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Currently viewing: Parva 7 - Chapter 7.25 (59 verses)
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Chapter 7.25

तेष्वेवं संनिवृत्तेषु प्रत्युद्यातेषु भागशः कथं युयुधिरे पार्था मामकाश्च तरस्विनः
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तद् + एवम् | संनिवृत्तेषु | प्रत्युद्यातेषु | भागशः
कथं | युयुधिरे | पार्था | मामक + च | तरस्विनः
किमर्जुनश्चाप्यकरोत्संशप्तकबलं प्रति संशप्तका वा पार्थस्य किमकुर्वत संजय
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किम् | अर्जुन + च + अपि + कृ | संशप्तक + बल | प्रति
संशप्तका | वा | पार्थस्य | किम् | अकुर्वत | संजय
तथा तेषु निवृत्तेषु प्रत्युद्यातेषु भागशः स्वयमभ्यद्रवद्भीमं नागानीकेन ते सुतः
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तद् + एवम् | संनिवृत्तेषु | प्रत्युद्यातेषु | भागशः
स्वयम् | अभ्यद्रवद् | भीमं | नाग + अनीक | ते | सुतः
नाग इव नागेन गोवृषेणेव गोवृषः समाहूतः स्वयं राज्ञा नागानीकमुपाद्रवत्
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स | नाग | इव | नागेन | गो + वृष + इव | गो + वृष
समाहूतः | स्वयं | राज्ञा | नाग + अनीक | उपाद्रवत्
युद्धकुशलः पार्थो बाहुवीर्येण चान्वितः अभिनत्कुञ्जरानीकमचिरेणैव मारिष
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स | युद्ध + कुशल | पार्थो | बाहु + वीर्य | च + अन्वित
अभिनत् | कुञ्जर + अनीक | अचिरेण + एव | मारिष
ते गजा गिरिसंकाशाः क्षरन्तः सर्वतो मदम् भीमसेनस्य नाराचैर्विमुखा विमदीकृताः
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ते | गजा | गिरि + संकाश | क्षरन्तः | सर्वतो | मदम्
भीमसेनस्य | नाराचैर् | विमुखा | विमदीकृताः
विधमेदभ्रजालानि यथा वायुः समन्ततः व्यधमत्तान्यनीकानि तथैव पवनात्मजः
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विधमेद् | अभ्र + जाल | यथा | वायुः | समन्ततः
व्यधमत् | तद् + अनीक | तूल + राशि | इव + अनिल
तेषु विसृजन्बाणान्भीमो नागेष्वशोभत भुवनेष्विव सर्वेषु गभस्तीनुदितो रविः
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स | तेषु | विसृजन् | बाणान् | भीमो | नाग + शुभ्
भुवन + इव | सर्वेषु | गभस्तीन् | उदितो | रविः
ते भीमबाणैः शतशः संस्यूता विबभुर्गजाः गभस्तिभिरिवार्कस्य व्योम्नि नानाबलाहकाः
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ते | भीम + बाण | शतशः | संस्यूता | विबभुर् | गजाः
गभस्तिभिर् | इव + अर्क | व्योम्नि | नाना + बलाहक
तथा गजानां कदनं कुर्वाणमनिलात्मजम् क्रुद्धो दुर्योधनोऽभ्येत्य प्रत्यविध्यच्छितैः शरैः
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तथा | गजानां | कदनं | कुर्वाणम् | अनिलात्मजम्
क्रुद्धो | दुर्योधनो | ऽभ्येत्य | प्रतिव्यध् + शा | शरैः
ततः क्षणेन क्षितिपं क्षतजप्रतिमेक्षणः क्षयं निनीषुर्निशितैर्भीमो विव्याध पत्रिभिः
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ततः | क्षणेन | क्षितिपं | क्षतज + प्रतिम + ईक्षण
क्षयं | निनीषुर् | निशितैर् | भीमो | विव्याध | पत्रिभिः
शरार्पितसर्वाङ्गः क्रुद्धो विव्याध पाण्डवम् नाराचैरर्करश्म्याभैर्भीमसेनं स्मयन्निव
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स | शर + अर्पय् + सर्व + अङ्ग | क्रुद्धो | विव्याध | पाण्डवम्
नाराचैर् | अर्क + रश्मि + आभ | भीमसेनं | स्मयन्न् | इव
तस्य नागं मणिमयं रत्नचित्रं ध्वजे स्थितम् भल्लाभ्यां कार्मुकं चैव क्षिप्रं चिच्छेद पाण्डवः
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तस्य | नागं | मणि + मय | रत्न + चित्र | ध्वजे | स्थितम्
भल्लाभ्यां | कार्मुकं | च + एव | क्षिप्रं | चिछेद | पाण्डवः
दुर्योधनं पीड्यमानं दृष्ट्वा भीमेन मारिष चुक्षोभयिषुरभ्यागादङ्गो मातङ्गमास्थितः
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दुर्योधनं | पीड्यमानं | दृष्ट्वा | भीमेन | मारिष
चुक्षोभयिषुर् | अभ्यागाद् | अङ्गो | मातङ्गम् | आस्थितः
तमापतन्तं मातङ्गमम्बुदप्रतिमस्वनम् कुम्भान्तरे भीमसेनो नाराचेनार्दयद्भृशम्
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तम् | आपतन्तं | मातङ्गम् | अम्बुद + प्रतिम + स्वन
कुम्भ + अन्तर | भीमसेनो | नाराच + अर्दय् | भृशम्
तस्य कायं विनिर्भिद्य ममज्ज धरणीतले ततः पपात द्विरदो वज्राहत इवाचलः
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तस्य | कायं | विनिर्भिद्य | ममज्ज | धरणी + तल
ततः | पपात | द्विरदो | वज्र + आहन् | इव + अचल
तस्यावर्जितनागस्य म्लेच्छस्यावपतिष्यतः शिरश्चिच्छेद भल्लेन क्षिप्रकारी वृकोदरः
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तद् + आवर्जय् + नाग | म्लेच्छ + अवपत्
शिरस् + छिद् | भल्लेन | क्षिप्रकारी | वृकोदरः
तस्मिन्निपतिते वीरे संप्राद्रवत सा चमूः संभ्रान्ताश्वद्विपरथा पदातीनवमृद्नती
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तद् + निपत् | वीरे | सम्प्राद्रवत | सा | चमूः
सम्भ्रम् + अश्व + द्विप + रथ | पदातीन् | अवमृद्नती
तेष्वनीकेषु सर्वेषु विद्रवत्सु समन्ततः प्राग्ज्योतिषस्ततो भीमं कुञ्जरेण समाद्रवत्
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तद् + अनीक | सर्वेषु | विद्रवत्सु | समन्ततः
प्राग्ज्योतिष + ततस् | भीमं | कुञ्जरेण | समाद्रवत्
येन नागेन मघवानजयद्दैत्यदानवान् नागप्रवरो भीमं सहसा समुपाद्रवत्
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येन | नागेन | मघवान् | अजयद् | दैत्य + दानव
स | नाग + प्रवर | भीमं | सहसा | समुपाद्रवत्
श्रवणाभ्यामथो पद्भ्यां संहतेन करेण व्यावृत्तनयनः क्रुद्धः प्रदहन्निव पाण्डवम्
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श्रवणाभ्याम् | अथो | पद्भ्यां | संहतेन | करेण | च
व्यावृत् + नयन | क्रुद्धः | प्रदहन्न् | इव | पाण्डवम्
ततः सर्वस्य सैन्यस्य नादः समभवन्महान् हा हा विनिहतो भीमः कुञ्जरेणेति मारिष
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ततः | सर्वस्य | सैन्यस्य | नादः | सम्भू + महत्
हा | हा | विनिहतो | भीमः | कुञ्जर + इति | मारिष
तेन नादेन वित्रस्ता पाण्डवानामनीकिनी सहसाभ्यद्रवद्राजन्यत्र तस्थौ वृकोदरः
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तेन | शब्देन | वित्रस्ता | संशप्तक + वरूथिनी
सहस् + अभिद्रु | राजन् | यत्र | तस्थौ | वृकोदरः
ततो युधिष्ठिरो राजा हतं मत्वा वृकोदरम् भगदत्तं सपाञ्चालः सर्वतः समवारयत्
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ततो | युधिष्ठिरो | राजा | हतं | मत्वा | वृकोदरम्
भगदत्तं | स + पाञ्चाल | सर्वतः | समवारयत्
तं रथै रथिनां श्रेष्ठाः परिवार्य समन्ततः अवाकिरञ्शरैस्तीक्ष्णैः शतशोऽथ सहस्रशः
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तं | रथै | रथिनां | श्रेष्ठाः | परिवार्य | समन्ततः
अवाकिरञ् | शर + तीक्ष्ण | शतशो | ऽथ | सहस्रशः
विघातं पृषत्कानामङ्कुशेन समाचरन् गजेन पाण्डुपाञ्चालान्व्यधमत्पर्वतेश्वरः
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स | विघातं | पृषत्कानाम् | अङ्कुशेन | समाचरन्
गजेन | पाण्डु + पाञ्चाल | व्यधमत् | पर्वतेश्वरः
तदद्भुतमपश्याम भगदत्तस्य संयुगे तथा वृद्धस्य चरितं कुञ्जरेण विशां पते
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तद् | अद्भुतम् | अपश्याम | भगदत्तस्य | संयुगे
तथा | वृद्धस्य | चरितं | कुञ्जरेण | विशां | पते
ततो राजा दशार्णानां प्राग्ज्योतिषमुपाद्रवत् तिर्यग्यातेन नागेन समदेनाशुगामिना
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ततो | राजा | दशार्णानां | प्राग्ज्योतिषम् | उपाद्रवत्
तिर्यञ्च् + या | नागेन | स + मद + आशु + गामिन्
तयोर्युद्धं समभवन्नागयोर्भीमरूपयोः सपक्षयोः पर्वतयोर्यथा सद्रुमयोः पुरा
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तयोर् | युद्धं | सम्भू + नाग | भीम + रूप
स + पक्ष | पर्वतयोर् | यथा | स + द्रुम | पुरा
प्राग्ज्योतिषपतेर्नागः संनिपत्यापवृत्य पार्श्वे दशार्णाधिपतेर्भित्त्वा नागमपातयत्
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प्राग्ज्योतिष + पति | नागः | संनिपत् + अपवृत् | च
पार्श्वे | दशार्ण + अधिपति | भित्त्वा | नागम् | अपातयत्
तोमरैः सूर्यरश्म्याभैर्भगदत्तोऽथ सप्तभिः जघान द्विरदस्थं तं शत्रुं प्रचलितासनम्
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तोमरैः | सूर्य + रश्मि + आभ | भगदत्तो | ऽथ | सप्तभिः
जघान | द्विरद + स्थ | तं | शत्रुं | प्रचल् + आसन
उपसृत्य तु राजानं भगदत्तं युधिष्ठिरः रथानीकेन महता सर्वतः पर्यवारयत्
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तत | एष्यति | ते | राजन् | वशम् | अद्य | युधिष्ठिरः
रथ + द्विप + नर + अश्व + च | सर्वतः | पर्यवारयन्
कुञ्जरस्थो रथिभिः शुशुभे सर्वतो वृतः पर्वते वनमध्यस्थो ज्वलन्निव हुताशनः
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स | कुञ्जर + स्थ | रथिभिः | शुशुभे | सर्वतो | वृतः
पर्वते | वन + मध्य + स्थ | ज्वलन्न् | इव | हुताशनः
मण्डलं सर्वतः श्लिष्टं रथिनामुग्रधन्विनाम् किरतां शरवर्षाणि नागः पर्यवर्तत
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मण्डलं | सर्वतः | श्लिष्टं | रथिनाम् | उग्र + धन्विन्
किरतां | शर + वर्ष | स | नागः | पर्यवर्तत
ततः प्राग्ज्योतिषो राजा परिगृह्य द्विपर्षभम् प्रेषयामास सहसा युयुधानरथं प्रति
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ततः | प्राग्ज्योतिषो | राजा | परिगृह्य | द्विप + ऋषभ
प्रेषयामास | सहसा | युयुधान + रथ | प्रति
शिनेः पौत्रस्य तु रथं परिगृह्य महाद्विपः अभिचिक्षेप वेगेन युयुधानस्त्वपाक्रमत्
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शिनेः | पौत्रस्य | तु | रथं | परिगृह्य | महत् + द्विप
अभिचिक्षेप | वेगेन | युयुधान + तु + अपक्रम्
बृहतः सैन्धवानश्वान्समुत्थाप्य तु सारथिः तस्थौ सात्यकिमासाद्य संप्लुतस्तं रथं पुनः
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बृहतः | सैन्धवान् | अश्वान् | समुत्थाप्य | तु | सारथिः
तस्थौ | सात्यकिम् | आसाद्य | सम्प्लु + तद् | रथं | पुनः
तु लब्ध्वान्तरं नागस्त्वरितो रथमण्डलात् निश्चक्राम ततः सर्वान्परिचिक्षेप पार्थिवान्
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स | तु | लभ् + अन्तर | नाग + त्वर् | रथ + मण्डल
निश्चक्राम | ततः | सर्वान् | परिचिक्षेप | पार्थिवान्
ते त्वाशुगतिना तेन त्रास्यमाना नरर्षभाः तमेकं द्विरदं संख्ये मेनिरे शतशो नृपाः
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ते | तु + आशु + गति | तेन | त्रास्यमाना | नर + ऋषभ
तम् | एकं | द्विरदं | संख्ये | मेनिरे | शतशो | नृपाः
ते गजस्थेन काल्यन्ते भगदत्तेन पाण्डवाः ऐरावतस्थेन यथा देवराजेन दानवाः
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ते | गज + स्थ | काल्यन्ते | भगदत्तेन | पाण्डवाः
ऐरावत + स्थ | यथा | देवराजेन | दानवाः
तेषां प्रद्रवतां भीमः पाञ्चालानामितस्ततः गजवाजिकृतः शब्दः सुमहान्समजायत
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तेषां | प्रद्रवतां | भीमः | पाञ्चालानाम् | इतस् + ततस्
गज + वाजिन् + कृ | शब्दः | सु + महत् | समजायत
भगदत्तेन समरे काल्यमानेषु पाण्डुषु प्राग्ज्योतिषमभिक्रुद्धः पुनर्भीमः समभ्ययात्
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भगदत्तेन | समरे | काल्यमानेषु | पाण्डुषु
प्राग्ज्योतिषम् | अभिक्रुद्धः | पुनर् | भीमः | समभ्ययात्
तस्याभिद्रवतो वाहान्हस्तमुक्तेन वारिणा सिक्त्वा व्यत्रासयन्नागस्ते पार्थमहरंस्ततः
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तद् + अभिद्रु | वाहान् | हस्त + मुच् | वारिणा
सिक्त्वा | वित्रासय् + नाग + तद् | पार्थम् | हृ + ततस्
ततस्तमभ्ययात्तूर्णं रुचिपर्वाकृतीसुतः समुक्षञ्शरवर्षेण रथस्थोऽन्तकसंनिभः
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ततस् + तद् | अभ्ययात् | तूर्णं | रुचिपर्वा | कृतीसुतः
समुक्षञ् | शर + वर्ष | रथ + स्थ | अन्तक + संनिभ
ततो रुचिरपर्वाणं शरेण नतपर्वणा सुपर्वा पर्वतपतिर्निन्ये वैवस्वतक्षयम्
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ततो | रुचिरपर्वाणं | शरेण | नम् + पर्वन्
सुपर्वा | पर्वत + पति | निन्ये | वैवस्वत + क्षय
तस्मिन्निपतिते वीरे सौभद्रो द्रौपदीसुताः चेकितानो धृष्टकेतुर्युयुत्सुश्चार्दयन्द्विपम्
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तद् + निपत् | वीरे | सम्प्राद्रवत | सा | चमूः
चेकितानो | धृष्टकेतुर् | युयुत्सु + च + अर्दय् | द्विपम्
एनं शरधाराभिर्धाराभिरिव तोयदाः सिषिचुर्भैरवान्नादान्विनदन्तो जिघांसवः
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त | एनं | शर + धारा | धाराभिर् | इव | तोयदाः
सिषिचुर् | भैरव + नाद | विनदन्तो | जिघांसवः
ततः पार्ष्ण्यङ्कुशाङ्गुष्ठैः कृतिना चोदितो द्विपः प्रसारितकरः प्रायात्स्तब्धकर्णेक्षणो द्रुतम्
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ततः | पार्ष्णि + अङ्कुश + अङ्गुष्ठ | कृतिना | चोदितो | द्विपः
प्रसारय् + कर | प्रायात् | स्तम्भ् + कर्ण + ईक्षण | द्रुतम्
सोऽधिष्ठाय पदा वाहान्युयुत्सोः सूतमारुजत् पुत्रस्तु तव संभ्रान्तः सौभद्रस्याप्लुतो रथम्
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सो | ऽधिष्ठाय | पदा | वाहान् | युयुत्सोः | सूतम् | आरुजत्
पुत्र + तु | तव | संभ्रान्तः | सौभद्र + आप्लु | रथम्
कुञ्जरस्थो विसृजन्निषूनरिषु पार्थिवः बभौ रश्मीनिवादित्यो भुवनेषु समुत्सृजन्
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स | कुञ्जर + स्थ | विसृजन्न् | इषून् | अरिषु | पार्थिवः
बभौ | रश्मीन् | इव + आदित्य | भुवनेषु | समुत्सृजन्
तमार्जुनिर्द्वादशभिर्युयुत्सुर्दशभिः शरैः त्रिभिस्त्रिभिर्द्रौपदेया धृष्टकेतुश्च विव्यधुः
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तम् | आर्जुनिर् | द्वादशभिर् | युयुत्सुर् | दशभिः | शरैः
त्रि | द्रौपदेया | धृष्टकेतु + च | विव्यधुः
सोऽरियत्नार्पितैर्बाणैराचितो द्विरदो बभौ संस्यूत इव सूर्यस्य रश्मिभिर्जलदो महान्
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सो | अरि + यत्न + अर्पय् | बाणैर् | आचितो | द्विरदो | बभौ
संस्यूत | इव | सूर्यस्य | रश्मिभिर् | जलदो | महान्
नियन्तुः शिल्पयत्नाभ्यां प्रेषितोऽरिशरार्दितः परिचिक्षेप तान्नागः रिपून्सव्यदक्षिणम्
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नियन्तुः | शिल्प + यत्न | प्रेषितो | अरि + शर + अर्दय्
परिचिक्षेप | तद् + नाग | स | रिपून् | सव्य + दक्षिण
गोपाल इव दण्डेन यथा पशुगणान्वने आवेष्टयत तां सेनां भगदत्तस्तथा मुहुः
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गोपाल | इव | दण्डेन | यथा | पशु + गण | वने
आवेष्टयत | तां | सेनां | भगदत्त + तथा | मुहुः
क्षिप्रं श्येनाभिपन्नानां वायसानामिव स्वनः बभूव पाण्डवेयानां भृशं विद्रवतां स्वनः
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क्षिप्रं | श्येन + अभिपद् | वायसानाम् | इव | स्वनः
बभूव | पाण्डवेयानां | भृशं | विद्रवतां | स्वनः
नागराजः प्रवराङ्कुशाहतः; पुरा सपक्षोऽद्रिवरो यथा नृप भयं तथा रिपुषु समादधद्भृशं; वणिग्गणानां क्षुभितो यथार्णवः
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स | नाग + राज | प्रवर + अङ्कुश + आहन् | पुरा | स + पक्ष | अद्रि + वर | यथा | नृप
भयं | तथा | रिपुषु | समादधद् | भृशं | वणिज् + गण | क्षुभितो | यथा + अर्णव
ततो ध्वनिर्द्विरदरथाश्वपार्थिवै;र्भयाद्द्रवद्भिर्जनितोऽतिभैरवः क्षितिं वियद्द्यां विदिशो दिशस्तथा; समावृणोत्पार्थिव संयुगे तदा
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ततो | ध्वनिर् | द्विरद + रथ + अश्व + पार्थिव | भयाद् | द्रवद्भिर् | जनितो | अति + भैरव
क्षितिं | वियद् | द्यां | विदिशो | दिश् + तथा | समावृणोत् | पार्थिव | संयुगे | तदा
तेन नागप्रवरेण पार्थिवो; भृशं जगाहे द्विषतामनीकिनीम् पुरा सुगुप्तां विबुधैरिवाहवे; विरोचनो देववरूथिनीमिव
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स | तेन | नाग + प्रवर | पार्थिवो | भृशं | जगाहे | द्विषताम् | अनीकिनीम्
पुरा | सु + गुप् | विबुधैर् | इव + आहव | विरोचनो | देव + वरूथिनी | इव
भृशं ववौ ज्वलनसखो वियद्रजः; समावृणोन्मुहुरपि चैव सैनिकान् तमेकनागं गणशो यथा गजाः; समन्ततो द्रुतमिव मेनिरे जनाः
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भृशं | ववौ | ज्वलन + सख | वियद् | रजः | समावृ + मुहुर् | अपि | च + एव | सैनिकान्
तम् | एक + नाग | गणशो | यथा | गजाः | समन्ततो | द्रुतम् | इव | मेनिरे | जनाः