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Currently viewing: Parva 7 - Chapter 7.57 (81 verses)
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Chapter 7.57

कुन्तीपुत्रस्तु तं मन्त्रं स्मरन्नेव धनंजयः प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन्मुमोहाचिन्त्यविक्रमः
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कुन्ती + पुत्र + तु | तं | मन्त्रं | स्मरन्न् | एव | धनंजयः
प्रतिज्ञाम् | आत्मनो | रक्ष् + मुह् + अचिन्त्य + विक्रम
तं तु शोकेन संतप्तं स्वप्ने कपिवरध्वजम् आससाद महातेजा ध्यायन्तं गरुडध्वजः
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तं | तु | शोकेन | संतप्तं | स्वप्ने | कपि + वर + ध्वज
आससाद | महत् + तेजस् | ध्यायन्तं | गरुडध्वजः
प्रत्युत्थानं तु कृष्णस्य सर्वावस्थं धनंजयः नालोपयत धर्मात्मा भक्त्या प्रेम्णा सर्वदा
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प्रत्युत्थानं | तु | कृष्णस्य | सर्व + अवस्था | धनंजयः
न + लोपय् | धर्म + आत्मन् | भक्त्या | प्रेम्णा | च | सर्वदा
प्रत्युत्थाय गोविन्दं तस्मायासनं ददौ चासने स्वयं बुद्धिं बीभत्सुर्व्यदधात्तदा
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प्रत्युत्थाय | च | गोविन्दं | स | ददौ
न | च + आसन | स्वयं | बुद्धिं | बीभत्सुर् | व्यदधात् | तदा
ततः कृष्णो महातेजा जानन्पार्थस्य निश्चयम् कुन्तीपुत्रमिदं वाक्यमासीनः स्थितमब्रवीत्
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ततः | कृष्णो | महत् + तेजस् | जानन् | पार्थस्य | निश्चयम्
कुन्ती + पुत्र | इदं | वाक्यम् | आसीनः | स्थितम् | अब्रवीत्
मा विषादे मनः पार्थ कृथाः कालो हि दुर्जयः कालः सर्वाणि भूतानि नियच्छति परे विधौ
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मा | विषादे | मनः | पार्थ | कृथाः | कालो | हि | दुर्जयः
कालः | सर्वाणि | भूतानि | नियच्छति | परे | विधौ
किमर्थं विषादस्ते तद्ब्रूहि वदतां वर शोचितव्यं विदुषा शोकः कार्यविनाशनः
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किमर्थं | च | विषाद + त्वद् | तद् | ब्रूहि | वदतां | वर
न | शोचितव्यं | विदुषा | शोकः | कार्य + विनाशन
शोचन्नन्दयते शत्रून्कर्शयत्यपि बान्धवान् क्षीयते नरस्तस्मान्न त्वं शोचितुमर्हसि
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शुच् + नन्दय् | शत्रून् | कर्शय् + अपि | बान्धवान्
क्षीयते | च | नर + तस्मात् + न | त्वं | शोचितुम् | अर्हसि
इत्युक्तो वासुदेवेन बीभत्सुरपराजितः आबभाषे तदा विद्वानिदं वचनमर्थवत्
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इति + वच् | वासुदेवेन | बीभत्सुर् | अपराजितः
आबभाषे | तदा | विद्वान् | इदं | वचनम् | अर्थवत्
मया प्रतिज्ञा महती जयद्रथवधे कृता श्वोऽस्मि हन्ता दुरात्मानं पुत्रघ्नमिति केशव
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पुत्र + शोक + अभितप् | प्रतिज्ञा | महती | कृता
श्वो | ऽस्मि | हन्ता | दुरात्मानं | पुत्र + घ्न | इति | केशव
मत्प्रतिज्ञाविघातार्थं धार्तराष्ट्रैः किलाच्युत पृष्ठतः सैन्धवः कार्यः सर्वैर्गुप्तो महारथैः
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मद् + प्रतिज्ञा + विघात + अर्थ | धार्तराष्ट्रैः | किल + अच्युत
पृष्ठतः | सैन्धवः | कार्यः | सर्वैर् | गुप्तो | महत् + रथ
दश चैका ताः कृष्ण अक्षौहिण्यः सुदुर्जयाः प्रतिज्ञायां हीनायां कथं जीवेत मद्विधः
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दश | च + एक | च | ताः | कृष्ण | अक्षौहिण्यः | सु + दुर्जय
प्रतिज्ञायां | च | हीनायां | कथं | जीवेत | मद्विधः
दुःखोपायस्य मे वीर विकाङ्क्षा परिवर्तते द्रुतं याति सविता तत एतद्ब्रवीम्यहम्
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दुःख + उपाय | मे | वीर | विकाङ्क्षा | परिवर्तते
द्रुतं | च | याति | सविता | तत | एतद् | ब्रू + मद्
शोकस्थानं तु तच्छ्रुत्वा पार्थस्य द्विजकेतनः संस्पृश्याम्भस्ततः कृष्णः प्राङ्मुखः समवस्थितः
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शोक + स्थान | तु | तद् + श्रु | पार्थस्य | द्विज + केतन
संस्पृश् + अम्भस् + ततस् | कृष्णः | प्राञ्च् + मुख | समवस्थितः
इदं वाक्यं महातेजा बभाषे पुष्करेक्षणः हितार्थं पाण्डुपुत्रस्य सैन्धवस्य वधे वृतः
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इदं | वाक्यं | महत् + तेजस् | बभाषे | पुष्करेक्षणः
हित + अर्थ | पाण्डु + पुत्र | सैन्धवस्य | वधे | वृतः
पार्थ पाशुपतं नाम परमास्त्रं सनातनम् येन सर्वान्मृधे दैत्याञ्जघ्ने देवो महेश्वरः
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पार्थ | पाशुपतं | नाम | परम + अस्त्र | सनातनम्
येन | सर्व + मृध | दैत्याञ् | जघ्ने | देवो | महेश्वरः
यदि तद्विदितं तेऽद्य श्वो हन्तासि जयद्रथम् अथ ज्ञातुं प्रपद्यस्व मनसा वृषभध्वजम्
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यदि | व्युष्टाम् | इमां | रात्रिं | श्वो | न | हन्यां | जयद्रथम्
अथ | ज्ञातुं | प्रपद्यस्व | मनसा | वृषभध्वजम्
तं देवं मनसा ध्यायञ्जोषमास्स्व धनंजय ततस्तस्य प्रसादात्त्वं भक्तः प्राप्स्यसि तन्महत्
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तं | देवं | मनसा | ध्यायञ् | जोषम् | आस्स्व | धनंजय
ततस् + तद् | प्रसादात् | त्वं | भक्तः | प्राप्स्यसि | तद् + महत्
ततः कृष्णवचः श्रुत्वा संस्पृश्याम्भो धनंजयः भूमावासीन एकाग्रो जगाम मनसा भवम्
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ततः | कृष्ण + वचस् | श्रुत्वा | संस्पृश् + अम्भस् | धनंजयः
भूमि + आस् | एकाग्रो | जगाम | मनसा | भवम्
ततः प्रणिहिते ब्राह्मे मुहूर्ते शुभलक्षणे आत्मानमर्जुनोऽपश्यद्गगने सहकेशवम्
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ततः | प्रणिहिते | ब्राह्मे | मुहूर्ते | शुभ + लक्षण
आत्मानम् | अर्जुनो | ऽपश्यद् | गगने | सह + केशव
ज्योतिर्भिश्च समाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम् वायुवेगगतिः पार्थः खं भेजे सहकेशवः
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ज्योतिस् + च | समाकीर्णं | सिद्ध + चारण + सेव्
वायु + वेग + गति | पार्थः | खं | भेजे | सह + केशव
केशवेन गृहीतः दक्षिणे विभुना भुजे प्रेक्षमाणो बहून्भावाञ्जगामाद्भुतदर्शनान्
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केशवेन | गृहीतः | स | दक्षिणे | विभुना | भुजे
प्रेक्षमाणो | बहून् | भावाञ् | गम् + अद्भुत + दर्शन
उदीच्यां दिशि धर्मात्मा सोऽपश्यच्छ्वेतपर्वतम् कुबेरस्य विहारे नलिनीं पद्मभूषिताम्
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उदीच्यां | दिशि | धर्म + आत्मन् | सो | पश् + श्वेतपर्वत
कुबेरस्य | विहारे | च | नलिनीं | पद्म + भूषय्
सरिच्छ्रेष्ठां तां गङ्गां वीक्षमाणो बहूदकाम् सदापुष्पफलैर्वृक्षैरुपेतां स्फटिकोपलाम्
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सरित् + श्रेष्ठ | च | तां | गङ्गां | वीक्षमाणो | बहु + उदक
सदा + पुष्प + फल | वृक्षैर् | उपेतां | स्फटिक + उपल
सिंहव्याघ्रसमाकीर्णां नानामृगगणाकुलाम् पुण्याश्रमवतीं रम्यां मनोज्ञाण्डजसेविताम्
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सिंह + व्याघ्र + समाकृ | नाना + मृग + गण + आकुल
पुण्य + आश्रमवत् | रम्यां | मनोज्ञ + अण्डज + सेव्
मन्दरस्य प्रदेशांश्च किंनरोद्गीतनादितान् हेमरूप्यमयैः शृङ्गैर्नानौषधिविदीपितान् तथा मन्दारवृक्षैश्च पुष्पितैरुपशोभितान्
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मन्दरस्य | प्रदेश + च | किंनर + उद्गीत + नादय्
हेमन् + रूप्य + मय | शृङ्गैर् | नाना + ओषधि + विदीपय्
तथा | मन्दार + वृक्ष + च | पुष्पितैर् | उपशोभितान्
स्निग्धाञ्जनचयाकारं संप्राप्तः कालपर्वतम् पुण्यं हिमवतः पादं मणिमन्तं पर्वतम् ब्रह्मतुङ्गं नदीश्चान्यास्तथा जनपदानपि
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स्निग्ध + अञ्जन + चय + आकार | सम्प्राप्तः | कालपर्वतम्
पुण्यं | हिमवतः | पादं | मणिमन्तं | च | पर्वतम्
ब्रह्मतुङ्गं | नदी + च + अन्य + तथा | जनपदान् | अपि
सुशृङ्गं शतशृङ्गं शर्यातिवनमेव पुण्यमश्वशिरःस्थानं स्थानमाथर्वणस्य
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सु + शृङ्ग | शतशृङ्गं | च | शर्याति + वन | एव | च
पुण्यम् | अश्वशिरस् + स्थान | स्थानम् | आथर्वणस्य | च
वृषदंशं शैलेन्द्रं महामन्दरमेव अप्सरोभिः समाकीर्णं किंनरैश्चोपशोभितम्
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वृषदंशं | च | शैल + इन्द्र | महत् + मन्दर | एव | च
अप्सरोभिः | समाकीर्णं | किंनर + च + उपशोभय्
तांश्च शैलान्व्रजन्पार्थः प्रेक्षते सहकेशवः शुभैः प्रस्रवणैर्जुष्टान्हेमधातुविभूषितान्
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तद् + च | शैलान् | व्रजन् | पार्थः | प्रेक्षते | सह + केशव
शुभैः | प्रस्रवणैर् | जुष्टान् | हेमन् + धातु + विभूषय्
चन्द्ररश्मिप्रकाशाङ्गीं पृथिवीं पुरमालिनीम् समुद्रांश्चाद्भुताकारानपश्यद्बहुलाकरान्
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चन्द्र + रश्मि + प्रकाश + अङ्ग | पृथिवीं | पुर + मालिन्
समुद्र + च + अद्भुत + आकार | अपश्यद् | बहुल + आकर
वियद्द्यां पृथिवीं चैव पश्यन्विष्णुपदे व्रजन् विस्मितः सह कृष्णेन क्षिप्तो बाण इवात्यगात्
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वियद् | द्यां | पृथिवीं | च + एव | पश्यन् | विष्णु + पद | व्रजन्
विस्मितः | सह | कृष्णेन | क्षिप्तो | बाण | इव + अतिगा
ग्रहनक्षत्रसोमानां सूर्याग्न्योश्च समत्विषम् अपश्यत तदा पार्थो ज्वलन्तमिव पर्वतम्
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ग्रह + नक्षत्र + सोम | सूर्य + अग्नि + च | सम + त्विष्
अपश्यत | तदा | पार्थो | ज्वलन्तम् | इव | पर्वतम्
समासाद्य तु तं शैलं शैलाग्रे समवस्थितम् तपोनित्यं महात्मानमपश्यद्वृषभध्वजम्
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समासाद्य | तु | तं | शैलं | शैल + अग्र | समवस्थितम्
तपस् + नित्य | महात्मानम् | अपश्यद् | वृषभध्वजम्
सहस्रमिव सूर्याणां दीप्यमानं स्वतेजसा शूलिनं जटिलं गौरं वल्कलाजिनवाससम्
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सहस्रम् | इव | सूर्याणां | दीप्यमानं | स्व + तेजस्
शूलिनं | जटिलं | गौरं | वल्कल + अजिन + वासस्
नयनानां सहस्रैश्च विचित्राङ्गं महौजसम् पार्वत्या सहितं देवं भूतसंघैश्च भास्वरैः
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नयनानां | सहस्र + च | विचित्र + अङ्ग | महत् + ओजस्
पार्वत्या | सहितं | देवं | भूत + संघ + च | भास्वरैः
गीतवादित्रसंह्रादैस्ताललास्यसमन्वितम् वल्गितास्फोटितोत्क्रुष्टैः पुण्यगन्धैश्च सेवितम्
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गीत + वादित्र + संह्राद + ताल + लास्य + समन्वित
वल्ग् + आस्फोटय् + उत्क्रुश् | पुण्य + गन्ध + च | सेवितम्
स्तूयमानं स्तवैर्दिव्यैर्मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः गोप्तारं सर्वभूतानामिष्वासधरमच्युतम्
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स्तूयमानं | स्तवैर् | दिव्यैर् | मुनिभिर् | ब्रह्मन् + वादिन्
गोप्तारं | सर्व + भूत | इष्वास + धर | अच्युतम्
वासुदेवस्तु तं दृष्ट्वा जगाम शिरसा क्षितिम् पार्थेन सह धर्मात्मा गृणन्ब्रह्म सनातनम्
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वासुदेव + तु | तं | दृष्ट्वा | जगाम | शिरसा | क्षितिम्
देवम् | आराधय् + शर्व | गृणन् | ब्रह्म | सनातनम्
लोकादिं विश्वकर्माणमजमीशानमव्ययम् मनसः परमां योनिं खं वायुं ज्योतिषां निधिम्
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लोकादिं | विश्वकर्माणम् | अजम् | ईशानम् | अव्ययम्
मनसः | परमां | योनिं | खं | वायुं | ज्योतिषां | निधिम्
स्रष्टारं वारिधाराणां भुवश्च प्रकृतिं पराम् देवदानवयक्षाणां मानवानां साधनम्
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स्रष्टारं | वारिधाराणां | भू + च | प्रकृतिं | पराम्
देव + दानव + यक्ष | मानवानां | च | साधनम्
योगिनां परमं ब्रह्म व्यक्तं ब्रह्मविदां निधिम् चराचरस्य स्रष्टारं प्रतिहर्तारमेव
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योगिनां | परमं | ब्रह्म | व्यक्तं | ब्रह्मन् + विद् | निधिम्
चराचरस्य | स्रष्टारं | प्रतिहर्तारम् | एव | च
कालकोपं महात्मानं शक्रसूर्यगुणोदयम् अवन्दत तदा कृष्णो वाङ्मनोबुद्धिकर्मभिः
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काल + कोप | महात्मानं | शक्र + सूर्य + गुण + उदय
अवन्दत | तदा | कृष्णो | वाच् + मनस् + बुद्धि + कर्मन्
यं प्रपश्यन्ति विद्वांसः सूक्ष्माध्यात्मपदैषिणः तमजं कारणात्मानं जग्मतुः शरणं भवम्
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यं | प्रपश्यन्ति | विद्वांसः | सूक्ष्म + अध्यात्म + पद + एषिन्
तम् | अजं | कारण + आत्मन् | जग्मतुः | शरणं | भवम्
अर्जुनश्चापि तं देवं भूयो भूयोऽभ्यवन्दत ज्ञात्वैकं भूतभव्यादिं सर्वभूतभवोद्भवम्
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अर्जुन + च + अपि | तं | देवं | भूयो | भूयो | ऽभ्यवन्दत
ज्ञा + एक | भूत + भव्य + आदि | सर्व + भूत + भव + उद्भव
ततस्तावागतौ शर्वः प्रोवाच प्रहसन्निव स्वागतं वां नरश्रेष्ठावुत्तिष्ठेतां गतक्लमौ किं वामीप्सितं वीरौ मनसः क्षिप्रमुच्यताम्
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ततस् + तद् + आगम् | शर्वः | प्रोवाच | प्रहसन्न् | इव
स्वागतं | वां | नर + श्रेष्ठ + उत्था | गम् + क्लम
किं | च | वाम् | ईप्सितं | वीरौ | मनसः | क्षिप्रम् | उच्यताम्
येन कार्येण संप्राप्तौ युवां तत्साधयामि वाम् व्रियतामात्मनः श्रेयस्तत्सर्वं प्रददानि वाम्
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येन | कार्येण | सम्प्राप्तौ | युवां | तत् | साधयामि | वाम्
व्रियताम् | आत्मनः | श्रेयस् + तद् | सर्वं | प्रददानि | वाम्
ततस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युत्थाय कृताञ्जली वासुदेवार्जुनौ शर्वं तुष्टुवाते महामती
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ततस् + तद् | वचनं | श्रुत्वा | प्रत्युत्थाय | कृताञ्जली
वासुदेव + अर्जुन | शर्वं | तुष्टुवाते | महामती
नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय पशूनां पतये नित्यमुग्राय कपर्दिने
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नमो | भवाय | शर्वाय | रुद्राय | वरदाय | च
पशूनां | पतये | नित्यम् | उग्राय | च | कपर्दिने
महादेवाय भीमाय त्र्यम्बकाय शंभवे ईशानाय भगघ्नाय नमोऽस्त्वन्धकघातिने
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महादेवाय | भीमाय | त्र्यम्बकाय | च | शम्भवे
ईशानाय | भगघ्नाय | नमो | अस् + अन्धकघातिन्
कुमारगुरवे नित्यं नीलग्रीवाय वेधसे विलोहिताय धूम्राय व्याधायानपराजिते
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कुमार + गुरु | नित्यं | नीलग्रीवाय | वेधसे
विलोहिताय | धूम्राय | व्याध + अनपराजित्
नित्यं नीलशिखण्डाय शूलिने दिव्यचक्षुषे हन्त्रे गोप्त्रे त्रिनेत्राय व्याधाय वसुरेतसे
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नित्यं | नीलशिखण्डाय | शूलिने | दिव्यचक्षुषे
हन्त्रे | गोप्त्रे | त्रिनेत्राय | व्याधाय | वसुरेतसे
अचिन्त्यायाम्बिकाभर्त्रे सर्वदेवस्तुताय वृषध्वजाय पिङ्गाय जटिने ब्रह्मचारिणे
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अचिन्त्य + अम्बिका + भर्तृ | सर्व + देव + स्तु | च
वृषध्वजाय | पिङ्गाय | जटिने | ब्रह्मचारिणे
तप्यमानाय सलिले ब्रह्मण्यायाजिताय विश्वात्मने विश्वसृजे विश्वमावृत्य तिष्ठते
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तप्यमानाय | सलिले | ब्रह्मण्य + अजित | च
विश्वात्मने | विश्वसृजे | विश्वम् | आवृत्य | तिष्ठते
नमो नमस्ते सेव्याय भूतानां प्रभवे सदा ब्रह्मवक्त्राय शर्वाय शंकराय शिवाय
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नमो | नमस् + त्वद् | सेव्याय | भूतानां | प्रभवे | सदा
नमो | भवाय | शर्वाय | रुद्राय | वरदाय | च
नमोऽस्तु वाचस्पतये प्रजानां पतये नमः नमो विश्वस्य पतये महतां पतये नमः
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नमो | ऽस्तु | वाचस्पतये | प्रजानां | पतये | नमः
नमो | ऽस्तु | वाचस्पतये | प्रजानां | पतये | नमः
नमः सहस्रशिरसे सहस्रभुजमन्यवे सहस्रनेत्रपादाय नमोऽसंख्येयकर्मणे
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नमः | सहस्र + शिरस् | सहस्र + भुज + मन्यु
सहस्र + नेत्र + पाद | नमो | असंख्येय + कर्मन्
नमो हिरण्यवर्णाय हिरण्यकवचाय भक्तानुकम्पिने नित्यं सिध्यतां नौ वरः प्रभो
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नमो | हिरण्य + वर्ण | हिरण्यकवचाय | च
भक्त + अनुकम्पिन् | नित्यं | सिध्यतां | नौ | वरः | प्रभो
एवं स्तुत्वा महादेवं वासुदेवः सहार्जुनः प्रसादयामास भवं तदा ह्यस्त्रोपलब्धये
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एवं | स्तुत्वा | महादेवं | वासुदेवः | सह + अर्जुन
प्रसादयामास | भवं | तदा | हि + अस्त्र + उपलब्धि
ततोऽर्जुनः प्रीतमना ववन्दे वृषभध्वजम् ददर्शोत्फुल्लनयनः समस्तं तेजसां निधिम्
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ततो | ऽर्जुनः | प्री + मनस् | ववन्दे | वृषभध्वजम्
दृश् + उत्फुल्ल + नयन | समस्तं | तेजसां | निधिम्
तं चोपहारं स्वकृतं नैशं नैत्यकमात्मनः ददर्श त्र्यम्बकाभ्याशे वासुदेवनिवेदितम्
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तं | च + उपहार | स्व + कृ | नैशं | नैत्यकम् | आत्मनः
ददर्श | त्र्यम्बक + अभ्याश | वासुदेव + निवेदय्
ततोऽभिपूज्य मनसा शर्वं कृष्णं पाण्डवः इच्छाम्यहं दिव्यमस्त्रमित्यभाषत शंकरम्
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ततो | ऽभिपूज्य | मनसा | शर्वं | कृष्णं | च | पाण्डवः
इष् + मद् | दिव्यम् | अस्त्रम् | इति + भाष् | शंकरम्
ततः पार्थस्य विज्ञाय वरार्थे वचनं प्रभुः वासुदेवार्जुनौ देवः स्मयमानोऽभ्यभाषत
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ततः | पार्थस्य | विज्ञाय | वर + अर्थ | वचनं | प्रभुः
वासुदेव + अर्जुन | देवः | स्मयमानो | ऽभ्यभाषत
सरोऽमृतमयं दिव्यमभ्याशे शत्रुसूदनौ तत्र मे तद्धनुर्दिव्यं शरश्च निहितः पुरा
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सरो | अमृत + मय | दिव्यम् | अभ्याशे | शत्रु + सूदन
तत्र | मे | तद् | धनुर् | दिव्यं | शर + च | निहितः | पुरा
येन देवारयः सर्वे मया युधि निपातिताः तत आनीयतां कृष्णौ सशरं धनुरुत्तमम्
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येन | देव + अरि | सर्वे | मया | युधि | निपातिताः
तत | आनीयतां | कृष्णौ | स + शर | धनुर् | उत्तमम्
तथेत्युक्त्वा तु तौ वीरौ तं शर्वं पार्षदैः सह प्रस्थितौ तत्सरो दिव्यं दिव्याश्चर्यशतैर्वृतम्
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तथा + इति + वच् | तु | तौ | वीरौ | तं | शर्वं | पार्षदैः | सह
प्रस्थितौ | तत् | सरो | दिव्यं | दिव्य + आश्चर्य + शत | वृतम्
निर्दिष्टं यद्वृषाङ्केन पुण्यं सर्वार्थसाधकम् तज्जग्मतुरसंभ्रान्तौ नरनारायणावृषी
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निर्दिष्टं | यद् | वृषाङ्केन | पुण्यं | सर्व + अर्थ + साधक
तद् + गम् | असंभ्रान्तौ | नर + नारायण | ऋषी
ततस्तु तत्सरो गत्वा सूर्यमण्डलसंनिभम् नागमन्तर्जले घोरं ददृशातेऽर्जुनाच्युतौ
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ततस् + तु | तत् | सरो | गत्वा | सूर्य + मण्डल + संनिभ
नागम् | अन्तर् + जल | घोरं | ददृशाते | अर्जुन + अच्युत
द्वितीयं चापरं नागं सहस्रशिरसं वरम् वमन्तं विपुलां ज्वालां ददृशातेऽग्निवर्चसम्
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द्वितीयं | च + अपर | नागं | सहस्र + शिरस् | वरम्
वमन्तं | विपुलां | ज्वालां | ददृशाते | अग्नि + वर्चस्
ततः कृष्णश्च पार्थश्च संस्पृश्यापः कृताञ्जली तौ नागावुपतस्थाते नमस्यन्तौ वृषध्वजम्
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ततः | कृष्ण + च | पार्थ + च | संस्पृश् + अप् | कृताञ्जली
तौ | नागाव् | उपतस्थाते | नमस्यन्तौ | वृषध्वजम्
गृणन्तौ वेदविदुषौ तद्ब्रह्म शतरुद्रियम् अप्रमेयं प्रणमन्तौ गत्वा सर्वात्मना भवम्
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गृणन्तौ | तद् | ब्रह्म | शतरुद्रियम्
अप्रमेयं | प्रणमन्तौ | गत्वा | सर्व + आत्मन् | भवम्
ततस्तौ रुद्रमाहात्म्याद्धित्वा रूपं महोरगौ धनुर्बाणश्च शत्रुघ्नं तद्द्वंद्वं समपद्यत
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ततस् + तद् | रुद्र + माहात्म्य + हा | रूपं | महत् + उरग
धनुर् | बाण + च | शत्रु + घ्न | तद् | द्वंद्वं | समपद्यत
ततो जगृहतुः प्रीतौ धनुर्बाणं सुप्रभम् आजह्रतुर्महात्मानौ ददतुश्च महात्मने
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ततो | जगृहतुः | प्रीतौ | धनुर् | बाणं | च | सु + प्रभा
आजह्रतुर् | महात्मानौ | दा + च | महात्मने
ततः पार्श्वाद्वृषाङ्कस्य ब्रह्मचारी न्यवर्तत पिङ्गाक्षस्तपसः क्षेत्रं बलवान्नीललोहितः
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ततः | पार्श्वाद् | वृषाङ्कस्य | ब्रह्मचारी | न्यवर्तत
पिङ्ग + अक्ष + तपस् | क्षेत्रं | बलवत् + नील + लोहित
तद्गृह्य धनुःश्रेष्ठं तस्थौ स्थानं समाहितः व्यकर्षच्चापि विधिवत्सशरं धनुरुत्तमम्
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स | तद् | गृह्य | धनुस् + श्रेष्ठ | तस्थौ | स्थानं | समाहितः
विकृष् + च + अपि | विधिवत् | स + शर | धनुर् | उत्तमम्
तस्य मौर्वीं मुष्टिं स्थानं चालक्ष्य पाण्डवः श्रुत्वा मन्त्रं भवप्रोक्तं जग्राहाचिन्त्यविक्रमः
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तस्य | मौर्वीं | च | मुष्टिं | च | स्थानं | च + आलक्षय् | पाण्डवः
श्रुत्वा | मन्त्रं | भव + प्रवच् | ग्रह् + अचिन्त्य + विक्रम
सरस्येव तं बाणं मुमोचातिबलः प्रभुः चकार पुनर्वीरस्तस्मिन्सरसि तद्धनुः
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सरस् + एव | च | तं | बाणं | मुच् + अतिबल | प्रभुः
चकार | च | पुनर् | वीर + तद् | सरसि | तद् | धनुः
ततः प्रीतं भवं ज्ञात्वा स्मृतिमानर्जुनस्तदा वरमारण्यकं दत्तं दर्शनं शंकरस्य मनसा चिन्तयामास तन्मे संपद्यतामिति
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ततः | प्रीतं | भवं | ज्ञात्वा | स्मृतिमान् | अर्जुन + तदा
वरम् | आरण्यकं | दत्तं | दर्शनं | शंकरस्य | च
मनसा | चिन्तयामास | तद् + मद् | संपद्यताम् | इति
तस्य तन्मतमाज्ञाय प्रीतः प्रादाद्वरं भवः तच्च पाशुपतं घोरं प्रतिज्ञायाश्च पारणम्
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तस्य | तद् + मत | आज्ञाय | प्रीतः | प्रादाद् | वरं | भवः
तद् + च | पाशुपतं | घोरं | प्रतिज्ञा + च | पारणम्
संहृष्टरोमा दुर्धर्षः कृतं कार्यममन्यत ववन्दतुश्च संहृष्टौ शिरोभ्यां तौ महेश्वरम्
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संहृष् + रोमन् | दुर्धर्षः | कृतं | कार्यम् | अमन्यत
वन्द् + च | संहृष्टौ | शिरोभ्यां | तौ | महेश्वरम्
अनुज्ञातौ क्षणे तस्मिन्भवेनार्जुनकेशवौ प्राप्तौ स्वशिबिरं वीरौ मुदा परमया युतौ इन्द्राविष्णू यथा प्रीतौ जम्भस्य वधकाङ्क्षिणौ
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अनुज्ञातौ | क्षणे | तस्मिन् | भव + अर्जुन + केशव
प्राप्तौ | स्व + शिबिर | वीरौ | मुदा | परमया | युतौ
इन्द्राविष्णू | यथा | प्रीतौ | जम्भस्य | वध + काङ्क्षिन्