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Currently viewing: Parva 7 - Chapter 7.13 (80 verses)
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Chapter 7.13

ततः पाण्डवानीके जनयंस्तुमुलं महत् व्यचरत्पाण्डवान्द्रोणो दहन्कक्षमिवानलः
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ततः | स | पाण्डव + अनीक | जनय् + तुमुल | महत्
व्यचरत् | पाण्डवान् | द्रोणो | दहन् | कक्षम् | इव + अनल
निर्दहन्तमनीकानि साक्षादग्निमिवोत्थितम् दृष्ट्वा रुक्मरथं युद्धे समकम्पन्त सृञ्जयाः
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निर्दहन्तम् | अनीकानि | साक्षाद् | अग्निम् | इव + उत्था
दृष्ट्वा | रुक्मरथं | युद्धे | समकम्पन्त | सृञ्जयाः
प्रततं चास्यमानस्य धनुषोऽस्याशुकारिणः ज्याघोषः श्रूयतेऽत्यर्थं विस्फूर्जितमिवाशनेः
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प्रततं | च + अस् | धनुषो | इदम् + आशुकारिन्
तस्य | ज्या + तल + निर्घोष | विस्फूर्जितम् | इव + अशनि
रथिनः सादिनश्चैव नागानश्वान्पदातिनः रौद्रा हस्तवता मुक्ताः प्रमथ्नन्ति स्म सायकाः
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रथिनः | सादिन् + च + एव | नागान् | अश्वान् | पदातिनः
रौद्रा | हस्तवता | मुक्ताः | प्रमथ्नन्ति | स्म | सायकाः
नानद्यमानः पर्जन्यः सानिलः शुचिसंक्षये अश्मवर्षमिवावर्षत्परेषामावहद्भयम्
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नानद्यमानः | पर्जन्यः | स + अनिल | शुचि + संक्षय
अश्मन् + वर्ष | इव + वृष् | परेषाम् | आवहद् | भयम्
व्यचरत्स तदा राजन्सेनां विक्षोभयन्प्रभुः वर्धयामास संत्रासं शात्रवाणाममानुषम्
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व्यचरत् | स | तदा | राजन् | सेनां | विक्षोभयन् | प्रभुः
वर्धयामास | संत्रासं | शात्रवाणाम् | अमानुषम्
तस्य विद्युदिवाभ्रेषु चापं हेमपरिष्कृतम् भ्रमद्रथाम्बुदे तस्मिन्दृश्यते स्म पुनः पुनः
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तस्य | विद्युद् | इव + अभ्र | चापं | हेमन् + परिष्कृ
भ्रमद् | रथ + अम्बुद | तस्मिन् | दृश्यते | स्म | पुनः | पुनः
वीरः सत्यवान्प्राज्ञो धर्मनित्यः सुदारुणः युगान्तकाले यन्तेव रौद्रां प्रास्कन्दयन्नदीम्
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स | वीरः | सत्यवान् | प्राज्ञो | धर्म + नित्य | सु + दारुण
युग + अन्त + काल | यन्तृ + इव | रौद्रां | प्रस्कन्दय् + नदी
अमर्षवेगप्रभवां क्रव्यादगणसंकुलाम् बलौघैः सर्वतः पूर्णां वीरवृक्षापहारिणीम्
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अमर्ष + वेग + प्रभव | क्रव्याद + गण + संकुल
बल + ओघ | सर्वतः | पूर्णां | वीर + वृक्ष + अपहारिन्
शोणितोदां रथावर्तां हस्त्यश्वकृतरोधसम् कवचोडुपसंयुक्तां मांसपङ्कसमाकुलाम्
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शोणित + उद | रथ + आवर्त | हस्तिन् + अश्व + कृ + रोधस्
कवच + उडुप + संयुज् | मांस + पङ्क + समाकुल
मेदोमज्जास्थिसिकतामुष्णीषवरफेनिलाम् संग्रामजलदापूर्णां प्रासमत्स्यसमाकुलाम्
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मेदस् + मज्जन् + अस्थि + सिकता | उष्णीष + वर + फेनिल
संग्राम + जलद + आप्￞ | प्रास + मत्स्य + समाकुल
नरनागाश्वसंभूतां शरवेगौघवाहिनीम् शरीरदारुशृङ्गाटां भुजनागसमाकुलाम्
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नर + नाग + अश्व + सम्भू | शर + वेग + ओघ + वाहिन्
शरीर + दारु + शृङ्गाट | भुज + नाग + समाकुल
उत्तमाङ्गोपलतलां निस्त्रिंशझषसेविताम् रथनागह्रदोपेतां नानाभरणनीरजाम्
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उत्तमाङ्ग + उपल + तल | निस्त्रिंश + झष + सेव्
रथ + नाग + ह्रद + उपे | नाना + आभरण + नीरज
महारथशतावर्तां भूमिरेणूर्मिमालिनीम् महावीर्यवतां संख्ये सुतरां भीरुदुस्तराम्
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महत् + रथ + शत + आवर्त | भूमि + रेणु + ऊर्मि + मालिन्
महत् + वीर्यवत् | संख्ये | सुतरां | भीरु + दुस्तर
शूरव्यालसमाकीर्णां प्राणिवाणिजसेविताम् छिन्नच्छत्रमहाहंसां मुकुटाण्डजसंकुलाम्
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शूर + व्याल + समाकृ | प्राणिन् + वाणिज + सेव्
छिद् + छत्त्र + महत् + हंस | मुकुट + अण्डज + संकुल
चक्रकूर्मां गदानक्रां शरक्षुद्रझषाकुलाम् बडगृध्रसृगालानां घोरसंघैर्निषेविताम्
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चक्र + कूर्म | गदा + नक्र | शर + क्षुद्र + झष + आकुल
घोर + संघ | निषेविताम्
निहतान्प्राणिनः संख्ये द्रोणेन बलिना शरैः वहन्तीं पितृलोकाय शतशो राजसत्तम
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निहतान् | प्राणिनः | संख्ये | द्रोणेन | बलिना | शरैः
वहन्तीं | पितृ + लोक | शतशो | राजन् + सत्तम
शरीरशतसंबाधां केशशैवलशाद्वलाम् नदीं प्रावर्तयद्राजन्भीरूणां भयवर्धिनीम्
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शरीर + शत + सम्बाध | केश + शैवल + शाद्वल
नदीं | प्रावर्तयद् | राजन् | भीरूणां | भय + वर्धिन्
तं जयन्तमनीकानि तानि तान्येव भारत सर्वतोऽभ्यद्रवन्द्रोणं युधिष्ठिरपुरोगमाः
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ततो | व्यूह् + अनीक | तव | तेषां | च | भारत
सर्वतो | ऽभ्यद्रवन् | द्रोणं | युधिष्ठिर + पुरोगम
तानभिद्रवतः शूरांस्तावका दृढकार्मुकाः सर्वतः प्रत्यगृह्णन्त तदभूल्लोमहर्षणम्
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तान् | अभिद्रवतः | शूर + तावक | दृढ + कार्मुक
सर्वतः | प्रत्यगृह्णन्त | तद् | अभूल् | लोमन् + हर्षण
शतमायस्तु शकुनिः सहदेवं समाद्रवत् सनियन्तृध्वजरथं विव्याध निशितैः शरैः
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शत + माया + तु | शकुनिः | सहदेवं | समाद्रवत्
स + नियन्तृ + ध्वज + रथ | विव्याध | निशितैः | शरैः
तस्य माद्रीसुतः केतुं धनुः सूतं हयानपि नातिक्रुद्धः शरैश्छित्त्वा षष्ट्या विव्याध मातुलम्
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तस्य | माद्री + सुत | केतुं | धनुः | सूतं | हयान् | अपि
न + अति + क्रुध् | शर + छिद् | षष्ट्या | विव्याध | मातुलम्
सौबलस्तु गदां गृह्य प्रचस्कन्द रथोत्तमात् तस्य गदया राजन्रथात्सूतमपातयत्
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सौबल + तु | गदां | गृह्य | प्रचस्कन्द | रथ + उत्तम
स | तस्य | गदया | राजन् | रथात् | सूतम् | अपातयत्
ततस्तौ विरथौ राजन्गदाहस्तौ महाबलौ चिक्रीडतू रणे शूरौ सशृङ्गाविव पर्वतौ
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ततस् + तद् | विरथौ | राजन् | गदा + हस्त | महत् + बल
चिक्रीडतू | रणे | शूरौ | स + शृङ्ग + इव | पर्वतौ
द्रोणः पाञ्चालराजानं विद्ध्वा दशभिराशुगैः बहुभिस्तेन चाभ्यस्तस्तं विव्याध शताधिकैः
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द्रोणः | पाञ्चाल + राजन् | विद्ध्वा | दशभिर् | आशुगैः
बहु + तद् | च + अभ्यस् + तद् | विव्याध | शत + अधिक
विविंशतिं भीमसेनो विंशत्या निशितैः शरैः विद्ध्वा नाकम्पयद्वीरस्तदद्भुतमिवाभवत्
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विविंशतिं | भीमसेनो | विंशत्या | निशितैः | शरैः
विद्ध्वा | न + कम्पय् | वीर + तद् | अद्भुतम् | इव + भू
विविंशतिस्तु सहसा व्यश्वकेतुशरासनम् भीमं चक्रे महाराज ततः सैन्यान्यपूजयन्
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विविंशति + तु | सहसा | व्यश्व + केतु + शरासन
भीमं | चक्रे | महत् + राज | ततः | सैन्य + पूजय्
तन्न ममृषे वीरः शत्रोर्विजयमाहवे ततोऽस्य गदया दान्तान्हयान्सर्वानपातयत्
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स | तद् + न | ममृषे | वीरः | शत्रोर् | विजयम् | आहवे
स | तस्य | गदया | राजन् | रथात् | सूतम् | अपातयत्
शल्यस्तु नकुलं वीरः स्वस्रीयं प्रियमात्मनः विव्याध प्रहसन्बाणैर्लाडयन्कोपयन्निव
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शल्य + तु | नकुलं | वीरः | स्वस्रीयं | प्रियम् | आत्मनः
विव्याध | प्रहसन् | बाणैर् | लाडयन् | कोपयन्न् | इव
तस्याश्वानातपत्रं ध्वजं सूतमथो धनुः निपात्य नकुलः संख्ये शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्
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तद् + अश्व | आतपत्रं | च | ध्वजं | सूतम् | अथो | धनुः
निपात्य | नकुलः | संख्ये | शङ्खं | दध्मौ | प्रतापवान्
धृष्टकेतुः कृपेनास्ताञ्छित्त्वा बहुविधाञ्शरान् कृपं विव्याध सप्तत्या लक्ष्म चास्याहरत्त्रिभिः
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धृष्टकेतुः | बहुविधाञ् | शरान्
कृपं | विव्याध | सप्तत्या | लक्ष्म | च + इदम् + आहृ | त्रिभिः
तं कृपः शरवर्षेण महता समवाकिरत् निवार्य रणे विप्रो धृष्टकेतुमयोधयत्
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तं | कृपः | शर + वर्ष | महता | समवाकिरत्
निवार्य | च | रणे | विप्रो | धृष्टकेतुम् | अयोधयत्
सात्यकिः कृतवर्माणं नाराचेन स्तनान्तरे विद्ध्वा विव्याध सप्तत्या पुनरन्यैः स्मयन्निव
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सात्यकिः | कृतवर्माणं | नाराचेन | स्तनान्तरे
विद्ध्वा | विव्याध | सप्तत्या | पुनर् | अन्यैः | स्मयन्न् | इव
सप्तसप्ततिभिर्भोजस्तं विद्ध्वा निशितैः शरैः नाकम्पयत शैनेयं शीघ्रो वायुरिवाचलम्
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स + नियन्तृ + ध्वज + रथ | विव्याध | निशितैः | शरैः
न + कम्पय् | शैनेयं | शीघ्रो | वायुर् | इव + अचल
सेनापतिः सुशर्माणं शीघ्रं मर्मस्वताडयत् चापि तं तोमरेण जत्रुदेशे अताडयत्
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सेनापतिः | सुशर्माणं | शीघ्रं | मर्मन् + ताडय्
स | च + अपि | तं | तोमरेण | जत्रु + देश | अताडयत्
वैकर्तनं तु समरे विराटः प्रत्यवारयत् सह मत्स्यैर्महावीर्यैस्तदद्भुतमिवाभवत्
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प्रेप्सन्तं | समरे | द्रोणं | के | वीराः | पर्यवारयन्
सह | मत्स्यैर् | महत् + वीर्य + तद् | अद्भुतम् | इव + भू
तत्पौरुषमभूत्तत्र सूतपुत्रस्य दारुणम् यत्सैन्यं वारयामास शरैः संनतपर्वभिः
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तत् | पौरुषम् | अभूत् | तत्र | सूतपुत्रस्य | दारुणम्
स + उपधान | नर + व्याघ्र | शरैः | संनम् + पर्वन्
द्रुपदस्तु स्वयं राजा भगदत्तेन संगतः तयोर्युद्धं महाराज चित्ररूपमिवाभवत् भूतानां त्रासजननं चक्रातेऽस्त्रविशारदौ
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द्रुपद + तु | स्वयं | राजा | भगदत्तेन | संगतः
तयोर् | युद्धं | महत् + राज | चित्र + रूप | इव + भू
भूतानां | त्रास + जनन | चक्राते | अस्त्र + विशारद
भूरिश्रवा रणे राजन्याज्ञसेनिं महारथम् महता सायकौघेन छादयामास वीर्यवान्
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अपश्याम | रणे | राजन् | भीमसेनं | महत् + बल
महता | सायक + ओघ | छादयामास | वीर्यवान्
शिखण्डी तु ततः क्रुद्धः सौमदत्तिं विशां पते नवत्या सायकानां तु कम्पयामास भारत
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शिखण्डी | तु | ततः | क्रुद्धः | सौमदत्तिं | विशां | पते
नवत्या | सायकानां | तु | कम्पयामास | भारत
राक्षसौ भीमकर्माणौ हैडिम्बालम्बुसावुभौ चक्रातेऽत्यद्भुतं युद्धं परस्परवधैषिणौ
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राक्षसौ | भीम + कर्मन् | हैडिम्ब + अलम्बुष + उभ्
ततः | प्रववृते | युद्धं | परस्पर + वध + एषिन्
मायाशतसृजौ दृप्तौ मायाभिरितरेतरम् अन्तर्हितौ चेरतुस्तौ भृशं विस्मयकारिणौ
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माया + शत + सृज् | दृप्तौ | मायाभिर् | इतरेतरम्
अन्तर्हितौ | चर् + तद् | भृशं | विस्मय + कारिन्
चेकितानोऽनुविन्देन युयुधे त्वतिभैरवम् यथा देवासुरे युद्धे बलशक्रौ महाबलौ
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चेकितानो | ऽनुविन्देन | युयुधे | तु + अति + भैरव
यथा | देवासुरे | युद्धे | बल + शक्र | महत् + बल
लक्ष्मणः क्षत्रदेवेन विमर्दमकरोद्भृशम् यथा विष्णुः पुरा राजन्हिरण्याक्षेण संयुगे
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लक्ष्मणः | क्षत्रदेवेन | विमर्दम् | अकरोद् | भृशम्
यथा | विष्णुः | पुरा | राजन् | हिरण्याक्षेण | संयुगे
ततः प्रजविताश्वेन विधिवत्कल्पितेन रथेनाभ्यपतद्राजन्सौभद्रं पौरवो नदन्
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ततः | प्रजवित + अश्व | विधिवत् | कल्पितेन | च
रथ + अभिपत् | राजन् | सौभद्रं | पौरवो | नदन्
ततोऽभियाय त्वरितो युद्धाकाङ्क्षी महाबलः तेन चक्रे महद्युद्धमभिमन्युररिंदमः
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ततो | ऽभियाय | त्वरितो | युद्ध + आकाङ्क्षिन् | महत् + बल
तेन | चक्रे | महद् | युद्धम् | अभिमन्युर् | अरिंदमः
पौरवस्त्वथ सौभद्रं शरव्रातैरवाकिरत् तस्यार्जुनिर्ध्वजं छत्रं धनुश्चोर्व्यामपातयत्
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पौरव + तु + अथ | सौभद्रं | शर + व्रात | अवाकिरत्
तद् + आर्जुनि | ध्वजं | छत्रं | धनुस् + च + उर्वी | अपातयत्
सौभद्रः पौरवं त्वन्यैर्विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः पञ्चभिस्तस्य विव्याध हयान्सूतं सायकैः
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सौभद्रः | पौरवं | तु + अन्य | विद्ध्वा | सप्तभिर् | आशुगैः
पञ्चन् + तद् | विव्याध | हयान् | सूतं | च | सायकैः
ततः संहर्षयन्सेनां सिंहवद्विनदन्मुहुः समादत्तार्जुनिस्तूर्णं पौरवान्तकरं शरम्
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ततः | संहर्षयन् | सेनां | सिंह + वत् | विनद् + मुहुर्
समादा + आर्जुनि + तूर्णम् | पौरव + अन्त + कर | शरम्
द्वाभ्यां शराभ्यां हार्दिक्यश्चकर्त सशरं धनुः तदुत्सृज्य धनुश्छिन्नं सौभद्रः परवीरहा उद्बबर्ह सितं खड्गमाददानः शरावरम्
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द्वाभ्यां | शराभ्यां | हार्दिक्य + कृत् | स + शर | धनुः
तद् | उत्सृज्य | धनुस् + छिद् | सौभद्रः | पर + वीर + हन्
सितं | खड्गम् | आददानः | शरावरम्
तेनानेकतारेण चर्मणा कृतहस्तवत् भ्रान्तासिरचरन्मार्गान्दर्शयन्वीर्यमात्मनः
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स | तद् + अनेक + तार | चर्मणा | कृतहस्त + वत्
भ्रम् + असि | चर् + मार्ग | दर्शयन् | वीर्यम् | आत्मनः
भ्रामितं पुनरुद्भ्रान्तमाधूतं पुनरुच्छ्रितम् चर्मनिस्त्रिंशयो राजन्निर्विशेषमदृश्यत
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भ्रामितं | पुनर् | उद्भ्रान्तम् | आधूतं | पुनर् | उच्छ्रितम्
चर्मन् + निस्त्रिंश | राजन् + निर्विशेष | अदृश्यत
पौरवरथस्येषामाप्लुत्य सहसा नदन् पौरवं रथमास्थाय केशपक्षे परामृशत्
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स | पौरव + रथ + ईषा | आप्लुत्य | सहसा | नदन्
पौरवं | रथम् | आस्थाय | केशपक्षे | परामृशत्
जघानास्य पदा सूतमसिनापातयद्ध्वजम् विक्षोभ्याम्भोनिधिं तार्क्ष्यस्तं नागमिव चाक्षिपत्
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हन् + इदम् | पदा | सूतम् | असि + पातय् | ध्वजम्
विक्षोभय् + अम्भोनिधि | तार्क्ष्य + तद् | नागम् | इव | च + क्षिप्
तमाकलितकेशान्तं ददृशुः सर्वपार्थिवाः उक्षाणमिव सिंहेन पात्यमानमचेतनम्
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तम् | आकलय् + केशान्त | ददृशुः | सर्व + पार्थिव
उक्षाणम् | इव | सिंहेन | पात्यमानम् | अचेतनम्
तमार्जुनिवशं प्राप्तं कृष्यमाणमनाथवत् पौरवं पतितं दृष्ट्वा नामृष्यत जयद्रथः
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तम् | आर्जुनि + वश | प्राप्तं | कृष्यमाणम् | अनाथ + वत्
पौरवं | पतितं | दृष्ट्वा | न + मृष् | जयद्रथः
बर्हिणमहावाजं किङ्किणीशतजालवत् चर्म चादाय खड्गं नदन्पर्यपतद्रथात्
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स | बर्हिण + महत् + वाज | किङ्किणी + शत + जालवत्
चर्म | च + आदा | खड्गं | च | नदन् | पर्यपतद् | रथात्
ततः सैन्धवमालोक्य कार्ष्णिरुत्सृज्य पौरवम् उत्पपात रथात्तूर्णं श्येनवन्निपपात
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ततः | सैन्धवम् | आलोक्य | कार्ष्णिर् | उत्सृज्य | पौरवम्
उत्पपात | रथात् | तूर्णं | श्येन + वत् + निपत् | च
प्रासपट्टिशनिस्त्रिंशाञ्शत्रुभिः संप्रवेरितान् चिच्छेदाथासिना कार्ष्णिश्चर्मणा संरुरोध
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प्रास + पट्टिश + निस्त्रिंश | शत्रुभिः | संप्रवेरितान्
छिद् + अथ + असि | कार्ष्णि + चर्मन् | संरुरोध | च
दर्शयित्वा सैन्यानां स्वबाहुबलमात्मनः तमुद्यम्य महाखड्गं चर्म चाथ पुनर्बली
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स | दर्शयित्वा | सैन्यानां | स्व + बाहु + बल | आत्मनः
तम् | उद्यम्य | महत् + खड्ग | चर्म | च + अथ | पुनर् | बली
वृद्धक्षत्रस्य दायादं पितुरत्यन्तवैरिणम् ससाराभिमुखः शूरः शार्दूल इव कुञ्जरम्
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वृद्धक्षत्रस्य | दायादं | पितुर् | अत्यन्त + वैरिन्
सृ + अभिमुख | शूरः | शार्दूल | इव | कुञ्जरम्
तौ परस्परमासाद्य खड्गदन्तनखायुधौ हृष्टवत्संप्रजह्राते व्याघ्रकेसरिणाविव
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तौ | परस्परम् | आसाद्य | खड्ग + दन्त + नख + आयुध
हृष् + वत् | सम्प्रजह्राते | व्याघ्र + केसरिन् + इव
संपातेष्वभिपातेषु निपातेष्वसिचर्मणोः तयोरन्तरं कश्चिद्ददर्श नरसिंहयोः
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सम्पात + अभिपात | निपात + असि + चर्मन्
न | तयोर् | अन्तरं | कश्चिद् | ददर्श | नर + सिंह
अवक्षेपोऽसिनिर्ह्रादः शस्त्रान्तरनिदर्शनम् बाह्यान्तरनिपातश्च निर्विशेषमदृश्यत
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अवक्षेपो | असि + निर्ह्राद | शस्त्र + अन्तर + निदर्शन
बाह्य + अन्तर + निपात + च | निर्विशेषम् | अदृश्यत
बाह्यमाभ्यन्तरं चैव चरन्तौ मार्गमुत्तमम् ददृशाते महात्मानौ सपक्षाविव पर्वतौ
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बाह्यम् | आभ्यन्तरं | च + एव | चरन्तौ | मार्गम् | उत्तमम्
ददृशाते | महात्मानौ | स + पक्ष + इव | पर्वतौ
ततो विक्षिपतः खड्गं सौभद्रस्य यशस्विनः शरावरणपक्षान्ते प्रजहार जयद्रथः
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ततो | विक्षिपतः | खड्गं | सौभद्रस्य | यशस्विनः
शरावरण + पक्ष + अन्त | प्रजहार | जयद्रथः
रुक्मपक्षान्तरे सक्तस्तस्मिंश्चर्मणि भास्वरे सिन्धुराजबलोद्धूतः सोऽभज्यत महानसिः
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रुक्म + पक्ष + अन्तर | सञ्ज् + तद् + चर्मन् | भास्वरे
सिन्धु + राजन् + बल + उद्धू | सो | ऽभज्यत | महान् | असिः
भग्नमाज्ञाय निस्त्रिंशमवप्लुत्य पदानि षट् सोऽदृश्यत निमेषेण स्वरथं पुनरास्थितः
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भग्नम् | आज्ञाय | निस्त्रिंशम् | अवप्लुत्य | पदानि | षट्
सो | ऽदृश्यत | निमेषेण | स्व + रथ | पुनर् | आस्थितः
तं कार्ष्णिं समरान्मुक्तमास्थितं रथमुत्तमम् सहिताः सर्वराजानः परिवव्रुः समन्ततः
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तं | कार्ष्णिं | समर + मुच् | आस्थितं | रथम् | उत्तमम्
सहिताः | सर्व + राजन् | परिवव्रुः | समन्ततः
ततश्चर्म खड्गं समुत्क्षिप्य महाबलः ननादार्जुनदायादः प्रेक्षमाणो जयद्रथम्
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ततस् + चर्मन् | च | खड्गं | च | समुत्क्षिप्य | महत् + बल
नद् + अर्जुन + दायाद | प्रेक्षमाणो | जयद्रथम्
सिन्धुराजं परित्यज्य सौभद्रः परवीरहा तापयामास तत्सैन्यं भुवनं भास्करो यथा
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तरुण + तु + अरुण + प्रख्या | सौभद्रः | पर + वीर + हन्
तापयामास | तत् | सैन्यं | भुवनं | भास्करो | यथा
तस्य सर्वायसीं शक्तिं शल्यः कनकभूषणाम् चिक्षेप समरे घोरां दीप्तामग्निशिखामिव
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तस्य | सर्व + आयस | शक्तिं | शल्यः | कनक + भूषण
चिक्षेप | समरे | घोरां | दीप्ताम् | अग्नि + शिखा | इव
तामवप्लुत्य जग्राह सकोशं चाकरोदसिम् वैनतेयो यथा कार्ष्णिः पतन्तमुरगोत्तमम्
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ताम् | अवप्लुत्य | जग्राह | स + कोश | च + कृ | असिम्
वैनतेयो | यथा | कार्ष्णिः | पतन्तम् | उरग + उत्तम
तस्य लाघवमाज्ञाय सत्त्वं चामिततेजसः सहिताः सर्वराजानः सिंहनादमथानदन्
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तस्य | लाघवम् | आज्ञाय | सत्त्वं | च + अमित + तेजस्
सहिताः | सर्व + राजन् | परिवव्रुः | समन्ततः
ततस्तामेव शल्यस्य सौभद्रः परवीरहा मुमोच भुजवीर्येण वैडूर्यविकृताजिराम्
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तरुण + तु + अरुण + प्रख्या | सौभद्रः | पर + वीर + हन्
मुमोच | भुज + वीर्य | वैडूर्य + विकृ + अजिर
सा तस्य रथमासाद्य निर्मुक्तभुजगोपमा जघान सूतं शल्यस्य रथाच्चैनमपातयत्
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सा | तस्य | रथम् | आसाद्य | निर्मुच् + भुजग + उपम
जघान | सूतं | शल्यस्य | रथ + च + एनद् | अपातयत्
ततो विराटद्रुपदौ धृष्टकेतुर्युधिष्ठिरः सात्यकिः केकया भीमो धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ यमौ द्रौपदेयाश्च साधु साध्विति चुक्रुशुः
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ततो | विराट + द्रुपद | धृष्टकेतुर् | युधिष्ठिरः
सात्यकिः | केकया | भीमो | धृष्टद्युम्न + शिखण्डिन्
यमौ | च | द्रौपदेय + च | साधु | साधु + इति | चुक्रुशुः
बाणशब्दाश्च विविधाः सिंहनादाश्च पुष्कलाः प्रादुरासन्हर्षयन्तः सौभद्रमपलायिनम् तन्नामृष्यन्त पुत्रास्ते शत्रोर्विजयलक्षणम्
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बाण + शब्द + च | विविधाः | सिंहनाद + च | पुष्कलाः
प्रादुरासन् | हर्षयन्तः | सौभद्रम् | अपलायिनम्
तद् + न + मृष् | पुत्र + त्वद् | शत्रोर् | विजय + लक्षण
अथैनं सहसा सर्वे समन्तान्निशितैः शरैः अभ्याकिरन्महाराज जलदा इव पर्वतम्
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अथ + एनद् | सहसा | सर्वे | समन्तात् + निशा | शरैः
अभ्याकृ + महत् + राज | जलदा | इव | पर्वतम्
तेषां प्रियमन्विच्छन्सूतस्य पराभवात् आर्तायनिरमित्रघ्नः क्रुद्धः सौभद्रमभ्ययात्
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तेषां | च | प्रियम् | अन्विच्छन् | सूतस्य | च | पराभवात्
आर्तायनिर् | अमित्र + घ्न | क्रुद्धः | सौभद्रम् | अभ्ययात्