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Currently viewing: Parva 5 -
Chapter 5.137
(22 verses)
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Sanskrit Text
वास
एव
यथा
हि
त्वं
प्रावृण्वानोऽद्य
मन्यसे
।
स्रजं
त्यक्तामिव
प्राप्य
लोभाद्यौधिष्ठिरीं
श्रियम्
॥
Padaccheda (Word Analysis)
वास | एव | यथा | हि | त्वं | प्रावृण्वानो | ऽद्य | मन्यसे
स्रजं | त्यक्ताम् | इव | प्राप्य | लोभाद् | यौधिष्ठिरीं | श्रियम्
स्रजं | त्यक्ताम् | इव | प्राप्य | लोभाद् | यौधिष्ठिरीं | श्रियम्