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Currently viewing: Parva 7 - Chapter 7.66 (43 verses)
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Chapter 7.66

दुःशासनबलं हत्वा सव्यसाची धनंजयः सिन्धुराजं परीप्सन्वै द्रोणानीकमुपाद्रवत्
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दुःशासन + बल | हत्वा | सव्यसाची | धनंजयः
सिन्धुराजं | परीप्सन् | वै | द्रोण + अनीक | उपाद्रवत्
तु द्रोणं समासाद्य व्यूहस्य प्रमुखे स्थितम् कृताञ्जलिरिदं वाक्यं कृष्णस्यानुमतेऽब्रवीत्
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स | तु | द्रोणं | समासाद्य | व्यूहस्य | प्रमुखे | स्थितम्
कृताञ्जलिर् | इदं | वाक्यं | कृष्ण + अनुमत | ऽब्रवीत्
शिवेन ध्याहि मां ब्रह्मन्स्वस्ति चैव वदस्व मे भवत्प्रसादादिच्छामि प्रवेष्टुं दुर्भिदां चमूम्
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शिवेन | ध्याहि | मां | ब्रह्मन् | स्वस्ति | च + एव | वदस्व | मे
भवत् + प्रसाद | इच्छामि | प्रवेष्टुं | दुर्भिदां | चमूम्
भवान्पितृसमो मह्यं धर्मराजसमोऽपि तथा कृष्णसमश्चैव सत्यमेतद्ब्रवीमि ते
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भवान् | पितृ + सम | मह्यं | धर्मराज + सम | ऽपि | च
तथा | कृष्ण + सम + च + एव | सत्यम् | एतद् | ब्रवीमि | ते
अश्वत्थामा यथा तात रक्षणीयस्तवानघ तथाहमपि ते रक्ष्यः सदैव द्विजसत्तम
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अश्वत्थामा | यथा | तात | रक्ष् + त्वद् + अनघ
तथा + मद् | अपि | ते | रक्ष्यः | सदा + एव | द्विजसत्तम
तव प्रसादादिच्छामि सिन्धुराजानमाहवे निहन्तुं द्विपदां श्रेष्ठ प्रतिज्ञां रक्ष मे विभो
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तव | प्रसादाद् | इच्छामि | सिन्धु + राजन् | आहवे
निहन्तुं | द्विपदां | श्रेष्ठ | प्रतिज्ञां | रक्ष | मे | विभो
एवमुक्तस्तदाचार्यः प्रत्युवाच स्मयन्निव मामजित्वा बीभत्सो शक्यो जेतुं जयद्रथः
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एवम् | वच् + तद् + आचार्य | प्रत्युवाच | स्मयन्न् | इव
माम् | अजित्वा | न | बीभत्सो | शक्यो | जेतुं | जयद्रथः
एतावदुक्त्वा तं द्रोणः शरव्रातैरवाकिरत् सरथाश्वध्वजं तीक्ष्णैः प्रहसन्वै ससारथिम्
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एतावद् | उक्त्वा | तं | द्रोणः | शर + व्रात | अवाकिरत्
स + रथ + अश्व + ध्वज | तीक्ष्णैः | प्रहसन् | वै | स + सारथि
ततोऽर्जुनः शरव्रातान्द्रोणस्यावार्य सायकैः द्रोणमभ्यर्दयद्बाणैर्घोररूपैर्महत्तरैः
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ततो | ऽर्जुनः | शर + व्रात | द्रोण + आवारय् | सायकैः
द्रोणम् | अभ्यर्दयद् | बाणैर् | घोर + रूप | महत्तरैः
विव्याध रणे द्रोणमनुमान्य विशां पते क्षत्रधर्मं समास्थाय नवभिः सायकैः पुनः
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विव्याध | च | रणे | द्रोणम् | अनुमान्य | विशां | पते
क्षत्र + धर्म | समास्थाय | नवभिः | सायकैः | पुनः
तस्येषूनिषुभिश्छित्त्वा द्रोणो विव्याध तावुभौ विषाग्निज्वलनप्रख्यैरिषुभिः कृष्णपाण्डवौ
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तद् + इषु | इषु + छिद् | द्रोणो | विव्याध | तद् + उभ्
विष + अग्नि + ज्वलन + प्रख्या | इषुभिः | कृष्ण + पाण्डव
इयेष पाण्डवस्तस्य बाणैश्छेत्तुं शरासनम् तस्य चिन्तयतस्त्वेवं फल्गुनस्य महात्मनः द्रोणः शरैरसंभ्रान्तो ज्यां चिच्छेदाशु वीर्यवान्
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इयेष | पाण्डव + तद् | बाण + छिद् | शरासनम्
तस्य | चिन्तय् + तु + एवम् | फल्गुनस्य | महात्मनः
द्रोणः | शरैर् | असंभ्रान्तो | ज्यां | छिद् + आशु | वीर्यवान्
विव्याध हयानस्य ध्वजं सारथिमेव अर्जुनं शरैर्वीरं स्मयमानोऽभ्यवाकिरत्
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विव्याध | च | हयान् | अस्य | ध्वजं | सारथिम् | एव | च
अर्जुनं | च | शरैर् | वीरं | स्मयमानो | ऽभ्यवाकिरत्
एतस्मिन्नन्तरे पार्थः सज्जं कृत्वा महद्धनुः विशेषयिष्यन्नाचार्यं सर्वास्त्रविदुषां वरम् मुमोच षट्शतान्बाणान्गृहीत्वैकमिव द्रुतम्
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एतस्मिन्न् | अन्तरे | पार्थः | सज्जं | कृत्वा | महद् | धनुः
विशेषयिष्यन्न् | आचार्यं | सर्व + अस्त्र + विद्वस् | वरम्
मुमोच | षष् + शत | बाणान् | ग्रह् + एक | इव | द्रुतम्
पुनः सप्त शतानन्यान्सहस्रं चानिवर्तिनाम् चिक्षेपायुतशश्चान्यांस्तेऽघ्नन्द्रोणस्य तां चमूम्
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पुनः | सप्त | शतान् | अन्यान् | सहस्रं | च + अनिवर्तिन्
क्षिप् + अयुतशस् + च + अन्य + तद् | ऽघ्नन् | द्रोणस्य | तां | चमूम्
तैः सम्यगस्तैर्बलिना कृतिना चित्रयोधिना मनुष्यवाजिमातङ्गा विद्धाः पेतुर्गतासवः
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तैः | सम्यग् | अस्तैर् | बलिना | कृतिना | चित्र + योधिन्
मनुष्य + वाजिन् + मातंग | विद्धाः | पेतुर् | गतासवः
विद्रुताश्च रणे पेतुः संछिन्नायुधजीविताः रथिनो रथमुख्येभ्यः सहयाः शरपीडिताः
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विद्रु + च | रणे | पेतुः | संछिद् + आयुध + जीवित
रथिनो | रथ + मुख्य | स + हय | शर + पीडय्
चूर्णिताक्षिप्तदग्धानां वज्रानिलहुताशनैः तुल्यरूपा गजाः पेतुर्गिर्यग्राम्बुदवेश्मनाम्
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चूर्णय् + आक्षिप् + दह् | वज्र + अनिल + हुताशन
तुल्य + रूप | गजाः | पेतुर् | गिरि + अग्र + अम्बुद + वेश्मन्
पेतुरश्वसहस्राणि प्रहतान्यर्जुनेषुभिः हंसा हिमवतः पृष्ठे वारिविप्रहता इव
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पेतुर् | अश्व + सहस्र | प्रहन् + अर्जुन + इषु
हंसा | हिमवतः | पृष्ठे | वारि + विप्रहन् | इव
रथाश्वद्विपपत्त्योघाः सलिलौघा इवाद्भुताः युगान्तादित्यरश्म्याभैः पाण्डवास्तशरैर्हताः
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रथ + अश्व + द्विप + पत्ति + ओघ | सलिल + ओघ | इव + अद्भुत
युग + अन्त + आदित्य + रश्मि + आभ | हताः
तं पाण्डवादित्यशरांशुजालं; कुरुप्रवीरान्युधि निष्टपन्तम् द्रोणमेघः शरवर्षवेगैः; प्राच्छादयन्मेघ इवार्करश्मीन्
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तं | पाण्डव + आदित्य + शर + अंशु + जाल | कुरु + प्रवीर | युधि | निष्टपन्तम्
स | द्रोण + मेघ | शर + वर्ष + वेग | प्रच्छादय् + मेघ | इव + अर्क + रश्मि
अथात्यर्थविसृष्टेन द्विषतामसुभोजिना आजघ्ने वक्षसि द्रोणो नाराचेन धनंजयम्
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अथ + अत्यर्थ + विसृज् | द्विषताम् | असु + भोजिन्
आजघ्ने | वक्षसि | द्रोणो | नाराचेन | धनंजयम्
विह्वलितसर्वाङ्गः क्षितिकम्पे यथाचलः धैर्यमालम्ब्य बीभत्सुर्द्रोणं विव्याध पत्रिभिः
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स | विह्वल् + सर्व + अङ्ग | क्षिति + कम्प | यथा + अचल
धैर्यम् | आलम्ब्य | बीभत्सुर् | द्रोणं | विव्याध | पत्रिभिः
द्रोणस्तु पञ्चभिर्बाणैर्वासुदेवमताडयत् अर्जुनं त्रिसप्तत्या ध्वजं चास्य त्रिभिः शरैः
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द्रोण + तु | पञ्चभिर् | बाणैर् | वासुदेवम् | अताडयत्
अर्जुनं | च | त्रिसप्तत्या | ध्वजं | च + इदम् | त्रिभिः | शरैः
विशेषयिष्यञ्शिष्यं द्रोणो राजन्पराक्रमी अदृश्यमर्जुनं चक्रे निमेषाच्छरवृष्टिभिः
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विशेषयिष्यञ् | शिष्यं | च | द्रोणो | राजन् | पराक्रमी
अदृश्यम् | अर्जुनं | चक्रे | निमेष + शर + वृष्टि
प्रसक्तान्पततोऽद्राक्ष्म भारद्वाजस्य सायकान् मण्डलीकृतमेवास्य धनुश्चादृश्यताद्भुतम्
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प्रसक्तान् | पततो | ऽद्राक्ष्म | भारद्वाजस्य | सायकान्
मण्डलीकृतम् | एव + इदम् | धनुस् + च + दृश् + अद्भुत
तेऽभ्ययुः समरे राजन्वासुदेवधनंजयौ द्रोणसृष्टाः सुबहवः कङ्कपत्रपरिच्छदाः
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ते | ऽभ्ययुः | समरे | राजन् | वासुदेव + धनंजय
द्रोण + सृज् | सु + बहु | कङ्क + पत्त्र + परिच्छद
तद्दृष्ट्वा तादृशं युद्धं द्रोणपाण्डवयोस्तदा वासुदेवो महाबुद्धिः कार्यवत्तामचिन्तयत्
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तद् | दृष्ट्वा | तादृशं | युद्धं | द्रोण + पाण्डव + तदा
वासुदेवो | महत् + बुद्धि | कार्यवत् + ता | अचिन्तयत्
ततोऽब्रवीद्वासुदेवो धनंजयमिदं वचः पार्थ पार्थ महाबाहो नः कालात्ययो भवेत्
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ततो | ऽब्रवीद् | वासुदेवो | धनंजयम् | इदं | वचः
पार्थ | पार्थ | महत् + बाहु | न | नः | काल + अत्यय | भवेत्
द्रोणमुत्सृज्य गच्छामः कृत्यमेतन्महत्तरम् पार्थश्चाप्यब्रवीत्कृष्णं यथेष्टमिति केशव
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द्रोणम् | उत्सृज्य | गच्छामः | कृत्यम् | एतद् + महत्तर
पार्थ + च + अपि + ब्रू | कृष्णं | यथेष्टम् | इति | केशव
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा द्रोणं प्रायान्महाभुजः परिवृत्तश्च बीभत्सुरगच्छद्विसृजञ्शरान्
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ततः | प्रदक्षिणं | कृत्वा | द्रोणं | प्रया + महत् + भुज
परिवृत् + च | बीभत्सुर् | अगच्छद् | विसृजञ् | शरान्
ततोऽब्रवीत्स्मयन्द्रोणः क्वेदं पाण्डव गम्यते ननु नाम रणे शत्रुमजित्वा निवर्तसे
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ततो | ऽब्रवीत् | स्मयन् | द्रोणः | क्व + इदम् | पाण्डव | गम्यते
ननु | नाम | रणे | शत्रुम् | अजित्वा | न | निवर्तसे
गुरुर्भवान्न मे शत्रुः शिष्यः पुत्रसमोऽस्मि ते चास्ति पुमाँल्लोके यस्त्वां युधि पराजयेत्
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गुरुर् | भवत् + न | मे | शत्रुः | शिष्यः | पुत्र + सम | ऽस्मि | ते
न | च + अस् | स | पुमांल् | लोके | यद् + त्वद् | युधि | पराजयेत्
एवं ब्रुवाणो बीभत्सुर्जयद्रथवधोत्सुकः त्वरायुक्तो महाबाहुस्तत्सैन्यं समुपाद्रवत्
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एवं | ब्रुवाणो | बीभत्सुर् | जयद्रथ + वध + उत्सुक
त्वरा + युज् | महत् + बाहु + तद् | सैन्यं | समुपाद्रवत्
तं चक्ररक्षौ पाञ्चाल्यौ युधामन्यूत्तमौजसौ अन्वयातां महात्मानौ विशन्तं तावकं बलम्
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तं | चक्ररक्षौ | पाञ्चाल्यौ | युधामन्यु + उत्तमौजस्
अन्वयातां | महात्मानौ | विशन्तं | तावकं | बलम्
ततो जयो महाराज कृतवर्मा सात्त्वतः काम्बोजश्च श्रुतायुश्च धनंजयमवारयन्
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ततो | जयो | महत् + राज | कृतवर्मा | च | सात्वतः
काम्बोज + च | श्रुतायु + च | धनंजयम् | अवारयन्
तेषां दशसहस्राणि रथानामनुयायिनाम् अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः
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ततः | शत + सहस्र | योधानाम् | अनिवर्तिनाम्
अभीषाहाः | शूरसेनाः | शिबयो | ऽथ | वसातयः
माचेल्लका ललित्थाश्च केकया मद्रकास्तथा नारायणाश्च गोपालाः काम्बोजानां ये गणाः
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माचेल्लका | ललित्थ + च | केकया | मद्रक + तथा
नारायण + च | गोपालाः | काम्बोजानां | च | ये | गणाः
कर्णेन विजिताः पूर्वं संग्रामे शूरसंमताः भारद्वाजं पुरस्कृत्य त्यक्तात्मानोऽर्जुनं प्रति
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कर्णेन | विजिताः | पूर्वं | संग्रामे | शूर + सम्मन्
भारद्वाजं | पुरस्कृत्य | त्यक्तात्मानो | ऽर्जुनं | प्रति
पुत्रशोकाभिसंतप्तं क्रुद्धं मृत्युमिवान्तकम् त्यजन्तं तुमुले प्राणान्संनद्धं चित्रयोधिनम्
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पुत्र + शोक + अभिसंतप् | अश्रु + पृ + मुख | तदा
त्यजन्तं | तुमुले | प्राणान् | संनद्धं | चित्र + योधिन्
गाहमानमनीकानि मातङ्गमिव यूथपम् महेष्वासं पराक्रान्तं नरव्याघ्रमवारयन्
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गाहमानम् | अनीकानि | मातङ्गम् | इव | यूथपम्
महत् + इष्वास | पराक्रान्तं | नर + व्याघ्र | अवारयन्
ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् अन्योन्यं वै प्रार्थयतां योधानामर्जुनस्य
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ततः | प्रववृते | युद्धं | तुमुलं | लोमन् + हर्षण
अन्योन्यं | वै | प्रार्थयतां | योधानाम् | अर्जुनस्य | च
जयद्रथवधप्रेप्सुमायान्तं पुरुषर्षभम् न्यवारयन्त सहिताः क्रिया व्याधिमिवोत्थितम्
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जयद्रथ + वध + प्रेप्सु | आयान्तं | पुरुष + ऋषभ
न्यवारयन्त | सहिताः | क्रिया | व्याधिम् | इव + उत्था