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Currently viewing: Parva 6 - Chapter 6.93 (41 verses)
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Chapter 6.93

ततो दुर्योधनो राजा शकुनिश्चापि सौबलः दुःशासनश्च पुत्रस्ते सूतपुत्रश्च दुर्जयः
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ततो | दुर्योधनो | राजा | लोहितायति | भास्करे
दुःशासन + च | पुत्र + त्वद् | सूतपुत्र + च | दुर्जयः
समागम्य महाराज मन्त्रं चक्रूर्विवक्षितम् कथं पाण्डुसुता युद्धे जेतव्याः सगणा इति
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समागम्य | महत् + राज | मन्त्रं | चक्रुर् | विवक्षितम्
कथं | पाण्डु + सुत | युद्धे | जेतव्याः | स + गण | इति
ततो दुर्योधनो राजा सर्वांस्तानाह मन्त्रिणः सूतपुत्रं समाभाष्य सौबलं महाबलम्
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ततो | दुर्योधनो | राजा | चित्रसेनो | विविंशतिः
सूतपुत्रं | समाभाष्य | सौबलं | च | महत् + बल
द्रोणो भीष्मः कृपः शल्यः सौमदत्तिश्च संयुगे पार्थान्प्रतिबाधन्ते जाने तत्र कारणम्
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द्रोणो | भीष्मः | कृपः | शल्यः | सौमदत्ति + च | संयुगे
न | पार्थान् | प्रतिबाधन्ते | न | जाने | तत्र | कारणम्
अवध्यमानास्ते चापि क्षपयन्ति बलं मम सोऽस्मि क्षीणबलः कर्ण क्षीणशस्त्रश्च संयुगे
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अवध्यमान + तद् | च + अपि | क्षपयन्ति | बलं | मम
सो | ऽस्मि | क्षि + बल | कर्ण | क्षि + शस्त्र + च | संयुगे
निकृतः पाण्डवैः शूरैरवध्यैर्दैवतैरपि सोऽहं संशयमापन्नः प्रकरिष्ये कथं रणम्
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निकृतः | पाण्डवैः | शूरैर् | अवध्यैर् | दैवतैर् | अपि
सो | ऽहं | संशयम् | आपन्नः | प्रकरिष्ये | कथं | रणम्
तमब्रवीन्महाराज सूतपुत्रो नराधिपम् मा शुचो भरतश्रेष्ठ प्रकरिष्ये प्रियं तव
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तम् | ब्रू + महत् + राज | सूतपुत्रो | नराधिपम्
मुमोच | भरत + श्रेष्ठ | निशाचर + बल | प्रति
भीष्मः शांतनवस्तूर्णमपयातु महारणात् निवृत्ते युधि गाङ्गेये न्यस्तशस्त्रे भारत
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भीष्मः | शांतनव + तूर्णम् | युधिष्ठिरम् | उपाद्रवत्
निवृत्ते | युधि | गाङ्गेये | न्यस् + शस्त्र | च | भारत
अहं पार्थान्हनिष्यामि सहितान्सर्वसोमकैः पश्यतो युधि भीष्मस्य शपे सत्येन ते नृप
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अहं | पार्थान् | हनिष्यामि | सर्व + सोमक
पश्यतो | युधि | भीष्मस्य | शपे | सत्येन | ते | नृप
पाण्डवेषु दयां राजन्सदा भीष्मः करोति वै अशक्तश्च रणे भीष्मो जेतुमेतान्महारथान्
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पाण्डवेषु | दयां | राजन् | सदा | भीष्मः | करोति | वै
अशक्त + च | रणे | भीष्मो | जेतुम् | एतद् + महत् + रथ
अभिमानी रणे भीष्मो नित्यं चापि रणप्रियः कथं पाण्डवान्युद्धे जेष्यते तात संगतान्
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अभिमानी | रणे | भीष्मो | नित्यं | च + अपि | रण + प्रिय
कथं | पाण्डु + सुत | युद्धे | जेतव्याः | स + गण | इति
त्वं शीघ्रमितो गत्वा भीष्मस्य शिबिरं प्रति अनुमान्य रणे भीष्मं शस्त्रं न्यासय भारत
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स | त्वं | शीघ्रम् | इतो | गत्वा | भीष्मस्य | शिबिरं | प्रति
अनुमान्य | रणे | भीष्मं | शस्त्रं | न्यासय | भारत
न्यस्तशस्त्रे ततो भीष्मे निहतान्पश्य पाण्डवान् मयैकेन रणे राजन्ससुहृद्गणबान्धवान्
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न्यस् + शस्त्र | ततो | भीष्मे | निहतान् | पश्य | पाण्डवान्
मद् + एक | रणे | राजन् | स + सुहृद् + गण + बान्धव
एवमुक्तस्तु कर्णेन पुत्रो दुर्योधनस्तव अब्रवीद्भ्रातरं तत्र दुःशासनमिदं वचः
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संक्रुद्धो | भरत + श्रेष्ठ | पुत्रो | दुर्योधन + त्वद्
अब्रवीद् | भ्रातरं | तत्र | दुःशासनम् | इदं | वचः
अनुयात्रं यथा सज्जं सर्वं भवति सर्वतः दुःशासन तथा क्षिप्रं सर्वमेवोपपादय
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अनुयात्रं | यथा | सज्जं | सर्वं | भवति | सर्वतः
दुःशासन | तथा | क्षिप्रं | सर्वम् | एव + उपपादय्
एवमुक्त्वा ततो राजन्कर्णमाह जनेश्वरः अनुमान्य रणे भीष्ममितोऽहं द्विपदां वरम्
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एवम् | उक्त्वा | ततो | राजन् | कर्णम् | आह | जनेश्वरः
अनुमान्य | रणे | भीष्मं | शस्त्रं | न्यासय | भारत
आगमिष्ये ततः क्षिप्रं त्वत्सकाशमरिंदम ततस्त्वं पुरुषव्याघ्र प्रकरिष्यसि संयुगम्
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आगमिष्ये | ततः | क्षिप्रं | त्वद् + सकाश | अरिंदम
ततस् + त्वद् | पुरुष + व्याघ्र | प्रकरिष्यसि | संयुगम्
निष्पपात ततस्तूर्णं पुत्रस्तव विशां पते सहितो भ्रातृभिः सर्वैर्देवैरिव शतक्रतुः
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दुर्योधन + पुरोग + तु | पुत्र + त्वद् | विशां | पते
सहितो | भ्रातृभिः | सर्वैर् | देवैर् | इव | शतक्रतुः
ततस्तं नृपशार्दूलं शार्दूलसमविक्रमम् आरोहयद्धयं तूर्णं भ्राता दुःशासनस्तदा
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ततस् + तद् | नृप + शार्दूल | शार्दूल + सम + विक्रम
आरोहय् + हय | तूर्णं | भ्राता | दुःशासन + तदा
अङ्गदी बद्धमुकुटो हस्ताभरणवान्नृपः धार्तराष्ट्रो महाराज विबभौ महेन्द्रवत्
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अङ्गदी | बन्ध् + मुकुट | हस्त + आभरणवत् | नृपः
धार्तराष्ट्रो | महत् + राज | विबभौ | स | महत् + इन्द्र + वत्
भाण्डीपुष्पनिकाशेन तपनीयनिभेन अनुलिप्तः परार्ध्येन चन्दनेन सुगन्धिना
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भाण्डी + पुष्प + निकाश | तपनीय + निभ | च
अनुलिप्तः | परार्ध्येन | चन्दनेन | सुगन्धिना
अरजोम्बरसंवीतः सिंहखेलगतिर्नृपः शुशुभे विमलार्चिष्मञ्शरदीव दिवाकरः
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अरजस् + अम्बर + संव्ये | सिंह + खेल + गति | नृपः
शुशुभे | विमल + अर्चिष्मत् | शरद् + इव | दिवाकरः
तं प्रयान्तं नरव्याघ्रं भीष्मस्य शिबिरं प्रति अनुजग्मुर्महेष्वासाः सर्वलोकस्य धन्विनः भ्रातरश्च महेष्वासास्त्रिदशा इव वासवम्
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स | त्वं | शीघ्रम् | इतो | गत्वा | भीष्मस्य | शिबिरं | प्रति
अनुजग्मुर् | महत् + इष्वास | सर्व + लोक | धन्विनः
भ्रातृ + च | महत् + इष्वास + त्रिदश | इव | वासवम्
हयानन्ये समारुह्य गजानन्ये भारत रथैरन्ये नरश्रेष्ठाः परिवव्रुः समन्ततः
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हयान् | अन्ये | समारुह्य | गजान् | अन्ये | च | भारत
रथैर् | अन्ये | नर + श्रेष्ठ | परिवव्रुः | समन्ततः
आत्तशस्त्राश्च सुहृदो रक्षणार्थं महीपतेः प्रादुर्बभूवुः सहिताः शक्रस्येवामरा दिवि
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आदा + शस्त्र + च | सुहृदो | रक्षण + अर्थ | महीपतेः
प्रादुर्बभूवुः | सहिताः | शक्र + इव + अमर | दिवि
संपूज्यमानः कुरुभिः कौरवाणां महारथः प्रययौ सदनं राजन्गाङ्गेयस्य यशस्विनः अन्वीयमानः सहितैः सोदरैः सर्वतो नृपः
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समभिधाव् + त्वर् | कौरवाणां | महत् + रथ
प्रययौ | सदनं | राजन् | गाङ्गेयस्य | यशस्विनः
अन्वीयमानः | सहितैः | सोदरैः | सर्वतो | नृपः
दक्षिणं दक्षिणः काले संभृत्य स्वभुजं तदा हस्तिहस्तोपमं शैक्षं सर्वशत्रुनिबर्हणम्
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दक्षिणं | दक्षिणः | काले | संभृत्य | स्व + भुज | तदा
हस्तिन् + हस्त + उपम | शैक्षं | सर्व + शत्रु + निबर्हण
प्रगृह्णन्नञ्जलीन्नॄणामुद्यतान्सर्वतोदिशम् शुश्राव मधुरा वाचो नानादेशनिवासिनाम्
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प्रगृह्णन्न् | अञ्जलि + नृ | उद्यतान् | सर्वतोदिशम्
शुश्राव | मधुरा | वाचो | नाना + देश + निवासिन्
संस्तूयमानः सूतैश्च मागधैश्च महायशाः पूजयानश्च तान्सर्वान्सर्वलोकेश्वरेश्वरः
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संस्तूयमानः | सूत + च | मागध + च | महत् + यशस्
पूजय् + च | तान् | सर्वान् | सर्व + लोक + ईश्वर
प्रदीपैः काञ्चनैस्तत्र गन्धतैलावसेचनैः परिवव्रुर्महात्मानं प्रज्वलद्भिः समन्ततः
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प्रदीपैः | काञ्चन + तत्र | गन्ध + तैल + अवसेचन
परिवव्रुर् | महात्मानं | प्रज्वलद्भिः | समन्ततः
तैः परिवृतो राजा प्रदीपैः काञ्चनैः शुभैः शुशुभे चन्द्रमा युक्तो दीप्तैरिव महाग्रहैः
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स | तैः | परिवृतो | राजा | प्रदीपैः | काञ्चनैः | शुभैः
शुशुभे | चन्द्रमा | युक्तो | दीप्तैर् | इव | महत् + ग्रह
कञ्चुकोष्णीषिणस्तत्र वेत्रझर्झरपाणयः प्रोत्सारयन्तः शनकैस्तं जनं सर्वतोदिशम्
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कञ्चुक + उष्णीषिन् + तत्र | वेत्र + झर्झर + पाणि
प्रोत्सारयन्तः | शनकैस् + तद् | जनं | सर्वतोदिशम्
संप्राप्य तु ततो राजा भीष्मस्य सदनं शुभम् अवतीर्य हयाच्चापि भीष्मं प्राप्य जनेश्वरः
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सम्प्राप्य | तु | ततो | राजा | भीष्मस्य | सदनं | शुभम्
अवतीर्य | हय + च + अपि | भीष्मं | प्राप्य | जनेश्वरः
अभिवाद्य ततो भीष्मं निषण्णः परमासने काञ्चने सर्वतोभद्रे स्पर्ध्यास्तरणसंवृते उवाच प्राञ्जलिर्भीष्मं बाष्पकण्ठोऽश्रुलोचनः
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अन् + आदृ | ततो | भीष्म + तद् | शिखण्डिनम् | आहवे
काञ्चने | सर्वतोभद्रे | स्पृध् + आस्तरण + संवृ
उवाच | प्राञ्जलिर् | भीष्मं | बाष्प + कण्ठ | अश्रु + लोचन
त्वां वयं समुपाश्रित्य संयुगे शत्रुसूदन उत्सहेम रणे जेतुं सेन्द्रानपि सुरासुरान्
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त्वां | वयं | समुपाश्रित्य | संयुगे | शत्रु + सूदन
न | शक्याः | पाण्डवा | जेतुं | स + इन्द्र | अपि | सुर + असुर
किमु पाण्डुसुतान्वीरान्ससुहृद्गणबान्धवान् तस्मादर्हसि गाङ्गेय कृपां कर्तुं मयि प्रभो जहि पाण्डुसुतान्वीरान्महेन्द्र इव दानवान्
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मद् + एक | रणे | राजन् | स + सुहृद् + गण + बान्धव
तस्माद् | अर्हसि | गाङ्गेय | कृपां | कर्तुं | मयि | प्रभो
किमु | पाण्डु + सुत | वीरान् | स + सुहृद् + गण + बान्धव
पूर्वमुक्तं महाबाहो निहनिष्यामि सोमकान् पाञ्चालान्पाण्डवैः सार्धं करूषांश्चेति भारत
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पूर्वम् | उक्तं | महत् + बाहु | निहनिष्यामि | सोमकान्
पाञ्चालान् | पाण्डवैः | सार्धं | करूष + च + इति | भारत
तद्वचः सत्यमेवास्तु जहि पार्थान्समागतान् सोमकांश्च महेष्वासान्सत्यवाग्भव भारत
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तद् | वचः | सत्यम् | एव + अस् | जहि | पार्थान् | समागतान्
सोमक + च | महत् + इष्वास | सत्य + वाच् | भव | भारत
दयया यदि वा राजन्द्वेष्यभावान्मम प्रभो मन्दभाग्यतया वापि मम रक्षसि पाण्डवान्
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दयया | यदि | वा | राजन् | द्विष् + भाव + मद् | प्रभो
मन्दभाग्य + ता | वा + अपि | मम | रक्षसि | पाण्डवान्
अनुजानीहि समरे कर्णमाहवशोभिनम् जेष्यति रणे पार्थान्ससुहृद्गणबान्धवान्
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अनुजानीहि | समरे | कर्णम् | आहव + शोभिन्
मद् + एक | रणे | राजन् | स + सुहृद् + गण + बान्धव
एतावदुक्त्वा नृपतिः पुत्रो दुर्योधनस्तव नोवाच वचनं किंचिद्भीष्मं भीमपराक्रमम्
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संक्रुद्धो | भरत + श्रेष्ठ | पुत्रो | दुर्योधन + त्वद्
न + वच् | वचनं | किंचिद् | भीष्मं | भीम + पराक्रम