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Currently viewing: Parva 6 - Chapter 6.82 (56 verses)
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Chapter 6.82

विरथं तं समासाद्य चित्रसेनं मनस्विनम् रथमारोपयामास विकर्णस्तनयस्तव
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विरथं | तं | समासाद्य | चित्रसेनं | मनस्विनम्
रथम् | आरोपयामास | विकर्ण + तनय + त्वद्
तस्मिंस्तथा वर्तमाने तुमुले संकुले भृशम् भीष्मः शांतनवस्तूर्णं युधिष्ठिरमुपाद्रवत्
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तद् + तथा | वर्तमाने | रणे | भीष्मं | महत् + रथ
भीष्मः | शांतनव + तूर्णम् | युधिष्ठिरम् | उपाद्रवत्
ततः सरथनागाश्वाः समकम्पन्त सृञ्जयाः मृत्योरास्यमनुप्राप्तं मेनिरे युधिष्ठिरम्
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ततः | स + रथ + नाग + अश्व | समकम्पत | वाहिनी
मृत्योर् | आस्यम् | अनुप्राप्तं | मेनिरे | च | युधिष्ठिरम्
युधिष्ठिरोऽपि कौरव्यो यमाभ्यां सहितः प्रभुः महेष्वासं नरव्याघ्रं भीष्मं शांतनवं ययौ
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युधिष्ठिरो | ऽपि | कौरव्यो | यमाभ्यां | सहितः | प्रभुः
ते | हन्यमानाः | पार्थेन | भीष्मं | शांतनवं | ययुः
ततः शरसहस्राणि प्रमुञ्चन्पाण्डवो युधि भीष्मं संछादयामास यथा मेघो दिवाकरम्
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ततः | शर + सहस्र | प्रमुञ्चन् | पाण्डवो | युधि
शरैः | संछादयामास | मेघैर् | इव | दिवाकरम्
तेन सम्यक्प्रणीतानि शरजालानि भारत प्रतिजग्राह गाङ्गेयः शतशोऽथ सहस्रशः
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तेन | सम्यक् | प्रणीतानि | शर + जाल | भारत
प्रतिजग्राह | गाङ्गेयः | शतशो | ऽथ | सहस्रशः
तथैव शरजालानि भीष्मेणास्तानि मारिष आकाशे समदृश्यन्त खगमानां व्रजा इव
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तथा + एव | शर + जाल | भीष्म + अस् | मारिष
आकाशे | समदृश्यन्त | खगमानां | व्रजा | इव
निमेषार्धाच्च कौन्तेयं भीष्मः शांतनवो युधि अदृश्यं समरे चक्रे शरजालेन भागशः
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निमेष + अर्ध + च | कौन्तेयं | भीष्मः | शांतनवो | युधि
अदृश्यं | समरे | चक्रे | शर + जाल | भागशः
ततो युधिष्ठिरो राजा कौरव्यस्य महात्मनः नाराचं प्रेषयामास क्रुद्ध आशीविषोपमम्
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ततो | युधिष्ठिरो | राजा | धृष्टद्युम्नम् | अभाषत
भारद्वाज + ततस् | क्रुद्धः | शरम् | आशीविष + उपम
असंप्राप्तं ततस्तं तु क्षुरप्रेण महारथः चिच्छेद समरे राजन्भीष्मस्तस्य धनुश्च्युतम्
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अ + सम्प्राप् | ततस् + तद् | तु | क्षुरप्रेण | महत् + रथ
छत्रं | चिछेद | समरे | राजन् + तद् | रथ + उत्तम
तं तु छित्त्वा रणे भीष्मो नाराचं कालसंमितम् निजघ्ने कौरवेन्द्रस्य हयान्काञ्चनभूषणान्
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तं | तु | छित्त्वा | रणे | भीष्मो | नाराचं | काल + संमा
निजघ्ने | कौरव + इन्द्र | हयान् | काञ्चन + भूषण
हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः आरुरोह रथं तूर्णं नकुलस्य महात्मनः
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श्रुतायुषं | तु | राजानं | धर्मपुत्रो | युधिष्ठिरः
आरुरोह | रथं | तूर्णं | शङ्खस्य | रथिनां | वरः
यमावपि सुसंक्रुद्धः समासाद्य रणे तदा शरैः संछादयामास भीष्मः परपुरंजयः
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यम + अपि | सु + संक्रुध् | समासाद्य | रणे | तदा
शरैः | संछादयामास | भीष्मः | परपुरंजयः
तौ तु दृष्ट्वा महाराज भीष्मबाणप्रपीडितौ जगामाथ परां चिन्तां भीष्मस्य वधकाङ्क्षया
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तौ | तु | दृष्ट्वा | महत् + राज | भीष्म + बाण + प्रपीडय्
गम् + अथ | परां | चिन्तां | भीष्मस्य | वध + काङ्क्षा
ततो युधिष्ठिरो वश्यान्राज्ञस्तान्समचोदयत् भीष्मं शांतनवं सर्वे निहतेति सुहृद्गणान्
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ततो | युधिष्ठिरो | राजा | कौरव्यस्य | महात्मनः
भीष्मं | शांतनवं | सर्वे | निहन् + इति | सुहृद् + गण
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम् महता रथवंशेन परिवव्रुः पितामहम्
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ततस् + तद् | पार्थिवाः | सर्वे | श्रुत्वा | पार्थस्य | भाषितम्
महता | रथ + वंश | परिवव्रुः | पितामहम्
समन्तात्परिवृतः पिता देवव्रतस्तव चिक्रीड धनुषा राजन्पातयानो महारथान्
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अवहारं | ततस् + कृ | पिता | देवव्रत + त्वद्
चिक्रीड | धनुषा | राजन् | पातयानो | महत् + रथ
तं चरन्तं रणे पार्था ददृशुः कौरवं युधि मृगमध्यं प्रविश्येव यथा सिंहशिशुं वने
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तं | चरन्तं | रणे | पार्था | ददृशुः | कौरवं | युधि
मृग + मध्य | प्रविश् + इव | यथा | सिंह + शिशु | वने
तर्जयानं रणे शूरांस्त्रासयानं सायकैः दृष्ट्वा त्रेसुर्महाराज सिंहं मृगगणा इव
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तर्जयानं | रणे | शूर + त्रासय् | च | सायकैः
दृष्ट्वा | त्रेसुर् | महत् + राज | सिंहं | मृग + गण | इव
रणे भरतसिंहस्य ददृशुः क्षत्रिया गतिम् अग्नेर्वायुसहायस्य यथा कक्षं दिधक्षतः
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रणे | भरत + सिंह | ददृशुः | क्षत्रिया | गतिम्
अग्नेर् | वायु + सहाय | यथा | कक्षं | दिधक्षतः
शिरांसि रथिनां भीष्मः पातयामास संयुगे तालेभ्य इव पक्वानि फलानि कुशलो नरः
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शिरांसि | रथिनां | भीष्मः | पातयामास | संयुगे
तालेभ्य | इव | पक्वानि | फलानि | कुशलो | नरः
पतद्भिश्च महाराज शिरोभिर्धरणीतले बभूव तुमुलः शब्दः पततामश्मनामिव
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पत् + च | महत् + राज | शिरोभिर् | धरणी + तल
बभूव | तुमुलः | शब्दः | पतताम् | अश्मनाम् | इव
तस्मिंस्तु तुमुले युद्धे वर्तमाने सुदारुणे सर्वेषामेव सैन्यानामासीद्व्यतिकरो महान्
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तद् + तु | तुमुले | युद्धे | वर्तमाने | भयानके
सर्वेषाम् | एव | सैन्यानाम् | आसीद् | व्यतिकरो | महान्
भिन्नेषु तेषु व्यूहेषु क्षत्रिया इतरेतरम् एकमेकं समाहूय युद्धायैवोपतस्थिरे
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भिन्नेषु | तेषु | व्यूहेषु | क्षत्रिया | इतरेतरम्
एकम् | एकं | समाहूय | युद्ध + एव + उपस्था
शिखण्डी तु समासाद्य भरतानां पितामहम् अभिदुद्राव वेगेन तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत्
Thereupon, O sire, Dushasana's invincible son excited with rage and upraising his mace, rushed against Abhimanyu crying at same time, “Wait" "Wait."
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शिखण्डी | तु | समासाद्य | भरतानां | पितामहम्
अभिदुद्राव | वेगेन | तिष्ठ | स्था + इति | च + ब्रू
अनादृत्य ततो भीष्मस्तं शिखण्डिनमाहवे प्रययौ सृञ्जयान्क्रुद्धः स्त्रीत्वं चिन्त्य शिखण्डिनः
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अन् + आदृ | ततो | भीष्म + तद् | शिखण्डिनम् | आहवे
प्रययौ | सृञ्जयान् | क्रुद्धः | स्त्री + त्व | चिन्त्य | शिखण्डिनः
सृञ्जयास्तु ततो हृष्टा दृष्ट्वा भीष्मं महारथम् सिंहनादान्बहुविधांश्चक्रुः शङ्खविमिश्रितान्
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सृञ्जय + तु | ततो | हृष्टा | दृष्ट्वा | भीष्मं | महत् + रथ
सिंहनादान् | बहुविध + कृ | शङ्ख + विमिश्रय्
ततः प्रववृते युद्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् अपरां दिशमास्थाय स्थिते सवितरि प्रभो
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तेषां | सु + तुमुल | युद्धं | व्यतिषञ्ज् + रथ + द्विप
अपरां | दिशम् | आस्थाय | स्थिते | सवितरि | प्रभो
धृष्टद्युम्नोऽथ पाञ्चाल्यः सात्यकिश्च महारथः पीडयन्तौ भृशं सैन्यं शक्तितोमरवृष्टिभिः शस्त्रैश्च बहुभी राजञ्जघ्नतुस्तावकान्रणे
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धृष्टद्युम्नो | ऽथ | पाञ्चाल्यः | सात्यकि + च | महत् + रथ
पीडयन्तौ | भृशं | सैन्यं | शक्ति + तोमर + वृष्टि
शस्त्र + च | बहुभी | राजञ् | हन् + तावक | रणे
ते हन्यमानाः समरे तावकाः पुरुषर्षभ आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा त्यजन्ति स्म संयुगम् यथोत्साहं समरे जघ्नुर्लोकं महारथाः
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ते | हन्यमानाः | समरे | रथिनः | सादिन् + तथा
आर्यां | युद्धे | मतिं | कृत्वा | न | त्यजन्ति | स्म | संयुगम्
यथोत्साहं | च | समरे | जघ्नुर् | लोकं | महत् + रथ
तत्राक्रन्दो महानासीत्तावकानां महात्मनाम् वध्यतां समरे राजन्पार्षतेन महात्मना
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ततो | भीष्मो | महत् + बाहु | पाण्डवानां | महात्मनाम्
वध्यतां | समरे | राजन् | पार्षतेन | महात्मना
तं श्रुत्वा निनदं घोरं तावकानां महारथौ विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पार्षतं प्रत्युपस्थितौ
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तं | श्रुत्वा | निनदं | घोरं | तावकानां | महत् + रथ
विन्द + अनुविन्द + आवन्त्य | बाह्लिकः | सह | बाह्लिकैः
तौ तस्य तुरगान्हत्वा त्वरमाणौ महारथौ छादयामासतुरुभौ शरवर्षेण पार्षतम्
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तौ | तस्य | तुरगान् | हत्वा | त्वरमाणौ | महत् + रथ
छादयामासतुर् | उभौ | शर + वर्ष | पार्षतम्
अवप्लुत्याथ पाञ्चाल्यो रथात्तूर्णं महाबलः आरुरोह रथं तूर्णं सात्यकेः सुमहात्मनः
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अवप्लु + अथ | पाञ्चाल्यो | रथात् | तूर्णं | महत् + बल
आरुरोह | रथं | तूर्णं | शङ्खस्य | रथिनां | वरः
ततो युधिष्ठिरो राजा महत्या सेनया वृतः आवन्त्यौ समरे क्रुद्धावभ्ययात्स परंतपौ
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उरस् + भू + नर + श्रेष्ठ | महत्या | सेनया | वृतः
आवन्त्यौ | समरे | क्रुध् + अभिया | स | परंतपौ
तथैव तव पुत्रोऽपि सर्वोद्योगेन मारिष विन्दानुविन्दावावन्त्यौ परिवार्योपतस्थिवान्
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तथा + एव | तव | पुत्रो | ऽपि | सर्व + उद्योग | मारिष
विन्द + अनुविन्द + आवन्त्य | बाह्लिकः | सह | बाह्लिकैः
अर्जुनश्चापि संक्रुद्धः क्षत्रियान्क्षत्रियर्षभ अयोधयत संग्रामे वज्रपाणिरिवासुरान्
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अर्जुन + च + अपि | संक्रुद्धः | क्षत्रियान् | क्षत्रिय + ऋषभ
अयोधयत | संग्रामे | वज्रपाणिर् | इव + असुर
द्रोणश्च समरे क्रुद्धः पुत्रस्य प्रियकृत्तव व्यधमत्सर्वपाञ्चालांस्तूलराशिमिवानलः
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द्रोण + च | समरे | क्रुद्धः | पुत्रस्य | प्रिय + कृत् | तव
व्यधमत् | पाण्डवीं | सेनां | तूल + राशि | इव + अनल
दुर्योधनपुरोगास्तु पुत्रास्तव विशां पते परिवार्य रणे भीष्मं युयुधुः पाण्डवैः सह
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दुर्योधन + पुरोग + तु | पुत्र + त्वद् | विशां | पते
परिवार्य | रणे | भीष्मं | युयुधुः | पाण्डवैः | सह
ततो दुर्योधनो राजा लोहितायति भास्करे अब्रवीत्तावकान्सर्वांस्त्वरध्वमिति भारत
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ततो | दुर्योधनो | राजा | मोहात् | प्रत्यागम् + तदा
अब्रवीत् | तावकान् | सर्व + त्वर् | इति | भारत
युध्यतां तु तथा तेषां कुर्वतां कर्म दुष्करम् अस्तं गिरिमथारूढे नप्रकाशति भास्करे
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युध्यतां | तु | तथा | तेषां | कुर्वतां | कर्म | दुष्करम्
अस्तं | गिरिम् | अथ + आरुह् | न + प्रकाश् | भास्करे
प्रावर्तत नदी घोरा शोणितौघतरङ्गिणी गोमायुगणसंकीर्णा क्षणेन रजनीमुखे
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प्रावर्तत | नदी | घोरा | शोणित + ओघ + तरंगिन्
गोमायु + गण + संकृ | क्षणेन | रजनी + मुख
शिवाभिरशिवाभिश्च रुवद्भिर्भैरवं रवम् घोरमायोधनं जज्ञे भूतसंघसमाकुलम्
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शिवाभिर् | अशिव + च | रुवद्भिर् | भैरवं | रवम्
घोरम् | आयोधनं | जज्ञे | भूत + संघ + समाकुल
राक्षसाश्च पिशाचाश्च तथान्ये पिशिताशनाः समन्ततो व्यदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः
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राक्षस + च | पिशाच + च | तथा + अन्य
पत् + तत्र | दृश्यन्ते | शतशो | ऽथ | सहस्रशः
अर्जुनोऽथ सुशर्मादीन्राज्ञस्तान्सपदानुगान् विजित्य पृतनामध्ये ययौ स्वशिबिरं प्रति
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अर्जुनो | ऽथ | सुशर्मन् + आदि | राजन् + तद् | स + पदानुग
विजित्य | पृतना + मध्य | ययौ | स्व + शिबिर | प्रति
युधिष्ठिरोऽपि कौरव्यो भ्रातृभ्यां सहितस्तदा ययौ स्वशिबिरं राजा निशायां सेनया वृतः
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युधिष्ठिरो | ऽपि | कौरव्यो | यमाभ्यां | सहितः | प्रभुः
ततो | युधिष्ठिरो | राजा | महत्या | सेनया | वृतः
भीमसेनोऽपि राजेन्द्र दुर्योधनमुखान्रथान् अवजित्य ततः संख्ये ययौ स्वशिबिरं प्रति
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भीमसेनो | ऽपि | राजन् + इन्द्र | दुर्योधन + मुख | रथान्
विजित्य | पृतना + मध्य | ययौ | स्व + शिबिर | प्रति
दुर्योधनोऽपि नृपतिः परिवार्य महारणे भीष्मं शांतनवं तूर्णं प्रयातः शिबिरं प्रति
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दुर्योधनो | ऽपि | नृपतिः | परिवार्य | महत् + रण
भीष्मं | शांतनवं | तूर्णं | प्रयातः | शिबिरं | प्रति
द्रोणो द्रौणिः कृपः शल्यः कृतवर्मा सात्वतः परिवार्य चमूं सर्वां प्रययुः शिबिरं प्रति
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अहं | द्रोण + च | शल्य + च | कृतवर्मा | च | सात्वतः
परिवार्य | चमूं | सर्वां | प्रययुः | शिबिरं | प्रति
तथैव सात्यकी राजन्धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः परिवार्य रणे योधान्ययतुः शिबिरं प्रति
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तथा + एव | सात्यकी | राजन् | धृष्टद्युम्न + च | पार्षतः
परिवार्य | चमूं | सर्वां | प्रययुः | शिबिरं | प्रति
एवमेते महाराज तावकाः पाण्डवैः सह पर्यवर्तन्त सहिता निशाकाले परंतपाः
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एवम् | एते | महत् + राज | तावकाः | पाण्डवैः | सह
पर्यवर्तन्त | सहिता | निशा + काल | परंतपाः
ततः स्वशिबिरं गत्वा पाण्डवाः कुरवस्तथा न्यविशन्त महाराज पूजयन्तः परस्परम्
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ततः | स्व + शिबिर | गत्वा | निविश् + तत्र | भारत
न्यविशन्त | महत् + राज | पूजयन्तः | परस्परम्
रक्षां कृत्वात्मनः शूरा न्यस्य गुल्मान्यथाविधि अपनीय शल्यांस्ते स्नात्वा विविधैर्जलैः
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रक्षां | कृ + आत्मन् | शूरा | न्यस्य | गुल्मान् | यथाविधि
अपनीय | च | शल्य + तद् | स्नात्वा | च | विविधैर् | जलैः
कृतस्वस्त्ययनाः सर्वे संस्तूयन्तश्च बन्दिभिः गीतवादित्रशब्देन व्यक्रीडन्त यशस्विनः
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कृ + स्वस्त्ययन | सर्वे | संस्तु + च | बन्दिभिः
गीत + वादित्र + शब्द | व्यक्रीडन्त | यशस्विनः
मुहूर्तमिव तत्सर्वमभवत्स्वर्गसंनिभम् हि युद्धकथां कांचित्तत्र चक्रुर्महारथाः
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मुहूर्तम् | इव | तत् | सर्वम् | अभवत् | स्वर्ग + संनिभ
न | हि | युद्ध + कथा | कांचित् | तत्र | चक्रुर् | महत् + रथ
ते प्रसुप्ते बले तत्र परिश्रान्तजने नृप हस्त्यश्वबहुले राजन्प्रेक्षणीये बभूवतुः
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ते | प्रसुप्ते | बले | तत्र | परिश्रम् + जन | नृप
हस्तिन् + अश्व + बहुल | राजन् | प्रेक्षणीये | बभूवतुः