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Currently viewing: Parva 7 - Chapter 7.51 (43 verses)
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Chapter 7.51

त्वयि याते महाबाहो संशप्तकबलं प्रति प्रयत्नमकरोत्तीव्रमाचार्यो ग्रहणे मम
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त्वयि | याते | महत् + बाहु | संशप्तक + बल | प्रति
प्रयत्नम् | अकरोत् | तीव्रम् | आचार्यो | ग्रहणे | मम
व्यूढानीकं वयं द्रोणं वरयामः स्म सर्वशः प्रतिव्यूह्य रथानीकं यतमानं तथा रणे
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वयं | द्रोणं | वरयामः | स्म | सर्वशः
प्रतिव्यूह्य | रथ + अनीक | यतमानं | तथा | रणे
वार्यमाणो रथिभी रक्षितेन मया तथा अस्मानपि जघानाशु पीडयन्निशितैः शरैः
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स | वार्यमाणो | रथिभी | रक्षितेन | मया | तथा
अस्मान् | अपि | हन् + आशु | पीडय् + निशा | शरैः
ते पीड्यमाना द्रोणेन द्रोणानीकं शक्नुमः प्रतिवीक्षितुमप्याजौ भेत्तुं तत्कुत एव तु
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ते | पीड्यमाना | द्रोणेन | द्रोण + अनीक | न | शक्नुमः
प्रतिवीक्षितुम् | अपि + आजि | भेत्तुं | तत् | कुत | एव | तु
वयं त्वप्रतिमं वीर्ये सर्वे सौभद्रमात्मजम् उक्तवन्तः स्म ते तात भिन्ध्यनीकमिति प्रभो
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वयं | तु + अप्रतिम | वीर्ये | सर्वे | सौभद्रम् | आत्मजम्
उक्तवन्तः | स्म | ते | तात | भिद् + अनीक | इति | प्रभो
तथा चोदितोऽस्माभिः सदश्व इव वीर्यवान् असह्यमपि तं भारं वोढुमेवोपचक्रमे
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स | तथा | चोदितो | ऽस्माभिः | सदश्व | इव | वीर्यवान्
असह्यम् | अपि | तं | भारं | वोढुम् | एव + उपक्रम्
तवास्त्रोपदेशेन वीर्येण समन्वितः प्राविशत्तद्बलं बालः सुपर्ण इव सागरम्
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स | त्वद् + अस्त्र + उपदेश | वीर्येण | च | समन्वितः
प्राविशत् | तद् | बलं | बालः | सुपर्ण | इव | सागरम्
तेऽनुयाता वयं वीरं सात्वतीपुत्रमाहवे प्रवेष्टुकामास्तेनैव येन प्राविशच्चमूम्
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ते | ऽनुयाता | वयं | वीरं | सात्वती + पुत्र | आहवे
प्रवेष्टु + काम + तेन + एव | येन | स | प्रविश् + चमू
ततः सैन्धवको राजा क्षुद्रस्तात जयद्रथः वरदानेन रुद्रस्य सर्वान्नः समवारयत्
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ततः | सैन्धवको | राजा | क्षुद्र + तात | जयद्रथः
वर + दान | रुद्रस्य | सर्व + मद् | समवारयत्
ततो द्रोणः कृपः कर्णो द्रौणिश्च बृहद्बलः कृतवर्मा सौभद्रं षड्रथाः पर्यवारयन्
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ततो | द्रोणः | कृपः | कर्णो | द्रौणी | राजा | जयद्रथः
कृतवर्मा | च | हार्दिक्यः | षड् | रथाः | पर्यवारयन्
परिवार्य तु तैः सर्वैर्युधि बालो महारथैः यतमानः परं शक्त्या बहुभिर्विरथीकृतः
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परिवार्य | तु | तैः | सर्वैर् | युधि | बालो | महत् + रथ
यतमानः | परं | शक्त्या | बहुभिर् | विरथीकृतः
ततो दौःशासनिः क्षिप्रं तथा तैर्विरथीकृतम् संशयं परमं प्राप्य दिष्टान्तेनाभ्ययोजयत्
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ततो | दौःशासनिः | क्षिप्रं | तथा | तैर् | विरथीकृतम्
संशयं | परमं | प्राप्य | दिष्टान्त + अभियोजय्
तु हत्वा सहस्राणि द्विपाश्वरथसादिनाम् राजपुत्रशतं चाग्र्यं वीरांश्चालक्षितान्बहून्
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स | तु | हत्वा | सहस्राणि | द्विप + अश्व + रथ + सादिन्
राजन् + पुत्र + शत | च + अग्र्य | वीर + च + अलक्षित | बहून्
बृहद्बलं राजानं स्वर्गेणाजौ प्रयोज्य ततः परमधर्मात्मा दिष्टान्तमुपजग्मिवान्
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बृहद्बलं | च | राजानं | स्वर्ग + आजि | प्रयोज्य | ह
ततः | परम + धर्म + आत्मन् | दिष्टान्तम् | उपजग्मिवान्
एतावदेव निर्वृत्तमस्माकं शोकवर्धनम् चैवं पुरुषव्याघ्रः स्वर्गलोकमवाप्तवान्
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एतावद् | एव | निर्वृत्तम् | अस्माकं | शोक + वर्धन
स | च + एवम् | पुरुष + व्याघ्र | स्वर्ग + लोक | अवाप्तवान्
ततोऽर्जुनो वचः श्रुत्वा धर्मराजेन भाषितम् हा पुत्र इति निःश्वस्य व्यथितो न्यपतद्भुवि
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सौभद्र + तु | वचः | श्रुत्वा | धर्मराजस्य | धीमतः
हा | पुत्र | इति | निःश्वस्य | व्यथितो | न्यपतद् | भुवि
विषण्णवदनाः सर्वे परिगृह्य धनंजयम् नेत्रैरनिमिषैर्दीनाः प्रत्यवेक्षन्परस्परम्
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विषद् + वदन | सर्वे | परिगृह्य | धनंजयम्
नेत्रैर् | अनिमिषैर् | दीनाः | प्रत्यवेक्षन् | परस्परम्
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां वासविः क्रोधमूर्छितः कम्पमानो ज्वरेणेव निःश्वसंश्च मुहुर्मुहुः
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प्रतिलभ्य | ततः | संज्ञां | वासविः | क्रोध + मूर्छय्
तम् | अन्तकम् | इव | क्रुद्धं | निःश्वसन्तं | मुहुर् | मुहुः
पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य श्वसमानोऽश्रुनेत्रवान् उन्मत्त इव विप्रेक्षन्निदं वचनमब्रवीत्
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पाणिं | पाणौ | विनिष्पिष्य | श्वसमानो | अश्रु + नेत्रवत्
उन्मत्त | इव | विप्रेक्षन्न् | इदं | वचनम् | अब्रवीत्
सत्यं वः प्रतिजानामि श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम् चेद्वधभयाद्भीतो धार्तराष्ट्रान्प्रहास्यति
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सत्यं | वः | प्रतिजानामि | श्वो | ऽस्मि | हन्ता | जयद्रथम्
न | चेद् | वध + भय | भीतो | धार्तराष्ट्रान् | प्रहास्यति
चास्माञ्शरणं गच्छेत्कृष्णं वा पुरुषोत्तमम् भवन्तं वा महाराज श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम्
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न | च + मद् | शरणं | गच्छेत् | कृष्णं | वा | पुरुषोत्तमम्
सत्यं | वः | प्रतिजानामि | श्वो | ऽस्मि | हन्ता | जयद्रथम्
धार्तराष्ट्रप्रियकरं मयि विस्मृतसौहृदम् पापं बालवधे हेतुं श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम्
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धार्तराष्ट्र + प्रिय + कर | मयि | विस्मृ + सौहृद
सत्यं | वः | प्रतिजानामि | श्वो | ऽस्मि | हन्ता | जयद्रथम्
रक्षमाणाश्च तं संख्ये ये मां योत्स्यन्ति केचन अपि द्रोणकृपौ वीरौ छादयिष्यामि ताञ्शरैः
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रक्ष् + च | तं | संख्ये | ये | मां | योत्स्यन्ति | केचन
अपि | द्रोण + कृप | वीरौ | छादयिष्यामि | ताञ् | शरैः
यद्येतदेवं संग्रामे कुर्यां पुरुषर्षभाः मा स्म पुण्यकृतां लोकान्प्राप्नुयां शूरसंमतान्
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यदि + एतद् | एवं | संग्रामे | न | कुर्यां | पुरुष + ऋषभ
मा | स्म | पुण्य + कृत् | लोकान् | प्राप्नुयां | शूर + सम्मन्
ये लोका मातृहन्तॄणां ये चापि पितृघातिनाम् गुरुदारगामिनां ये पिशुनानां ये तथा
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ये | लोका | मातृ + हन्तृ | ये | च + अपि | पितृ + घातिन्
गुरु + दार + गामिन् | ये | च | पिशुनानां | च | ये | तथा
साधूनसूयतां ये ये चापि परिवादिनाम् ये निक्षेपहर्तॄणां ये विश्वासघातिनाम्
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साधून् | असूयतां | ये | च | ये | च + अपि | परिवादिनाम्
ये | लोका | मातृ + हन्तृ | ये | च + अपि | पितृ + घातिन्
भुक्तपूर्वां स्त्रियं ये निन्दतामघशंसिनाम् ब्रह्मघ्नानां ये लोका ये गोघातिनामपि
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भुज् + पूर्व | स्त्रियं | ये | च | निन्दताम् | अघ + शंसिन्
ब्रह्मन् + घ्न | च | ये | लोका | ये | च | गो + घातिन् | अपि
पायसं वा यवान्नं वा शाकं कृसरमेव वा संयावापूपमांसानि ये लोका वृथाश्नताम् तानह्नैवाधिगच्छेयं चेद्धन्यां जयद्रथम्
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पायसं | वा | यव + अन्न | वा | शाकं | कृसरम् | एव | वा
संयाव + अपूप + मांस | ये | च | लोका | वृथा + अश्
तान् | अहर् + एव + अधिगम् | न | चेद् + हन् | जयद्रथम्
वेदाध्यायिनमत्यर्थं संशितं वा द्विजोत्तमम् अवमन्यमानो यान्याति वृद्धान्साधूंस्तथा गुरून्
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वेद + अध्यायिन् | अत्यर्थं | संशितं | वा | द्विजोत्तमम्
अवमन्यमानो | यान् | याति | वृद्धान् | साधु + तथा | गुरून्
स्पृशतां ब्राह्मणं गां पादेनाग्निं यां लभेत् याप्सु श्लेष्म पुरीषं वा मूत्रं वा मुञ्चतां गतिः तां गच्छेयं गतिं घोरां चेद्धन्यां जयद्रथम्
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स्पृशतां | ब्राह्मणं | गां | च | पाद + अग्नि | च | यां | लभेत्
यद् + अप् | श्लेष्म | पुरीषं | वा | मूत्रं | वा | मुञ्चतां | गतिः
तान् | अहर् + एव + अधिगम् | न | चेद् + हन् | जयद्रथम्
नग्नस्य स्नायमानस्य या वन्ध्यातिथेर्गतिः उत्कोचिनां मृषोक्तीनां वञ्चकानां या गतिः आत्मापहारिणां या या मिथ्याभिशंसिनाम्
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नग्नस्य | स्नायमानस्य | या | च | वन्ध्या + अतिथि | गतिः
उत्कोचिनां | मृषा + उक्ति | वञ्चकानां | च | या | गतिः
आत्मन् + अपहारिन् | या | च | या | च | मिथ्या + अभिशंसिन्
भृत्यैः संदृश्यमानानां पुत्रदाराश्रितैस्तथा असंविभज्य क्षुद्राणां या गतिर्मृष्टमश्नताम् तां गच्छेयं गतिं घोरां चेद्धन्यां जयद्रथम्
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भृत्यैः | संदृश्यमानानां | पुत्र + दार + आश्रि + तथा
अ + संविभज् | क्षुद्राणां | या | गतिर् | मृष्टम् | अश्नताम्
तान् | अहर् + एव + अधिगम् | न | चेद् + हन् | जयद्रथम्
संश्रितं वापि यस्त्यक्त्वा साधुं तद्वचने रतम् बिभर्ति नृशंसात्मा निन्दते चोपकारिणम्
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संश्रितं | वा + अपि | यद् + त्यज् | साधुं | तद् + वचन | रतम्
न | बिभर्ति | नृशंस + आत्मन् | निन्दते | च + उपकारिन्
अर्हते प्रातिवेश्याय श्राद्धं यो ददाति अनर्हते यो दद्याद्वृषलीपत्युरेव
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अर्हते | प्रातिवेश्याय | श्राद्धं | यो | न | ददाति | च
अनर्हते | च | यो | दद्याद् | वृषली + पति | एव | च
मद्यपो भिन्नमर्यादः कृतघ्नो भ्रातृनिन्दकः तेषां गतिमियां क्षिप्रं चेद्धन्यां जयद्रथम्
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मद्यपो | भिद् + मर्यादा | कृतघ्नो | भ्रातृ + निन्दक
तान् | अहर् + एव + अधिगम् | न | चेद् + हन् | जयद्रथम्
धर्मादपेता ये चान्ये मया नात्रानुकीर्तिताः ये चानुकीर्तिताः क्षिप्रं तेषां गतिमवाप्नुयाम् यदि व्युष्टामिमां रात्रिं श्वो हन्यां जयद्रथम्
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धर्माद् | अपेता | ये | च + अन्य | मया | न + अत्र + अनुकीर्तय्
ये | च + अनुकीर्तय् | क्षिप्रं | तेषां | गतिम् | अवाप्नुयाम्
भवन्तं | वा | महत् + राज | श्वो | ऽस्मि | हन्ता | जयद्रथम्
इमां चाप्यपरां भूयः प्रतिज्ञां मे निबोधत यद्यस्मिन्नहते पापे सूर्योऽस्तमुपयास्यति इहैव संप्रवेष्टाहं ज्वलितं जातवेदसम्
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इमां | च + अपि + अपर | भूयः | प्रतिज्ञां | मे | निबोधत
यदि + इदम् | अहते | पापे | सूर्यो | ऽस्तम् | उपयास्यति
पतंग | इव | संक्रुद्धो | ज्वलितं | जातवेदसम्
असुरसुरमनुष्याः पक्षिणो वोरगा वा; पितृरजनिचरा वा ब्रह्मदेवर्षयो वा चरमचरमपीदं यत्परं चापि तस्मा;त्तदपि मम रिपुं तं रक्षितुं नैव शक्ताः
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असुर + सुर + मनुष्य | पक्षिणो | वा + उरग | वा | पितृ + रजनिचर | वा | ब्रह्मन् + देव + ऋषि | वा
चरम् | अचरम् | अपि + इदम् | यत् | परं | च + अपि | तस्मात् | तद् | अपि | मम | रिपुं | तं | रक्षितुं | न + एव | शक्ताः
यदि विशति रसातलं तदग्र्यं; वियदपि देवपुरं दितेः पुरं वा तदपि शरशतैरहं प्रभाते; भृशमभिपत्य रिपोः शिरोऽभिहर्ता
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यदि | विशति | रसातलं | तद् + अग्र्य | वियद् | अपि | देव + पुर | दितेः | पुरं | वा
तद् | अपि | शर + शत | अहं | प्रभाते | भृशम् | अभिपत्य | रिपोः | शिरो | ऽभिहर्ता
एवमुक्त्वा विचिक्षेप गाण्डीवं सव्यदक्षिणम् तस्य शब्दमतिक्रम्य धनुःशब्दोऽस्पृशद्दिवम्
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एवम् | उक्त्वा | विचिक्षेप | गाण्डीवं | सव्य + दक्षिण
तस्य | शब्दम् | अतिक्रम्य | धनुस् + शब्द | ऽस्पृशद् | दिवम्
अर्जुनेन प्रतिज्ञाते पाञ्चजन्यं जनार्दनः प्रदध्मौ तत्र संक्रुद्धो देवदत्तं धनंजयः
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अर्जुनेन | प्रतिज्ञाते | पाञ्चजन्यं | जनार्दनः
प्रदध्मौ | तत्र | संक्रुद्धो | देवदत्तं | धनंजयः
पाञ्चजन्योऽच्युतवक्त्रवायुना; भृशं सुपूर्णोदरनिःसृतध्वनिः जगत्सपातालवियद्दिगीश्वरं; प्रकम्पयामास युगात्यये यथा
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स | पाञ्चजन्यो | अच्युत + वक्त्र + वायु | भृशं | सु + पृ + उदर + निःसृ + ध्वनि
जगत् | स + पाताल + वियन्त् + दिश् + ईश्वर | प्रकम्पयामास | युग + अत्यय | यथा
ततो वादित्रघोषाश्च प्रादुरासन्समन्ततः सिंहनादाश्च पाण्डूनां प्रतिज्ञाते महात्मना
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ततो | वादित्र + घोष + च | प्रादुरासन् | समन्ततः
सिंहनाद + च | पाण्डूनां | प्रतिज्ञाते | महात्मना