Vidya Kendra
Mahābhārata
Home Introduction Reader Glossary All Resources
Vidyakendra
Vidyakendra Home

Navigate to Verse

Currently viewing: Parva 6 - Chapter 6.117 (34 verses)
Powered by Aksharamukha

Search Mahābhārata

Try searching for: dharma, युद्ध, Arjuna, 1.1.5 (verse reference)
Quick Navigation: Start Browse Parvas
❖ ❖ ❖

Chapter 6.117

ततस्ते पार्थिवाः सर्वे जग्मुः स्वानालयान्पुनः तूष्णींभूते महाराज भीष्मे शंतनुनन्दने
View Padaccheda
ततस् | ते | पार्थिवाः | सर्वे | जग्मुः | स्वान् | आलयान् | पुनः
तूष्णीम् + भू | महत् + राज | भीष्मे | शंतनु + नन्दन
श्रुत्वा तु निहतं भीष्मं राधेयः पुरुषर्षभः ईषदागतसंत्रासः त्वरयोपजगाम
View Padaccheda
श्रुत्वा | विनिहतं | भीष्मं | शतधा | यत् + न | दीर्यते
ईषद् | आगम् + संत्रास | त्वरा + उपगम् | ह
ददर्श महात्मानं शरतल्पगतं तदा जन्मशय्यागतं देवं कार्त्तिकेयमिव प्रभुम्
View Padaccheda
स | ददर्श | महात्मानं | शर + तल्प + गम् | तदा
जन्मन् + शय्या + गम् | देवं | कार्त्तिकेयम् | इव | प्रभुम्
निमीलिताक्षं तं वीरं साश्रुकण्ठस्तदा वृषः अभ्येत्य पादयोस्तस्य निपपात महाद्युतिः
View Padaccheda
निमीलय् + अक्ष | तं | वीरं | स + अश्रु + कण्ठ | तदा | वृषः
अभ्येत्य | पादयोस् | तस्य | निपपात | महत् + द्युति
राधेयोऽहं कुरुश्रेष्ठ नित्यं चाक्षिगतस्तव द्वेष्योऽत्यन्तमनागाः सन्निति चैनमुवाच
View Padaccheda
राधेयो | ऽहं | कुरु + श्रेष्ठ | नित्यं | च + अक्षिगत | तव
द्वेष्यो | ऽत्यन्तम् | अनागाः | सन्न् | इति | च + एनद् | उवाच | ह
तच्छ्रुत्वा कुरुवृद्धः बलात्संवृत्तलोचनः शनैरुद्वीक्ष्य सस्नेहमिदं वचनमब्रवीत्
View Padaccheda
तद् + श्रु | कुरुवृद्धः | स | बलात् | संवृत् + लोचन
शनैर् | उद्वीक्ष्य | स + स्नेह | इदं | वचनम् | अब्रवीत्
रहितं धिष्ण्यमालोक्य समुत्सार्य रक्षिणः पितेव पुत्रं गाङ्गेयः परिष्वज्यैकबाहुना
View Padaccheda
रहितं | धिष्ण्यम् | आलोक्य | समुत्सार्य | च | रक्षिणः
पितृ + इव | पुत्रं | गाङ्गेयः | परिष्वज् + एक + बाहु
एह्येहि मे विप्रतीप स्पर्धसे त्वं मया सह यदि मां नाभिगच्छेथा ते श्रेयो भवेद्ध्रुवम्
View Padaccheda
एह्य् | एहि | मे | विप्रतीप | स्पर्धसे | त्वं | मया | सह
यदि | मां | न + अभिगम् | न | ते | श्रेयो | भवेद् | ध्रुवम्
कौन्तेयस्त्वं राधेयो विदितो नारदान्मम कृष्णद्वैपायनाच्चैव केशवाच्च संशयः
View Padaccheda
कौन्तेयस् | त्वं | न | राधेयो | विदितो | नारदान् | मम
कृष्णद्वैपायनाच् | च + एव | केशवाच् | च | न | संशयः
द्वेषोऽस्ति मे तात त्वयि सत्यं ब्रवीमि ते तेजोवधनिमित्तं तु परुषाण्यहमुक्तवान्
View Padaccheda
न | च | द्वेषो | ऽस्ति | मे | तात | त्वयि | सत्यं | ब्रवीमि | ते
तेजस् + वध + निमित्त | तु | परुषाण्य् | अहम् | उक्तवान्
अकस्मात्पाण्डवान्हि त्वं द्विषसीति मतिर्मम येनासि बहुशो रूक्षं चोदितः सूर्यनन्दन
View Padaccheda
अकस्मात् | पाण्डवान् | हि | त्वं | द्विष् + इति | मतिर् | मम
येन + अस् | बहुशो | रूक्षं | चोदितः | सूर्यनन्दन
जानामि समरे वीर्यं शत्रुभिर्दुःसहं तव ब्रह्मण्यतां शौर्यं दाने परमां गतिम्
View Padaccheda
जानामि | समरे | वीर्यं | शत्रुभिर् | दुःसहं | तव
ब्रह्मण्य + ता | च | शौर्यं | च | दाने | च | परमां | गतिम्
त्वया सदृशः कश्चित्पुरुषेष्वमरोपम कुलभेदं मत्वाहं सदा परुषमुक्तवान्
View Padaccheda
न | त्वया | सदृशः | कश्चित् | पुरुषेष्व् | अमर + उपम
कुल + भेद | च | मन् + मद् | सदा | परुषम् | उक्तवान्
इष्वस्त्रे भारसंधाने लाघवेऽस्त्रबले तथा सदृशः फल्गुनेनासि कृष्णेन महात्मना
View Padaccheda
इष्वस्त्रे | भार + संधान | लाघवे | अस्त्र + बल | तथा
सदृशः | फल्गुन + अस् | कृष्णेन | च | महात्मना
कर्ण राजपुरं गत्वा त्वयैकेन धनुष्मता तस्यार्थे कुरुराजस्य राजानो मृदिता युधि
View Padaccheda
कर्ण | राजन् + पुर | गत्वा | त्वद् + एक | धनुष्मता
तद् + अर्थ | कुरु + राज | राजानो | मृदिता | युधि
तथा बलवान्राजा जरासंधो दुरासदः समरे समरश्लाघी त्वया सदृशोऽभवत्
View Padaccheda
तथा | च | बलवान् | राजा | जरासंधो | दुरासदः
समरे | समर + श्लाघिन् | त्वया | न | सदृशो | ऽभवत्
ब्रह्मण्यः सत्यवादी तेजसार्क इवापरः देवगर्भोऽजितः संख्ये मनुष्यैरधिको भुवि
View Padaccheda
ब्रह्मण्यः | सत्य + वादिन् | च | तेजस् + अर्क | इव + अपर
देव + गर्भ | ऽजितः | संख्ये | मनुष्यैर् | अधिको | भुवि
व्यपनीतोऽद्य मन्युर्मे यस्त्वां प्रति पुरा कृतः दैवं पुरुषकारेण शक्यमतिवर्तितुम्
View Padaccheda
व्यपनीतो | ऽद्य | मन्युर् | मे | यस् | त्वां | प्रति | पुरा | कृतः
दैवं | पुरुषकारेण | न | शक्यम् | अतिवर्तितुम्
सोदर्याः पाण्डवा वीरा भ्रातरस्तेऽरिसूदन संगच्छ तैर्महाबाहो मम चेदिच्छसि प्रियम्
View Padaccheda
सोदर्याः | पाण्डवा | वीरा | भ्रातरस् | ते | अरि + सूदन
संगच्छ | तैर् | महत् + बाहु | मम | चेद् | इच्छसि | प्रियम्
मया भवतु निर्वृत्तं वैरमादित्यनन्दन पृथिव्यां सर्वराजानो भवन्त्वद्य निरामयाः
View Padaccheda
मया | भवतु | निर्वृत्तं | वैरम् | आदित्य + नन्दन
पृथिव्यां | सर्व + राजन् | भवन्त्व् | अद्य | निरामयाः
जानाम्यहं महाप्राज्ञ सर्वमेतन्न संशयः यथा वदसि दुर्धर्ष कौन्तेयोऽहं सूतजः
View Padaccheda
जानाम्य् | अहं | महत् + प्राज्ञ | सर्वम् | एतन् | न | संशयः
यथा | वदसि | दुर्धर्ष | कौन्तेयो | ऽहं | न | सूतजः
अवकीर्णस्त्वहं कुन्त्या सूतेन विवर्धितः भुक्त्वा दुर्योधनैश्वर्यं मिथ्या कर्तुमुत्सहे
View Padaccheda
अवकीर्णस् | त्व् | अहं | कुन्त्या | सूतेन | च | विवर्धितः
भुक्त्वा | दुर्योधन + ऐश्वर्य | न | मिथ्या | कर्तुम् | उत्सहे
वसु चैव शरीरं यदुदारं तथा यशः सर्वं दुर्योधनस्यार्थे त्यक्तं मे भूरिदक्षिण कोपिताः पाण्डवा नित्यं मयाश्रित्य सुयोधनम्
View Padaccheda
वसु | च + एव | शरीरं | च | यद् | उदारं | तथा | यशः
सर्वं | दुर्योधन + अर्थ | त्यक्तं | मे | भूरि + दक्षिणा
कोपिताः | पाण्डवा | नित्यं | मद् + आश्रि | सुयोधनम्
अवश्यभावी वै योऽर्थो शक्यो निवर्तितुम् दैवं पुरुषकारेण को निवर्तितुमुत्सहेत्
View Padaccheda
अवश्य + भाविन् | वै | यो | ऽर्थो | न | स | शक्यो | निवर्तितुम्
दैवं | पुरुषकारेण | न | शक्यम् | अतिवर्तितुम्
पृथिवीक्षयशंसीनि निमित्तानि पितामह भवद्भिरुपलब्धानि कथितानि संसदि
View Padaccheda
पृथिवी + क्षय + शंसिन् | निमित्तानि | पितामह
भवद्भिर् | उपलब्धानि | कथितानि | च | संसदि
पाण्डवा वासुदेवश्च विदिता मम सर्वशः अजेयाः पुरुषैरन्यैरिति तांश्चोत्सहामहे
View Padaccheda
पाण्डवा | वासुदेवश् | च | विदिता | मम | सर्वशः
अजेयाः | पुरुषैर् | अन्यैर् | इति | तांश् | च + उत्सह्
अनुजानीष्व मां तात युद्धे प्रीतमनाः सदा अनुज्ञातस्त्वया वीर युध्येयमिति मे मतिः
View Padaccheda
अनुजानीष्व | मां | तात | युद्धे | प्री + मनस् | सदा
अनुज्ञातस् | त्वया | वीर | युध्येयम् | इति | मे | मतिः
दुरुक्तं विप्रतीपं वा संरम्भाच्चापलात्तथा यन्मयापकृतं किंचित्तदनुक्षन्तुमर्हसि
View Padaccheda
दुरुक्तं | विप्रतीपं | वा | संरम्भाच् | चापलात् | तथा
यन् | मद् + अपकृ | किंचित् | तद् | अनुक्षन्तुम् | अर्हसि
चेच्छक्यमथोत्स्रष्टुं वैरमेतत्सुदारुणम् अनुजानामि कर्ण त्वां युध्यस्व स्वर्गकाम्यया
View Padaccheda
न | चेद् + शक्य | अथ + उत्सृज् | वैरम् | एतत् | सु + दारुण
अनुजानामि | कर्ण | त्वां | युध्यस्व | स्वर्ग + काम्या
विमन्युर्गतसंरम्भः कुरु कर्म नृपस्य हि यथाशक्ति यथोत्साहं सतां वृत्तेषु वृत्तवान्
View Padaccheda
विमन्युर् | गम् + संरम्भ | कुरु | कर्म | नृपस्य | हि
यथाशक्ति | यथोत्साहं | सतां | वृत्तेषु | वृत्तवान्
अहं त्वामनुजानामि यदिच्छसि तदाप्नुहि क्षत्रधर्मजिताँल्लोकान्संप्राप्स्यसि संशयः
View Padaccheda
अहं | त्वाम् | अनुजानामि | यद् | इच्छसि | तद् | आप्नुहि
क्षत्र + धर्म + जि | लोकान् | सम्प्राप्स्यसि | न | संशयः
युध्यस्व निरहंकारो बलवीर्यव्यपाश्रयः धर्मो हि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य विद्यते
View Padaccheda
युध्यस्व | निरहंकारो | बल + वीर्य + व्यपाश्रय
धर्मो | हि | युद्धाच् | छ्रेयो | ऽन्यत् | क्षत्रियस्य | न | विद्यते
प्रशमे हि कृतो यत्नः सुचिरात्सुचिरं मया चैव शकितः कर्तुं यतो धर्मस्ततो जयः
View Padaccheda
प्रशमे | हि | कृतो | यत्नः | सु + चिरात् | सु + चिरम् | मया
न | च + एव | शकितः | कर्तुं | यतो | धर्मस् | ततो | जयः
एवं ब्रुवन्तं गाङ्गेयमभिवाद्य प्रसाद्य राधेयो रथमारुह्य प्रायात्तव सुतं प्रति
View Padaccheda
एवं | ब्रुवन्तं | गाङ्गेयम् | अभिवाद्य | प्रसाद्य | च
राधेयो | रथम् | आरुह्य | प्रायात् | तव | सुतं | प्रति