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Currently viewing: Parva 6 - Chapter 6.56 (28 verses)
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Chapter 6.56

व्युष्टां निशां भारत भारताना;मनीकिनीनां प्रमुखे महात्मा ययौ सपत्नान्प्रति जातकोपो; वृतः समग्रेण बलेन भीष्मः
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व्युष्टां | निशां | भारत | भारतानाम् | अनीकिनीनां | प्रमुखे | महात्मा
ययौ | सपत्नान् | प्रति | जन् + कोप | वृतः | समग्रेण | बलेन | भीष्मः
तं द्रोणदुर्योधनबाह्लिकाश्च; तथैव दुर्मर्षणचित्रसेनौ जयद्रथश्चातिबलो बलौघै;र्नृपास्तथान्येऽनुययुः समन्तात्
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श्रुतायुर् | अम्बष्ठ + पति + च | राजा | तथा + एव | दुर्मर्षण + चित्रसेन
जयद्रथ + च + अतिबल | बल + ओघ | नृप + तथा + अन्य | ऽनुययुः | समन्तात्
तैर्महद्भिश्च महारथैश्च; तेजस्विभिर्वीर्यवद्भिश्च राजन् रराज राजोत्तम राजमुख्यै;र्वृतः देवैरिव वज्रपाणिः
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स | तैर् | महत् + च | महत् + रथ | च | तेजस्विभिर् | वीर्यवत् + च | राजन्
रराज | राजन् + उत्तम | राजन् + मुख्य | वृतः | स | देवैर् | इव | वज्रपाणिः
तस्मिन्ननीकप्रमुखे विषक्ता; दोधूयमानाश्च महापताकाः सुरक्तपीतासितपाण्डुराभा; महागजस्कन्धगता विरेजुः
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तस्मिन्न् | अनीक + प्रमुख | विषक्ता | दोधूय् + च | महत् + पताका
सु + रक्त + पीत + असित + पाण्डुर + आभ | महत् + गज + स्कन्ध + गम् | विरेजुः
सा वाहिनी शांतनवेन राज्ञा; महारथैर्वारणवाजिभिश्च बभौ सविद्युत्स्तनयित्नुकल्पा; जलागमे द्यौरिव जातमेघा
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सा | वाहिनी | शांतनवेन | राज्ञा | महत् + रथ | वारण + वाजिन् + च
बभौ | स + विद्युत् + स्तनयित्नु + कल्प | जलागमे | द्यौर् | इव | जन् + मेघ
ततो रणायाभिमुखी प्रयाता; प्रत्यर्जुनं शांतनवाभिगुप्ता सेना महोग्रा सहसा कुरूणां; वेगो यथा भीम इवापगायाः
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ततो | रण + अभिमुख | प्रयाता | प्रति + अर्जुन | शांतनव + अभिगुप्
सेना | महत् + उग्र | सहसा | कुरूणां | वेगो | यथा | भीम | इव + आपगा
तं व्यालनानाविधगूढसारं; गजाश्वपादातरथौघपक्षम् व्यूहं महामेघसमं महात्मा; ददर्श दूरात्कपिराजकेतुः
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तं | व्याल + नानाविध + गुह् + सार | गज + अश्व + पादात + रथ + ओघ + पक्ष
व्यूहं | महत् + मेघ + सम | महात्मा | ददर्श | दूरात् | कपि + राजन् + केतु
निर्ययौ केतुमता रथेन; नरर्षभः श्वेतहयेन वीरः वरूथिना सैन्यमुखे महात्मा; वधे धृतः सर्वसपत्नयूनाम्
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स | निर्ययौ | केतुमता | रथेन | नर + ऋषभ | श्वेत + हय | वीरः
वरूथिना | सैन्य + मुख | महात्मा | वधे | धृतः | सर्व + सपत्न + युवन्
सूपस्करं सोत्तरबन्धुरेषं; यत्तं यदूनामृषभेण संख्ये कपिध्वजं प्रेक्ष्य विषेदुराजौ; सहैव पुत्रैस्तव कौरवेयाः
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सु + उपस्कर | यत्तं | यदूनाम् | ऋषभेण | संख्ये
कपिध्वजं | प्रेक्ष्य | विषेदुर् | आजौ | सह + एव | पुत्र + त्वद् | कौरवेयाः
प्रकर्षता गुप्तमुदायुधेन; किरीटिना लोकमहारथेन तं व्यूहराजं ददृशुस्त्वदीया;श्चतुश्चतुर्व्यालसहस्रकीर्णम्
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स्व + बाहु + वीर्य | जिताः | स + भीष्म | किरीटिना | लोक + महत् + रथ
तं | व्यूह + राज | दृश् + त्वदीय | चतुर् + व्याल + सहस्र + कृ
यथा हि पूर्वेऽहनि धर्मराज्ञा; व्यूहः कृतः कौरवनन्दनेन तथा तथोद्देशमुपेत्य तस्थुः; पाञ्चालमुख्यैः सह चेदिमुख्याः
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यथा | हि | पूर्वे | ऽहनि | धर्मराज्ञा | व्यूहः | कृतः | कौरव + नन्दन
तथा | तथा + उद्देश | उपेत्य | तस्थुः | पाञ्चाल + मुख्य | सह | चेदि + मुख्य
ततो महावेगसमाहतानि; भेरीसहस्राणि विनेदुराजौ शङ्खस्वना दुन्दुभिनिस्वनाश्च; सर्वेष्वनीकेषु ससिंहनादाः
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ततो | महत् + वेग + समाहन् | भेरी + सहस्र | विनेदुर् | आजौ
शङ्ख + स्वन | दुन्दुभि + निस्वन + च | सर्व + अनीक | स + सिंहनाद
ततः सबाणानि महास्वनानि; विस्फार्यमाणानि धनूंषि वीरैः क्षणेन भेरीपणवप्रणादा;नन्तर्दधुः शङ्खमहास्वनाश्च
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ततः | स + बाण | महत् + स्वन | विस्फार्यमाणानि | धनूंषि | वीरैः
क्षणेन | भेरी + पणव + प्रणाद | अन्तर्दधुः | शङ्ख + महत् + स्वन + च
तच्छङ्खशब्दावृतमन्तरिक्ष;मुद्धूतभौमद्रुतरेणुजालम् महावितानावततप्रकाश;मालोक्य वीराः सहसाभिपेतुः
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तद् + शङ्ख + शब्द + आवृ | अन्तरिक्षम् | उद्धू + भौम + द्रु + रेणु + जाल
महत् + वितान + अवतन् + प्रकाश | आलोक्य | वीराः | सहसा + अभिपत्
रथी रथेनाभिहतः ससूतः; पपात साश्वः सरथः सकेतुः गजो गजेनाभिहतः पपात; पदातिना चाभिहतः पदातिः
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रथी | रथ + अभिहन् | स + सूत | पपात | स + अश्व | स + रथ | स + केतु
गजो | गज + अभिहन् | पपात | पदातिना | च + अभिहन् | पदातिः
आवर्तमानान्यभिवर्तमानै;र्बाणैः क्षतान्यद्भुतदर्शनानि प्रासैश्च खड्गैश्च समाहतानि; सदश्ववृन्दानि सदश्ववृन्दैः
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आवृत् + अभिवृत् | बाणैः | क्षत + अद्भुत + दर्शन
प्रास + च | खड्ग + च | समाहतानि | सत् + अश्व + वृन्द | सत् + अश्व + वृन्द
सुवर्णतारागणभूषितानि; शरावराणि प्रहितानि वीरैः विदार्यमाणानि परश्वधैश्च; प्रासैश्च खड्गैश्च निपेतुरुर्व्याम्
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सुवर्ण + तारा + गण + भूषय् | शरावराणि | प्रहितानि | वीरैः
विदार्यमाणानि | परश्वध + च | प्रास + च | खड्ग + च | निपेतुर् | उर्व्याम्
गजैर्विषाणैर्वरहस्तरुग्णाः; केचित्ससूता रथिनः प्रपेतुः गजर्षभाश्चापि रथर्षभेण; निपेतिरे बाणहताः पृथिव्याम्
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गजैर् | विषाणैर् | वर + हस्त + रुज् | केचित् | स + सूत | रथिनः | प्रपेतुः
गज + ऋषभ + च + अपि | रथ + ऋषभ | निपेतिरे | बाण + हन् | पृथिव्याम्
गजौघवेगोद्धतसादितानां; श्रुत्वा निषेदुर्वसुधां मनुष्याः आर्तस्वरं सादिपदातियूनां; विषाणगात्रावरताडितानाम्
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गज + ओघ + वेग + उद्धन् + सादय् | श्रुत्वा | निषेदुर् | वसुधां | मनुष्याः
आर्त + स्वर | सादिन् + पदाति + युवन् | विषाण + गात्र + अवर + ताडय्
संभ्रान्तनागाश्वरथे प्रसूते; महाभये सादिपदातियूनाम् महारथैः संपरिवार्यमाणं; ददर्श भीष्मः कपिराजकेतुम्
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सम्भ्रम् + नाग + अश्व + रथ | प्रसूते | महत् + भय | सादिन् + पदाति + युवन्
महत् + रथ | संपरिवार्यमाणं | ददर्श | भीष्मः | कपि + राजन् + केतु
तं पञ्चतालोच्छ्रिततालकेतुः; सदश्ववेगोद्धतवीर्ययातः महास्त्रबाणाशनिदीप्तमार्गं; किरीटिनं शांतनवोऽभ्यधावत्
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तं | पञ्चन् + ताल + उच्छ्रि + केतु | सत् + अश्व + वेग + उद्धन् + वीर्य + या
महत् + अस्त्र + बाण + अशनि + दीप् + मार्ग | किरीटिनं | शांतनवो | ऽभ्यधावत्
तथैव शक्रप्रतिमानकल्प;मिन्द्रात्मजं द्रोणमुखाभिसस्रुः कृपश्च शल्यश्च विविंशतिश्च; दुर्योधनः सौमदत्तिश्च राजन्
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तथा + एव | शक्र + प्रतिमान + कल्प | इन्द्र + आत्मज | द्रोण + मुख + अभिसृ
कृप + च | शल्य + च | विविंशति + च | दुर्योधनः | सौमदत्ति + च | राजन्
ततो रथानीकमुखादुपेत्य; सर्वास्त्रवित्काञ्चनचित्रवर्मा जवेन शूरोऽभिससार सर्वां;स्तथार्जुनस्यात्र सुतोऽभिमन्युः
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ततो | रथ + अनीक + मुख | उपेत्य | सर्व + अस्त्र + विद् | काञ्चन + चित्र + वर्मन्
जवेन | शूरो | ऽभिससार | सर्वांस् | तथा + अर्जुन + अत्र | सुतो | ऽभिमन्युः
तेषां महास्त्राणि महारथाना;मसक्तकर्मा विनिहत्य कार्ष्णिः बभौ महामन्त्रहुतार्चिमाली; सदोगतः सन्भगवानिवाग्निः
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तेषां | महत् + अस्त्र | महत् + रथ | असक्त + कर्मन् | विनिहत्य | कार्ष्णिः
बभौ | महत् + मन्त्र + हु + अर्चि + मालिन् | सदस् + गम् | सन् | भगवान् | इव + अग्नि
ततः तूर्णं रुधिरोदफेनां; कृत्वा नदीं वैशसने रिपूणाम् जगाम सौभद्रमतीत्य भीष्मो; महारथं पार्थमदीनसत्त्वः
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ततः | स | तूर्णं | रुधिर + उद + फेन | कृत्वा | नदीं | रिपूणाम्
जगाम | सौभद्रम् | अतीत्य | भीष्मो | महत् + रथ | पार्थम् | अदीन + सत्त्व
ततः प्रहस्याद्भुतदर्शनेन; गाण्डीवनिर्ह्रादमहास्वनेन विपाठजालेन महास्त्रजालं; विनाशयामास किरीटमाली
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ततः | प्रहस् + अद्भुत + दर्शन | गाण्डीव + निर्ह्राद + महत् + स्वन
विपाठ + जाल | महत् + अस्त्र + जाल | विनाशयामास | किरीटमाली
तमुत्तमं सर्वधनुर्धराणा;मसक्तकर्मा कपिराजकेतुः भीष्मं महात्माभिववर्ष तूर्णं; शरौघजालैर्विमलैश्च भल्लैः
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तम् | उत्तमं | सर्व + धनुर्धर | असक्त + कर्मन् | कपि + राजन् + केतु
भीष्मं | महात्मन् + अभिवृष् | तूर्णं | शर + ओघ + जाल | विमल + च | भल्लैः
एवंविधं कार्मुकभीमनाद;मदीनवत्सत्पुरुषोत्तमाभ्याम् ददर्श लोकः कुरुसृञ्जयाश्च; तद्द्वैरथं भीष्मधनंजयाभ्याम्
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एवंविधं | कार्मुक + भीम + नाद | अदीन + वत् | सत् + पुरुष + उत्तम
ददर्श | लोकः | कुरु + सृञ्जय + च | तद् | द्वैरथं | भीष्म + धनंजय