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Currently viewing: Parva 6 - Chapter 6.71 (36 verses)
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Chapter 6.71

विहृत्य ततो राजन्सहिताः कुरुपाण्डवाः व्यतीतायां तु शर्वर्यां पुनर्युद्धाय निर्ययुः
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विहृत्य | च | ततो | राजन् | सहिताः | कुरु + पाण्डव
व्यतीतायां | तु | शर्वर्यां | पुनर् | युद्धाय | निर्ययुः
तत्र शब्दो महानासीत्तव तेषां भारत युज्यतां रथमुख्यानां कल्प्यतां चैव दन्तिनाम्
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तत्र | शब्दो | महान् | आसीत् | तव | तेषां | च | भारत
युज्यतां | रथ + मुख्य | च + एव | दन्तिनाम्
संनह्यतां पदातीनां हयानां चैव भारत शङ्खदुन्दुभिनादश्च तुमुलः सर्वतोऽभवत्
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संनह्यतां | पदातीनां | हयानां | च + एव | भारत
भेरी + शङ्ख + निनाद + च | तुमुलः | समपद्यत
ततो युधिष्ठिरो राजा धृष्टद्युम्नमभाषत व्यूहं व्यूह महाबाहो मकरं शत्रुतापनम्
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ततो | युधिष्ठिरो | राजा | धृष्टद्युम्नम् | अभाषत
व्यूहं | व्यूह | महत् + बाहु | मकरं | शत्रु + तापन
एवमुक्तस्तु पार्थेन धृष्टद्युम्नो महारथः व्यादिदेश महाराज रथिनो रथिनां वरः
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दुर्योधन + तु | संक्रुद्धो | धृष्टद्युम्नं | महत् + रण
ततः | शल्यो | महत् + राज | स्वस्रीयौ | रथिनां | वरौ
शिरोऽभूद्द्रुपदस्तस्य पाण्डवश्च धनंजयः चक्षुषी सहदेवश्च नकुलश्च महारथः तुण्डमासीन्महाराज भीमसेनो महाबलः
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शिरो | ऽभूद् | द्रुपद + तद् | पाण्डव + च | धनंजयः
चक्षुषी | सहदेव + च | नकुल + च | महत् + रथ
तस्य | शक्तिं | महत् + वेग | भीमसेनो | महत् + बल
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च राक्षसश्च घटोत्कचः सात्यकिर्धर्मराजश्च व्यूहग्रीवां समास्थिताः
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धृष्टकेतु + च | समरे | राक्षस + च | घटोत्कचः
सात्यकिर् | धर्मराज + च | व्यूह + ग्रीवा | समास्थिताः
पृष्ठमासीन्महाराज विराटो वाहिनीपतिः धृष्टद्युम्नेन सहितो महत्या सेनया वृतः
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पृष्ठम् | अस् + महत् + राज | विराटो | वाहिनीपतिः
धृष्टद्युम्नेन | सहितो | महत्या | सेनया | वृतः
केकया भ्रातरः पञ्च वामं पार्श्वं समाश्रिताः धृष्टकेतुर्नरव्याघ्रः करकर्षश्च वीर्यवान् दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थिता व्यूहस्य रक्षणे
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केकया | भ्रातरः | पञ्च | वामं | पार्श्वं | समाश्रिताः
धृष्टकेतुर् | नर + व्याघ्र | करकर्ष + च | वीर्यवान्
दक्षिणं | पक्षम् | आश्रित्य | स्थिता | व्यूहस्य | रक्षणे
पादयोस्तु महाराज स्थितः श्रीमान्महारथः कुन्तिभोजः शतानीको महत्या सेनया वृतः
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पाद + तु | महत् + राज | स्थितः | श्रीमत् + महत् + रथ
कुन्तिभोजः | शतानीको | महत्या | सेनया | वृतः
शिखण्डी तु महेष्वासः सोमकैः संवृतो बली इरावांश्च ततः पुच्छे मकरस्य व्यवस्थितौ
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शिखण्डी | तु | महत् + इष्वास | सोमकैः | संवृतो | बली
इरावन्त् + च | ततः | पुच्छे | मकरस्य | व्यवस्थितौ
एवमेतन्महाव्यूहं व्यूह्य भारत पाण्डवाः सूर्योदये महाराज पुनर्युद्धाय दंशिताः
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एवम् | एतद् + महत् + व्यूह | व्यूह्य | भारत | पाण्डवाः
उभे | सेने | महत् + राज | युद्ध + एव | समीयतुः
कौरवानभ्ययुस्तूर्णं हस्त्यश्वरथपत्तिभिः समुच्छ्रितैर्ध्वजैश्चित्रैः शस्त्रैश्च विमलैः शितैः
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कौरवान् | अभिया + तूर्णम् | हस्तिन् + अश्व + रथ + पत्ति
समुच्छ्रितैर् | ध्वज + चित्र | शस्त्र + च | विमलैः | शितैः
व्यूहं दृष्ट्वा तु तत्सैन्यं पिता देवव्रतस्तव क्रौञ्चेन महता राजन्प्रत्यव्यूहत वाहिनीम्
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तस्य | दृष्ट्वा | तु | तत् | कर्म | परिवव्रुः | सुत + त्वद्
क्रौञ्चेन | महता | राजन् | प्रत्यव्यूहत | वाहिनीम्
तस्य तुण्डे महेष्वासो भारद्वाजो व्यरोचत अश्वत्थामा कृपश्चैव चक्षुरास्तां नरेश्वर
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तस्य | तुण्डे | महत् + इष्वास | भारद्वाजो | व्यरोचत
अश्वत्थामा | कृप + च + एव | चक्षुर् | आस्तां | नरेश्वर
कृतवर्मा तु सहितः काम्बोजारट्टबाह्लिकैः शिरस्यासीन्नरश्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम्
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कृतवर्मा | च | हार्दिक्यः | काम्बोज + च | सुदक्षिणः
शिरस् + अस् + नर + श्रेष्ठ | श्रेष्ठः | सर्व + धनुष्मत्
ग्रीवायां शूरसेनस्तु तव पुत्रश्च मारिष दुर्योधनो महाराज राजभिर्बहुभिर्वृतः
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ग्रीवायां | शूरसेन + तु | तव | पुत्र + च | मारिष
ततो | दुर्योधनो | राजा | कलिङ्गैर् | बहुभिर् | वृतः
प्राग्ज्योतिषस्तु सहितः मद्रसौवीरकेकयैः उरस्यभून्नरश्रेष्ठ महत्या सेनया वृतः
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प्राग्ज्योतिष + तु | सहितः | मद्र + सौवीर + केकय
धृष्टद्युम्नेन | सहितो | महत्या | सेनया | वृतः
स्वसेनया सहितः सुशर्मा प्रस्थलाधिपः वामं पक्षं समाश्रित्य दंशितः समवस्थितः
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स्व + सेना | च | सहितः | सुशर्मा | प्रस्थल + अधिप
वामं | पक्षं | समाश्रित्य | दंशितः | समवस्थितः
तुषारा यवनाश्चैव शकाश्च सह चूचुपैः दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थिता व्यूहस्य भारत
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तुषारा | यवन + च + एव | शक + च | सह | चूचुपैः
दक्षिणं | पक्षम् | आश्रित्य | स्थिता | व्यूहस्य | रक्षणे
श्रुतायुश्च शतायुश्च सौमदत्तिश्च मारिष व्यूहस्य जघने तस्थू रक्षमाणाः परस्परम्
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द्रुपद + चेकितान + च | सात्यकि + च | महत् + रथ
व्यूहस्य | जघने | तस्थू | रक्षमाणाः | परस्परम्
ततो युद्धाय संजग्मुः पाण्डवाः कौरवैः सह सूर्योदये महाराज ततो युद्धमभून्महत्
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ततो | युद्धाय | संजग्मुः | पाण्डवाः | कौरवैः | सह
सूर्य + उदय | महत् + राज | पुनर् | युद्धाय | दंशिताः
प्रतीयू रथिनो नागान्नागाश्च रथिनो ययुः हयारोहा हयारोहान्रथिनश्चापि सादिनः
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प्रतीयू | रथिनो | नाग + च | रथिनो | ययुः
हय + आरोह | हय + आरोह | रथिन् + च + अपि | सादिनः
सारथिं रथी राजन्कुञ्जरांश्च महारणे हस्त्यारोहा रथारोहान्रथिनश्चापि सादिनः
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सारथिं | च | रथी | राजन् | कुञ्जर + च | महत् + रण
हय + आरोह | हय + आरोह | रथिन् + च + अपि | सादिनः
रथिनः पत्तिभिः सार्धं सादिनश्चापि पत्तिभिः अन्योन्यं समरे राजन्प्रत्यधावन्नमर्षिताः
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रथिनः | पत्तिभिः | सार्धं | सादिन् + च + अपि | पत्तिभिः
अन्योन्यं | समरे | राजन् | प्रत्यधावन्न् | अमर्षिताः
भीमसेनार्जुनयमैर्गुप्ता चान्यैर्महारथैः शुशुभे पाण्डवी सेना नक्षत्रैरिव शर्वरी
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भीमसेन + अर्जुन + यम | गुप्ता | च + अन्य | महत् + रथ
शुशुभे | पाण्डवी | सेना | नक्षत्रैर् | इव | शर्वरी
तथा भीष्मकृपद्रोणशल्यदुर्योधनादिभिः तवापि विबभौ सेना ग्रहैर्द्यौरिव संवृता
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तथा | भीष्म + कृप + द्रोण + शल्य + दुर्योधन + आदि
त्वद् + अपि | विबभौ | सेना | ग्रहैर् | द्यौर् | इव | संवृता
भीमसेनस्तु कौन्तेयो द्रोणं दृष्ट्वा पराक्रमी अभ्ययाज्जवनैरश्वैर्भारद्वाजस्य वाहिनीम्
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भीमसेन + तु | कौन्तेयो | द्रोणं | दृष्ट्वा | पराक्रमी
अभिया + जवन | अश्वैर् | भारद्वाजस्य | वाहिनीम्
द्रोणस्तु समरे क्रुद्धो भीमं नवभिरायसैः विव्याध समरे राजन्मर्माण्युद्दिश्य वीर्यवान्
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द्रोण + तु | समरे | क्रुद्धो | भीमं | नवभिर् | आयसैः
विव्याध | समरे | राजन् + मर्मन् + उद्दिश् | वीर्यवान्
दृढाहतस्ततो भीमो भारद्वाजस्य संयुगे सारथिं प्रेषयामास यमस्य सदनं प्रति
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दृढ + आहन् + ततस् | भीमो | भारद्वाजस्य | संयुगे
प्रेषयामास | समरे | सौभद्रस्य | रथं | प्रति
संगृह्य स्वयं वाहान्भारद्वाजः प्रतापवान् व्यधमत्पाण्डवीं सेनां तूलराशिमिवानलः
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स | संगृह्य | स्वयं | वाहान् | भारद्वाजः | प्रतापवान्
व्यधमत् | पाण्डवीं | सेनां | तूल + राशि | इव + अनल
ते वध्यमाना द्रोणेन भीष्मेण नरोत्तम सृञ्जयाः केकयैः सार्धं पलायनपराभवन्
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ते | वध्यमाना | भीष्मेण | पाञ्चालाः | सोमकैः | सह
सृञ्जयाः | केकयैः | सार्धं | पलायन + पर + भू
तथैव तावकं सैन्यं भीमार्जुनपरिक्षतम् मुह्यते तत्र तत्रैव समदेव वराङ्गना
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तथा + एव | तावकं | सैन्यं | भीम + अर्जुन + परिक्षन्
मुह्यते | तत्र | तत्र + एव | स + मद + इव | वर + अङ्गना
अभिद्येतां ततो व्यूहौ तस्मिन्वीरवरक्षये आसीद्व्यतिकरो घोरस्तव तेषां भारत
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अभिद्येतां | ततो | व्यूहौ | तस्मिन् | वीर + वर + क्षय
आसीद् | व्यतिकरो | घोर + त्वद् | तेषां | च | भारत
तदद्भुतमपश्याम तावकानां परैः सह एकायनगताः सर्वे यदयुध्यन्त भारत
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तद् | अद्भुतम् | अपश्याम | तावकानां | परैः | सह
एकायन + गम् | सर्वे | यद् | अयुध्यन्त | भारत
प्रतिसंवार्य चास्त्राणि तेऽन्योन्यस्य विशां पते युयुधुः पाण्डवाश्चैव कौरवाश्च महारथाः
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प्रतिसंवार्य | च + अस्त्र | ते | ऽन्योन्यस्य | विशां | पते
युयुधुः | पाण्डव + च + एव | कौरव + च | महत् + रथ