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Currently viewing: Parva 7 - Chapter 7.27 (30 verses)
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Chapter 7.27

यियासतस्ततः कृष्णः पार्थस्याश्वान्मनोजवान् अप्रैषीद्धेमसंछन्नान्द्रोणानीकाय पाण्डुरान्
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यियास् + ततस् | कृष्णः | पार्थ + अश्व + मनोजव
प्रेष् + हेमन् + संछद् | द्रोण + अनीक | पाण्डुरान्
तं प्रयान्तं कुरुश्रेष्ठं स्वांस्त्रातुं द्रोणतापितान् सुशर्मा भ्रातृभिः सार्धं युद्धार्थी पृष्ठतोऽन्वयात्
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तं | प्रयान्तं | कुरु + श्रेष्ठ | स्व + त्रा | द्रोण + तापय्
सुशर्मा | भ्रातृभिः | सार्धं | युद्ध + अर्थिन् | पृष्ठतो | ऽन्वयात्
ततः श्वेतहयः कृष्णमब्रवीदजितं जयः एष मां भ्रातृभिः सार्धं सुशर्माह्वयतेऽच्युत
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ततः | श्वेतहयः | कृष्णम् | अब्रवीद् | अजितं | जयः
एष | च | भ्रातृभिः | सार्धं | सुशर्मन् + आह्वा | रणे
दीर्यते चोत्तरेणैतत्सैन्यं नः शत्रुसूदन द्वैधीभूतं मनो मेऽद्य कृतं संशप्तकैरिदम्
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दीर्यते | च + उत्तर + एतद् | सैन्यं | नः | शत्रु + सूदन
द्वैधीभूतं | मनो | मे | ऽद्य | कृतं | संशप्तकैर् | इदम्
किं नु संशप्तकान्हन्मि स्वान्रक्षाम्यहितार्दितान् इति मे त्वं मतं वेत्थ तत्र किं सुकृतं भवेत्
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किं | नु | संशप्तकान् | हन्मि | स्वान् | रक्ष् + अहित + अर्दय्
इति | मे | त्वं | मतं | वेत्थ | तत्र | किं | सु + कृ | भवेत्
एवमुक्तस्तु दाशार्हः स्यन्दनं प्रत्यवर्तयत् येन त्रिगर्ताधिपतिः पाण्डवं समुपाह्वयत्
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एवम् | वच् + तु | दाशार्हः | स्यन्दनं | प्रत्यवर्तयत्
येन | त्रिगर्त + अधिपति | पाण्डवं | समुपाह्वयत्
ततोऽर्जुनः सुशर्माणं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः ध्वजं धनुश्चास्य तथा क्षुराभ्यां समकृन्तत
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ततो | ऽर्जुनः | सुशर्माणं | विद्ध्वा | सप्तभिर् | आशुगैः
ध्वजं | धनुस् + च + इदम् | तथा | क्षुराभ्यां | समकृन्तत
त्रिगर्ताधिपतेश्चापि भ्रातरं षड्भिरायसैः साश्वं ससूतं त्वरितः पार्थः प्रैषीद्यमक्षयम्
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त्रिगर्त + अधिपति + च + अपि | भ्रातरं | षड्भिर् | आयसैः
स + अश्व | स + सूत | त्वरितः | पार्थः | प्रैषीद् | यम + क्षय
ततो भुजगसंकाशां सुशर्मा शक्तिमायसीम् चिक्षेपार्जुनमादिश्य वासुदेवाय तोमरम्
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ततो | भुजग + संकाश | सुशर्मा | शक्तिम् | आयसीम्
क्षिप् + अर्जुन | आदिश्य | वासुदेवाय | तोमरम्
शक्तिं त्रिभिः शरैश्छित्त्वा तोमरं त्रिभिरर्जुनः सुशर्माणं शरव्रातैर्मोहयित्वा न्यवर्तत
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शक्तिं | त्रिभिः | शर + छिद् | तोमरं | त्रिभिर् | अर्जुनः
सुशर्माणं | शर + व्रात | मोहयित्वा | न्यवर्तत
तं वासवमिवायान्तं भूरिवर्षशरौघिणम् राजंस्तावकसैन्यानां नोग्रं कश्चिदवारयत्
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तं | वासवम् | इव + आया | भूरि + वर्ष + शर + ओघिन्
राजंस् | तावक + सैन्य | न + उग्र | कश्चिद् | अवारयत्
ततो धनंजयो बाणैस्तत एव महारथान् आयाद्विनिघ्नन्कौरव्यान्दहन्कक्षमिवानलः
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ततो | धनंजयो | बाण + ततस् | एव | महत् + रथ
आयाद् | विनिघ्नन् | कौरव्यान् | दहन् | कक्षम् | इव + अनल
तस्य वेगमसह्यं तु कुन्तीपुत्रस्य धीमतः नाशक्नुवंस्ते संसोढुं स्पर्शमग्नेरिव प्रजाः
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तस्य | वेगम् | असह्यं | तु | कुन्ती + पुत्र | धीमतः
न + शक् + तद् | संसोढुं | स्पर्शम् | अग्नेर् | इव | प्रजाः
संवेष्टयन्ननीकानि शरवर्षेण पाण्डवः सुपर्णपातवद्राजन्नायात्प्राग्ज्योतिषं प्रति
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संवेष्टयन्न् | अनीकानि | शर + वर्ष | पाण्डवः
सुपर्ण + पात + वत् | राजन्न् | आयात् | प्राग्ज्योतिषं | प्रति
यत्तदानामयज्जिष्णुर्भरतानामपायिनाम् धनुः क्षेमकरं संख्ये द्विषतामश्रुवर्धनम्
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यत् | तदा + नामय् + जिष्णु | भरतानाम् | अपायिनाम्
धनुः | क्षेम + कर | संख्ये | द्विषताम् | अश्रु + वर्धन
तदेव तव पुत्रस्य राजन्दुर्द्यूतदेविनः कृते क्षत्रविनाशाय धनुरायच्छदर्जुनः
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तद् | एव | तव | पुत्रस्य | राजन् | दुर्द्यूत + देविन्
कृते | क्षत्र + विनाश | धनुर् | आयच्छद् | अर्जुनः
तथा विक्षोभ्यमाणा सा पार्थेन तव वाहिनी व्यदीर्यत महाराज नौरिवासाद्य पर्वतम्
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तथा | विक्षोभ्यमाणा | सा | पार्थेन | तव | वाहिनी
अभ्याकृ + महत् + राज | जलदा | इव | पर्वतम्
ततो दश सहस्राणि न्यवर्तन्त धनुष्मताम् मतिं कृत्वा रणे क्रुद्धा वीरा जयपराजये
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ततो | दश | सहस्राणि | न्यवर्तन्त | धनुष्मताम्
मतिं | कृत्वा | रणे | क्रुद्धा | वीरा | जय + पराजय
व्यपेतहृदयत्रास आपद्धर्मातिगो रथः आर्छत्पार्थो गुरुं भारं सर्वभारसहो युधि
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व्यपे + हृदय + त्रास | आपद् + धर्म + अतिग | रथः
आर्छत् | पार्थो | गुरुं | भारं | सर्व + भार + सह | युधि
यथा नडवनं क्रुद्धः प्रभिन्नः षष्टिहायनः मृद्नीयात्तद्वदायस्तः पार्थोऽमृद्नाच्चमूं तव
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यथा | नडवनं | क्रुद्धः | प्रभिन्नः | षष्टिहायनः
मृद्नीयात् | तद्वद् | आयस्तः | पार्थो | मृद् + चमू | तव
तस्मिन्प्रमथिते सैन्ये भगदत्तो नराधिपः तेन नागेन सहसा धनंजयमुपाद्रवत्
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तस्मिन् | प्रमथिते | सैन्ये | भगदत्तो | नराधिपः
स | नाग + प्रवर | भीमं | सहसा | समुपाद्रवत्
तं रथेन नरव्याघ्रः प्रत्यगृह्णादभीतवत् संनिपातस्तुमुलो बभूव रथनागयोः
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महता | शर + वर्ष | प्रत्यगृह्णाद् | अभीत + वत्
स | संनिपात + तुमुल | बभूव | रथ + नाग
कल्पिताभ्यां यथाशास्त्रं रथेन गजेन संग्रामे चेरतुर्वीरौ भगदत्तधनंजयौ
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कल्पिताभ्यां | यथाशास्त्रं | रथेन | च | गजेन | च
संग्रामे | चेरतुर् | वीरौ | भगदत्त + धनंजय
ततो जीमूतसंकाशान्नागादिन्द्र इवाभिभूः अभ्यवर्षच्छरौघेण भगदत्तो धनंजयम्
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ततो | जीमूत + संकाश + नाग | इन्द्र
अभिवृष् + शर + ओघ | भगदत्तो | धनंजयम्
चापि शरवर्षं तच्छरवर्षेण वासविः अप्राप्तमेव चिच्छेद भगदत्तस्य वीर्यवान्
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स | च + अपि | शर + वर्ष | तद् + शर + वर्ष | वासविः
अप्राप्तम् | एव | चिछेद | भगदत्तस्य | वीर्यवान्
ततः प्राग्ज्योतिषो राजा शरवर्षं निवार्य तत् शरैर्जघ्ने महाबाहुं पार्थं कृष्णं भारत
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ततः | प्राग्ज्योतिषो | राजा | परिगृह्य | द्विप + ऋषभ
शरैर् | जघ्ने | महत् + बाहु | पार्थं | कृष्णं | च | भारत
ततः शरजालेन महताभ्यवकीर्य तौ चोदयामास तं नागं वधायाच्युतपार्थयोः
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ततः | स | शर + जाल | महत् + अभ्यवकृ | तौ
चोदयामास | तं | नागं | वध + अच्युत + पार्थ
तमापतन्तं द्विरदं दृष्ट्वा क्रुद्धमिवान्तकम् चक्रेऽपसव्यं त्वरितः स्यन्दनेन जनार्दनः
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तम् | आपतन्तं | द्विरदं | दृष्ट्वा | क्रुद्धम् | इव + अन्तक
चक्रे | ऽपसव्यं | त्वरितः | स्यन्दनेन | जनार्दनः
संप्राप्तमपि नेयेष परावृत्तं महाद्विपम् सारोहं मृत्युसात्कर्तुं स्मरन्धर्मं धनंजयः
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सम्प्राप्तम् | अपि | न + इष् | परावृत्तं | महत् + द्विप
स + आरोह | मृत्युसात् | कर्तुं | स्मरन् | धर्मं | धनंजयः
तु नागो द्विपरथान्हयांश्चारुज्य मारिष प्राहिणोन्मृत्युलोकाय ततोऽक्रुध्यद्धनंजयः
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स | तु | नागो | द्विप + रथ | हय + च + आरुज् | मारिष
प्रहि + मृत्यु + लोक | ततो | ऽक्रुध्यद् | धनंजयः