Krishna, said While armed with a bow were gratifying the fire-god in Khandava forest-this snake, having his body covered by his mother's, was in the sky. You killed his mother taking her for a single snake.
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यो | ऽसौ | त्वया | खाण्डवे | चित्रभानुं | संतर्पयानेन | धनुर्धरेण
वियन्त् + गम् | बाण + निकृत् + देह | ह्य् | अनेक + रूप | निहन् + इदम् | माता
ततस्तु जिष्णुः परिहृत्य शेषां;श्चिच्छेद षड्भिर्निशितैः सुधारैः नागं वियत्तिर्यगिवोत्पतन्तं; छिन्नगात्रो निपपात भूमौ
Sanjaya said Thereupon covering the snake with six sharpened arrows Jishnu cut him off while he was moving in the sky. His body cut-off he dropped down on earth.
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ततस् | तु | जिष्णुः | परिहृत्य | शेषांश् | चिछेद | षड्भिर् | निशितैः | सु + धारा
नागं | वियत् | तिर्यग् | इव + उत्पत् | स | छिद् + गात्र | निपपात | भूमौ
तस्मिन्मुहूर्ते दशभिः पृषत्कैः; शिलाशितैर्बर्हिणवाजितैश्च विव्याध कर्णः पुरुषप्रवीरं; धनंजयं तिर्यगवेक्षमाणम्
In that very moment, Karna, looking askance on Dananjaya, struck that foremost of men with ten arrows whetted on stone and adorned with peacock feathers.
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तस्मिन् | मुहूर्ते | दशभिः | पृषत्कैः | शिला + शा | बर्हिण + वाजित | च
विव्याध | कर्णः | पुरुष + प्रवीर | धनंजयं | तिर्यग् | अवेक्षमाणम्
ततोऽर्जुनो द्वादशभिर्विमुक्तै;राकर्णमुक्तैर्निशितैः समर्प्य नाराचमाशीविषतुल्यवेग;माकर्णपूर्णायतमुत्ससर्ज
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ततो | ऽर्जुनो | द्वादशभिर् | विमुक्तैर् | आकर्ण + मुच् | निशितैः | समर्प्य
नाराचम् | आशीविष + तुल्य + वेग | आकर्ण + पृ + आयम् | उत्ससर्ज
चित्रवर्मेषुवरो विदार्य; प्राणान्निरस्यन्निव साधु मुक्तः कर्णस्य पीत्वा रुधिरं विवेश; वसुंधरां शोणितवाजदिग्धः
Then Dhananjaya struck Karna with twelve keen and boar-eared arrows and a powerful Naracha like a virulent snake shot off his fulldrawn bow. Those arrows went though Karna's armour, as if drinking his blood and killing him and entered into the earth with their wings soaked with blood.
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स | चित्र + वर्मन् + इषु + वर | विदार्य | प्राणान् | निरस्यन्न् | इव | साधु | मुक्तः
कर्णस्य | पीत्वा | रुधिरं | विवेश | वसुंधरां | शोणित + वाज + दिह्
ततो वृषो बाणनिपातकोपितो; महोरगो दण्डविघट्टितो यथा तथाशुकारी व्यसृजच्छरोत्तमा;न्महाविषः सर्प इवोत्तमं विषम्
Then Vrisha, angered at the stroke of arrow like a scotched snake, discharged most powerful and quick-coursing shafts like a serpent vomiting poison. He struck Janardana with twelve and Arjuna with ninty nine arrows. And striking the latter again with a dreadful arrow Karna laughed.
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ततो | वृषो | बाण + निपात + कोपय् | महत् + उरग | दण्ड + विघट्टय् | यथा
तथा + आशुकारिन् | विसृज् + शर + उत्तम | महत् + विष | सर्प | इव + उत्तम | विषम्
जनार्दनं द्वादशभिः पराभिन;न्नवैर्नवत्या शरैस्तथार्जुनम् शरेण घोरेण पुनश्च पाण्डवं; विभिद्य कर्णोऽभ्यनदज्जहास
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जनार्दनं | द्वादशभिः | पराभिनन् | नवैर् | नवत्या | च | शरैस् | तथा + अर्जुन
शरेण | घोरेण | पुनश् | च | पाण्डवं | विभिद्य | कर्णो | ऽभ्यनदज् | जहास | च
तमस्य हर्षं ममृषे पाण्डवो; बिभेद मर्माणि ततोऽस्य मर्मवित् परं शरैः पत्रिभिरिन्द्रविक्रम;स्तथा यथेन्द्रो बलमोजसाहनत्
Pandu's son could bear his joy. Then that one, of Indra's power, acquainted with all the vitals parts, cut him to the quick with a hundred winged arrows as did Indra would Bala with great force.
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तम् | अस्य | हर्षं | ममृषे | न | पाण्डवो | बिभेद | मर्माणि | ततो | ऽस्य | मर्मन् + विद्
परं | शरैः | पत्रिभिर् | इन्द्र + विक्रम | तथा | यथा + इन्द्र | बलम् | ओजस् + हन्
ततः शराणां नवतीर्नवार्जुनः; ससर्ज कर्णेऽन्तकदण्डसंनिभाः शरैर्भृशायस्ततनुः प्रविव्यथे; तथा यथा वज्रविदारितोऽचलः
Then Arjuna shot ninety arrows each resembling Yama's rod at Karna. Wounded greatly Karna trembled like a a mountain clapped by a thunder-bolt.
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ततः | शराणां | नवतीर् | नवन् + अर्जुन | ससर्ज | कर्णे | अन्तक + दण्ड + संनिभ
शरैर् | भृश + आयस् + तनु | प्रविव्यथे | तथा | यथा | वज्र + विदारय् | ऽचलः
मणिप्रवेकोत्तमवज्रहाटकै;रलंकृतं चास्य वराङ्गभूषणम् प्रविद्धमुर्व्यां निपपात पत्रिभि;र्धनंजयेनोत्तमकुण्डलेऽपि
Karna's head dress, set with costly, gems, his most excellent other ornaments and ear rings were struck down on earth by Arjuna's winged arrows.
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मणि + प्रवेक + उत्तम + वज्र + हाटक | अलंकृतं | च + इदम् | वराङ्ग + भूषण
प्रविद्धम् | उर्व्यां | निपपात | पत्रिभिर् | धनंजय + उत्तम + कुण्डल | ऽपि | च
महाधनं शिल्पिवरैः प्रयत्नतः; कृतं यदस्योत्तमवर्म भास्वरम् सुदीर्घकालेन तदस्य पाण्डवः; क्षणेन बाणैर्बहुधा व्यशातयत्
Pandu's son cut-off in no time into pieces the costly and shinning arınour of Karna that had been prepared with great care by clever artists working for a long time.
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महाधनं | शिल्पिन् + वर | प्रयत्नतः | कृतं | यद् | इदम् + उत्तम + वर्मन् | भास्वरम्
सु + दीर्घ + काल | तद् | अस्य | पाण्डवः | क्षणेन | बाणैर् | बहुधा | व्यशातयत्
तं विवर्माणमथोत्तमेषुभिः; शरैश्चतुर्भिः कुपितः पराभिनत् विव्यथेऽत्यर्थमरिप्रहारितो; यथातुरः पित्तकफानिलव्रणैः
Then he again, in anger, struck Karna with four sharp and strong arrows who was devested of his armour. He trembled, thereat, like a person suffering from bile, wind, phlegm and fever.
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स | तं | विवर्माणम् | अथ + उत्तम + इषु | शरैश् | चतुर्भिः | कुपितः | पराभिनत्
स | विव्यथे | ऽत्यर्थम् | अरि + प्रहारय् | यथा + आतुर | पित्त + कफ + अनिल + व्रण
महाधनुर्मण्डलनिःसृतैः शितैः; क्रियाप्रयत्नप्रहितैर्बलेन ततक्ष कर्णं बहुभिः शरोत्तमै;र्बिभेद मर्मस्वपि चार्जुनस्त्वरन्
Arjuna again cut Karna to the quick with many excellent and keen arrows shot off his circling bow with force, care and skill.
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महत् + धनुस् + मण्डल + निःसृ | शितैः | क्रिया + प्रयत्न + प्रहि | बलेन | च
ततक्ष | कर्णं | बहुभिः | शर + उत्तम | बिभेद | मर्मस्व् | अपि | च + अर्जुन | त्वरन्
दृढाहतः पत्रिभिरुग्रवेगैः; पार्थेन कर्णो विविधैः शिताग्रैः बभौ गिरिर्गैरिकधातुरक्तः; क्षरन्प्रपातैरिव रक्तमम्भः
Thus wounded by Partha with many keen and powerful arrows Karna looked like a red chalk mountain with streams of red water pouring down.
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दृढ + आहन् | पत्रिभिर् | उग्र + वेग | पार्थेन | कर्णो | विविधैः | शा + अग्र
बभौ | गिरिर् | गैरिक + धातु + रक्त | क्षरन् | प्रपातैर् | इव | रक्तम् | अम्भः
साश्वं तु कर्णं सरथं किरीटी; समाचिनोद्भारत वत्सदन्तैः प्रच्छादयामास दिशश्च बाणैः; सर्वप्रयत्नात्तपनीयपुङ्खैः
Then Kiritin, O descendant of Bharata, covered Karna, his car and horses with calftoothed arrows and the ten quarters with gold winged ones.
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स + अश्व | तु | कर्णं | स + रथ | किरीटी | समाचिनोद् | भारत | वत्सदन्तैः
प्रच्छादयामास | दिशश् | च | बाणैः | सर्व + प्रयत्न | तपनीय + पुङ्ख
वत्सदन्तैः पृथुपीनवक्षाः; समाचितः स्माधिरथिर्विभाति सुपुष्पिताशोकपलाशशाल्मलि;र्यथाचलः स्पन्दनचन्दनायुतः
Wounded with those calf-toothed arrows the broad-chested son of Adiratha shone like a blossoming Asoka, Palasa or Salmali tree or a mountain leaden with sandal tree or a mountain laden with sandal trees.
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स | वत्सदन्तैः | पृथु + पीन + वक्षस् | समाचितः | स्म + आधिरथि | विभाति
सु + पुष्पित + अशोक + पलाश + शाल्मलि | यथा + अचल | स्पन्दन + चन्दन + आयुत
शरैः शरीरे बहुधा समर्पितै;र्विभाति कर्णः समरे विशां पते महीरुहैराचितसानुकन्दरो; यथा महेन्द्रः शुभकर्णिकारवान्
His body covered with numberless arrows Karna shone like the mountain-chief covered with trees or adorned with blossoming Karnikaras.
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शरैः | शरीरे | बहुधा | समर्पितैर् | विभाति | कर्णः | समरे | विशां | पते
महीरुहैर् | आचि + सानु + कन्दर | यथा | महेन्द्रः | शुभ + कर्णिकारवत्
बाणसंघान्धनुषा व्यवासृज;न्विभाति कर्णः शरजालरश्मिवान् सलोहितो रक्तगभस्तिमण्डलो; दिवाकरोऽस्ताभिमुखो यथा तथा
Discharging numberless arrows Karna, having shafts for his rays, looked like the crimson-coloured sun coursing towards the setting hill.
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स | बाण + संघ | धनुषा | व्यवासृजन् | विभाति | कर्णः | शर + जाल + रश्मिवत्
स + लोहित | रक्त + गभस्ति + मण्डल | दिवाकरो | अस्त + अभिमुख | यथा | तथा
बाह्वन्तरादाधिरथेर्विमुक्ता;न्बाणान्महाहीनिव दीप्यमानान् व्यध्वंसयन्नर्जुनबाहुमुक्ताः; शराः समासाद्य दिशः शिताग्राः
Meeting in the sky the shining and snakelike arrows discharged by Karna, these keen ones, shot by Arjuna, destroyed them.
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बाहु + अन्तर | आधिरथेर् | विमुक्तान् | बाणान् | महत् + अहि | इव | दीप्यमानान्
व्यध्वंसयन् | अर्जुन + बाहु + मुच् | शराः | समासाद्य | दिशः | शा + अग्र
ततश्चक्रमपतत्तस्य भूमौ; विह्वलः समरे सूतपुत्रः घूर्णे रथे ब्राह्मणस्याभिशापा;द्रामादुपात्तेऽप्रतिभाति चास्त्रे
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ततश् | चक्र + पत् | तस्य | भूमौ | स | विह्वलः | समरे | सूतपुत्रः
घूर्णे | रथे | ब्राह्मण + अभिशाप | रामाद् | उपात्ते | च + अस्त्र
अमृष्यमाणो व्यसनानि तानि; हस्तौ विधुन्वन्स विगर्हमाणः धर्मप्रधानानभिपाति धर्म; इत्यब्रुवन्धर्मविदः सदैव ममापि निम्नोऽद्य पाति भक्ता;न्मन्ये नित्यं परिपाति धर्मः
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अ + मृष् | व्यसनानि | तानि | हस्तौ | विधुन्वन् | स | विगर्हमाणः
धर्म + प्रधान | अभिपाति | धर्म | इत्य् | अब्रुवन् | धर्म + विद् | सदा + एव
मद् + अपि | निम्नो | ऽद्य | न | पाति | भक्तान् | मन्ये | न | नित्यं | परिपाति | धर्मः
एवं ब्रुवन्प्रस्खलिताश्वसूतो; विचाल्यमानोऽर्जुनशस्त्रपातैः मर्माभिघाताच्छलितः क्रियासु; पुनः पुनर्धर्ममगर्हदाजौ
While he gave vent to these words he was greatly assailed by Arjuna's shafts. His horses and charioteer were dislodged. He was cut to the quick and became careless about his doings. He again and again spoke ill of virtue in the battle-field.
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एवं | ब्रुवन् | प्रस्खल् + अश्व + सूत | विचाल्यमानो | अर्जुन + शस्त्र + पात
मर्मन् + अभिघात | चलितः | क्रियासु | पुनः | पुनर् | धर्मम् | अगर्हद् | आजौ
ततः शरैर्भीमतरैरविध्यत्त्रिभिराहवे हस्ते कर्णस्तदा पार्थमभ्यविध्यच्च सप्तभिः
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ततः | शरैर् | भीमतरैर् | अविध्यत् | त्रिभिर् | आहवे
हस्ते | कर्णस् | तदा | पार्थम् | अभ्यविध्यच् | च | सप्तभिः
ततोऽर्जुनः सप्तदश तिग्मतेजानजिह्मगान् इन्द्राशनिसमान्घोरानसृजत्पावकोपमान्
He struck Krishna's arm with three dreadful arrows and Arjuna with seven. Arjuna then discharged seventeen dreadful, straightcoursing and forcible arrows effulgent like fire and resembling Indra's thunder-bolt in impetuosity.
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ततो | ऽर्जुनः | सप्तदश | तिग्म + तेज | अजिह्मगान्
इन्द्र + अशनि + सम | घोरान् | असृजत् | पावक + उपम
निर्भिद्य ते भीमवेगा न्यपतन्पृथिवीतले कम्पितात्मा तथा कर्णः शक्त्या चेष्टामदर्शयत्
Those powerful and dreadful arrows went through Karna's body and dropped on the surface of the earth. Trembling threat Karna showed his activity to the very best of his power.
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निर्भिद्य | ते | भीम + वेग | न्यपतन् | पृथिवी + तल
कम्प् + आत्मन् | तथा | कर्णः | शक्त्या | चेष्टाम् | अदर्शयत्
बलेनाथ संस्तभ्य ब्रह्मास्त्रं समुदैरयत् ऐन्द्रास्त्रमर्जुनश्चापि तद्दृष्ट्वाभिन्यमन्त्रयत्
Controlling himself with great exertion he brought the Brahma weapon into requisition beholding which Arjuna invoked the weapon given him by Indra with becoming mantras.
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बल + अथ | स | संस्तभ्य | ब्रह्मास्त्रं | समुदैरयत्
ऐन्द्र + अस्त्र | अर्जुनश् | च + अपि | तद् | दृश् + अभिनिमन्त्रय्
गाण्डीवं ज्यां बाणांश्च अनुमन्त्र्य धनंजयः असृजच्छरवर्षाणि वर्षाणीव पुरंदरः
Then inspiring his Gandiva, its strings and arrows with mantras that repressor of enemies discharged arrows like Indra pouring down torrents of rain.
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गाण्डीवं | ज्यां | च | बाणांश् | च | अनुमन्त्र्य | धनंजयः
सृज् + शर + वर्ष | वर्ष + इव | पुरंदरः
ततस्तेजोमया बाणा रथात्पार्थस्य निःसृताः प्रादुरासन्महावीर्याः कर्णस्य रथमन्तिकात्
Coming out of Arjuna's car those powerful and terrific arrows appeared near Karna's.
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ततस् | तेजस् + मय | बाणा | रथात् | पार्थस्य | निःसृताः
प्रादुरासन् | महत् + वीर्य | कर्णस्य | रथम् | अन्तिकात्
तान्कर्णस्त्वग्रतोऽभ्यस्तान्मोघांश्चक्रे महारथः ततोऽब्रवीद्वृष्णिवीरस्तस्मिन्नस्त्रे विनाशिते
That great car-warrior baffled those arrows which appeared before him. Seeing the arrows
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तान् | कर्णस् | त्व् | अग्रतो | ऽभ्यस्तान् | मोघांश् | चक्रे | महत् + रथ
ततो | ऽब्रवीद् | वृष्णि + वीर | तस्मिन्न् | अस्त्रे | विनाशिते
विसृजास्त्रं परं पार्थ राधेयो ग्रसते शरान् ब्रह्मास्त्रमर्जुनश्चापि संमन्त्र्याथ प्रयोजयत्
Discharge more powerful weapons, O Partha, Karna makes these your arrows powerless." Then duly invoking it with mantras Arjuna set the Brahma weapon on his string.
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विसृज् + अस्त्र | परं | पार्थ | राधेयो | ग्रसते | शरान्
ब्रह्मास्त्रम् | अर्जुनश् | च + अपि | सम्मन्त्रय् + अथ | प्रयोजयत्
छादयित्वा ततो बाणैः कर्णं प्रभ्राम्य चार्जुनः तस्य कर्णः शरैः क्रुद्धश्चिच्छेद ज्यां सुतेजनैः
Then covering all the directions with arrows he struck Karna with many. Then with a number of whetted arrows of great power Karna sundered the string of Arjuna's bow.
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छादयित्वा | ततो | बाणैः | कर्णं | प्रभ्राम्य | च + अर्जुन
तस्य | कर्णः | शरैः | क्रुद्धश् | चिछेद | ज्यां | सु + तेजन
ततो ज्यामवधायान्यामनुमृज्य पाण्डवः शरैरवाकिरत्कर्णं दीप्यमानैः सहस्रशः
Then setting another string to his bow and shooting innumerable shafts, Arjuna covered Karna with arrows resembly fiery-mouthed serpents.
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ततो | ज्याम् | अवधा + अन्य | अनुमृज्य | च | पाण्डवः
शरैर् | अवाकिरत् | कर्णं | दीप्यमानैः | सहस्रशः
तस्य ज्याच्छेदनं कर्णो ज्यावधानं संयुगे नान्वबुध्यत शीघ्रत्वात्तदद्भुतमिवाभवत्
So quickly did Arjuna replace his strings that Karna could not perceive when one was broken and another replaced. The feat was highly wonderful to him.
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तस्य | ज्या + छेदन | कर्णो | ज्या + अवधान | च | संयुगे
न + अनुबुध् | शीघ्र + त्व | तद् | अद्भुतम् | इव + भू
अस्त्रैरस्त्राणि राधेयः प्रत्यहन्सव्यसाचिनः चक्रे चाभ्यधिकं पार्थात्स्ववीर्यं प्रतिदर्शयन्
Radha's son, however, nullified all the arrows of Savyasachin. With his power he got better of Arjuna for the time being.
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अस्त्रैर् | अस्त्राणि | राधेयः | प्रत्यहन् | सव्यसाचिनः
चक्रे | च + अभ्यधिक | पार्थात् | स्व + वीर्य | प्रतिदर्शयन्
ततः कृष्णोऽर्जुनं दृष्ट्वा कर्णास्त्रेणाभिपीडितम् अभ्यस्येत्यब्रवीत्पार्थमातिष्ठास्त्रमनुत्तमम्
Seeing Arjuna thus assailed with Karna's arrows Krishna said to him "Go nearer to Karna and strike him with more powerful weapons."
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ततः | कृष्णो | ऽर्जुनं | दृष्ट्वा | कर्ण + अस्त्र + अभिपीडय्
अभ्यस् + इति | अब्रवीत् | पार्थम् | आस्था + अस्त्र | अनुत्तमम्
ततोऽन्यमग्निसदृशं शरं सर्पविषोपमम् अश्मसारमयं दिव्यमनुमन्त्र्य धनंजयः
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ततो | ऽन्यम् | अग्नि + सदृश | शरं | सर्प + विष + उपम
अश्मसार + मय | दिव्यम् | अनुमन्त्र्य | धनंजयः
रौद्रमस्त्रं समादाय क्षेप्तुकामः किरीटवान् ततोऽग्रसन्मही चक्रं राधेयस्य महामृधे
Worked up with anger Arjuna invoked the aid of another celestial weapon with mantras which was effulgent like fire, dreadful like venom and hard like adamant. Then uniting it with Raudra weapon he was about to hurl it at his enemy when the earth swallowed up one of the wheels of Karna's car.
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रौद्रम् | अस्त्रं | समादाय | क्षेप्तु + काम | किरीटवान्
ततो | ऽग्रसन् | मही | चक्रं | राधेयस्य | महत् + मृध
ग्रस्तचक्रस्तु राधेयः कोपादश्रूण्यवर्तयत् सोऽब्रवीदर्जुनं चापि मुहूर्तं क्षम पाण्डव
Seeing his wheel thus sunk, Karna wept in anger. And seeing Arjuna before him, he, worked up with
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ग्रस् + चक्र | तु | राधेयः | कोपाद् | अश्रूण्य् | अवर्तयत्
सो | ऽब्रवीद् | अर्जुनं | च + अपि | मुहूर्तं | क्षम | पाण्डव
मध्ये चक्रमवग्रस्तं दृष्ट्वा दैवादिदं मम पार्थ कापुरुषाचीर्णमभिसंधिं विवर्जय
Seeing my wheel thus accidentally sunken you should give up your idea which is cherished by a coward only.
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मध्ये | चक्रम् | अवग्रस्तं | दृष्ट्वा | दैवाद् | इदं | मम
पार्थ | कापुरुष + आचर् | अभिसंधिं | विवर्जय
प्रकीर्णकेशे विमुखे ब्राह्मणे कृताञ्जलौ शरणागते न्यस्तशस्त्रे तथा व्यसनगेऽर्जुन
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प्रक्￞ + केश | विमुखे | ब्राह्मणे | च | कृताञ्जलौ
शरण + आगम् | न्यस् + शस्त्र | तथा | व्यसन + ग | ऽर्जुन
अबाणे भ्रष्टकवचे भ्रष्टभग्नायुधे तथा शूराः प्रहरन्त्याजौ राज्ञे पार्थिवास्तथा त्वं शूरोऽसि कौन्तेय तस्मात्क्षम मुहूर्तकम्
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अ + बाण | भ्रंश् + कवच | भ्रंश् + भञ्ज् + आयुध | तथा
न | शूराः | प्रहरन्त्य् | आजौ | न | राज्ञे | पार्थिवास् | तथा
त्वं | च | शूरो | ऽसि | कौन्तेय | तस्मात् | क्षम | मुहूर्तकम्
यावच्चक्रमिदं भूमेरुद्धरामि धनंजय मां रथस्थो भूमिष्ठमसज्जं हन्तुमर्हसि वासुदेवात्त्वत्तो वा पाण्डवेय बिभेम्यहम्
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यावच् | चक्रम् | इदं | भूमेर् | उद्धरामि | धनंजय
न | मां | रथ + स्थ | भूमिष्ठम् | अ + सज्ज | हन्तुम् | अर्हसि
न | वासुदेवात् | त्वत्तो | वा | पाण्डवेय | बिभेम्य् | अहम्
त्वं हि क्षत्रियदायादो महाकुलविवर्धनः स्मृत्वा धर्मोपदेशं त्वं मुहूर्तं क्षम पाण्डव
Neither Krishna, nor you fear me the least. You are a Kshatriya and the scion of an illustrious family. Remembering the dictates of virtue, excuse me for a moment, O son of Pandu.
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त्वं | हि | क्षत्रिय + दायाद | महत् + कुल + विवर्धन
सो | ऽब्रवीद् | अर्जुनं | च + अपि | मुहूर्तं | क्षम | पाण्डव