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Currently viewing: Parva 7 - Chapter 7.67 (71 verses)
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Chapter 7.67

संनिरुद्धस्तु तैः पार्थो महाबलपराक्रमः द्रुतं समनुयातश्च द्रोणेन रथिनां वरः
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संनिरुध् + तु | तैः | पार्थो | महत् + बल + पराक्रम
द्रुतं | समनुया + च | द्रोणेन | रथिनां | वरः
किरन्निषुगणांस्तीक्ष्णान्स्वरश्मीनिव भास्करः तापयामास तत्सैन्यं देहं व्याधिगणो यथा
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किरन्न् | इषु + गण + तीक्ष्ण | स्व + रश्मि | इव | भास्करः
तापयामास | तत् | सैन्यं | देहं | व्याधि + गण | यथा
अश्वो विद्धो ध्वजश्छिन्नः सारोहः पतितो गजः छत्राणि चापविद्धानि रथाश्चक्रैर्विना कृताः
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अश्वो | विद्धो | ध्वज + छिद् | स + आरोह | पतितो | गजः
छत्राणि | च + अपव्यध् | रथ + चक्र | विना | कृताः
विद्रुतानि सैन्यानि शरार्तानि समन्ततः इत्यासीत्तुमुलं युद्धं प्राज्ञायत किंचन
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उत्था + अगणेय | कबन्धानि | समन्ततः
इति + अस् | तुमुलं | युद्धं | न | प्राज्ञायत | किंचन
तेषामायच्छतां संख्ये परस्परमजिह्मगैः अर्जुनो ध्वजिनीं राजन्नभीक्ष्णं समकम्पयत्
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तेषाम् | आयच्छतां | संख्ये | परस्परम् | अजिह्मगैः
अर्जुनो | ध्वजिनीं | राजन्न् | अभीक्ष्णं | समकम्पयत्
सत्यां चिकीर्षमाणस्तु प्रतिज्ञां सत्यसंगरः अभ्यद्रवद्रथश्रेष्ठं शोणाश्वं श्वेतवाहनः
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उत्सहन्ते | ऽन्यथा | कर्तुं | प्रतिज्ञां | सव्यसाचिनः
अभ्यद्रवद् | रथ + श्रेष्ठ | शोणाश्वं | श्वेतवाहनः
तं द्रोणः पञ्चविंशत्या मर्मभिद्भिरजिह्मगैः अन्तेवासिनमाचार्यो महेष्वासं समर्दयत्
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तं | द्रोणः | पञ्चविंशत्या | मर्मन् + भिद् | अजिह्मगैः
अन्तेवासिनम् | आचार्यो | महत् + इष्वास | समर्दयत्
तं तूर्णमिव बीभत्सुः सर्वशस्त्रभृतां वरः अभ्यधावदिषूनस्यन्निषुवेगविघातकान्
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तं | तूर्णम् | इव | बीभत्सुः | सर्व + शस्त्रभृत् | वरः
अभ्यधावद् | इषून् | अस्यन्न् | इषु + वेग + विघातक
तस्याशु क्षिपतो भल्लान्भल्लैः संनतपर्वभिः प्रत्यविध्यदमेयात्मा ब्रह्मास्त्रं समुदीरयन्
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आच्छिद् + उत्तमाङ्ग | भल्लैः | संनम् + पर्वन्
प्रत्यविध्यद् | अमेय + आत्मन् | ब्रह्मास्त्रं | समुदीरयन्
तदद्भुतमपश्याम द्रोणस्याचार्यकं युधि यतमानो युवा नैनं प्रत्यविध्यद्यदर्जुनः
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तद् | अद्भुतम् | अपश्याम | द्रोण + आचार्यक | युधि
यतमानो | युवा | न + एनद् | प्रत्यविध्यद् | यद् | अर्जुनः
क्षरन्निव महामेघो वारिधाराः सहस्रशः द्रोणमेघः पार्थशैलं ववर्ष शरवृष्टिभिः
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क्षरन्न् | इव | महत् + मेघ | वारि + धारा | सहस्रशः
द्रोण + मेघ | पार्थ + शैल | ववर्ष | शर + वृष्टि
अर्जुनः शरवर्षं तद्ब्रह्मास्त्रेणैव मारिष प्रतिजग्राह तेजस्वी बाणैर्बाणान्विशातयन्
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अर्जुनः | शर + वर्ष | तद् | ब्रह्मास्त्र + एव | मारिष
प्रतिजग्राह | तेजस्वी | बाणैर् | बाणान् | विशातयन्
द्रोणस्तु पञ्चविंशत्या श्वेतवाहनमार्दयत् वासुदेवं सप्तत्या बाह्वोरुरसि चाशुगैः
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द्रोण + तु | पञ्चभिर् | बाणैर् | वासुदेवम् | अताडयत्
वासुदेवं | च | सप्तत्या | बाह्वोर् | उरसि | च + आशुग
पार्थस्तु प्रहसन्धीमानाचार्यं शरौघिणम् विसृजन्तं शितान्बाणानवारयत तं युधि
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पार्थ + तु | प्रहसन् | धीमान् | आचार्यं | स | शर + ओघिन्
विसृजन्तं | शितान् | बाणान् | अवारयत | तं | युधि
अथ तौ वध्यमानौ तु द्रोणेन रथसत्तमौ आवर्जयेतां दुर्धर्षं युगान्ताग्निमिवोत्थितम्
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अथ | तौ | वध्यमानौ | तु | द्रोणेन | रथ + सत्तम
आवर्जयेतां | दुर्धर्षं | युग + अन्त + अग्नि | इव + उत्था
वर्जयन्निशितान्बाणान्द्रोणचापविनिःसृतान् किरीटमाली कौन्तेयो भोजानीकं न्यपातयत्
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वर्जय् + निशा | बाणान् | द्रोण + चाप + विनिःसृ
किरीटमाली | कौन्तेयो | भोज + अनीक | न्यपातयत्
सोऽन्तरा कृतवर्माणं काम्बोजं सुदक्षिणम् अभ्ययाद्वर्जयन्द्रोणं मैनाकमिव पर्वतम्
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सो | ऽन्तरा | कृतवर्माणं | काम्बोजं | च | सुदक्षिणम्
अभ्ययाद् | वर्जयन् | द्रोणं | मैनाकम् | इव | पर्वतम्
ततो भोजो नरव्याघ्रं दुःसहः कुरुसत्तम अविध्यत्तूर्णमव्यग्रो दशभिः कङ्कपत्रिभिः
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ततो | भोजो | नर + व्याघ्र | दुःसहः | कुरुसत्तम
अविध्यत् | तूर्णम् | अव्यग्रो | दशभिः | कङ्क + पत्त्रिन्
तमर्जुनः शितेनाजौ राजन्विव्याध पत्रिणा पुनश्चान्यैस्त्रिभिर्बाणैर्मोहयन्निव सात्वतम्
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तम् | अर्जुनः | शा + आजि | राजन् | विव्याध | पत्रिणा
पुनर् + च + अन्य + त्रि | बाणैर् | मोहयन्न् | इव | सात्वतम्
भोजस्तु प्रहसन्पार्थं वासुदेवं माधवम् एकैकं पञ्चविंशत्या सायकानां समार्पयत्
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भोज + तु | प्रहसन् | पार्थं | वासुदेवं | च | माधवम्
एकैकं | पञ्चविंशत्या | सायकानां | समार्पयत्
तस्यार्जुनो धनुश्छित्त्वा विव्याधैनं त्रिसप्तभिः शरैरग्निशिखाकारैः क्रुद्धाशीविषसंनिभैः
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तद् + अर्जुन | धनुस् + छिद् | व्यध् + एनद् | त्रि + सप्तन्
शरैर् | अग्नि + शिखा + आकार | क्रुध् + आशीविष + संनिभ
अथान्यद्धनुरादाय कृतवर्मा महारथः पञ्चभिः सायकैस्तूर्णं विव्याधोरसि भारत
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अथ + अन्य | धनुर् | आदाय | कृतवर्मा | महत् + रथ
पञ्चभिः | सायक + तूर्णम् | व्यध् + उरस् | भारत
पुनश्च निशितैर्बाणैः पार्थं विव्याध पञ्चभिः तं पार्थो नवभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे
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पुनर् + च | निशितैर् | बाणैः | पार्थं | विव्याध | पञ्चभिः
तं | पार्थो | नवभिर् | बाणैर् | आजघान | स्तनान्तरे
विषक्तं दृश्य कौन्तेयं कृतवर्मरथं प्रति चिन्तयामास वार्ष्णेयो नः कालात्ययो भवेत्
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विषक्तं | दृश्य | कौन्तेयं | कृतवर्मन् + रथ | प्रति
पार्थ | पार्थ | महत् + बाहु | न | नः | काल + अत्यय | भवेत्
ततः कृष्णोऽब्रवीत्पार्थं कृतवर्मणि मा दयाम् कुरुसांबन्धिकं कृत्वा प्रमथ्यैनं विशातय
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ततः | कृष्णो | ऽब्रवीत् | पार्थं | कृतवर्मणि | मा | दयाम्
कुरु + साम्बन्धिक | कृत्वा | प्रमथ् + एनद् | विशातय
ततः कृतवर्माणं मोहयित्वार्जुनः शरैः अभ्यगाज्जवनैरश्वैः काम्बोजानामनीकिनीम्
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ततः | स | कृतवर्माणं | मोहय् + अर्जुन | शरैः
अभिगा + जवन | अश्वैः | काम्बोजानाम् | अनीकिनीम्
अमर्षितस्तु हार्दिक्यः प्रविष्टे श्वेतवाहने विधुन्वन्सशरं चापं पाञ्चाल्याभ्यां समागतः
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अमर्षित + तु | हार्दिक्यः | प्रविष्टे | श्वेतवाहने
विधुन्वन् | स + शर | चापं | पाञ्चाल्याभ्यां | समागतः
चक्ररक्षौ तु पाञ्चाल्यावर्जुनस्य पदानुगौ पर्यवारयदायान्तौ कृतवर्मा रथेषुभिः
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चक्ररक्षौ | तु | पाञ्चाल्य + अर्जुन | पदानुगौ
पर्यवारयद् | कृतवर्मा | रथेषुभिः
तावविध्यत्ततो भोजः सर्वपारशवैः शरैः त्रिभिरेव युधामन्युं चतुर्भिश्चोत्तमौजसम्
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तद् + व्यध् | ततो | भोजः | सर्व + पारशव | शरैः
त्रिभिर् | एव | युधामन्युं | चतुर् + च + उत्तमौजस्
तावप्येनं विव्यधतुर्दशभिर्दशभिः शरैः संचिच्छिदतुरप्यस्य ध्वजं कार्मुकमेव
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तद् + अपि + एनद् | विव्यधतुर् | दशभिर् | दशभिः | शरैः
संचिछिदतुर् | अपि + इदम् | ध्वजं | कार्मुकम् | एव | च
अथान्यद्धनुरादाय हार्दिक्यः क्रोधमूर्छितः कृत्वा विधनुषौ वीरौ शरवर्षैरवाकिरत्
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अथ + अन्य | धनुर् | आदाय | हार्दिक्यः | क्रोध + मूर्छय्
कृत्वा | वीरौ | शर + वर्ष | अवाकिरत्
तावन्ये धनुषी सज्ये कृत्वा भोजं विजघ्नतुः तेनान्तरेण बीभत्सुर्विवेशामित्रवाहिनीम्
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तद् + अन्य | धनुषी | सज्ये | कृत्वा | भोजं | विजघ्नतुः
तद् + अन्तर | बीभत्सुर् | विश् + अमित्र + वाहिनी
लेभाते तु तौ द्वारं वारितौ कृतवर्मणा धार्तराष्ट्रेष्वनीकेषु यतमानौ नरर्षभौ
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न | लेभाते | तु | तौ | द्वारं | वारितौ | कृतवर्मणा
धार्तराष्ट्र + अनीक | यतमानौ | नर + ऋषभ
अनीकान्यर्दयन्युद्धे त्वरितः श्वेतवाहनः नावधीत्कृतवर्माणं प्राप्तमप्यरिसूदनः
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अनीक + अर्दय् | युद्धे | त्वरितः | श्वेतवाहनः
न + वध् | कृतवर्माणं | प्राप्तम् | अपि + अरि + सूदन
तं दृष्ट्वा तु तथायान्तं शूरो राजा श्रुतायुधः अभ्यद्रवत्सुसंक्रुद्धो विधुन्वानो महद्धनुः
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तं | दृष्ट्वा | तु | तथा + आया | शूरो | राजा | श्रुतायुधः
अभ्यद्रवत् | सु + संक्रुध् | विधुन्वानो | महद् | धनुः
पार्थं त्रिभिरानर्छत्सप्तत्या जनार्दनम् क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन पार्थकेतुमताडयत्
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स | पार्थं | त्रिभिर् | आनर्छत् | सप्तत्या | च | जनार्दनम्
क्षुरप्रेण | सु + तीक्ष्ण | पार्थ + केतु | अताडयत्
तमर्जुनो नवत्या तु शराणां नतपर्वणाम् आजघान भृशं क्रुद्धस्तोत्त्रैरिव महाद्विपम्
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तम् | अर्जुनो | नवत्या | तु | शराणां | नम् + पर्वन्
आजघान | भृशं | क्रुध् + तोत्त्र | इव | महत् + द्विप
तन्न ममृषे राजन्पाण्डवेयस्य विक्रमम् अथैनं सप्तसप्तत्या नाराचानां समार्पयत्
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स | तद् + न | ममृषे | राजन् | पाण्डवेयस्य | विक्रमम्
एकैकं | पञ्चविंशत्या | सायकानां | समार्पयत्
तस्यार्जुनो धनुश्छित्त्वा शरावापं निकृत्य आजघानोरसि क्रुद्धः सप्तभिर्नतपर्वभिः
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तद् + अर्जुन | धनुस् + छिद् | व्यध् + एनद् | त्रि + सप्तन्
आहन् + उरस् | क्रुद्धः | सप्तभिर् | नम् + पर्वन्
अथान्यद्धनुरादाय राजा क्रोधमूर्छितः वासविं नवभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत्
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अथ + अन्य | धनुर् | आदाय | हार्दिक्यः | क्रोध + मूर्छय्
वासविं | नवभिर् | बाणैर् | बाह्वोर् | उरसि | च + अर्पय्
ततोऽर्जुनः स्मयन्नेव श्रुतायुधमरिंदमः शरैरनेकसाहस्रैः पीडयामास भारत
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ततो | ऽर्जुनः | स्मयन्न् | एव | श्रुतायुधम् | अरिंदमः
शरैर् | अनेक + साहस्र | पीडयामास | भारत
अश्वांश्चास्यावधीत्तूर्णं सारथिं महारथः विव्याध चैनं सप्तत्या नाराचानां महाबलः
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अश्व + च + इदम् + वध् | तूर्णं | सारथिं | च | महत् + रथ
अथ + एनद् | सप्तसप्तत्या | नाराचानां | समार्पयत्
हताश्वं रथमुत्सृज्य तु राजा श्रुतायुधः अभ्यद्रवद्रणे पार्थं गदामुद्यम्य वीर्यवान्
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हन् + अश्व | रथम् | उत्सृज्य | स | तु | राजा | श्रुतायुधः
अभ्यद्रवद् | रणे | पार्थं | गदाम् | उद्यम्य | वीर्यवान्
वरुणस्यात्मजो वीरः तु राजा श्रुतायुधः पर्णाशा जननी यस्य शीततोया महानदी
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हन् + अश्व | रथम् | उत्सृज्य | स | तु | राजा | श्रुतायुधः
पर्णाशा | जननी | यस्य | शीत + तोय | महत् + नदी
तस्य माताब्रवीद्वाक्यं वरुणं पुत्रकारणात् अवध्योऽयं भवेल्लोके शत्रूणां तनयो मम
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तस्य | मातृ + ब्रू | वाक्यं | वरुणं | पुत्र + कारण
अवध्यो | ऽयं | भू + लोक | शत्रूणां | तनयो | मम
वरुणस्त्वब्रवीत्प्रीतो ददाम्यस्मै वरं हितम् दिव्यमस्त्रं सुतस्तेऽयं येनावध्यो भविष्यति
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वरुण + तु + ब्रू | प्रीतो | दा + इदम् | वरं | हितम्
दिव्यम् | अस्त्रं | सुत + त्वद् | ऽयं | भविष्यति
नास्ति चाप्यमरत्वं वै मनुष्यस्य कथंचन सर्वेणावश्यमर्तव्यं जातेन सरितां वरे
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न + अस् | च + अपि | अमर + त्व | वै | मनुष्यस्य | कथंचन
सर्व + अवश्य + मृ | जातेन | सरितां | वरे
दुर्धर्षस्त्वेष शत्रूणां रणेषु भविता सदा अस्त्रस्यास्य प्रभावाद्वै व्येतु ते मानसो ज्वरः
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दुर्धर्ष + तु + एतद् | शत्रूणां | रणेषु | भविता | सदा
अस्त्र + इदम् | प्रभावाद् | वै | व्येतु | ते | मानसो | ज्वरः
इत्युक्त्वा वरुणः प्रादाद्गदां मन्त्रपुरस्कृताम् यामासाद्य दुराधर्षः सर्वलोके श्रुतायुधः
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इति + वच् | वरुणः | प्रादाद् | गदां | मन्त्र + पुरस्कृ
याम् | आसाद्य | दुराधर्षः | सर्व + लोक | श्रुतायुधः
उवाच चैनं भगवान्पुनरेव जलेश्वरः अयुध्यति मोक्तव्या सा त्वय्येव पतेदिति
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उवाच | च + एनद् | भगवान् | पुनर् | एव | जलेश्वरः
अयुध्यति | न | मोक्तव्या | सा | त्वद् + एव | पतेद् | इति
तया वीरघातिन्या जनार्दनमताडयत् प्रतिजग्राह तां कृष्णः पीनेनांसेन वीर्यवान्
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स | तया | वीर + घातिन् | जनार्दनम् | अताडयत्
प्रतिजग्राह | तां | कृष्णः | पीन + अंस | वीर्यवान्
नाकम्पयत शौरिं सा विन्ध्यं गिरिमिवानिलः प्रत्यभ्ययात्तं विप्रोढा कृत्येव दुरधिष्ठिता
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न + कम्पय् | शौरिं | सा | विन्ध्यं | गिरिम् | इव + अनिल
प्रत्यभ्ययात् | तं | विप्र + वह् | कृत्या + इव | दुरधिष्ठिता
जघान चास्थितं वीरं श्रुतायुधममर्षणम् हत्वा श्रुतायुधं वीरं जगतीमन्वपद्यत
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जघान | च + आस्था | वीरं | श्रुतायुधम् | अमर्षणम्
हत्वा | श्रुतायुधं | वीरं | जगतीम् | अन्वपद्यत
हाहाकारो महांस्तत्र सैन्यानां समजायत स्वेनास्त्रेण हतं दृष्ट्वा श्रुतायुधमरिंदमम्
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त्वरा + युज् | महत् + बाहु + तद् | सैन्यं | समुपाद्रवत्
स्व + अस्त्र | हतं | दृष्ट्वा | श्रुतायुधम् | अरिंदमम्
अयुध्यमानाय हि सा केशवाय नराधिप क्षिप्ता श्रुतायुधेनाथ तस्मात्तमवधीद्गदा
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अयुध्यमानाय | हि | सा | केशवाय | नराधिप
क्षिप्ता | श्रुतायुध + अथ | तस्मात् | तम् | अवधीद् | गदा
यथोक्तं वरुणेनाजौ तथा निधनं गतः व्यसुश्चाप्यपतद्भूमौ प्रेक्षतां सर्वधन्विनाम्
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यथा + वच् | वरुण + आजि | तथा | स | निधनं | गतः
व्यसु + च + अपि + पत् | भूमौ | प्रेक्षतां | सर्व + धन्विन्
पतमानस्तु बभौ पर्णाशायाः प्रियः सुतः संभग्न इव वातेन बहुशाखो वनस्पतिः
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पत् + तु | स | बभौ | पर्णाशायाः | प्रियः | सुतः
संभग्न | इव | वातेन | बहु + शाखा | वनस्पतिः
ततः सर्वाणि सैन्यानि सेनामुख्याश्च सर्वशः प्राद्रवन्त हतं दृष्ट्वा श्रुतायुधमरिंदमम्
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ततः | सर्वाणि | सैन्यानि | सेना + मुख्य + च | सर्वशः
स्व + अस्त्र | हतं | दृष्ट्वा | श्रुतायुधम् | अरिंदमम्
तथ काम्बोजराजस्य पुत्रः शूरः सुदक्षिणः अभ्ययाज्जवनैरश्वैः फल्गुनं शत्रुसूदनम्
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तथा | काम्बोज + राज | पुत्रः | शूरः | सुदक्षिणः
अभिया + जवन | अश्वैः | फल्गुनं | शत्रु + सूदन
तस्य पार्थः शरान्सप्त प्रेषयामास भारत ते तं शूरं विनिर्भिद्य प्राविशन्धरणीतलम्
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तस्य | पार्थः | शरान् | सप्त | प्रेषयामास | भारत
ते | तं | शूरं | विनिर्भिद्य | प्राविशन् | धरणी + तल
सोऽतिविद्धः शरैस्तीक्ष्णैर्गाण्डीवप्रेषितैर्मृधे अर्जुनं प्रतिविव्याध दशभिः कङ्कपत्रिभिः
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सो | ऽतिविद्धः | शर + तीक्ष्ण | गाण्डीव + प्रेषय् | मृधे
अर्जुनं | प्रतिविव्याध | दशभिः | कङ्क + पत्त्रिन्
वासुदेवं त्रिभिर्विद्ध्वा पुनः पार्थं पञ्चभिः तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा केतुं चिच्छेद मारिष
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वासुदेवं | त्रिभिर् | विद्ध्वा | पुनः | पार्थं | च | पञ्चभिः
तस्य | पार्थो | धनुस् + छिद् | केतुं | चिछेद | मारिष
भल्लाभ्यां भृशतीक्ष्णाभ्यां तं विव्याध पाण्डवः तु पार्थं त्रिभिर्विद्ध्वा सिंहनादमथानदत्
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भल्लाभ्यां | भृश + तीक्ष्ण | तं | च | विव्याध | पाण्डवः
स | तु | पार्थं | त्रिभिर् | विद्ध्वा | सिंहनादम् | अथ + नद्
सर्वपारशवीं चैव शक्तिं शूरः सुदक्षिणः सघण्टां प्राहिणोद्घोरां क्रुद्धो गाण्डीवधन्वने
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सर्व + पारशव | च + एव | शक्तिं | शूरः | सुदक्षिणः
स + घण्टा | प्राहिणोद् | घोरां | क्रुद्धो | गाण्डीवधन्वने
सा ज्वलन्ती महोल्केव तमासाद्य महारथम् सविस्फुलिङ्गा निर्भिद्य निपपात महीतले
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सा | ज्वलन्ती | महत् + उल्का + इव | तम् | आसाद्य | महत् + रथ
स + विस्फुलिङ्ग | निर्भिद्य | निपपात | मही + तल
तं चतुर्दशभिः पार्थो नाराचैः कङ्कपत्रिभिः साश्वध्वजधनुःसूतं विव्याधाचिन्त्यविक्रमः रथं चान्यैः सुबहुभिश्चक्रे विशकलं शरैः
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तं | चतुर्दशभिः | पार्थो | नाराचैः | कङ्क + पत्त्रिन्
स + अश्व + ध्वज + धनुस् + सूत | व्यध् + अचिन्त्य + विक्रम
रथं | च + अन्य | सु + बहु + कृ | विशकलं | शरैः
सुदक्षिणं तु काम्बोजं मोघसंकल्पविक्रमम् बिभेद हृदि बाणेन पृथुधारेण पाण्डवः
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सुदक्षिणं | तु | काम्बोजं | मोघ + संकल्प + विक्रम
बिभेद | हृदि | बाणेन | पृथु + धारा | पाण्डवः
भिन्नमर्मा स्रस्ताङ्गः प्रभ्रष्टमुकुटाङ्गदः पपाताभिमुखः शूरो यन्त्रमुक्त इव ध्वजः
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स | भिद् + मर्मन् | स्रंस् + अङ्ग | प्रभ्रंश् + मुकुट + अङ्गद
पत् + अभिमुख | शूरो | यन्त्र + मुच् | इव | ध्वजः
गिरेः शिखरजः श्रीमान्सुशाखः सुप्रतिष्ठितः निर्भग्न इव वातेन कर्णिकारो हिमात्यये
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गिरेः | शिखर + ज | श्रीमान् | सु + शाखा | सु + प्रतिष्ठा
निर्भग्न | इव | वातेन | कर्णिकारो | हिम + अत्यय
शेते स्म निहतो भूमौ काम्बोजास्तरणोचितः सुदर्शनीयस्ताम्राक्षः कर्णिना सुदक्षिणः पुत्रः काम्बोजराजस्य पार्थेन विनिपातितः
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शेते | स्म | निहतो | भूमौ | काम्बोज + आस्तरण + उचित
सु + दृश् | ताम्र + अक्ष | कर्णिना | स | सुदक्षिणः
पुत्रः | काम्बोज + राज | पार्थेन | विनिपातितः
ततः सर्वाणि सैन्यानि व्यद्रवन्त सुतस्य ते हतं श्रुतायुधं दृष्ट्वा काम्बोजं सुदक्षिणम्
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ततः | सर्वाणि | सैन्यानि | सेना + मुख्य + च | सर्वशः
हतं | श्रुतायुधं | दृष्ट्वा | काम्बोजं | च | सुदक्षिणम्