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Currently viewing: Parva 6 - Chapter 6.96 (51 verses)
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Chapter 6.96

अभिमन्यू रथोदारः पिशङ्गैस्तुरगोत्तमैः अभिदुद्राव तेजस्वी दुर्योधनबलं महत् विकिरञ्शरवर्षाणि वारिधारा इवाम्बुदः
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अभिमन्यू | रथ + उदार | पिशङ्ग + तुरग + उत्तम
अभिदुद्राव | वेगेन | दुर्योधनम् | अरिंदमम्
विकिरञ् | शर + वर्ष | वारि + धारा | इव + अम्बुद
शेकुः समरे क्रुद्धं सौभद्रमरिसूदनम् शस्त्रौघिणं गाहमानं सेनासागरमक्षयम् निवारयितुमप्याजौ त्वदीयाः कुरुपुंगवाः
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न | शेकुः | समरे | क्रुद्धं | सौभद्रम् | अरि + सूदन
गाहमानं | सेना + सागर | अक्षयम्
निवारयितुम् | अपि + आजि | त्वदीयाः | कुरु + पुंगव
तेन मुक्ता रणे राजञ्शराः शत्रुनिबर्हणाः क्षत्रियाननयञ्शूरान्प्रेतराजनिवेशनम्
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तेन | मुक्ता | रणे | राजञ् | शराः | शत्रु + निबर्हण
क्षत्रियान् | अनयञ् | शूरान् | प्रेतराज + निवेशन
यमदण्डोपमान्घोराञ्ज्वलनाशीविषोपमान् सौभद्रः समरे क्रुद्धः प्रेषयामास सायकान्
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यम + दण्ड + उपम | घोराञ् | ज्वलन + आशीविष + उपम
सौभद्रः | समरे | क्रुद्धः | प्रेषयामास | सायकान्
रथिनं रथात्तूर्णं हयपृष्ठाच्च सादिनम् गजारोहांश्च सगजान्पातयामास फाल्गुनिः
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रथिनं | च | रथात् | तूर्णं | हय + पृष्ठ + च | सादिनम्
गज + आरोह + च | स + गज | पातयामास | फाल्गुनिः
तस्य तत्कुर्वतः कर्म महत्संख्येऽद्भुतं नृपाः पूजयां चक्रिरे हृष्टाः प्रशशंसुश्च फाल्गुनिम्
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तस्य | तत् | कुर्वतः | कर्म | महत् | संख्ये | ऽद्भुतं | नृपाः
पूजयांचक्रिरे | हृष्टाः | प्रशंस् + च | फाल्गुनिम्
तान्यनीकानि सौभद्रो द्रावयन्बह्वशोभत तूलराशिमिवाधूय मारुतः सर्वतोदिशम्
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तद् + अनीक | सौभद्रो | द्रावयन् | बहु + शुभ्
तूल + राशि | इव + आधू | मारुतः | सर्वतोदिशम्
तेन विद्राव्यमाणानि तव सैन्यानि भारत त्रातारं नाध्यगच्छन्त पङ्के मग्ना इव द्विपाः
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तेन | विद्राव्यमाणानि | तव | सैन्यानि | भारत
त्रातारं | न + अधिगम् | पङ्के | मग्ना | इव | द्विपाः
विद्राव्य सर्वसैन्यानि तावकानि नरोत्तमः अभिमन्युः स्थितो राजन्विधूमोऽग्निरिव ज्वलन्
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विद्राव्य | सर्व + सैन्य | तावकानि | नर + उत्तम
अभिमन्युः | स्थितो | राजन् | विधूमो | ऽग्निर् | इव | ज्वलन्
चैनं तावकाः सर्वे विषेहुररिघातिनम् प्रदीप्तं पावकं यद्वत्पतंगाः कालचोदिताः
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न | च + एनद् | तावकाः | सर्वे | विषेहुर् | अरि + घातिन्
प्रदीप्तं | पावकं | यद्वत् | पतंगाः | काल + चोदय्
प्रहरन्सर्वशत्रुभ्यः पाण्डवानां महारथः अदृश्यत महेष्वासः सवज्र इव वज्रभृत्
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एते | क्रुद्धा | महत् + इष्वास | पाण्डवानां | महत् + रथ
अदृश्यत | महत् + इष्वास | स + वज्र | इव | वज्रभृत्
हेमपृष्ठं धनुश्चास्य ददृशे चरतो दिशः तोयदेषु यथा राजन्भ्राजमानाः शतह्रदाः
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हेमन् + पृष्ठ | धनुस् + च + इदम् | ददृशे | चरतो | दिशः
तोयदेषु | यथा | राजन् | भ्राजमानाः | शतह्रदाः
शराश्च निशिताः पीता निश्चरन्ति स्म संयुगे वनात्फुल्लद्रुमाद्राजन्भ्रमराणामिव व्रजाः
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शर + च | निशिताः | पीता | निश्चरन्ति | स्म | संयुगे
वनात् | फुल्ल + द्रुम | राजन् | भ्रमराणाम् | इव | व्रजाः
तथैव चरतस्तस्य सौभद्रस्य महात्मनः रथेन मेघघोषेण ददृशुर्नान्तरं जनाः
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यत्र | भीष्मस्य | द्रोणस्य | कृपस्य | च | महात्मनः
रथेन | मेघ + घोष | ददृशुर् | न + अन्तर | जनाः
मोहयित्वा कृपं द्रोणं द्रौणिं बृहद्बलम् सैन्धवं महेष्वासं व्यचरल्लघु सुष्ठु
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मोहयित्वा | कृपं | द्रोणं | द्रौणिं | च | स | बृहद्बलम्
सैन्धवं | च | महत् + इष्वास | व्यचरल् | लघु | सुष्ठु | च
मण्डलीकृतमेवास्य धनुः पश्याम मारिष सूर्यमण्डलसंकाशं तपतस्तव वाहिनीम्
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मण्डलीकृतम् | एव + इदम् | धनुः | पश्याम | मारिष
सूर्य + मण्डल + संकाश | तप् + त्वद् | वाहिनीम्
तं दृष्ट्वा क्षत्रियाः शूराः प्रतपन्तं शरार्चिभिः द्विफल्गुनमिमं लोकं मेनिरे तस्य कर्मभिः
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तं | दृष्ट्वा | क्षत्रियाः | शूराः | प्रतपन्तं | शर + अर्चि
द्वि + फल्गुन | इमं | लोकं | मेनिरे | तस्य | कर्मभिः
तेनार्दिता महाराज भारती सा महाचमूः बभ्राम तत्र तत्रैव योषिन्मदवशादिव
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तद् + अर्दय् | महत् + राज | भारती | सा | महत् + चमू
बभ्राम | तत्र | तत्र + एव | योषित् + मद + वश | इव
द्रावयित्वा तत्सैन्यं कम्पयित्वा महारथान् नन्दयामास सुहृदो मयं जित्वेव वासवः
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द्रावयित्वा | च | तत् | सैन्यं | कम्पयित्वा | महत् + रथ
नन्दयामास | सुहृदो | मयं | जि + इव | वासवः
तेन विद्राव्यमाणानि तव सैन्यानि संयुगे चक्रुरार्तस्वरं घोरं पर्जन्यनिनदोपमम्
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तेन | विद्राव्यमाणानि | तव | सैन्यानि | भारत
चक्रुर् | आर्त + स्वर | घोरं | पर्जन्य + निनद + उपम
तं श्रुत्वा निनदं घोरं तव सैन्यस्य मारिष मारुतोद्धूतवेगस्य समुद्रस्येव पर्वणि दुर्योधनस्तदा राजा आर्श्यशृङ्गिमभाषत
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तं | श्रुत्वा | सु + महत् + नाद | तव | सैन्यस्य | भारत
मारुत + उद्धू + वेग | सागर + इव | पर्वणि
दुर्योधन + तदा | राजा | आर्श्यशृङ्गिम् | अभाषत
एष कार्ष्णिर्महेष्वासो द्वितीय इव फल्गुनः चमूं द्रावयते क्रोधाद्वृत्रो देवचमूमिव
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एष | कार्ष्णिर् | महत् + इष्वास | द्वितीय | इव | फल्गुनः
चमूं | द्रावयते | क्रोधाद् | वृत्रो | देव + चमू | इव
तस्य नान्यं प्रपश्यामि संयुगे भेषजं महत् ऋते त्वां राक्षसश्रेष्ठ सर्वविद्यासु पारगम्
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तस्य | न + अन्य | प्रपश्यामि | संयुगे | भेषजं | महत्
ऋते | त्वां | राक्षस + श्रेष्ठ | सर्व + विद्या | पारगम्
गत्वा त्वरितं वीरं जहि सौभद्रमाहवे वयं पार्थान्हनिष्यामो भीष्मद्रोणपुरःसराः
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स | गत्वा | त्वरितं | वीरं | जहि | सौभद्रम् | आहवे
वयं | पार्थान् | हनिष्यामो | भीष्म + द्रोण + पुरःसर
एवमुक्तो बलवान्राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् प्रययौ समरे तूर्णं तव पुत्रस्य शासनात् नर्दमानो महानादं प्रावृषीव बलाहकः
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स | एवम् | उक्तो | बलवान् | राक्षस + इन्द्र | प्रतापवान्
प्रययौ | समरे | तूर्णं | तव | पुत्रस्य | शासनात्
पर्वतं | वारि + धारा | प्रावृष् + इव | बलाहकः
तस्य शब्देन महता पाण्डवानां महद्बलम् प्राचलत्सर्वतो राजन्पूर्यमाण इवार्णवः
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तस्य | शब्देन | महता | पाण्डवानां | महद् | बलम्
प्राचलत् | सर्वतो | राजन् | पूर्यमाण | इव + अर्णव
बहवश्च नरा राजंस्तस्य नादेन भीषिताः प्रियान्प्राणान्परित्यज्य निपेतुर्धरणीतले
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बहु + च | नरा | राजन् + तद् | नादेन | भीषिताः
प्रियान् | प्राणान् | परित्यज्य | निपेतुर् | धरणी + तल
कार्ष्णिश्चापि मुदा युक्तः प्रगृहीतशरासनः नृत्यन्निव रथोपस्थे तद्रक्षः समुपाद्रवत्
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कार्ष्णि + च + अपि | मुदा | युक्तः | प्रग्रह् + शरासन
नृत्यन्न् | इव | रथोपस्थे | तद् | रक्षः | समुपाद्रवत्
ततः राक्षसः क्रुद्धः संप्राप्यैवार्जुनिं रणे नातिदूरे स्थितस्तस्य द्रावयामास वै चमूम्
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ततः | स | राक्षसः | क्रुद्धः | सम्प्राप् + एव + आर्जुनि | रणे
न + अति + दूर | स्था + तद् | द्रावयामास | वै | चमूम्
सा वध्यमाना समरे पाण्डवानां महाचमूः प्रत्युद्ययौ रणे रक्षो देवसेना यथा बलिम्
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कम्पयन् | समरे | सेनां | पाण्डवानां | महत् + बल
प्रत्युद्ययौ | रणे | रक्षो | देव + सेना | यथा | बलिम्
विमर्दः सुमहानासीत्तस्य सैन्यस्य मारिष रक्षसा घोररूपेण वध्यमानस्य संयुगे
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अथ | शब्दो | महान् | आसीत् | तव | सैन्यस्य | भारत
रक्षसा | घोर + रूप | वध्यमानस्य | संयुगे
ततः शरसहस्रैस्तां पाण्डवानां महाचमूम् व्यद्रावयद्रणे रक्षो दर्शयद्वै पराक्रमम्
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ततः | शर + सहस्र + तद् | पाण्डवानां | महत् + चमू
व्यद्रावयद् | रणे | रक्षो | दर्शयद् | वै | पराक्रमम्
सा वध्यमाना तथा पाण्डवानामनीकिनी रक्षसा घोररूपेण प्रदुद्राव रणे भयात्
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तावकाः | समवर्तन्त | पाण्डवानाम् | अनीकिनीम्
रक्षसा | घोर + रूप | प्रदुद्राव | रणे | भयात्
तां प्रमृद्य ततः सेनां पद्मिनीं वारणो यथा ततोऽभिदुद्राव रणे द्रौपदेयान्महाबलान्
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तां | प्रमृद्य | ततः | सेनां | पद्मिनीं | वारणो | यथा
ततो | ऽभिदुद्राव | रणे | द्रौपदेय + महत् + बल
ते तु क्रुद्धा महेष्वासा द्रौपदेयाः प्रहारिणः राक्षसं दुद्रुवुः सर्वे ग्रहाः पञ्च यथा रविम्
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ते | तु | क्रुद्धा | महत् + इष्वास | द्रौपदेयाः | प्रहारिणः
राक्षसं | दुद्रुवुः | सर्वे | ग्रहाः | पञ्च | यथा | रविम्
वीर्यवद्भिस्ततस्तैस्तु पीडितो राक्षसोत्तमः यथा युगक्षये घोरे चन्द्रमाः पञ्चभिर्ग्रहैः
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वीर्यवत् + ततस् + तद् + तु | पीडितो | राक्षस + उत्तम
यथा | युग + क्षय | घोरे | चन्द्रमाः | पञ्चभिर् | ग्रहैः
प्रतिविन्ध्यस्ततो रक्षो बिभेद निशितैः शरैः सर्वपारशवैस्तूर्णमकुण्ठाग्रैर्महाबलः
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प्रतिविन्ध्य + ततस् | रक्षो | बिभेद | निशितैः | शरैः
सर्व + पारशव + तूर्णम् | अकुण्ठ + अग्र | महत् + बल
तैर्भिन्नतनुत्राणः शुशुभे राक्षसोत्तमः मरीचिभिरिवार्कस्य संस्यूतो जलदो महान्
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स | तैर् | भिद् + तनुत्राण | शुशुभे | राक्षस + उत्तम
मरीचिभिर् | इव + अर्क | संस्यूतो | जलदो | महान्
विषक्तैः शरैश्चापि तपनीयपरिच्छदैः आर्श्यशृङ्गिर्बभौ राजन्दीप्तशृङ्ग इवाचलः
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विषक्तैः | स | शर + च + अपि | तपनीय + परिच्छद
आर्श्यशृङ्गिर् | बभौ | राजन् | दीप् + शृङ्ग | इव + अचल
ततस्ते भ्रातरः पञ्च राक्षसेन्द्रं महाहवे विव्यधुर्निशितैर्बाणैस्तपनीयविभूषितैः
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ततस् + तद् | भ्रातरः | पञ्च | राक्षस + इन्द्र | महत् + आहव
विव्यधुर् | निशितैर् | बाण + तपनीय + विभूषय्
निर्भिन्नः शरैर्घोरैर्भुजगैः कोपितैरिव अलम्बुसो भृशं राजन्नागेन्द्र इव चुक्रुधे
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स | निर्भिन्नः | शरैर् | घोरैर् | भुजगैः | कोपितैर् | इव
अलम्बुसो | भृशं | राजन् + नाग + इन्द्र | इव | चुक्रुधे
सोऽतिविद्धो महाराज मुहूर्तमथ मारिष प्रविवेश तमो दीर्घं पीडितस्तैर्महारथैः
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सो | ऽतिविद्धो | महत् + राज | मुहूर्तम् | अथ | मारिष
प्रविवेश | तमो | दीर्घं | पीडय् + तद् | महत् + रथ
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां क्रोधेन द्विगुणीकृतः चिच्छेद सायकैस्तेषां ध्वजांश्चैव धनूंषि
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प्रतिलभ्य | ततः | संज्ञां | क्रोधेन | द्वि + गुणीकृ
चिछेद | सायक + तद् | ध्वज + च + एव | धनूंषि | च
एकैकं त्रिभिर्बाणैराजघान स्मयन्निव अलम्बुसो रथोपस्थे नृत्यन्निव महारथः
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एकैकं | च | त्रिभिर् | बाणैर् | आजघान | स्मयन्न् | इव
अलम्बुसो | रथ + श्रेष्ठ | श्रुतायुस् + च | महत् + रथ
त्वरमाणश्च संक्रुद्धो हयांस्तेषां महात्मनाम् जघान राक्षसः क्रुद्धः सारथींश्च महाबलः
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त्वर् + च | संक्रुद्धो | हय + तद् | महात्मनाम्
जघान | राक्षसः | क्रुद्धः | सारथि + च | महत् + बल
बिभेद सुसंहृष्टः पुनश्चैनान्सुसंशितैः शरैर्बहुविधाकारैः शतशोऽथ सहस्रशः
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बिभेद | च | सु + संहृष् | पुनर् + च + एनद् | सु + संशा
शरैर् | बहुविध + आकार | शतशो | ऽथ | सहस्रशः
विरथांश्च महेष्वासान्कृत्वा तत्र राक्षसः अभिदुद्राव वेगेन हन्तुकामो निशाचरः
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जघान | च | महत् + इष्वास | प्रधान + तत्र | राक्षसान्
अभिदुद्राव | वेगेन | हन्तु + काम | निशाचरः
तानर्दितान्रणे तेन राक्षसेन दुरात्मना दृष्ट्वार्जुनसुतः संख्ये राक्षसं समुपाद्रवत्
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अभिद्रुतं | महाभागं | राक्षसेन | दुरात्मना
दृश् + अर्जुन + सुत | संख्ये | राक्षसं | समुपाद्रवत्
तयोः समभवद्युद्धं वृत्रवासवयोरिव ददृशुस्तावकाः सर्वे पाण्डवाश्च महारथाः
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तयोः | समभवद् | युद्धं | वृत्र + वासव | इव
अभिदुद्राव | वेगेन | पाण्डवानां | महत् + रथ
तौ समेतौ महायुद्धे क्रोधदीप्तौ परस्परम् महाबलौ महाराज क्रोधसंरक्तलोचनौ परस्परमवेक्षेतां कालानलसमौ युधि
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तौ | समेतौ | महत् + युद्ध | क्रोध + दीप् | परस्परम्
घटोत्कचो | महत् + राज | क्रोध + संरञ्ज् + लोचन
परस्परम् | अवेक्षेतां | काल + अनल + सम | युधि
तयोः समागमो घोरो बभूव कटुकोदयः यथा देवासुरे युद्धे शक्रशम्बरयोरिव
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तयोः | समागमो | घोरो | बभूव | कटुक + उदय
यथा | देवासुरे | युद्धे | त्रिदशा | वज्र + धारिन्