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Currently viewing: Parva 5 - Chapter 5.137 (22 verses)
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Chapter 5.137

एवमुक्तस्तु विमनास्तिर्यग्दृष्टिरधोमुखः संहत्य भ्रुवोर्मध्यं किंचिद्व्याजहार
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एवम् | वच् + तु | विमनस् + तिर्यञ्च् + दृष्टि | अधोमुखः
दुःख + आर्त | भरत + श्रेष्ठ | न | किंचिद् | व्याजहार | ह
तं वै विमनसं दृष्ट्वा संप्रेक्ष्यान्योन्यमन्तिकात् पुनरेवोत्तरं वाक्यमुक्तवन्तौ नरर्षभौ
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तं | वै | विमनसं | दृष्ट्वा | सम्प्रेक्ष् + अन्योन्य | अन्तिकात्
पुनर् | एव + उत्तर | वाक्यम् | उक्तवन्तौ | नर + ऋषभ
शुश्रूषुमनसूयं ब्रह्मण्यं सत्यसंगरम् प्रतियोत्स्यामहे पार्थमतो दुःखतरं नु किम्
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शुश्रूषुम् | अनसूयं | च | ब्रह्मण्यं | सत्य + संगर
प्रतियोत्स्यामहे | पार्थम् | अतो | दुःखतरं | नु | किम्
अश्वत्थाम्नि यथा पुत्रे भूयो मम धनंजये बहुमानः परो राजन्संनतिश्च कपिध्वजे
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अश्वत्थाम्नि | यथा | पुत्रे | भूयो | मम | धनंजये
बहु + मान | परो | राजन् | संनति + च | कपिध्वजे
तं चेत्पुत्रात्प्रियतरं प्रतियोत्स्ये धनंजयम् क्षत्रधर्ममनुष्ठाय धिगस्तु क्षत्रजीविकाम्
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तं | चेत् | पुत्रात् | प्रियतरं | प्रतियोत्स्ये | धनंजयम्
क्षत्र + धर्म | अनुष्ठाय | धिग् | अस्तु | क्षत्र + जीविका
यस्य लोके समो नास्ति कश्चिदन्यो धनुर्धरः मत्प्रसादात्स बीभत्सुः श्रेयानन्यैर्धनुर्धरैः
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न | हि + इदम् | त्रिषु | लोकेषु | सदृशो | ऽस्ति | धनुर्धरः
मद् + प्रसाद | स | बीभत्सुः | श्रेयान् | अन्यैर् | धनुर्धरैः
मित्रध्रुग्दुष्टभावश्च नास्तिकोऽथानृजुः शठः सत्सु लभते पूजां यज्ञे मूर्ख इवागतः
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मित्र + द्रुह् | दुष् + भाव + च | नास्तिको | अथ + अनृजु | शठः
न | सत्सु | लभते | पूजां | यज्ञे | मूर्ख | इव + आगम्
वार्यमाणोऽपि पापेभ्यः पापात्मा पापमिच्छति चोद्यमानोऽपि पापेन शुभात्मा शुभमिच्छति
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वार्यमाणो | ऽपि | पापेभ्यः | पाप + आत्मन् | पापम् | इच्छति
वार्यमाणो | ऽपि | पापेभ्यः | पाप + आत्मन् | पापम् | इच्छति
मिथ्योपचरिता ह्येते वर्तमाना ह्यनु प्रिये अहितत्वाय कल्पन्ते दोषा भरतसत्तम
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मिथ्या + उपचर् | हि + एतद् | वर्तमाना | हि + अनु | प्रिये
न | हि | त्वाम् | उत्सहे | वक्तुं | भूयो | भरत + सत्तम
त्वमुक्तः कुरुवृद्धेन मया विदुरेण वासुदेवेन तथा श्रेयो नैवाभिपद्यसे
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त्वम् | उक्तः | कुरुवृद्धेन | मया | च | विदुरेण | च
वासुदेवेन | च | तथा | श्रेयो | न + एव + अभिपद्
अस्ति मे बलमित्येव सहसा त्वं तितीर्षसि सग्राहनक्रमकरं गङ्गावेगमिवोष्णगे
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अस्ति | मे | बलम् | इति + एव | सहसा | त्वं | तितीर्षसि
स + ग्राह + नक्र + मकर | गङ्गा + वेग | इव + उष्णग
वास एव यथा हि त्वं प्रावृण्वानोऽद्य मन्यसे स्रजं त्यक्तामिव प्राप्य लोभाद्यौधिष्ठिरीं श्रियम्
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वास | एव | यथा | हि | त्वं | प्रावृण्वानो | ऽद्य | मन्यसे
स्रजं | त्यक्ताम् | इव | प्राप्य | लोभाद् | यौधिष्ठिरीं | श्रियम्
द्रौपदीसहितं पार्थं सायुधैर्भ्रातृभिर्वृतम् वनस्थमपि राज्यस्थः पाण्डवं कोऽतिजीवति
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द्रौपदी + सहित | पार्थं | स + आयुध | भ्रातृभिर् | वृतम्
वन + स्थ | अपि | राज्य + स्थ | पाण्डवं | को | ऽतिजीवति
निदेशे यस्य राजानः सर्वे तिष्ठन्ति किंकराः तमैलविलमासाद्य धर्मराजो व्यराजत
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नाभि + मध्य | शरीरस्य | प्राणाः | सर्वे | प्रतिष्ठिताः
तम् | ऐलविलम् | आसाद्य | धर्मराजो | व्यराजत
कुबेरसदनं प्राप्य ततो रत्नान्यवाप्य स्फीतमाक्रम्य ते राष्ट्रं राज्यमिच्छन्ति पाण्डवाः
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कुबेर + सदन | प्राप्य | ततो | रत्न + अवाप् | च
स्फीतम् | आक्रम्य | ते | राष्ट्रं | राज्यम् | इच्छन्ति | पाण्डवाः
दत्तं हुतमधीतं ब्राह्मणास्तर्पिता धनैः आवयोर्गतमायुश्च कृतकृत्यौ विद्धि नौ
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दत्तं | हुतम् | अधीतं | च | ब्राह्मण + तर्पय् | धनैः
आवयोर् | गतम् | आयुस् + च | कृतकृत्यौ | च | विद्धि | नौ
त्वं तु हित्वा सुखं राज्यं मित्राणि धनानि विग्रहं पाण्डवैः कृत्वा महद्व्यसनमाप्स्यसि
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त्वं | तु | हित्वा | सुखं | राज्यं | मित्राणि | च | धनानि | च
विग्रहं | पाण्डवैः | कृत्वा | महद् | व्यसनम् | आप्स्यसि
द्रौपदी यस्य चाशास्ते विजयं सत्यवादिनी तपोघोरव्रता देवी त्वं जेष्यसि पाण्डवम्
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द्रौपदी | यस्य | च + आशास् | विजयं | सत्य + वादिन्
तपस् + घोर + व्रत | देवी | न | त्वं | जेष्यसि | पाण्डवम्
मन्त्री जनार्दनो यस्य भ्राता यस्य धनंजयः सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं कथं जेष्यसि पाण्डवम्
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भवता | संगमो | यस्य | भ्राता | यस्य | धनंजयः
भैमि | धर्म + भृत् | श्रेष्ठं | द्रक्ष्यसे | विगम् + ज्वर
सहाया ब्राह्मणा यस्य धृतिमन्तो जितेन्द्रियाः तमुग्रतपसं वीरं कथं जेष्यसि पाण्डवम्
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शूर + च | कृतविद्य + च | बुद्धिमन्तो | जि + इन्द्रिय
तपस् + घोर + व्रत | देवी | न | त्वं | जेष्यसि | पाण्डवम्
पुनरुक्तं वक्ष्यामि यत्कार्यं भूतिमिच्छता सुहृदा मज्जमानेषु सुहृत्सु व्यसनार्णवे
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पुनर् | उक्तं | च | वक्ष्यामि | त्वं | राधेय | निबोध | तत्
सुहृदा | मज्जमानेषु | सुहृत्सु | व्यसन + अर्णव
अलं युद्धेन तैर्वीरैः शाम्य त्वं कुरुवृद्धये मा गमः ससुतामात्यः सबलश्च पराभवम्
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अलं | युद्धेन | तैर् | वीरैः | शाम्य | त्वं | कुरु + वृद्धि
मा | गमः | स + सुत + अमात्य | ऽत्ययं | पुत्रान् | अनुभ्रमन्