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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.86 (24 verses)
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Chapter 3.86

दक्षिणस्यां तु पुण्यानि शृणु तीर्थानि भारत विस्तरेण यथाबुद्धि कीर्त्यमानानि भारत
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दक्षिणस्यां | तु | पुण्यानि | शृणु | तीर्थानि | भारत
तेषां | तु | ते | यथामुख्यं | कीर्तयिष्यामि | भारत
यस्यामाख्यायते पुण्या दिशि गोदावरी नदी बह्वारामा बहुजला तापसाचरिता शुभा
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यस्याम् | आख्यायते | पुण्या | दिशि | गोदावरी | नदी
बहु + आराम | बहु + जल | तापस + आचर् | शुभा
वेण्णा भीमरथी चोभे नद्यौ पापभयापहे मृगद्विजसमाकीर्णे तापसालयभूषिते
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वेण्णा | भीमरथी | च + उभ् | नद्यौ | पाप + भय + अपह
मृग + द्विज + समाकृ | तापस + आलय + भूषय्
राजर्षेस्तत्र सरिन्नृगस्य भरतर्षभ रम्यतीर्था बहुजला पयोष्णी द्विजसेविता
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राजन् + ऋषि | तत्र | च | सरित् + नृग | भरत + ऋषभ
रम्य + तीर्थ | बहु + जल | पयोष्णी | द्विज + सेव्
अपि चात्र महायोगी मार्कण्डेयो महातपाः अनुवंश्यां जगौ गाथां नृगस्य धरणीपतेः
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अपि | च + अत्र | महत् + योगिन् | मार्कण्डेयो | महत् + तपस्
अनुवंश्यां | जगौ | गाथां | नृगस्य | धरणी + पति
नृगस्य यजमानस्य प्रत्यक्षमिति नः श्रुतम् अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः
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नृगस्य | यजमानस्य | प्रत्यक्षम् | इति | नः | श्रुतम्
अमाद्यद् | इन्द्रः | सोमेन | दक्षिणाभिर् | द्विजातयः
माठरस्य वनं पुण्यं बहुमूलफलं शिवम् यूपश्च भरतश्रेष्ठ वरुणस्रोतसे गिरौ
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माठरस्य | वनं | पुण्यं | बहु + मूल + फल | शिवम्
यूपश् | च | भरत + श्रेष्ठ | वरुणस्रोतसे | गिरौ
प्रवेण्युत्तरपार्श्वे तु पुण्ये कण्वाश्रमे तथा तापसानामरण्यानि कीर्तितानि यथाश्रुति
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प्रवेणी + उत्तर + पार्श्व | तु | पुण्ये | कण्वाश्रमे | तथा
तापसानाम् | अरण्यानि | कीर्तितानि | यथाश्रुति
वेदी शूर्पारके तात जमदग्नेर्महात्मनः रम्या पाषाणतीर्था पुरश्चन्द्रा भारत
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वेदी | शूर्पारके | तात | जमदग्नेर् | महात्मनः
रम्या | पाषाण + तीर्थ | च | पुरश्चन्द्रा | च | भारत
अशोकतीर्थं मर्त्येषु कौन्तेय बहुलाश्रमम् अगस्त्यतीर्थं पाण्ड्येषु वारुणं युधिष्ठिर
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अशोकतीर्थं | मर्त्येषु | कौन्तेय | बहुल + आश्रम
एवम् | अस् + इति | तं | च + अपि | प्रत्युवाच | युधिष्ठिरः
कुमार्यः कथिताः पुण्याः पाण्ड्येष्वेव नरर्षभ ताम्रपर्णीं तु कौन्तेय कीर्तयिष्यामि तां शृणु
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कुमार्यः | कथिताः | पुण्याः | पाण्ड्य + एव | नर + ऋषभ
ताम्रपर्णीं | तु | कौन्तेय | कीर्तयिष्यामि | तां | शृणु
यत्र देवैस्तपस्तप्तं महदिच्छद्भिराश्रमे गोकर्णमिति विख्यातं त्रिषु लोकेषु भारत
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यत्र | देवैस् | तपस् | तप्तं | महद् | इच्छद्भिर् | आश्रमे
न | तस्याः | सदृशं | कंचित् | त्रिषु | लोकेषु | भारत
शीततोयो बहुजलः पुण्यस्तात शिवश्च सः ह्रदः परमदुष्प्रापो मानुषैरकृतात्मभिः
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शीत + तोय | बहु + जल | पुण्यस् | तात | शिवश् | च | सः
ह्रदः | परम + दुष्प्राप | मानुषैर् | अकृतात्मभिः
तत्रैव तृणसोमाग्नेः संपन्नफलमूलवान् आश्रमोऽगस्त्यशिष्यस्य पुण्यो देवसभे गिरौ
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तत्र + एव | तृण + सोम + अग्नि | सम्पद् + फल + मूलवत्
आश्रमो | अगस्त्य + शिष्य | पुण्यो | देवसभे | गिरौ
वैडूर्यपर्वतस्तत्र श्रीमान्मणिमयः शिवः अगस्त्यस्याश्रमश्चैव बहुमूलफलोदकः
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वैडूर्य + पर्वत | तत्र | श्रीमान् | मणि + मय | शिवः
अगस्त्य + आश्रम | च + एव | बहु + मूलफल + उदक
सुराष्ट्रेष्वपि वक्ष्यामि पुण्यान्यायतनानि आश्रमान्सरितः शैलान्सरांसि नराधिप
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दृष्टवान् | पर्वत + श्रेष्ठ | पुण्य + आयतन | च
आश्रमान् | सरितः | शैलान् | सरांसि | च | नर + अधिप
चमसोन्मज्जनं विप्रास्तत्रापि कथयन्त्युत प्रभासं चोदधौ तीर्थं त्रिदशानां युधिष्ठिर
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चमस + उन्मज्जन | विप्रास् | तत्र + अपि | कथय् + उत
तत्र | मासं | वसेद् | वीर | सरस्वत्यां | युधिष्ठिर
तत्र पिण्डारकं नाम तापसाचरितं शुभम् उज्जयन्तश्च शिखरी क्षिप्रं सिद्धिकरो महान्
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तत्र | पिण्डारकं | नाम | तापस + आचर् | शुभम्
उज्जयन्तश् | च | शिखरी | क्षिप्रं | सिद्धि + कर | महान्
तत्र देवर्षिवर्येण नारदेनानुकीर्तितः पुराणः श्रूयते श्लोकस्तं निबोध युधिष्ठिर
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तत्र | देव + ऋषि + वर्य | नारद + अनुकीर्तय्
पुराणः | श्रूयते | श्लोकस् | तं | निबोध | युधिष्ठिर
पुण्ये गिरौ सुराष्ट्रेषु मृगपक्षिनिषेविते उज्जयन्ते स्म तप्ताङ्गो नाकपृष्ठे महीयते
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पुण्ये | गिरौ | सुराष्ट्रेषु | मृग + पक्षिन् + निषेव्
पूयन्ते | सर्व + पाप | नाक + पृष्ठ | च | पूज्यते
पुण्या द्वारवती तत्र यत्रास्ते मधुसूदनः साक्षाद्देवः पुराणोऽसौ हि धर्मः सनातनः
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पुण्या | द्वारवती | तत्र | यत्र + आस् | मधुसूदनः
साक्षाद् | देवः | पुराणो | ऽसौ | स | हि | धर्मः | सनातनः
ये वेदविदो विप्रा ये चाध्यात्मविदो जनाः ते वदन्ति महात्मानं कृष्णं धर्मं सनातनम्
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ये | च | वेद + विद् | विप्रा | ये | च + अध्यात्म + विद् | जनाः
एष | ते | विहितो | राजन् | धात्रा | धर्मः | सनातनः
पवित्राणां हि गोविन्दः पवित्रं परमुच्यते पुण्यानामपि पुण्योऽसौ मङ्गलानां मङ्गलम्
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पवित्राणां | हि | गोविन्दः | पवित्रं | परम् | उच्यते
पुण्यानाम् | अपि | पुण्यो | ऽसौ | मङ्गलानां | च | मङ्गलम्
त्रैलोक्यं पुण्डरीकाक्षो देवदेवः सनातनः आस्ते हरिरचिन्त्यात्मा तत्रैव मधुसूदनः
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त्रैलोक्यं | पुण्डरीकाक्षो | देवदेवः | सनातनः
आस्ते | हरिर् | अचिन्त्य + आत्मन् | तत्र + एव | मधुसूदनः