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Currently viewing: Parva 7 - Chapter 7.23 (19 verses)
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Chapter 7.23

व्यथयेयुरिमे सेनां देवानामपि संयुगे आहवे ये न्यवर्तन्त वृकोदरमुखा रथाः
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व्यथयेयुर् | इमे | सेनां | देवानाम् | अपि | संयुगे
तम् | एते | च + अनुवृत् | सात्यकि + प्रमुख | रथाः
संप्रयुक्तः किलैवायं दिष्टैर्भवति पूरुषः तस्मिन्नेव तु सर्वार्था दृश्यन्ते वै पृथग्विधाः
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सम्प्रयुक्तः | किल + एव + इदम् | दिष्टैर् | भवति | पूरुषः
तस्मिन्न् | एव | तु | सर्व + अर्थ | दृश्यन्ते | वै | पृथग्विधाः
दीर्घं विप्रोषितः कालमरण्ये जटिलोऽजिनी अज्ञातश्चैव लोकस्य विजहार युधिष्ठिरः
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दीर्घं | विप्रोषितः | कालम् | अरण्ये | जटिलो | ऽजिनी
अज्ञात + च + एव | लोकस्य | विजहार | युधिष्ठिरः
एव महतीं सेनां समावर्तयदाहवे किमन्यद्दैवसंयोगान्मम पुत्रस्य चाभवत्
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स | एव | महतीं | सेनां | समावर्तयद् | आहवे
किम् | अन्यद् | दैव + संयोग + मद् | पुत्रस्य | च + भू
युक्त एव हि भाग्येन ध्रुवमुत्पद्यते नरः तथाकृष्यते तेन यथा स्वयमिच्छति
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युक्त | एव | हि | भाग्येन | ध्रुवम् | उत्पद्यते | नरः
स | तथा + आकृष् | तेन | न | यथा | स्वयम् | इच्छति
द्यूतव्यसनमासाद्य क्लेशितो हि युधिष्ठिरः पुनर्भागधेयेन सहायानुपलब्धवान्
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द्यूत + व्यसन | आसाद्य | क्लेशितो | हि | युधिष्ठिरः
स | पुनर् | भागधेयेन | सहायान् | उपलब्धवान्
अर्धं मे केकया लब्धाः काशिकाः कोसलाश्च ये चेदयश्चापरे वङ्गा मामेव समुपाश्रिताः
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अर्धं | मे | केकया | लब्धाः | काशिकाः | कोसल + च | ये
चेदि + च + अपर | वङ्गा | माम् | एव | समुपाश्रिताः
पृथिवी भूयसी तात मम पार्थस्य नो तथा इति मामब्रवीत्सूत मन्दो दुर्योधनस्तदा
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पृथिवी | भूयसी | तात | मम | पार्थस्य | नो | तथा
इति | माम् | अब्रवीत् | सूत | मन्दो | दुर्योधन + तदा
तस्य सेनासमूहस्य मध्ये द्रोणः सुरक्षितः निहतः पार्षतेनाजौ किमन्यद्भागधेयतः
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तस्य | सेना + समूह | मध्ये | द्रोणः | सु + रक्ष्
निहतः | पार्षत + आजि | किम् | अन्यद् | भागधेयतः
मध्ये राज्ञां महाबाहुं सदा युद्धाभिनन्दिनम् सर्वास्त्रपारगं द्रोणं कथं मृत्युरुपेयिवान्
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मध्ये | राज्ञां | महत् + बाहु | सदा | युद्ध + अभिनन्दिन्
सर्व + अस्त्र + पारग | द्रोणं | कथं | मृत्युर् | उपेयिवान्
समनुप्राप्तकृच्छ्रोऽहं संमोहं परमं गतः भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा नाहं जीवितुमुत्सहे
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समनुप्राप् + कृच्छ्र | ऽहं | संमोहं | परमं | गतः
भीष्म + द्रोण | हतौ | श्रुत्वा | किं | नु | जीवामि | संजय
यन्मा क्षत्ताब्रवीत्तात प्रपश्यन्पुत्रगृद्धिनम् दुर्योधनेन तत्सर्वं प्राप्तं सूत मया सह
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यद् + मद् | क्षत्तृ + ब्रू | तात | प्रपश्यन् | पुत्र + गृद्धिन्
दुर्योधनेन | तत् | सर्वं | प्राप्तं | सूत | मया | सह
नृशंसं तु परं तत्स्यात्त्यक्त्वा दुर्योधनं यदि पुत्रशेषं चिकीर्षेयं कृच्छ्रं मरणं भवेत्
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नृशंसं | तु | परं | तत् | स्यात् | त्यक्त्वा | दुर्योधनं | यदि
पुत्र + शेष | चिकीर्षेयं | कृच्छ्रं | न | मरणं | भवेत्
यो हि धर्मं परित्यज्य भवत्यर्थपरो नरः सोऽस्माच्च हीयते लोकात्क्षुद्रभावं गच्छति
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यो | हि | धर्मं | परित्यज्य | भू + अर्थ + पर | नरः
सो | इदम् + च | हीयते | लोकात् | क्षुद्र + भाव | च | गच्छति
अद्य चाप्यस्य राष्ट्रस्य हतोत्साहस्य संजय अवशेषं पश्यामि ककुदे मृदिते सति
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अद्य | च + अपि + इदम् | राष्ट्रस्य | हन् + उत्साह | संजय
अवशेषं | न | पश्यामि | ककुदे | मृदिते | सति
कथं स्यादवशेषं हि धुर्ययोरभ्यतीतयोः यौ नित्यमनुजीवामः क्षमिणौ पुरुषर्षभौ
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कथं | स्याद् | अवशेषं | हि | धुर्ययोर् | अभ्यतीतयोः
यौ | नित्यम् | अनुजीवामः | क्षमिणौ | पुरुष + ऋषभ
व्यक्तमेव मे शंस यथा युद्धमवर्तत केऽयुध्यन्के व्यपाकर्षन्के क्षुद्राः प्राद्रवन्भयात्
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व्यक्तम् | एव | च | मे | शंस | यथा | युद्धम् | अवर्तत
के | ऽयुध्यन् | के | व्यपाकर्षन् | के | क्षुद्राः | प्राद्रवन् | भयात्
धनंजयं मे शंस यद्यच्चक्रे रथर्षभः तस्माद्भयं नो भूयिष्ठं भ्रातृव्याच्च विशेषतः
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धनंजयं | च | मे | शंस | यद् | यद् + कृ | रथ + ऋषभ
तस्माद् | भयं | नो | भूयिष्ठं | भ्रातृव्य + च | विशेषतः
यथासीच्च निवृत्तेषु पाण्डवेषु संजय मम सैन्यावशेषस्य संनिपातः सुदारुणः मामकानां ये शूराः कांस्तत्र समवारयन्
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यथा + अस् + च | निवृत्तेषु | पाण्डवेषु | च | संजय
मम | सैन्य + अवशेष | संनिपातः | सु + दारुण
मामकानां | च | ये | शूराः | क + तत्र | समवारयन्