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Currently viewing: Parva 6 - Chapter 6.48 (70 verses)
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Chapter 6.48

एवं व्यूढेष्वनीकेषु मामकेष्वितरेषु कथं प्रहरतां श्रेष्ठाः संप्रहारं प्रचक्रिरे
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एवं | व्यूह् + अनीक | मामक + इतर | च
कथं | प्रहरतां | श्रेष्ठाः | संप्रहारं | प्रचक्रिरे
समं व्यूढेष्वनीकेषु संनद्धा रुचिरध्वजाः अपारमिव संदृश्य सागरप्रतिमं बलम्
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समं | व्यूह् + अनीक | संनद्धा | रुचिर + ध्वज
अपारम् | इव | संदृश्य | सागर + प्रतिम | बलम्
तेषां मध्ये स्थितो राजा पुत्रो दुर्योधनस्तव अब्रवीत्तावकान्सर्वान्युध्यध्वमिति दंशिताः
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भ्रातृभिः | सहितो | राजन् | पुत्रो | दुर्योधन + त्वद्
अब्रवीत् | तावकान् | सर्वान् | युध्यध्वम् | इति | दंशिताः
ते मनः क्रूरमास्थाय समभित्यक्तजीविताः पाण्डवानभ्यवर्तन्त सर्व एवोच्छ्रितध्वजाः
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ते | मनः | क्रूरम् | आधाय | समभित्यज् + जीवित
पाण्डवान् | अभ्यवर्तन्त | सर्व | एव + उच्छ्रि + ध्वज
ततो युद्धं समभवत्तुमुलं लोमहर्षणम् तावकानां परेषां व्यतिषक्तरथद्विपम्
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तयोः | समभवद् | युद्धं | तुमुलं | लोमन् + हर्षण
तावकानां | परेषां | च | व्यतिषञ्ज् + रथ + द्विप
मुक्तास्तु रथिभिर्बाणा रुक्मपुङ्खाः सुतेजनाः संनिपेतुरकुण्ठाग्रा नागेषु हयेषु
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मुच् + तु | रथिभिर् | बाणा | रुक्म + पुङ्ख | सु + तेजन
संनिपेतुर् | अकुण्ठ + अग्र | नागेषु | च | हयेषु | च
तथा प्रवृत्ते संग्रामे धनुरुद्यम्य दंशितः अभिपत्य महाबाहुर्भीष्मो भीमपराक्रमः
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तथा | प्रवृत्ते | संग्रामे | धनुर् | उद्यम्य | दंशितः
कृष्ण | पश्य | महत् + इष्वास | भीष्मं | भीम + पराक्रम
सौभद्रे भीमसेने शैनेये महारथे केकये विराटे धृष्टद्युम्ने पार्षते
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सौभद्रे | भीमसेने | च | शैनेये | च | महत् + रथ
नकुलः | सहदेव + च | धृष्टद्युम्न + च | पार्षतः
एतेषु नरवीरेषु चेदिमत्स्येषु चाभितः ववर्ष शरवर्षाणि वृद्धः कुरुपितामहः
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एतेषु | नर + वीर | चेदि + मत्स्य | च + अभितस्
ववर्ष | शर + वर्ष | वृद्धः | कुरु + पितामह
प्राकम्पत महाव्यूहस्तस्मिन्वीरसमागमे सर्वेषामेव सैन्यानामासीद्व्यतिकरो महान्
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प्राकम्पत | महत् + व्यूह + तद् | वीर + समागम
सर्वेषाम् | एव | सैन्यानाम् | आसीद् | व्यतिकरो | महान्
सादितध्वजनागाश्च हतप्रवरवाजिनः विप्रयातरथानीकाः समपद्यन्त पाण्डवाः
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सादय् + ध्वज + नाग + च | हन् + प्रवर + वाजिन्
विप्रया + रथ + अनीक | समपद्यन्त | पाण्डवाः
अर्जुनस्तु नरव्याघ्रो दृष्ट्वा भीष्मं महारथम् वार्ष्णेयमब्रवीत्क्रुद्धो याहि यत्र पितामहः
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अर्जुन + तु | नर + व्याघ्र | दृष्ट्वा | भीष्मं | महत् + रथ
वार्ष्णेयम् | अब्रवीत् | क्रुद्धो | याहि | यत्र | पितामहः
एष भीष्मः सुसंक्रुद्धो वार्ष्णेय मम वाहिनीम् नाशयिष्यति सुव्यक्तं दुर्योधनहिते रतः
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एष | भीष्मः | सु + संक्रुध् | वार्ष्णेय | मम | वाहिनीम्
नाशयिष्यति | सु + व्यक्त | दुर्योधन + हित | रतः
एष द्रोणः कृपः शल्यो विकर्णश्च जनार्दन धार्तराष्ट्राश्च सहिता दुर्योधनपुरोगमाः
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एष | द्रोणः | कृपः | शल्यो | विकर्ण + च | जनार्दन
धार्तराष्ट्र + च | सहिता | दुर्योधन + पुरोगम
पाञ्चालान्निहनिष्यन्ति रक्षिता दृढधन्वना सोऽहं भीष्मं गमिष्यामि सैन्यहेतोर्जनार्दन
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पाञ्चाल + निहन् | रक्षिता | दृढ + धन्वन्
सो | ऽहं | भीष्मं | गमिष्यामि | सैन्य + हेतु | जनार्दन
तमब्रवीद्वासुदेवो यत्तो भव धनंजय एष त्वा प्रापये वीर पितामहरथं प्रति
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तम् | अब्रवीद् | वासुदेवो | यत्तो | भव | धनंजय
एष | त्वा | प्रापये | वीर | पितामह + रथ | प्रति
एवमुक्त्वा ततः शौरी रथं तं लोकविश्रुतम् प्रापयामास भीष्माय रथं प्रति जनेश्वर
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एवम् | उक्त्वा | ततः | शौरी | रथं | तं | लोक + विश्रु
प्रापयामास | भीष्माय | रथं | प्रति | जनेश्वर
चञ्चद्बहुपताकेन बलाकावर्णवाजिना समुच्छ्रितमहाभीमनदद्वानरकेतुना महता मेघनादेन रथेनादित्यवर्चसा
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चञ्च् + बहु + पताका | बलाका + वर्ण + वाजिन्
समुच्छ्रि + महत् + भीम + नद् + वानर + केतु
महता | मेघ + नाद | रथ + आदित्य + वर्चस्
विनिघ्नन्कौरवानीकं शूरसेनांश्च पाण्डवः आयाच्छरान्नुदञ्शीघ्रं सुहृच्छोषविनाशनः
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विनिघ्नन् | कौरव + अनीक | शूरसेन + च | पाण्डवः
आया + शर + नुद् | शीघ्रं | सुहृद् + शोष + विनाशन
तमापतन्तं वेगेन प्रभिन्नमिव वारणम् त्रासयानं रणे शूरान्पातयन्तं सायकैः
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तम् | आपतन्तं | वेगेन | प्रभिन्नम् | इव | वारणम्
त्रासयानं | रणे | शूरान् | पातयन्तं | च | सायकैः
सैन्धवप्रमुखैर्गुप्तः प्राच्यसौवीरकेकयैः सहसा प्रत्युदीयाय भीष्मः शांतनवोऽर्जुनम्
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सैन्धव + प्रमुख | गुप्तः | प्राच्य + सौवीर + केकय
सहसा | प्रत्युदियाय | भीष्मः | शांतनवो | ऽर्जुनम्
को हि गाण्डीवधन्वानमन्यः कुरुपितामहात् द्रोणवैकर्तनाभ्यां वा रथः संयातुमर्हति
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को | हि | गाण्डीवधन्वानम् | अन्यः | कुरु + पितामह
द्रोण + वैकर्तन | वा | रथः | संयातुम् | अर्हति
ततो भीष्मो महाराज कौरवाणां पितामहः अर्जुनं सप्तसप्तत्या नाराचानां समावृणोत्
Then, O king, The son of Sharadvata, who was stationed in front of Bhishma, pierced Arjuna with a number of twenty five arrows.
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ततो | भीष्मो | महत् + राज | कौरवाणां | पितामहः
अर्जुनं | सप्तसप्तत्या | नाराचानां | समावृणोत्
द्रोणश्च पञ्चविंशत्या कृपः पञ्चाशता शरैः दुर्योधनश्चतुःषष्ट्या शल्यश्च नवभिः शरैः
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द्रोण + च | पञ्चविंशत्या | कृपः | पञ्चाशता | शरैः
दुर्योधन + चतुःषष्टि | शल्य + च | नवभिः | शरैः
सैन्धवो नवभिश्चापि शकुनिश्चापि पञ्चभिः विकर्णो दशभिर्भल्लै राजन्विव्याध पाण्डवम्
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सैन्धवो | नवन् + च + अपि | शकुनि + च + अपि | पञ्चभिः
विकर्णो | दशभिर् | भल्लै | राजन् | विव्याध | पाण्डवम्
तैर्विद्धो महेष्वासः समन्तान्निशितैः शरैः विव्यथे महाबाहुर्भिद्यमान इवाचलः
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स | तैर् | विद्धो | महत् + इष्वास | समन्तात् + निशा | शरैः
न | विव्यथे | महत् + बाहु | भिद्यमान | इव + अचल
भीष्मं पञ्चविंशत्या कृपं नवभिः शरैः द्रोणं षष्ट्या नरव्याघ्रो विकर्णं त्रिभिः शरैः
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द्रोण + च | पञ्चविंशत्या | कृपः | पञ्चाशता | शरैः
द्रोणं | षष्ट्या | नर + व्याघ्र | विकर्णं | च | त्रिभिः | शरैः
आर्तायनिं त्रिभिर्बाणै राजानं चापि पञ्चभिः प्रत्यविध्यदमेयात्मा किरीटी भरतर्षभ
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आर्तायनिं | त्रिभिर् | बाणै | राजानं | च + अपि | पञ्चभिः
प्रत्यविध्यद् | अमेय + आत्मन् | किरीटी | भरत + ऋषभ
तं सात्यकिर्विराटश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः द्रौपदेयाभिमन्युश्च परिवव्रुर्धनंजयम्
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नकुलः | सहदेव + च | धृष्टद्युम्न + च | पार्षतः
द्रौपदेय + अभिमन्यु + च | परिवव्रुर् | धनंजयम्
ततो द्रोणं महेष्वासं गाङ्गेयस्य प्रिये रतम् अभ्यवर्षत पाञ्चाल्यः संयुक्तः सह सोमकैः
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ततो | द्रोणं | महत् + इष्वास | गाङ्गेयस्य | प्रिये | रतम्
अभ्यवर्षत | पाञ्चाल्यः | संयुक्तः | सह | सोमकैः
भीष्मस्तु रथिनां श्रेष्ठस्तूर्णं विव्याध पाण्डवम् अशीत्या निशितैर्बाणैस्ततोऽक्रोशन्त तावकाः
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भीष्म + तु | रथिनां | श्रेष्ठ + तूर्णम् | विव्याध | पाण्डवम्
अशीत्या | निशितैर् | बाणैस् | ततो | ऽक्रोशन्त | तावकाः
तेषां तु निनदं श्रुत्वा प्रहृष्टानां प्रहृष्टवत् प्रविवेश ततो मध्यं रथसिंहः प्रतापवान्
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तेषां | तु | निनदं | श्रुत्वा | प्रहृष्टानां | प्रहृष् + वत्
प्रविवेश | ततो | मध्यं | रथ + सिंह | प्रतापवान्
तेषां तु रथसिंहानां मध्यं प्राप्य धनंजयः चिक्रीड धनुषा राजँल्लक्ष्यं कृत्वा महारथान्
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तेषां | तु | रथ + सिंह | मध्यं | प्राप्य | धनंजयः
चिक्रीड | धनुषा | राजंल् | लक्ष्यं | कृत्वा | महत् + रथ
ततो दुर्योधनो राजा भीष्ममाह जनेश्वरः पीड्यमानं स्वकं सैन्यं दृष्ट्वा पार्थेन संयुगे
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ततो | दुर्योधनो | राजा | सहितः | सर्व + सोदर
पीड्यमानं | स्वकं | सैन्यं | दृष्ट्वा | पार्थेन | संयुगे
एष पाण्डुसुतस्तात कृष्णेन सहितो बली यततां सर्वसैन्यानां मूलं नः परिकृन्तति त्वयि जीवति गाङ्गेये द्रोणे रथिनां वरे
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एष | पाण्डु + सुत + तात | कृष्णेन | सहितो | बली
यततां | सर्व + सैन्य | मूलं | नः | परिकृन्तति
त्वयि | जीवति | गाङ्गेये | द्रोणे | च | रथिनां | वरे
त्वत्कृते ह्येष कर्णोऽपि न्यस्तशस्त्रो महारथः युध्यति रणे पार्थं हितकामः सदा मम
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त्वद् + कृते | हि + एतद् | कर्णो | ऽपि | न्यस् + शस्त्र | महत् + रथ
न | युध्यति | रणे | पार्थं | हित + काम | सदा | मम
तथा कुरु गाङ्गेय यथा हन्येत फल्गुनः एवमुक्तस्ततो राजन्पिता देवव्रतस्तव धिक्क्षत्रधर्ममित्युक्त्वा ययौ पार्थरथं प्रति
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स | तथा | कुरु | गाङ्गेय | यथा | हन्येत | फल्गुनः
एवम् | वच् + ततस् | राजन् | पिता | देवव्रत + त्वद्
धिक् | क्षत्र + धर्म | इति + वच् | ययौ | पार्थ + रथ | प्रति
उभौ श्वेतहयौ राजन्संसक्तौ दृश्य पार्थिवाः सिंहनादान्भृशं चक्रुः शङ्खशब्दांश्च भारत
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उभौ | श्वेत + हय | राजन् | संसक्तौ | दृश्य | पार्थिवाः
सिंहनादान् | भृशं | चक्रुः | शङ्ख + शब्द + च | भारत
द्रौणिर्दुर्योधनश्चैव विकर्णश्च तवात्मजः परिवार्य रणे भीष्मं स्थिता युद्धाय मारिष
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द्रौणिर् | दुर्योधन + च + एव | विकर्ण + च | त्वद् + आत्मज
परिवार्य | रणे | भीष्मं | स्थिता | युद्धाय | मारिष
तथैव पाण्डवाः सर्वे परिवार्य धनंजयम् स्थिता युद्धाय महते ततो युद्धमवर्तत
So also, O king, the Pandavas, clad in mail, surrounding Dhananjaya, O foremost of the Bharatas, began to put forth all their energies in battle.
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तथा + एव | पाण्डवाः | सर्वे | भीमसेन + पुरोगम
स्थिता | युद्धाय | महते | ततो | युद्धम् | अवर्तत
गाङ्गेयस्तु रणे पार्थमानर्छन्नवभिः शरैः तमर्जुनः प्रत्यविध्यद्दशभिर्मर्मवेधिभिः
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गाङ्गेय + तु | रणे | पार्थम् | ऋछ् + नवन् | शरैः
तम् | अर्जुनः | प्रत्यविध्यद् | दशभिर् | मर्मन् + वेधिन्
ततः शरसहस्रेण सुप्रयुक्तेन पाण्डवः अर्जुनः समरश्लाघी भीष्मस्यावारयद्दिशः
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ततः | शत + सहस्र | सौभद्रं | प्रपितामहः
अर्जुनः | समर + श्लाघिन् | भीष्म + वारय् | दिशः
शरजालं ततस्तत्तु शरजालेन कौरव वारयामास पार्थस्य भीष्मः शांतनवस्तथा
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शर + जाल | ततस् + तद् | तु | शर + जाल | कौरव
वारयामास | पार्थस्य | भीष्मः | शांतनव + तथा
उभौ परमसंहृष्टावुभौ युद्धाभिनन्दिनौ निर्विशेषमयुध्येतां कृतप्रतिकृतैषिणौ
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उभौ | परम + संहृष् + उभ् | युद्ध + अभिनन्दिन्
त्रासयेतां | शरैर् | घोरैः | कृ + प्रतिकृ + एषिन्
भीष्मचापविमुक्तानि शरजालानि संघशः शीर्यमाणान्यदृश्यन्त भिन्नान्यर्जुनसायकैः
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भीष्म + चाप + विमुच् | शर + जाल | संघशः
शृ + दृश् | भिद् + अर्जुन + सायक
तथैवार्जुनमुक्तानि शरजालानि भागशः गाङ्गेयशरनुन्नानि न्यपतन्त महीतले
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भीष्म + चाप + विमुच् | शर + जाल | संघशः
गाङ्गेय + शर + नुद् | न्यपतन्त | मही + तल
अर्जुनः पञ्चविंशत्या भीष्ममार्च्छच्छितैः शरैः भीष्मोऽपि समरे पार्थं विव्याध त्रिंशता शरैः
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अर्जुनः | पञ्चविंशत्या | भीष्मम् | ऋछ् + शा | शरैः
भीष्मो | ऽपि | समरे | पार्थं | विव्याध | त्रिंशता | शरैः
अन्योन्यस्य हयान्विद्ध्वा ध्वजौ सुमहाबलौ रथेषां रथचक्रे चिक्रीडतुररिंदमौ
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अन्योन्यस्य | हयान् | विद्ध्वा | ध्वजौ | च | सु + महत् + बल
रथ + ईषा | रथ + चक्र | च | चिक्रीडतुर् | अरिंदमौ
ततः क्रुद्धो महाराज भीष्मः प्रहरतां वरः वासुदेवं त्रिभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे
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ततः | क्रुद्धो | महत् + राज | भीष्मः | प्रहरतां | वरः
वासुदेवं | त्रिभिर् | बाणैर् | आजघान | स्तनान्तरे
भीष्मचापच्युतैर्बाणैर्निर्विद्धो मधुसूदनः विरराज रणे राजन्सपुष्प इव किंशुकः
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भीष्म + चाप + च्यु | बाणैर् | निर्विद्धो | मधुसूदनः
अशोभन्त | महत् + राज | पुष्पिता | इव | किंशुकाः
ततोऽर्जुनो भृशं क्रुद्धो निर्विद्धं प्रेक्ष्य माधवम् गाङ्गेयसारथिं संख्ये निर्बिभेद त्रिभिः शरैः
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ततो | ऽर्जुनो | भृशं | क्रुद्धो | निर्विद्धं | प्रेक्ष्य | माधवम्
गाङ्गेय + सारथि | संख्ये | निर्बिभेद | त्रिभिः | शरैः
यतमानौ तु तौ वीरावन्योन्यस्य वधं प्रति नाशक्नुतां तदान्योन्यमभिसंधातुमाहवे
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यतमानौ | तु | तौ | वीर + अन्योन्य | वधं | प्रति
न + शक् | तदा + अन्योन्य | अभिसंधातुम् | आहवे
मण्डलानि विचित्राणि गतप्रत्यागतानि अदर्शयेतां बहुधा सूतसामर्थ्यलाघवात्
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मण्डलानि | विचित्राणि | गम् + प्रत्यागम् | च
अदर्शयेतां | बहुधा | सूत + सामर्थ्य + लाघव
अन्तरं प्रहारेषु तर्कयन्तौ महारथौ राजन्नन्तरमार्गस्थौ स्थितावास्तां मुहुर्मुहुः
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अन्तरं | च | प्रहारेषु | तर्कयन्तौ | महत् + रथ
राजन्न् | अन्तर + मार्ग + स्थ | स्था + अस् | मुहुर् | मुहुः
उभौ सिंहरवोन्मिश्रं शङ्खशब्दं प्रचक्रतुः तथैव चापनिर्घोषं चक्रतुस्तौ महारथौ
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उभौ | सिंह + रव + उन्मिश्र | शङ्ख + शब्द | प्रचक्रतुः
तथा + एव | चाप + निर्घोष | कृ + तद् | महत् + रथ
तयोः शङ्खप्रणादेन रथनेमिस्वनेन दारिता सहसा भूमिश्चकम्प ननाद
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तयोः | शङ्ख + प्रणाद | रथ + नेमि + स्वन | च
दारिता | सहसा | भूमिश् | चकम्प | च | ननाद | च
तयोरन्तरं कश्चिद्ददृशे भरतर्षभ बलिनौ समरे शूरावन्योन्यसदृशावुभौ
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न | तयोर् | अन्तरं | कश्चिद् | ददृशे | भरत + ऋषभ
बलिनौ | समरे | शूर + अन्योन्य + सदृश + उभ्
चिह्नमात्रेण भीष्मं तु प्रजज्ञुस्तत्र कौरवाः तथा पाण्डुसुताः पार्थं चिह्नमात्रेण जज्ञिरे
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चिह्न + मात्र | भीष्मं | तु | प्रज्ञा + तत्र | कौरवाः
तथा | पाण्डु + सुत | पार्थं | चिह्न + मात्र | जज्ञिरे
तयोर्नृवरयो राजन्दृश्य तादृक्पराक्रमम् विस्मयं सर्वभूतानि जग्मुर्भारत संयुगे
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तयोर् | नृ + वर | राजन् | दृश्य | तादृश् + पराक्रम
विस्मयः | सर्व + भूत | समपद्यत | भारत
तयोर्विवरं कश्चिद्रणे पश्यति भारत धर्मे स्थितस्य हि यथा कश्चिद्वृजिनं क्वचित्
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न | तयोर् | अन्तरं | कश्चिद् | ददृशे | भरत + ऋषभ
धर्मे | स्थितस्य | हि | यथा | न | कश्चिद् | वृजिनं | क्वचित्
उभौ हि शरजालेन तावदृश्यौ बभूवतुः प्रकाशौ पुनस्तूर्णं बभूवतुरुभौ रणे
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उभौ | हि | शर + जाल | तद् + अदृश्य | बभूवतुः
प्रकाशौ | च | पुनर् + तूर्णम् | बभूवतुर् | उभौ | रणे
तत्र देवाः सगन्धर्वाश्चारणाश्च सहर्षिभिः अन्योन्यं प्रत्यभाषन्त तयोर्दृष्ट्वा पराक्रमम्
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तत्र | देव + ऋषि | सिद्ध + चारण + च | समागताः
अन्योन्यं | प्रत्यभाषन्त | तयोर् | दृष्ट्वा | पराक्रमम्
शक्यौ युधि संरब्धौ जेतुमेतौ महारथौ सदेवासुरगन्धर्वैर्लोकैरपि कथंचन
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न | शक्यौ | युधि | संरब्धौ | जेतुम् | एतौ | महत् + रथ
स + देव + असुर + गन्धर्व | लोकैर् | अपि | कथंचन
आश्चर्यभूतं लोकेषु युद्धमेतन्महाद्भुतम् नैतादृशानि युद्धानि भविष्यन्ति कथंचन
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आश्चर्य + भू | लोकेषु | युद्धम् | एतद् + महत् + अद्भुत
न + एतादृश | युद्धानि | भविष्यन्ति | कथंचन
नापि शक्यो रणे जेतुं भीष्मः पार्थेन धीमता सधनुश्च रथस्थश्च प्रवपन्सायकान्रणे
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न + अपि | शक्यो | रणे | जेतुं | भीष्मः | पार्थेन | धीमता
स + धनुस् + च | रथ + स्थ + च | प्रवपन् | सायकान् | रणे
तथैव पाण्डवं युद्धे देवैरपि दुरासदम् विजेतुं रणे भीष्म उत्सहेत धनुर्धरम्
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तथा + एव | पाण्डवं | युद्धे | देवैर् | अपि | दुरासदम्
न | विजेतुं | रणे | भीष्म | उत्सहेत | धनुर्धरम्
इति स्म वाचः श्रूयन्ते प्रोच्चरन्त्यस्ततस्ततः गाङ्गेयार्जुनयोः संख्ये स्तवयुक्ता विशां पते
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इति | स्म | वाचः | श्रूयन्ते | प्रोच्चर् + ततस्
गाङ्गेय + अर्जुन | संख्ये | स्तव + युज् | विशां | पते
त्वदीयास्तु ततो योधाः पाण्डवेयाश्च भारत अन्योन्यं समरे जघ्नुस्तयोस्तत्र पराक्रमे
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त्वदीय + तु | ततो | योधाः | पाण्डवेय + च | भारत
अन्योन्यं | समरे | हन् + तद् + तत्र | पराक्रमे
शितधारैस्तथा खड्गैर्विमलैश्च परश्वधैः शरैरन्यैश्च बहुभिः शस्त्रैर्नानाविधैर्युधि उभयोः सेनयोर्वीरा न्यकृन्तन्त परस्परम्
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शा + धारा + तथा | खड्गैर् | विमल + च | परश्वधैः
शरैर् | अन्य + च | बहुभिः | शस्त्रैर् | नानाविधैर् | युधि
उभयोः | सेनयोर् | वीरा | न्यकृन्तन्त | परस्परम्
वर्तमाने तथा घोरे तस्मिन्युद्धे सुदारुणे द्रोणपाञ्चाल्ययो राजन्महानासीत्समागमः
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वर्तमाने | भये | तद् + निर्मर्याद | महत् + आहव
द्रोण + पाञ्चाल्य | राजन् + महत् | आसीत् | समागमः