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Currently viewing: Parva 3 -
Chapter 3.86
(24 verses)
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Sanskrit Text
तत्रैव
तृणसोमाग्नेः
संपन्नफलमूलवान्
।
आश्रमोऽगस्त्यशिष्यस्य
पुण्यो
देवसभे
गिरौ
॥
Padaccheda (Word Analysis)
तत्र + एव | तृण + सोम + अग्नि | सम्पद् + फल + मूलवत्
आश्रमो | अगस्त्य + शिष्य | पुण्यो | देवसभे | गिरौ
आश्रमो | अगस्त्य + शिष्य | पुण्यो | देवसभे | गिरौ