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Currently viewing: Parva 7 - Chapter 7.103 (49 verses)
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Chapter 7.103

तमुत्तीर्णं रथानीकात्तमसो भास्करं यथा दिधारयिषुराचार्यः शरवर्षैरवाकिरत्
Sanjaya said The Preceptor then, desirous of checking the progress of the son of Pandu, who had now crossed the car-host, began to cover him smilingly with his arrows.
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तम् | उत्तीर्णं | रथ + अनीक | तमसो | भास्करं | यथा
दिधारयिषुर् | आचार्यः | शर + वर्ष | अवाकिरत्
पिबन्निव शरौघांस्तान्द्रोणचापवरातिगान् सोऽभ्यवर्तत सोदर्यान्मायया मोहयन्बलम्
Then seeming to drink in the arrowy showers shot from Drona's bow and confounding your troops by his illusive powers, he began to rush against your sons.
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पिबन्न् | इव | शर + ओघ + तद् | द्रोण + चाप + वर + अतिग
सो | ऽभ्यवर्तत | सोदर्य + माया | मोहयन् | बलम्
तं मृधे वेगमास्थाय परं परमधन्विनः चोदितास्तव पुत्रैश्च सर्वतः पर्यवारयन्
Urged on by your sons, many king all foremost bowmen, rushing with forces began to surround Bhima from all sides.
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तं | मृधे | वेगम् | आस्थाय | परं | परम + धन्विन्
चोदय् + त्वद् | पुत्रेण | रुरुधुः | सर्वतोदिशम्
तथा संवृतो भीमः प्रहसन्निव भारत उदयच्छद्गदां तेभ्यो घोरां तां सिंहवन्नदन् अवासृजच्च वेगेन तेषु तान्प्रमथद्बली
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स | तथा | संवृतो | भीमः | प्रहसन्न् | इव | भारत
उदयच्छद् | गदां | तेभ्यो | घोरां | तां | सिंह + वत् + नद्
अवसृज् + च | वेगेन | तेषु | तान् | प्रमथद् | बली
सेन्द्राशनिरिवेन्द्रेण प्रविद्धा संहतात्मना घोषेण महता राजन्पूरयित्वेव मेदिनीम् ज्वलन्ती तेजसा भीमा त्रासयामास ते सुतान्
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स + इन्द्र + अशनि | इव + इन्द्र | प्रविद्धा | संहन् + आत्मन्
घोषेण | महता | राजन् | पूरय् + इव | मेदिनीम्
ज्वलन्ती | तेजसा | भीमा | त्रासयामास | ते | सुतान्
तां पतन्तीं महावेगां दृष्ट्वा तेजोभिसंवृताम् प्राद्रवंस्तावकाः सर्वे नदन्तो भैरवान्रवान्
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तां | पतन्तीं | महत् + वेग | दृष्ट्वा | तेजस् + अभिसंवृ
प्राद्रवन् | द्विरदाः | सर्वे | नदन्तो | भैरवान् | रवान्
तं शब्दमसंसह्यं तस्याः संलक्ष्य मारिष प्रापतन्मनुजास्तत्र रथेभ्यो रथिनस्तदा
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तं | च | शब्दम् | असंसह्यं | तस्याः | संलक्ष्य | मारिष
प्रपत् + मनुज + तत्र | रथेभ्यो | रथिन् + तदा
तान्विद्राव्य कौन्तेयः संख्येऽमित्रान्दुरासदः सुपर्ण इव वेगेन पक्षिराडत्यगाच्चमूम्
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स | तान् | विद्राव्य | कौन्तेयः | संख्ये | ऽमित्रान् | दुरासदः
सुपर्ण | इव | वेगेन | पक्षिराड् | अतिगा + चमू
तथा तं विप्रकुर्वाणं रथयूथपयूथपम् भारद्वाजो महाराज भीमसेनं समभ्ययात्
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तथा | तं | विप्रकुर्वाणं | रथ + यूथप
भारद्वाजो | महत् + राज | भीमसेनं | समभ्ययात्
द्रोणस्तु समरे भीमं वारयित्वा शरोर्मिभिः अकरोत्सहसा नादं पाण्डूनां भयमादधत्
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द्रोण + तु | समरे | भीमं | वारयित्वा | शर + ऊर्मि
अकरोत् | सहसा | नादं | पाण्डूनां | भयम् | आदधत्
तद्युद्धमासीत्सुमहद्घोरं देवासुरोपमम् द्रोणस्य महाराज भीमस्य महात्मनः
Then he uttered a loud war-cry, inspiring there with the Pandavas with terror. Then a dreadful combat commenced between the highsouled Bhima and Drona, that resembled that between the Gods and Asuras. Then with the sharp shafts shot from the bow of Drona.
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शृणु | युद्धं | यथा | वृत्तं | घोरं | देवासुर + उपम
द्रोणस्य | च | महत् + राज | भीमस्य | च | महात्मनः
यदा तु विशिखैस्तीक्ष्णैर्द्रोणचापविनिःसृतैः वध्यन्ते समरे वीराः शतशोऽथ सहस्रशः
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यदा | तु | विशिख + तीक्ष्ण | द्रोण + चाप + विनिःसृ
निजघ्ने | तत्र | शैनेयः | शतशो | ऽथ | सहस्रशः
ततो रथादवप्लुत्य वेगमास्थाय पाण्डवः निमील्य नयने राजन्पदातिर्द्रोणमभ्ययात्
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ततो | रथाद् | अवप्लुत्य | वेगम् | आस्थाय | पाण्डवः
निमील्य | नयने | राजन् | पदातिर् | द्रोणम् | अभ्ययात्
यथा हि गोवृषो वर्षं प्रतिगृह्णाति लीलया तथा भीमो नरव्याघ्रः शरवर्षं समग्रहीत्
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यथा | हि | गो + वृष | वर्षं | प्रतिगृह्णाति | लीलया
तथा | भीमो | नर + व्याघ्र | शर + वर्ष | समग्रहीत्
वध्यमानः समरे रथं द्रोणस्य मारिष ईषायां पाणिना गृह्य प्रचिक्षेप महाबलः
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स | वध्यमानः | समरे | शैनेयस्य | शर + उत्तम
ईषायां | पाणिना | गृह्य | प्रचिक्षेप | महत् + बल
द्रोणस्तु सत्वरो राजन्क्षिप्तो भीमेन संयुगे रथमन्यं समास्थाय व्यूहद्वारमुपाययौ
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द्रोण + तु | स + त्वरा | राजन् | क्षिप्तो | भीमेन | संयुगे
रथम् | अन्यं | समास्थाय | व्यूह + द्वार | उपाययौ
तस्मिन्क्षणे तस्य यन्ता तूर्णमश्वानचोदयत् भीमसेनस्य कौरव्य तदद्भुतमिवाभवत्
He then proceeded resisting the hostile troops like mountains checking the surging sea;
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तस्मिन् | क्षणे | तस्य | यन्ता | तूर्णम् | अश्वान् | अचोदयत्
भीमसेनस्य | कौरव्य | तद् | अद्भुतम् | इव + भू
ततः स्वरथमास्थाय भीमसेनो महाबलः अभ्यवर्तत वेगेन तव पुत्रस्य वाहिनीम्
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प्रतिलभ्य | ततः | संज्ञां | भीमसेनो | महत् + बल
अभ्यवर्तत | वेगेन | तव | पुत्रस्य | वाहिनीम्
मृद्नन्क्षत्रियानाजौ वातो वृक्षानिवोद्धतः अगच्छद्दारयन्सेनां सिन्धुवेगो नगानिव
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स | मृद्नन् | क्षत्रियान् | आजौ | वातो | वृक्षान् | इव + उद्धन्
अगच्छद् | दारयन् | सेनां | सिन्धु + वेग | नगान् | इव
भोजानीकं समासाद्य हार्दिक्येनाभिरक्षितम् प्रमथ्य बहुधा राजन्भीमसेनः समभ्ययात्
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भोज + अनीक | समासाद्य | हार्दिक्य + अभिरक्ष्
भारद्वाजो | महत् + राज | भीमसेनं | समभ्ययात्
संत्रासयन्ननीकानि तलशब्देन मारिष अजयत्सर्वसैन्यानि शार्दूल इव गोवृषान्
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संत्रासयन्न् | अनीकानि | तल + शब्द | मारिष
अजयत् | सर्व + सैन्य | शार्दूल | इव | गो + वृष
भोजानीकमतिक्रम्य काम्बोजानां वाहिनीम् तथा म्लेच्छगणांश्चान्यान्बहून्युद्धविशारदान्
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जलसंध + अर्णव | तीर्त्वा | काम्बोजानां | च | वाहिनीम्
तथा | म्लेच्छ + गण + च + अन्य | बहून् | युद्ध + विशारद
सात्यकिं चापि संप्रेक्ष्य युध्यमानं नरर्षभम् रथेन यत्तः कौन्तेयो वेगेन प्रययौ तदा
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सात्यकिं | च + अपि | सम्प्रेक्ष्य | युध्यमानं | नर + ऋषभ
रथेन | यत्तः | कौन्तेयो | वेगेन | प्रययौ | तदा
भीमसेनो महाराज द्रष्टुकामो धनंजयम् अतीत्य समरे योधांस्तावकान्पाण्डुनन्दनः
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भीमसेनो | महत् + राज | द्रष्टु + काम | धनंजयम्
अतीत्य | समरे | योध + तावक | पाण्डु + नन्दन
सोऽपश्यदर्जुनं तत्र युध्यमानं नरर्षभम् सैन्धवस्य वधार्थं हि पराक्रान्तं पराक्रमी
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अति + अर्जुन | शिनेः | पौत्रो | युध्यते | भरत + ऋषभ
सैन्धवस्य | वध + अर्थ | हि | पराक्रान्तं | पराक्रमी
अर्जुनं तत्र दृष्ट्वाथ चुक्रोश महतो रवान् तं तु तस्य महानादं पार्थः शुश्राव नर्दतः
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अर्जुनं | तत्र | दृश् + अथ | चुक्रोश | महतो | रवान्
तं | तु | तस्य | महत् + नाद | पार्थः | शुश्राव | नर्दतः
ततः पार्थो महानादं मुञ्चन्वै माधवश्च अभ्ययातां महाराज नर्दन्तौ गोवृषाविव
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ततः | पार्थो | महत् + नाद | मुञ्चन् | वै | माधव + च | ह
अभ्ययातां | महत् + राज | नर्दन्तौ | गो + वृष + इव
वासुदेवार्जुनौ श्रुत्वा निनादं तस्य शुष्मिणः पुनः पुनः प्रणदतां दिदृक्षन्तौ वृकोदरम्
Those two heroes hearing at the same time the war-cry of the mighty Bhima themselves began to shout their war-cries, desirous of having a sight of Bhimasena. Then Pritha's son Arjuna and he of Madhu's race, both uttering their war-cries.
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वासुदेव + अर्जुन | श्रुत्वा | निनादं | तस्य | शुष्मिणः
पुनः | पुनः | प्रणदतां | दिदृक्षन्तौ | वृकोदरम्
भीमसेनरवं श्रुत्वा फल्गुनस्य धन्विनः अप्रीयत महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः
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भीमसेन + रव | श्रुत्वा | फल्गुनस्य | च | धन्विनः
यावत् + न | क्रुध्यते | राजा | धर्मपुत्रो | युधिष्ठिरः
विशोकश्चाभवद्राजा श्रुत्वा तं निनदं महत् धनंजयस्य रणे जयमाशास्तवान्विभुः
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विशोक + च + भू | राजा | श्रुत्वा | तं | निनदं | महत्
धनंजयस्य | च | रणे | जयम् | आशा + स्तव | विभुः
तथा तु नर्दमाने वै भीमसेने रणोत्कटे स्मितं कृत्वा महाबाहुर्धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः
While the furious Bhima was thus roaring the mighty-armed Yudhishthira that foremost of all virtuous persons, that son of Dharma, reflected smilingly for a while and then thus worded the thought that then filled his heart.
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तथा | तु | नर्दमाने | वै | भीमसेने | रण + उत्कट
यावत् + न | क्रुध्यते | राजा | धर्मपुत्रो | युधिष्ठिरः
हृद्गतं मनसा प्राह ध्यात्वा धर्मभृतां वरः दत्ता भीम त्वया संवित्कृतं गुरुवचस्तथा
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हृद्गतं | मनसा | प्राह | ध्यात्वा | धर्म + भृत् | वरः
दत्ता | भीम | त्वया | संवित् | कृतं | गुरु + वचस् + तथा
हि तेषां जयो युद्धे येषां द्वेष्टासि पाण्डव दिष्ट्या जीवति संग्रामे सव्यसाची धनंजयः
"O Bhima, you have indeed sent me information; you have truly carried out the commands of your superior. O son of Pandu, they cannot have any hope of victory in battle, whose enemy you yourself are. It is indeed fortunate that Savyasachin, that conqueror of Kubera still lives.
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न | हि | तेषां | जयो | युद्धे | येषां | द्वेष्टृ + अस् | पाण्डव
दिष्ट्या | जीवति | संग्रामे | सव्यसाची | धनंजयः
दिष्ट्या कुशली वीरः सात्यकिः सत्यविक्रमः दिष्ट्या शृणोमि गर्जन्तौ वासुदेवधनंजयौ
It is also fortunate that Satyaki of indomitable prowess is sound and safe. It if fortunate that I hear the roars of the roaring Vasudeva and Dhananjaya. He who having vanquished Shakra in battle, gratified the God of fire. It is fortunate, that slayer of foes Phalguna still lives. He depending upon whose prowess of arms we live.
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ततस् + तद् | विरथं | कृत्वा | सात्यकिः | सत्य + विक्रम
दिष्ट्या | शृणोमि | गर्जन्तौ | वासुदेव + धनंजय
येन शक्रं रणे जित्वा तर्पितो हव्यवाहनः हन्ता द्विषतां संख्ये दिष्ट्या जीवति फल्गुनः
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येन | शक्रं | रणे | जित्वा | तर्पितो | हव्यवाहनः
स | हन्ता | द्विषतां | संख्ये | दिष्ट्या | जीवति | फल्गुनः
यस्य बाहुबलं सर्वे वयमाश्रित्य जीविताः हन्ता रिपुसैन्यानां दिष्ट्या जीवति फल्गुनः
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यस्य | बाहु + बल | सर्वे | समाश्रित्य | महात्मनः
स | हन्ता | द्विषतां | संख्ये | दिष्ट्या | जीवति | फल्गुनः
निवातकवचा येन देवैरपि सुदुर्जयाः निर्जिता रथिनैकेन दिष्ट्या पार्थः जीवति
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निवात + कवच | येन | देवैर् | अपि | सु + दुर्जय
निर्जिता | रथिन् + एक | दिष्ट्या | पार्थः | स | जीवति
कौरवान्सहितान्सर्वान्गोग्रहार्थे समागतान् योऽजयन्मत्स्यनगरे दिष्ट्या पार्थः जीवति
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कौरवान् | सहितान् | सर्वान् | गोग्रह + अर्थ | समागतान्
निर्जिता | रथिन् + एक | दिष्ट्या | पार्थः | स | जीवति
कालकेयसहस्राणि चतुर्दश महारणे योऽवधीद्भुजवीर्येण दिष्ट्या पार्थः जीवति
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कालकेय + सहस्र | चतुर्दश | महत् + रण
निर्जिता | रथिन् + एक | दिष्ट्या | पार्थः | स | जीवति
गन्धर्वराजं बलिनं दुर्योधनकृतेन वै जितवान्योऽस्त्रवीर्येण दिष्ट्या पार्थः जीवति
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तव | दुर्मन्त्रिते | राजन् | दुर्योधन + कृत | च
निर्जिता | रथिन् + एक | दिष्ट्या | पार्थः | स | जीवति
किरीटमाली बलवाञ्श्वेताश्वः कृष्णसारथिः मम प्रियश्च सततं दिष्ट्या जीवति फल्गुनः
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किरीटमाली | बलवाञ् | श्वेताश्वः | कृष्णसारथिः
स | हन्ता | द्विषतां | संख्ये | दिष्ट्या | जीवति | फल्गुनः
पुत्रशोकाभिसंतप्तश्चिकीर्षुः कर्म दुष्करम् जयद्रथवधान्वेषी प्रतिज्ञां कृतवान्हि यः कच्चित्स सैन्धवं संख्ये हनिष्यति धनंजयः
And even now endeavouring to compass the death of Jayadratha, he that has made a terrible vow, viz., Dhananjaya, will he succeed in slaying the king of the Sindhus in battle.
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पुत्र + शोक + अभिसंतप् + चिकीर्षु | कर्म | दुष्करम्
जयद्रथ + वध + अन्वेषिन् | प्रतिज्ञां | कृतवान् | हि | यः
कच्चित् | स | सैन्धवं | संख्ये | हनिष्यति | धनंजयः
कच्चित्तीर्णप्रतिज्ञं हि वासुदेवेन रक्षितम् अनस्तमित आदित्ये समेष्याम्यहमर्जुनम्
Shall I behold Arjuna again before the sun set, when he will return having fulfilled his vow through the help of Vasudeva's son?
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कच्चित् | तृ + प्रतिज्ञा | हि | वासुदेवेन | रक्षितम्
अनस्तंगत | आदित्ये | हन्ता | सैन्धवम् | अर्जुनः
कच्चित्सैन्धवको राजा दुर्योधनहिते रतः नन्दयिष्यत्यमित्राणि फल्गुनेन निपातितः
Will the ruler of the Sindhus ever anxious for achieving the good of king Duryodhana, afford delight unto his foes, being slain by Phalguna.
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कच्चित् | सैन्धवको | राजा | दुर्योधन + हित | रतः
नन्दय् + अमित्र | फल्गुनेन | निपातितः
कच्चिद्दुर्योधनो राजा फल्गुनेन निपातितम् दृष्ट्वा सैन्धवकं संख्ये शममस्मासु धास्यति
Will king Duryodhana, beholding the ruler of the Sindhus slain by Arjuna, conclude peace with ourselves?
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कच्चिद् | दुर्योधनो | राजा | फल्गुनेन | निपातितम्
दृष्ट्वा | सैन्धवकं | संख्ये | शमम् | अस्मासु | धास्यति
दृष्ट्वा विनिहतान्भ्रातॄन्भीमसेनेन संयुगे कच्चिद्दुर्योधनो मन्दः शममस्मासु धास्यति
Will the wicked Duryodhana beholding his brothers slain in battle by Bhimasena, conclude peace with us?
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दृष्ट्वा | विनिहतान् | भ्रातॄन् | भीमसेनेन | संयुगे
कच्चिद् | दुर्योधनो | मन्दः | शमम् | अस्मासु | धास्यति
दृष्ट्वा चान्यान्बहून्योधान्पातितान्धरणीतले कच्चिद्दुर्योधनो मन्दः पश्चात्तापं करिष्यति
Will the wicked Duryodhana beholding many other mighty warriors slain and fallen on the field, repent for his own folly.
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दृष्ट्वा | च + अन्य | बहून् | योधान् | पातितान् | धरणी + तल
दृष्ट्वा | दुर्योधनो | राजा | पश्चात्तापं | गमिष्यति
कच्चिद्भीष्मेण नो वैरमेकेनैव प्रशाम्यति शेषस्य रक्षणार्थं संधास्यति सुयोधनः
Will our enmity end with the sacrifice of Bhima's self alone? Will Suyodhana conclude peace for the safety of the rest of the Kshatriyas?"
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कच्चिद् | भीष्मेण | नो | वैरम् | एक + एव | प्रशाम्यति
शेषस्य | रक्षण + अर्थ | च | संधास्यति | सुयोधनः
एवं बहुविधं तस्य चिन्तयानस्य पार्थिव कृपयाभिपरीतस्य घोरं युद्धमवर्तत
When in his heart overflowing with compassion, king Yudhishthira was thus thinking, on the other part of the field.
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एवं | बहुविधं | तस्य | चिन्तयानस्य | पार्थिव
कृपा + अभिपरी | घोरं | युद्धम् | अवर्तत