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Currently viewing: Parva 6 - Chapter 6.81 (37 verses)
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Chapter 6.81

तुद्यमानस्तु शरैर्धनंजयः; पदा हतो नाग इव श्वसन्बली बाणेन बाणेन महारथानां; चिच्छेद चापानि रणे प्रसह्य
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स | तुद् + तु | शरैर् | धनंजयः | पदा | हतो | नाग | इव | श्वसन् | बली
बाणेन | बाणेन | महत् + रथ | चिछेद | चापानि | रणे | प्रसह्य
संछिद्य चापानि तानि राज्ञां; तेषां रणे वीर्यवतां क्षणेन विव्याध बाणैर्युगपन्महात्मा; निःशेषतां तेष्वथ मन्यमानः
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संछिद्य | चापानि | च | तानि | राज्ञां | तेषां | रणे | वीर्यवतां | क्षणेन
विव्याध | बाणैर् | युगपद् + महात्मन् | निःशेष + ता | तद् + अथ | मन्यमानः
निपेतुराजौ रुधिरप्रदिग्धा;स्ते ताडिताः शक्रसुतेन राजन् विभिन्नगात्राः पतितोत्तमाङ्गा; गतासवश्छिन्नतनुत्रकायाः
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निपेतुर् | आजौ | रुधिर + प्रदिह् | ते | ताडिताः | शक्रसुतेन | राजन्
विभिद् + गात्र | पत् + उत्तमाङ्ग | गतासु + छिद् + तनुत्र + काय
महीं गताः पार्थबलाभिभूता; विचित्ररूपा युगपद्विनेशुः दृष्ट्वा हतांस्तान्युधि राजपुत्रां;स्त्रिगर्तराजः प्रययौ क्षणेन
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महीं | गताः | पार्थ + बल + अभिभू | विचित्र + रूप | युगपद् | विनेशुः
दृष्ट्वा | हन् + तद् | युधि | राजन् + पुत्र | त्रिगर्त + राज | प्रययौ | क्षणेन
तेषां रथानामथ पृष्ठगोपा; द्वात्रिंशदन्येऽब्यपतन्त पार्थम् तथैव ते संपरिवार्य पार्थं; विकृष्य चापानि महारवाणि अवीवृषन्बाणमहौघवृष्ट्या; यथा गिरिं तोयधरा जलौघैः
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तेषां | रथानाम् | अथ | पृष्ठगोपा | द्वात्रिंशद् | अन्ये | ऽभ्यपतन्त | पार्थम्
तथा + एव | ते | संपरिवार्य | पार्थं | विकृष्य | चापानि | महत् + रव
अवीवृषन् | बाण + महत् + ओघ + वृष्टि | यथा | गिरिं | तोयधरा | जल + ओघ
संपीड्यमानस्तु शरौघवृष्ट्या; धनंजयस्तान्युधि जातरोषः षष्ट्या शरैः संयति तैलधौतै;र्जघान तानप्यथ पृष्ठगोपान्
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सम्पीडय् + तु | शर + ओघ + वृष्टि | धनंजय + तद् | युधि | जन् + रोष
षष्ट्या | शरैः | संयति | तैल + धाव् | जघान | तान् | अपि + अथ | पृष्ठगोपान्
षष्टिं रथांस्तानवजित्य संख्ये; धनंजयः प्रीतमना यशस्वी अथात्वरद्भीष्मवधाय जिष्णु;र्बलानि राज्ञां समरे निहत्य
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षष्टिं | रथ + तद् | अवजित्य | संख्ये | धनंजयः | प्री + मनस् | यशस्वी
अथ + त्वर् | भीष्म + वध | जिष्णुर् | बलानि | राज्ञां | समरे | निहत्य
त्रिगर्तराजो निहतान्समीक्ष्य; महारथांस्तानथ बन्धुवर्गान् रणे पुरस्कृत्य नराधिपांस्ता;ञ्जगाम पार्थं त्वरितो वधाय
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त्रिगर्त + राज | निहतान् | समीक्ष्य | महत् + रथ + तद् | अथ | बन्धु + वर्ग
रणे | पुरस्कृत्य | नराधिप + तद् | जगाम | पार्थं | त्वरितो | वधाय
अभिद्रुतं चास्त्रभृतां वरिष्ठं; धनंजयं वीक्ष्य शिखण्डिमुख्याः अभ्युद्ययुस्ते शितशस्त्रहस्ता; रिरक्षिषन्तो रथमर्जुनस्य
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अभिद्रुतं | शस्त्रभृतां | वरिष्ठं | समन्ततः | पाण्डवं | लोक + वीर
अभ्युद्या + तद् | शा + शस्त्र + हस्त | रिरक्षिषन्तो | रथम् | अर्जुनस्य
पार्थोऽपि तानापततः समीक्ष्य; त्रिगर्तराज्ञा सहितान्नृवीरान् विध्वंसयित्वा समरे धनुष्मा;न्गाण्डीवमुक्तैर्निशितैः पृषत्कैः भीष्मं यियासुर्युधि संददर्श; दुर्योधनं सैन्धवादींश्च राज्ञः
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पार्थो | ऽपि | तान् | आपततः | समीक्ष्य | त्रिगर्त + राजन् | सहित + नृ + वीर
विध्वंसयित्वा | समरे | धनुष्मान् | गाण्डीव + मुच् | निशितैः | पृषत्कैः
भीष्मं | यियासुर् | युधि | संददर्श | दुर्योधनं | सैन्धव + आदि + च | राज्ञः
आवारयिष्णूनभिसंप्रयाय; मुहूर्तमायोध्य बलेन वीरः उत्सृज्य राजानमनन्तवीर्यो; जयद्रथादींश्च नृपान्महौजाः ययौ ततो भीमबलो मनस्वी; गाङ्गेयमाजौ शरचापपाणिः
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आवारयिष्णून् | अभिसम्प्रयाय | मुहूर्तम् | आयोध्य | बलेन | वीरः
उत्सृज्य | राजानम् | अनन्त + वीर्य | जयद्रथ + आदि + च | नृप + महत् + ओजस्
ययौ | ततो | भीम + बल | मनस्वी | गाङ्गेयम् | आजौ | शर + चाप + पाणि
युधिष्ठिरश्चोग्रबलो महात्मा; समाययौ त्वरितो जातकोपः मद्राधिपं समभित्यज्य संख्ये; स्वभागमाप्तं तमनन्तकीर्तिः सार्धं माद्रीसुतभीमसेनै;र्भीष्मं ययौ शांतनवं रणाय
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युधिष्ठिर + च + उग्र + बल | महात्मा | समाययौ | त्वरितो | जन् + कोप
मद्र + अधिप | समभित्यज्य | संख्ये | स्व + भाग | आप्तं | तम् | अनन्त + कीर्ति
सार्धं | स | माद्री + सुत + भीमसेन | भीष्मं | ययौ | शांतनवं | रणाय
तैः संप्रयुक्तः महारथाग्र्यै;र्गङ्गासुतः समरे चित्रयोधी विव्यथे शांतनवो महात्मा; समागतैः पाण्डुसुतैः समस्तैः
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तैः | सम्प्रयुक्तः | स | महत् + रथ + अग्र्य | गङ्गासुतः | समरे | चित्र + योधिन्
न | विव्यथे | शांतनवो | महात्मा | समागतैः | पाण्डु + सुत | समस्तैः
अथैत्य राजा युधि सत्यसंधो; जयद्रथोऽत्युग्रबलो मनस्वी चिच्छेद चापानि महारथानां; प्रसह्य तेषां धनुषा वरेण
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अथ + ए | राजा | युधि | सत्य + संधा | जयद्रथो | अति + उग्र + बल | मनस्वी
चिछेद | चापानि | महत् + रथ | प्रसह्य | तेषां | धनुषा | वरेण
युधिष्ठिरं भीमसेनं यमौ च; पार्थं तथा युधि संजातकोपः दुर्योधनः क्रोधविषो महात्मा; जघान बाणैरनलप्रकाशैः
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युधिष्ठिरं | भीमसेनं | यमौ | च | पार्थं | तथा | युधि | संजन् + कोप
दुर्योधनः | क्रोध + विष | महात्मा | जघान | बाणैर् | अनल + प्रकाश
कृपेण शल्येन शलेन चैव; तथा विभो चित्रसेनेन चाजौ विद्धाः शरैस्तेऽतिविवृद्धकोपै;र्देवा यथा दैत्यगणैः समेतैः
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कृपेण | शल्येन | शलेन | च + एव | तथा | विभो | चित्रसेनेन | च + आजि
विद्धाः | शर + तद् | अति + विवृध् + कोप | देवा | यथा | दैत्य + गण | समेतैः
छिन्नायुधं शांतनवेन राजा; शिखण्डिनं प्रेक्ष्य जातकोपः अजातशत्रुः समरे महात्मा; शिखण्डिनं क्रुद्ध उवाच वाक्यम्
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छिद् + आयुध | शांतनवेन | राजा | शिखण्डिनं | प्रेक्ष्य | च | जन् + कोप
अजात + शत्रु | समरे | महात्मा | शिखण्डिनं | क्रुद्ध | उवाच | वाक्यम्
उक्त्वा तथा त्वं पितुरग्रतो मा;महं हनिष्यामि महाव्रतं तम् भीष्मं शरौघैर्विमलार्कवर्णैः; सत्यं वदामीति कृता प्रतिज्ञा
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उक्त्वा | तथा | त्वं | पितुर् | अग्रतो | माम् | अहं | हनिष्यामि | महत् + व्रत | तम्
भीष्मं | शर + ओघ | विमल + अर्क + वर्ण | सत्यं | वद् + इति | कृता | प्रतिज्ञा
त्वया चैनां सफलां करोषि; देवव्रतं यन्न निहंसि युद्धे मिथ्याप्रतिज्ञो भव मा नृवीर; रक्षस्व धर्मं कुलं यशश्च
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त्वया | न | च + एनद् | स + फल | करोषि | देवव्रतं | यत् + न | निहंसि | युद्धे
मिथ्या + प्रतिज्ञा | भव | मा | नृ + वीर | रक्षस्व | धर्मं | च | कुलं | यशस् + च
प्रेक्षस्व भीष्मं युधि भीमवेगं; सर्वांस्तपन्तं मम सैन्यसंघान् शरौघजालैरतितिग्मतेजैः; कालं यथा मृत्युकृतं क्षणेन
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प्रेक्षस्व | भीष्मं | युधि | भीम + वेग | सर्व + तप् | मम | सैन्य + संघ
शर + ओघ + जाल | अति + तिग्म + तेज | कालं | यथा | मृत्यु + कृत् | क्षणेन
निकृत्तचापः समरानपेक्षः; पराजितः शांतनवेन राज्ञा विहाय बन्धूनथ सोदरांश्च; क्व यास्यसे नानुरूपं तवेदम्
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निकृत् + चाप | समर + अनपेक्ष | पराजितः | शांतनवेन | राज्ञा
विहाय | बन्धून् | अथ | सोदर + च | क्व | यास्यसे | न + अनुरूप | त्वद् + इदम्
दृष्ट्वा हि भीष्मं तमनन्तवीर्यं; भग्नं सैन्यं द्रवमाणमेवम् भीतोऽसि नूनं द्रुपदस्य पुत्र; तथा हि ते मुखवर्णोऽप्रहृष्टः
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दृष्ट्वा | हि | भीष्मं | तम् | अनन्त + वीर्य | भग्नं | च | सैन्यं | द्रवमाणम् | एवम्
भीतो | ऽसि | नूनं | द्रुपदस्य | पुत्र | तथा | हि | ते | मुख + वर्ण | ऽप्रहृष्टः
आज्ञायमानेऽपि धनंजयेन; महाहवे संप्रसक्ते नृवीर कथं हि भीष्मात्प्रथितः पृथिव्यां; भयं त्वमद्य प्रकरोषि वीर
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आज्ञायमाने | ऽपि | धनंजयेन | महत् + आहव | सम्प्रसक्ते | नृ + वीर
कथं | हि | भीष्मात् | प्रथितः | पृथिव्यां | भयं | त्वम् | अद्य | प्रकरोषि | वीर
धर्मराजस्य वचो निशम्य; रूक्षाक्षरं विप्रलापानुबद्धम् प्रत्यादेशं मन्यमानो महात्मा; प्रतत्वरे भीष्मवधाय राजन्
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स | धर्मराजस्य | वचो | निशम्य | रूक्ष + अक्षर | विप्रलाप + अनुबन्ध्
प्रत्यादेशं | मन्यमानो | महात्मा | प्रतत्वरे | भीष्म + वध | राजन्
तमापतन्तं महता जवेन; शिखण्डिनं भीष्ममभिद्रवन्तम् आवारयामास हि शल्य एनं; शस्त्रेण घोरेण सुदुर्जयेन
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तम् | आपतन्तं | महता | जवेन | शिखण्डिनं | भीष्मम् | अभिद्रवन्तम्
आवारयामास | हि | शल्य | एनं | शस्त्रेण | घोरेण | सु + दुर्जय
चापि दृष्ट्वा समुदीर्यमाण;मस्त्रं युगान्ताग्निसमप्रभावम् नासौ व्यमुह्यद्द्रुपदस्य पुत्रो; राजन्महेन्द्रप्रतिमप्रभावः
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स | च + अपि | दृष्ट्वा | समुदीर्यमाणम् | अस्त्रं | युग + अन्त + अग्नि + सम + प्रभाव
न + अदस् | व्यमुह्यद् | द्रुपदस्य | पुत्रो | राजन् + महत् + इन्द्र + प्रतिम + प्रभाव
तस्थौ तत्रैव महाधनुष्मा;ञ्शरैस्तदस्त्रं प्रतिबाधमानः अथाददे वारुणमन्यदस्त्रं; शिखण्ड्यथोग्रं प्रतिघाताय तस्य तदस्त्रमस्त्रेण विदार्यमाणं; खस्थाः सुरा ददृशुः पार्थिवाश्च
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तस्थौ | च | तत्र + एव | महत् + धनुष्मत् | शर + तद् | अस्त्रं | प्रतिबाधमानः
अथ + आदा | वारुणम् | अन्यद् | अस्त्रं | शिखण्डिन् + अथ + उग्र | प्रतिघाताय | तस्य
तद् | अस्त्रम् | अस्त्रेण | विदार्यमाणं | ख + स्थ | सुरा | ददृशुः | पार्थिव + च
भीष्मस्तु राजन्समरे महात्मा; धनुः सुचित्रं ध्वजमेव चापि छित्त्वानदत्पाण्डुसुतस्य वीरो; युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः
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भीष्म + तु | राजन् | समरे | महात्मा | धनुः | सु + चित्र | ध्वजम् | एव | च + अपि
छिद् + नद् | पाण्डु + सुत | वीरो | युधिष्ठिर + अजमीढ | राज्ञः
ततः समुत्सृज्य धनुः सबाणं; युधिष्ठिरं वीक्ष्य भयाभिभूतम् गदां प्रगृह्याभिपपात संख्ये; जयद्रथं भीमसेनः पदातिः
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ततः | समुत्सृज्य | धनुः | स + बाण | युधिष्ठिरं | वीक्ष्य | भय + अभिभू
गदां | प्रग्रह् + अभिपत् | संख्ये | जयद्रथं | भीमसेनः | पदातिः
तमापतन्तं महता जवेन; जयद्रथः सगदं भीमसेनम् विव्याध घोरैर्यमदण्डकल्पैः; शितैः शरैः पञ्चशतैः समन्तात्
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तम् | आपतन्तं | महता | जवेन | जयद्रथः | स + गदा | भीमसेनम्
विव्याध | घोरैर् | यम + दण्ड + कल्प | शितैः | शरैः | पञ्चशतैः | समन्तात्
अचिन्तयित्वा शरांस्तरस्वी; वृकोदरः क्रोधपरीतचेताः जघान वाहान्समरे समस्ता;नारट्टजान्सिन्धुराजस्य संख्ये
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अचिन्तयित्वा | स | शर + तरस्विन् | वृकोदरः | क्रोध + परी + चेतस्
जघान | वाहान् | समरे | समस्तान् | आरट्ट + ज | सिन्धुराजस्य | संख्ये
ततोऽभिवीक्ष्याप्रतिमप्रभाव;स्तवात्मजस्त्वरमाणो रथेन अभ्याययौ भीमसेनं निहन्तुं; समुद्यतास्त्रः सुरराजकल्पः
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ततो | अभिवीक्ष् + अप्रतिम + प्रभाव | त्वद् + आत्मज + त्वर् | रथेन
अभ्याययौ | भीमसेनं | निहन्तुं | समुद्यम् + अस्त्र | सुरराज + कल्प
भीमोऽप्यथैनं सहसा विनद्य; प्रत्युद्ययौ गदया तर्जमानः समुद्यतां तां यमदण्डकल्पां; दृष्ट्वा गदां ते कुरवः समन्तात्
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भीमो | अपि + अथ + एनद् | सहसा | विनद्य | प्रत्युद्ययौ | गदया | तर्जमानः
समुद्यतां | तां | यम + दण्ड + कल्प | दृष्ट्वा | गदां | ते | कुरवः | समन्तात्
विहाय सर्वे तव पुत्रमुग्रं; पातं गदायाः परिहर्तुकामाः अपक्रान्तास्तुमुले संविमर्दे; सुदारुणे भारत मोहनीये
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विहाय | सर्वे | तव | पुत्रम् | उग्रं | पातं | गदायाः | परिहर्तु + काम
अपक्रम् + तुमुल | संविमर्दे | सु + दारुण | भारत | मोहनीये
अमूढचेतास्त्वथ चित्रसेनो; महागदामापतन्तीं निरीक्ष्य रथं समुत्सृज्य पदातिराजौ; प्रगृह्य खड्गं विमलं चर्म अवप्लुतः सिंह इवाचलाग्रा;ज्जगाम चान्यं भुवि भूमिदेशम्
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अमूढ + चेतस् + तु + अथ | चित्रसेनो | महत् + गदा | आपतन्तीं | निरीक्ष्य
रथं | समुत्सृज्य | पदातिर् | आजौ | प्रगृह्य | खड्गं | विमलं | च | चर्म
अवप्लुतः | सिंह | इव + अचल + अग्र | जगाम | च + अन्य | भुवि | भूमि + देश
गदापि सा प्राप्य रथं सुचित्रं; साश्वं ससूतं विनिहत्य संख्ये जगाम भूमिं ज्वलिता महोल्का; भ्रष्टाम्बराद्गामिव संपतन्ती
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गदा + अपि | सा | प्राप्य | रथं | सु + चित्र | स + अश्व | स + सूत | विनिहत्य | संख्ये
जगाम | भूमिं | ज्वलिता | महत् + उल्का | भ्रंश् + अम्बर | गाम् | इव | संपतन्ती
आश्चर्यभूतं सुमहत्त्वदीया; दृष्ट्वैव तद्भारत संप्रहृष्टाः सर्वे विनेदुः सहिताः समन्ता;त्पुपूजिरे तव पुत्रं ससैन्याः
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आश्चर्य + भू | सु + महत् | त्वदीया | दृश् + एव | तद् | भारत | सम्प्रहृष्टाः
सर्वे | विनेदुः | सहिताः | समन्तात् | पुपूजिरे | तव | पुत्रं | स + सैन्य