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Currently viewing: Parva 6 - Chapter 6.62 (40 verses)
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Chapter 6.62

ततः भगवान्देवो लोकानां परमेश्वरः ब्रह्माणं प्रत्युवाचेदं स्निग्धगम्भीरया गिरा
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ततः | स | भगवान् | देवो | लोकानां | परमेश्वरः
ब्रह्माणं | प्रतिवच् + इदम् | स्निग्ध + गम्भीर | गिरा
विदितं तात योगान्मे सर्वमेतत्तवेप्सितम् तथा तद्भवितेत्युक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत
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विदितं | तात | योग + मद् | सर्वम् | एतत् | त्वद् + ईप्सय्
तथा | तद् | भू + इति + वच् | तत्र + एव + अन्तर्धा
ततो देवर्षिगन्धर्वा विस्मयं परमं गताः कौतूहलपराः सर्वे पितामहमथाब्रुवन्
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ततो | देव + ऋषि + गन्धर्व | विस्मयं | परमं | गताः
कौतूहल + पर | सर्वे | पितामहम् | अथ + ब्रू
को न्वयं यो भगवता प्रणम्य विनयाद्विभो वाग्भिः स्तुतो वरिष्ठाभिः श्रोतुमिच्छाम तं वयम्
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को | नु + इदम् | यो | भगवता | प्रणम्य | विनयाद् | विभो
वाग्भिः | स्तुतो | वरिष्ठाभिः | श्रोतुम् | इच्छाम | तं | वयम्
एवमुक्तस्तु भगवान्प्रत्युवाच पितामहः देवब्रह्मर्षिगन्धर्वान्सर्वान्मधुरया गिरा
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एवम् | वच् + तु | भगवान् | प्रत्युवाच | पितामहः
देव + ब्रह्मन् + ऋषि + गन्धर्व | सर्व + मधुर | गिरा
यत्तत्परं भविष्यं भवितव्यं यत्परम् भूतात्मा यः प्रभुश्चैव ब्रह्म यच्च परं पदम्
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यत् | तद् + पर | भविष्यं | च | भवितव्यं | च | यत् | परम्
भूतात्मा | यः | प्रभु + च + एव | ब्रह्म | यद् + च | परं | पदम्
तेनास्मि कृतसंवादः प्रसन्नेन सुरर्षभाः जगतोऽनुग्रहार्थाय याचितो मे जगत्पतिः
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तद् + अस् | कृ + संवाद | प्रसन्नेन | सुर + ऋषभ
जगतो | अनुग्रह + अर्थ | याचितो | मे | जगत्पतिः
मानुषं लोकमातिष्ठ वासुदेव इति श्रुतः असुराणां वधार्थाय संभवस्व महीतले
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मानुषं | लोकम् | आतिष्ठ | वासुदेव | इति | श्रुतः
असुराणां | वध + अर्थ | संभवस्व | मही + तल
संग्रामे निहता ये ते दैत्यदानवराक्षसाः इमे नृषु संभूता घोररूपा महाबलाः
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संग्रामे | निहता | ये | ते | दैत्य + दानव + राक्षस
त | इमे | नृषु | सम्भूता | घोर + रूप | महत् + बल
तेषां वधार्थं भगवान्नरेण सहितो वशी मानुषीं योनिमास्थाय चरिष्यति महीतले
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तेषां | वध + अर्थ | भगवन्त् + नर | सहितो | वशी
मानुषीं | योनिम् | आस्थाय | चरिष्यति | मही + तल
नरनारायणौ यौ तौ पुराणावृषिसत्तमौ सहितौ मानुषे लोके संभूतावमितद्युती
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नर + नारायण | यौ | तौ | पुराणाव् | ऋषि + सत्तम
सहितौ | मानुषे | लोके | सम्भू + अमित + द्युति
अजेयौ समरे यत्तौ सहितावमरैरपि मूढास्त्वेतौ जानन्ति नरनारायणावृषी
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अजेयौ | समरे | यत्तौ | सहित + अमर | अपि
मुह् + तु + एतद् | न | जानन्ति | नर + नारायण | ऋषी
तस्याहमात्मजो ब्रह्मा सर्वस्य जगतः पतिः वासुदेवोऽर्चनीयो वः सर्वलोकमहेश्वरः
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तद् + मद् | आत्मजो | ब्रह्मा | सर्वस्य | जगतः | पतिः
वासुदेवो | ऽर्चनीयो | वः | सर्व + लोक + महेश्वर
तथा मनुष्योऽयमिति कदाचित्सुरसत्तमाः नावज्ञेयो महावीर्यः शङ्खचक्रगदाधरः
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तथा | मनुष्यो | ऽयम् | इति | कदाचित् | सुर + सत्तम
न + अवज्ञा | महत् + वीर्य | शङ्ख + चक्र + गदा + धर
एतत्परमकं गुह्यमेतत्परमकं पदम् एतत्परमकं ब्रह्म एतत्परमकं यशः
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यद् | एतत् | परमं | गुह्यं | त्वद् + प्रसाद + मय | विभो
एतत् | परमकं | गुह्यम् | एतत् | परमकं | पदम्
एतदक्षरमव्यक्तमेतत्तच्छाश्वतं महत् एतत्पुरुषसंज्ञं वै गीयते ज्ञायते
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एतद् | अक्षरम् | अव्यक्तम् | एतत् | तद् + शाश्वत | महत्
एतत् | पुरुष + संज्ञा | वै | गीयते | ज्ञायते | न | च
एतत्परमकं तेज एतत्परमकं सुखम् एतत्परमकं सत्यं कीर्तितं विश्वकर्मणा
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एतत् | परमकं | गुह्यम् | एतत् | परमकं | पदम्
एतत् | परमकं | सत्यं | कीर्तितं | विश्वकर्मणा
तस्मात्सर्वैः सुरैः सेन्द्रैर्लोकैश्चामितविक्रमः नावज्ञेयो वासुदेवो मानुषोऽयमिति प्रभुः
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तस्मात् | सर्वैः | सुरैः | स + इन्द्र | लोक + च + अमित + विक्रम
न + अवज्ञा | वासुदेवो | मानुषो | ऽयम् | इति | प्रभुः
यश्च मानुषमात्रोऽयमिति ब्रूयात्सुमन्दधीः हृषीकेशमवज्ञानात्तमाहुः पुरुषाधमम्
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यद् + च | मानुष + मात्र | ऽयम् | इति | ब्रूयात् | सु + मन्द + धी
हृषीकेशम् | अवज्ञानात् | तम् | आहुः | पुरुष + अधम
योगिनं तं महात्मानं प्रविष्टं मानुषीं तनुम् अवमन्येद्वासुदेवं तमाहुस्तामसं जनाः
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योगिनं | तं | महात्मानं | प्रविष्टं | मानुषीं | तनुम्
अवमन्येद् | वासुदेवं | तम् | अह् + तामस | जनाः
देवं चराचरात्मानं श्रीवत्साङ्कं सुवर्चसम् पद्मनाभं जानाति तमाहुस्तामसं जनाः
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देवं | चराचर + आत्मन् | श्रीवत्स + अङ्क | सु + वर्चस्
पद्मनाभं | न | जानाति | तम् | अह् + तामस | जनाः
किरीटकौस्तुभधरं मित्राणामभयंकरम् अवजानन्महात्मानं घोरे तमसि मज्जति
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किरीट + कौस्तुभ + धर | मित्राणाम् | अभयंकरम्
अवज्ञा + महात्मन् | घोरे | तमसि | मज्जति
एवं विदित्वा तत्त्वार्थं लोकानामीश्वरेश्वरः वासुदेवो नमस्कार्यः सर्वलोकैः सुरोत्तमाः
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एवं | विदित्वा | तत्त्व + अर्थ | लोकानाम् | ईश्वर
वासुदेवो | ऽर्चनीयो | वः | सर्व + लोक + महेश्वर
एवमुक्त्वा भगवान्सर्वान्देवगणान्पुरा विसृज्य सर्वलोकात्मा जगाम भवनं स्वकम्
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एवम् | उक्त्वा | स | भगवान् | सर्वान् | देव + गण | पुरा
विसृज्य | सर्व + लोक + आत्मन् | जगाम | भवनं | स्वकम्
ततो देवाः सगन्धर्वा मुनयोऽप्सरसोऽपि कथां तां ब्रह्मणा गीतां श्रुत्वा प्रीता दिवं ययुः
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ततो | देवाः | स + गन्धर्व | मुनयो | ऽप्सरसो | ऽपि | च
कथां | तां | ब्रह्मणा | गीतां | श्रुत्वा | प्रीता | दिवं | ययुः
एतच्छ्रुतं मया तात ऋषीणां भावितात्मनाम् वासुदेवं कथयतां समवाये पुरातनम्
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एतद् + श्रु | मया | तात | ऋषीणां | भावितात्मनाम्
वासुदेवं | कथयतां | समवाये | पुरातनम्
जामदग्न्यस्य रामस्य मार्कण्डेयस्य धीमतः व्यासनारदयोश्चापि श्रुतं श्रुतविशारद
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जामदग्न्यस्य | रामस्य | मार्कण्डेयस्य | धीमतः
व्यास + नारद + च + अपि | श्रुतं | श्रु + विशारद
एतमर्थं विज्ञाय श्रुत्वा प्रभुमव्ययम् वासुदेवं महात्मानं लोकानामीश्वरेश्वरम्
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एतम् | अर्थं | च | विज्ञाय | श्रुत्वा | च | प्रभुम् | अव्ययम्
वासुदेवं | महात्मानं | लोकानाम् | ईश्वर
यस्यासावात्मजो ब्रह्मा सर्वस्य जगतः पिता कथं वासुदेवोऽयमर्च्यश्चेज्यश्च मानवैः
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तद् + मद् | आत्मजो | ब्रह्मा | सर्वस्य | जगतः | पतिः
कथं | न | वासुदेवो | ऽयम् | अर्च् + च + यज् | मानवैः
वारितोऽसि पुरा तात मुनिभिर्वेदपारगैः मा गच्छ संयुगं तेन वासुदेवेन धीमता मा पाण्डवैः सार्धमिति तच्च मोहान्न बुध्यसे
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वारितो | ऽसि | पुरा | तात | मुनिभिर् | वेदपारगैः
मा | गच्छ | संयुगं | तेन | वासुदेवेन | धीमता
मा | पाण्डवैः | सार्धम् | इति | तद् + च | मोह + न | बुध्यसे
मन्ये त्वां राक्षसं क्रूरं तथा चासि तमोवृतः यस्माद्द्विषसि गोविन्दं पाण्डवं धनंजयम् नरनारायणौ देवौ नान्यो द्विष्याद्धि मानवः
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मन्ये | त्वां | राक्षसं | क्रूरं | तथा | च + अस् | तमस् + वृ
यस्माद् | द्विषसि | गोविन्दं | पाण्डवं | च | धनंजयम्
नर + नारायण | देवौ | न + अन्य | द्विष् + हि | मानवः
तस्माद्ब्रवीमि ते राजन्नेष वै शाश्वतोऽव्ययः सर्वलोकमयो नित्यः शास्ता धाता धरो ध्रुवः
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तस्माद् | ब्रवीमि | ते | राजन्न् | एष | वै | शाश्वतो | ऽव्ययः
सर्व + लोक + मय | नित्यः | शास्ता | धाता | धरो | ध्रुवः
लोकान्धारयते यस्त्रींश्चराचरगुरुः प्रभुः योद्धा जयश्च जेता सर्वप्रकृतिरीश्वरः
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लोकान् | धारयते | यद् + त्रि + चराचर + गुरु | प्रभुः
योद्धा | जय + च | जेता | च | सर्व + प्रकृति | ईश्वरः
राजन्सत्त्वमयो ह्येष तमोरागविवर्जितः यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः
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राजन् | सत्त्व + मय | हि + एतद् | तमस् + राग + विवर्जय्
यतः | कृष्ण + ततस् | धर्मो | यतो | धर्म + ततस् | जयः
तस्य माहात्म्ययोगेन योगेनात्मन एव धृताः पाण्डुसुता राजञ्जयश्चैषां भविष्यति
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तस्य | माहात्म्य + योग | योग + आत्मन् | एव | च
धृताः | पाण्डु + सुत | राजञ् | जय + च + इदम् | भविष्यति
श्रेयोयुक्तां सदा बुद्धिं पाण्डवानां दधाति यः बलं चैव रणे नित्यं भयेभ्यश्चैव रक्षति
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श्रेयस् + युज् | सदा | बुद्धिं | पाण्डवानां | दधाति | यः
बलं | च + एव | रणे | नित्यं | भय + च + एव | रक्षति
एष शाश्वतो देवः सर्वगुह्यमयः शिवः वासुदेव इति ज्ञेयो यन्मां पृच्छसि भारत
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स | एष | शाश्वतो | देवः | सर्व + गुह्य + मय | शिवः
वासुदेव | इति | ज्ञेयो | यद् + मद् | पृच्छसि | भारत
ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैश्च कृतलक्षणैः सेव्यतेऽभ्यर्च्यते चैव नित्ययुक्तैः स्वकर्मभिः
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ब्राह्मणैः | क्षत्रियैर् | वैश्यैः | शूद्र + च | कृ + लक्षण
सेव्यते | ऽभ्यर्च्यते | च + एव | नित्य + युज् | स्व + कर्मन्
द्वापरस्य युगस्यान्ते आदौ कलियुगस्य सात्वतं विधिमास्थाय गीतः संकर्षणेन यः
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द्वापरस्य | युग + अन्त | आदौ | कलि + युग | च
सात्वतं | विधिम् | आस्थाय | गीतः | संकर्षणेन | यः
एष सर्वासुरमर्त्यलोकं; समुद्रकक्ष्यान्तरिताः पुरीश्च युगे युगे मानुषं चैव वासं; पुनः पुनः सृजते वासुदेवः
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स | एष | सर्व + असुर + मर्त्य + लोक | समुद्र + कक्ष्या + अन्तरि | पुरी + च
युगे | युगे | मानुषं | च + एव | वासं | पुनः | पुनः | सृजते | वासुदेवः