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Currently viewing: Parva 7 - Chapter 7.53 (56 verses)
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Chapter 7.53

प्रतिज्ञाते तु पार्थेन सिन्धुराजवधे तदा वासुदेवो महाबाहुर्धनंजयमभाषत
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प्रतिज्ञाते | तु | पार्थेन | सिन्धुराज + वध | तदा
वासुदेवो | महत् + बाहु | धनंजयम् | अभाषत
भ्रातॄणां मतमाज्ञाय त्वया वाचा प्रतिश्रुतम् सैन्धवं श्वोऽस्मि हन्तेति तत्साहसतमं कृतम्
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भ्रातॄणां | मतम् | आज्ञाय | त्वया | वाचा | प्रतिश्रुतम्
सैन्धवं | श्वो | ऽस्मि | हन् + इति | तत् | साहसतमं | कृतम्
असंमन्त्र्य मया सार्धमतिभारोऽयमुद्यतः कथं नु सर्वलोकस्य नावहास्या भवेमहि
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असंमन्त्र्य | मया | सार्धम् | अतिभारो | ऽयम् | उद्यतः
कथं | नु | सर्व + लोक | न + अवहस् | भवेमहि
धार्तराष्ट्रस्य शिबिरे मया प्रणिहिताश्चराः इमे शीघ्रमागम्य प्रवृत्तिं वेदयन्ति नः
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धार्तराष्ट्रस्य | शिबिरे | मया | प्रणिधा + चर
त | इमे | शीघ्रम् | आगम्य | प्रवृत्तिं | वेदयन्ति | नः
त्वया वै संप्रतिज्ञाते सिन्धुराजवधे तदा सिंहनादः सवादित्रः सुमहानिह तैः श्रुतः
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प्रतिज्ञाते | तु | पार्थेन | सिन्धुराज + वध | तदा
सिंहनादः | स + वादित्र | सु + महत् | इह | तैः | श्रुतः
तेन शब्देन वित्रस्ता धार्तराष्ट्राः ससैन्धवाः नाकस्मात्सिंहनादोऽयमिति मत्वा व्यवस्थिताः
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तेन | शब्देन | वित्रस्ता | धार्तराष्ट्राः | स + सैन्धव
न + अकस्मात् | सिंहनादो | ऽयम् | इति | मत्वा | व्यवस्थिताः
सुमहाञ्शब्दसंपातः कौरवाणां महाभुज आसीन्नागाश्वपत्तीनां रथघोषश्च भैरवः
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सु + महत् | शब्द + सम्पात | कौरवाणां | महत् + भुज
अस् + नाग + अश्व + पत्ति | रथ + घोष + च | भैरवः
अभिमन्युवधं श्रुत्वा ध्रुवमार्तो धनंजयः रात्रौ निर्यास्यति क्रोधादिति मत्वा व्यवस्थिताः
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अभिमन्यु + वध | श्रुत्वा | ध्रुवम् | आर्तो | धनंजयः
रात्रौ | निर्यास्यति | क्रोधाद् | इति | मत्वा | व्यवस्थिताः
तैर्यतद्भिरियं सत्या श्रुता सत्यवतस्तव प्रतिज्ञा सिन्धुराजस्य वधे राजीवलोचन
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तैर् | यतद्भिर् | इयं | सत्या | श्रुता | सत्यवत् + त्वद्
प्रतिज्ञाते | तु | पार्थेन | सिन्धुराज + वध | तदा
ततो विमनसः सर्वे त्रस्ताः क्षुद्रमृगा इव आसन्सुयोधनामात्याः राजा जयद्रथः
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ततो | विमनसः | सर्वे | त्रस्ताः | क्षुद्र + मृग | इव
आसन् | सुयोधन + अमात्य | स | च | राजा | जयद्रथः
अथोत्थाय सहामात्यैर्दीनः शिबिरमात्मनः आयात्सौवीरसिन्धूनामीश्वरो भृशदुःखितः
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अथ + उत्था | सह + अमात्य | दीनः | शिबिरम् | आत्मनः
आयात् | सौवीर + सिन्धु | ईश्वरो | भृश + दुःखित
मन्त्रकाले संमन्त्र्य सर्वा नैःश्रेयसीः क्रियाः सुयोधनमिदं वाक्यमब्रवीद्राजसंसदि
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स | मन्त्र + काल | संमन्त्र्य | सर्वा | नैःश्रेयसीः | क्रियाः
सुयोधनम् | इदं | वाक्यम् | अब्रवीद् | राजन् + संसद्
मामसौ पुत्रहन्तेति श्वोऽभियाता धनंजयः प्रतिज्ञातो हि सेनाया मध्ये तेन वधो मम
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माम् | असौ | पुत्र + हन्तृ + इति | श्वो | ऽभियाता | धनंजयः
प्रतिज्ञातो | हि | सेनाया | मध्ये | तेन | वधो | मम
तां देवा गन्धर्वा नासुरोरगराक्षसाः उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुं प्रतिज्ञां सव्यसाचिनः
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न | देवा | न | च | गन्धर्वा | न + असुर + उरग + राक्षस
उत्सहन्ते | ऽन्यथा | कर्तुं | कुत | एव | नराधिपाः
ते मां रक्षत संग्रामे मा वो मूर्ध्नि धनंजयः पदं कृत्वाप्नुयाल्लक्ष्यं तस्मादत्र विधीयताम्
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ते | मां | रक्षत | संग्रामे | मा | वो | मूर्ध्नि | धनंजयः
पदं | कृ + आप् | लक्ष्यं | तस्माद् | अत्र | विधीयताम्
अथ रक्षा मे संख्ये क्रियते कुरुनन्दन अनुजानीहि मां राजन्गमिष्यामि गृहान्प्रति
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अथ | रक्षा | न | मे | संख्ये | क्रियते | कुरु + नन्दन
अनुजानीहि | मां | राजन् | गमिष्यामि | गृहान् | प्रति
एवमुक्तस्त्ववाक्शीर्षो विमनाः सुयोधनः श्रुत्वाभिशप्तवन्तं त्वां ध्यानमेवान्वपद्यत
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एवम् | वच् + तु + अवाक् + शीर्ष | विमनाः | स | सुयोधनः
श्रु + अभिशप् | त्वां | ध्यानम् | एव + अनुपद्
तमार्तमभिसंप्रेक्ष्य राजा किल सैन्धवः मृदु चात्महितं चैव सापेक्षमिदमुक्तवान्
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तम् | आर्तम् | अभिसम्प्रेक्ष्य | राजा | किल | स | सैन्धवः
मृदु | च + आत्मन् + हित | च + एव | स + अपेक्षा | इदम् | उक्तवान्
नाहं पश्यामि भवतां तथावीर्यं धनुर्धरम् योऽर्जुनस्यास्त्रमस्त्रेण प्रतिहन्यान्महाहवे
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न + मद् | पश्यामि | भवतां | तथावीर्यं | धनुर्धरम्
यो | अर्जुन + अस्त्र | अस्त्रेण | प्रतिहन् + महत् + आहव
वासुदेवसहायस्य गाण्डीवं धुन्वतो धनुः कोऽर्जुनस्याग्रतस्तिष्ठेत्साक्षादपि शतक्रतुः
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वासुदेव + सहाय | गाण्डीवं | धुन्वतो | धनुः
को | अर्जुन + अग्रतस् + स्था | साक्षाद् | अपि | शतक्रतुः
महेश्वरोऽपि पार्थेन श्रूयते योधितः पुरा पदातिना महातेजा गिरौ हिमवति प्रभुः
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महेश्वरो | ऽपि | पार्थेन | श्रूयते | योधितः | पुरा
पदातिना | महत् + तेजस् | गिरौ | हिमवति | प्रभुः
दानवानां सहस्राणि हिरण्यपुरवासिनाम् जघानैकरथेनैव देवराजप्रचोदितः
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दानवानां | सहस्राणि | हिरण्यपुर + वासिन्
एक + रथ + एव | देवराज + प्रचोदय्
समायुक्तो हि कौन्तेयो वासुदेवेन धीमता सामरानपि लोकांस्त्रीन्निहन्यादिति मे मतिः
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समायुक्तो | हि | कौन्तेयो | वासुदेवेन | धीमता
स + अमर | अपि | लोक + त्रि + निहन् | इति | मे | मतिः
सोऽहमिच्छाम्यनुज्ञातुं रक्षितुं वा महात्मना द्रोणेन सहपुत्रेण वीरेण यदि मन्यसे
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सो | ऽहम् | इष् + अनुज्ञा | रक्षितुं | वा | महात्मना
द्रोणेन | सह + पुत्र | वीरेण | यदि | मन्यसे
राज्ञा स्वयमाचार्यो भृशमाक्रन्दितोऽर्जुन संविधानं विहितं रथाश्च किल सज्जिताः
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स | राज्ञा | स्वयम् | आचार्यो | भृशम् | आक्रन्दितो | ऽर्जुन
संविधानं | च | विहितं | रथ + च | किल | सज्जिताः
कर्णो भूरिश्रवा द्रौणिर्वृषसेनश्च दुर्जयः कृपश्च मद्रराजश्च षडेतेऽस्य पुरोगमाः
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कर्णो | भूरिश्रवा | द्रौणिर् | वृषसेन + च | दुर्जयः
कृप + च | मद्र + राज + च | षड् | एते | ऽस्य | पुरोगमाः
शकटः पद्मपश्चार्धो व्यूहो द्रोणेन कल्पितः पद्मकर्णिकमध्यस्थः सूचीपाशे जयद्रथः स्थास्यते रक्षितो वीरैः सिन्धुराड्युद्धदुर्मदैः
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शकटः | पद्म + पश्च + अर्ध | व्यूहो | द्रोणेन | कल्पितः
पद्म + कर्णिक + मध्य + स्थ | सूचि + पाश | जयद्रथः
स्थास्यते | रक्षितो | वीरैः | सिन्धु + राज् | युद्ध + दुर्मद
धनुष्यस्त्रे वीर्ये प्राणे चैव तथोरसि अविषह्यतमा ह्येते निश्चिताः पार्थ षड्रथाः एतानजित्वा सगणान्नैव प्राप्यो जयद्रथः
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धनुस् + अस्त्र | च | वीर्ये | च | प्राणे | च + एव | तथा + उरस्
अविषह्यतमा | हि + एतद् | निश्चिताः | पार्थ | षड् | रथाः
एतान् | अजित्वा | स + गण + न + एव | प्राप्यो | जयद्रथः
तेषामेकैकशो वीर्यं षण्णां त्वमनुचिन्तय सहिता हि नरव्याघ्रा शक्या जेतुमञ्जसा
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तेषाम् | एकैकशो | वीर्यं | षण्णां | त्वम् | अनुचिन्तय
सहिता | हि | नर + व्याघ्र | न | शक्या | जेतुम् | अञ्जसा
भूयश्च चिन्तयिष्यामि नीतिमात्महिताय वै मन्त्रज्ञैः सचिवैः सार्धं सुहृद्भिः कार्यसिद्धये
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भूयस् + च | चिन्तयिष्यामि | नीतिम् | आत्मन् + हित | वै
मन्त्रज्ञैः | सचिवैः | सार्धं | सुहृद्भिः | कार्य + सिद्धि
षड्रथान्धार्तराष्ट्रस्य मन्यसे यान्बलाधिकान् तेषां वीर्यं ममार्धेन तुल्यमिति लक्षये
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षड् | रथान् | धार्तराष्ट्रस्य | मन्यसे | यान् | बल + अधिक
तेषां | वीर्यं | मद् + अर्ध | न | तुल्यम् | इति | लक्षये
अस्त्रमस्त्रेण सर्वेषामेतेषां मधुसूदन मया द्रक्ष्यसि निर्भिन्नं जयद्रथवधैषिणा
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अस्त्रम् | अस्त्रेण | सर्वेषाम् | एतेषां | मधुसूदन
मया | द्रक्ष्यसि | निर्भिन्नं | जयद्रथ + वध + एषिन्
द्रोणस्य मिषतः सोऽहं सगणस्य विलप्यतः मूर्धानं सिन्धुराजस्य पातयिष्यामि भूतले
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द्रोणस्य | मिषतः | सो | ऽहं | स + गण | विलप्यतः
मूर्धानं | सिन्धुराजस्य | पातयिष्यामि | भू + तल
यदि साध्याश्च रुद्राश्च वसवश्च सहाश्विनः मरुतश्च सहेन्द्रेण विश्वेदेवास्तथासुराः
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यदि | साध्य + च | रुद्र + च | वसु + च | सह + अश्विन्
मरुत् + च | सह + इन्द्र | विश्वेदेव + तथा + असुर
पितरः सहगन्धर्वाः सुपर्णाः सागराद्रयः द्यौर्वियत्पृथिवी चेयं दिशश्च सदिगीश्वराः
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पितरः | सह + गन्धर्व | सुपर्णाः | सागर + अद्रि
द्यौर् | वियत् | पृथिवी | च + इदम् | दिश् + च | स + दिगीश्वर
ग्राम्यारण्यानि भूतानि स्थावराणि चराणि त्रातारः सिन्धुराजस्य भवन्ति मधुसूदन
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ग्राम्य + आरण्य | भूतानि | स्थावराणि | चराणि | च
पार्श्वतः | सिन्धु + राज | व्यराजन्त | महत् + रथ
तथापि बाणैर्निहतं श्वो द्रष्टासि रणे मया सत्येन ते शपे कृष्ण तथैवायुधमालभे
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तथा + अपि | बाणैर् | निहतं | श्वो | द्रष्टासि | रणे | मया
सत्येन | ते | शपे | कृष्ण | तथा + एव + आयुध | आलभे
यश्च गोप्ता महेष्वासस्तस्य पापस्य दुर्मतेः तमेव प्रथमं द्रोणमभियास्यामि केशव
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यद् + च | गोप्ता | महत् + इष्वास + तद् | पापस्य | दुर्मतेः
तम् | एव | प्रथमं | द्रोणम् | अभियास्यामि | केशव
तस्मिन्द्यूतमिदं बद्धं मन्यते स्म सुयोधनः तस्मात्तस्यैव सेनाग्रं भित्त्वा यास्यामि सैन्धवम्
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तस्मिन् | द्यूतम् | इदं | बद्धं | मन्यते | स्म | सुयोधनः
तस्मात् | तद् + एव | सेना + अग्र | भित्त्वा | यास्यामि | सैन्धवम्
द्रष्टासि श्वो महेष्वासान्नाराचैस्तिग्मतेजनैः शृङ्गाणीव गिरेर्वज्रैर्दार्यमाणान्मया युधि
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द्रष्टासि | श्वो | महत् + इष्वास | नाराचैस् | तिग्म + तेजन
शृङ्ग + इव | गिरेर् | वज्रैर् | दारय् + मद् | युधि
नरनागाश्वदेहेभ्यो विस्रविष्यति शोणितम् पतद्भ्यः पतितेभ्यश्च विभिन्नेभ्यः शितैः शरैः
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नर + नाग + अश्व + देह | विस्रविष्यति | शोणितम्
पतद्भ्यः | पत् + च | विभिन्नेभ्यः | शितैः | शरैः
गाण्डीवप्रेषिता बाणा मनोनिलसमा जवे नृनागाश्वान्विदेहासून्कर्तारश्च सहस्रशः
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गाण्डीव + प्रेषय् | बाणा | मनस् + अनिल + सम | जवे
नृ + नाग + अश्व | विदेह + असु | कृ + च | सहस्रशः
यमात्कुबेराद्वरुणाद्रुद्रादिन्द्राच्च यन्मया उपात्तमस्त्रं घोरं वै तद्द्रष्टारो नरा युधि
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यमात् | कुबेराद् | वरुणाद् | रुद्राद् | इन्द्र + च | यद् + मद्
उपात्तम् | अस्त्रं | घोरं | वै | तद् | द्रष्टारो | नरा | युधि
ब्राह्मेणास्त्रेण चास्त्राणि हन्यमानानि संयुगे मया द्रष्टासि सर्वेषां सैन्धवस्याभिरक्षिणाम्
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ब्राह्म + अस्त्र | च + अस्त्र | हन्यमानानि | संयुगे
मया | द्रष्टासि | सर्वेषां | सैन्धव + अभिरक्षिन्
शरवेगसमुत्कृत्तै राज्ञां केशव मूर्धभिः आस्तीर्यमाणां पृथिवीं द्रष्टासि श्वो मया युधि
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शर + वेग + समुत्कृत् | राज्ञां | केशव | मूर्धभिः
आस्तीर्यमाणां | पृथिवीं | द्रष्टासि | श्वो | मया | युधि
क्रव्यादांस्तर्पयिष्यामि द्रावयिष्यामि शात्रवान् सुहृदो नन्दयिष्यामि पातयिष्यामि सैन्धवम्
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क्रव्याद + तर्पय् | द्रावयिष्यामि | शात्रवान्
सुहृदो | नन्दयिष्यामि | पातयिष्यामि | सैन्धवम्
बह्वागस्कृत्कुसंबन्धी पापदेशसमुद्भवः मया सैन्धवको राजा हतः स्वाञ्शोचयिष्यति
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बहु + आगस्कृत् | कुसंबन्धी | पाप + देश + समुद्भव
मया | सैन्धवको | राजा | हतः | स्वाञ् | शोचयिष्यति
सर्वक्षीरान्नभोक्तारः पापाचारा रणाजिरे मया सराजका बाणैर्नुन्ना नंक्ष्यन्ति सैन्धवाः
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सर्व + क्षीर + अन्न + भोक्तृ | पाप + आचार | रण + अजिर
मया | स + राजक | बाणैर् | नुन्ना | नङ्क्ष्यन्ति | सैन्धवाः
तथा प्रभाते कर्तास्मि यथा कृष्ण सुयोधनः नान्यं धनुर्धरं लोके मंस्यते मत्समं युधि
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तथा | प्रभाते | कर्तास्मि | यथा | कृष्ण | सुयोधनः
न + अन्य | धनुर्धरं | लोके | मंस्यते | मद् + सम | युधि
गाण्डीवं धनुर्दिव्यं योद्धा चाहं नरर्षभ त्वं यन्ता हृषीकेश किं नु स्यादजितं मया
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गाण्डीवं | च | धनुर् | दिव्यं | योद्धा | च + मद् | नर + ऋषभ
त्वं | च | यन्ता | हृषीकेश | किं | नु | स्याद् | अजितं | मया
यथा हि लक्ष्म चन्द्रे वै समुद्रे यथा जलम् एवमेतां प्रतिज्ञां मे सत्यां विद्धि जनार्दन
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यथा | हि | लक्ष्म | चन्द्रे | वै | समुद्रे | च | यथा | जलम्
एवम् | एतां | प्रतिज्ञां | मे | सत्यां | विद्धि | जनार्दन
मावमंस्था ममास्त्राणि मावमंस्था धनुर्दृढम् मावमंस्था बलं बाह्वोर्मावमंस्था धनंजयम्
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मा + अवमन् | मद् + अस्त्र | मा + अवमन् | धनुर् | दृढम्
मा + अवमन् | बलं | बाह्वोर् | मा + अवमन् | धनंजयम्
यथा हि यात्वा संग्रामे जीये विजयामि तेन सत्येन संग्रामे हतं विद्धि जयद्रथम्
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यथा | हि | यात्वा | संग्रामे | न | जीये | विजयामि | च
तेन | सत्येन | संग्रामे | हतं | विद्धि | जयद्रथम्
ध्रुवं वै ब्राह्मणे सत्यं ध्रुवा साधुषु संनतिः श्रीर्ध्रुवा चापि दक्षेषु ध्रुवो नारायणे जयः
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ध्रुवं | वै | ब्राह्मणे | सत्यं | ध्रुवा | साधुषु | संनतिः
श्रीर् | ध्रुवा | च + अपि | दक्षेषु | ध्रुवो | नारायणे | जयः
एवमुक्त्वा हृषीकेशं स्वयमात्मानमात्मना संदिदेशार्जुनो नर्दन्वासविः केशवं प्रभुम्
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एवम् | उक्त्वा | हृषीकेशं | स्वयम् | आत्मानम् | आत्मना
संदिश् + अर्जुन | नर्दन् | वासविः | केशवं | प्रभुम्
यथा प्रभातां रजनीं कल्पितः स्याद्रथो मम तथा कार्यं त्वया कृष्ण कार्यं हि महदुद्यतम्
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यथा | प्रभातां | रजनीं | कल्पितः | स्याद् | रथो | मम
तथा | कार्यं | त्वया | कृष्ण | कार्यं | हि | महद् | उद्यतम्