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Currently viewing: Parva 6 - Chapter 6.112 (138 verses)
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Chapter 6.112

अभिमन्युर्महाराज तव पुत्रमयोधयत् महत्या सेनया युक्तो भीष्महेतोः पराक्रमी
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अभिमन्युं | महत् + राज | यान्तं | भीष्म + रथ | प्रति
दुर्मुखः | समरे | प्रायाद् | भीष्म + हेतु | पराक्रमी
दुर्योधनो रणे कार्ष्णिं नवभिर्नतपर्वभिः आजघान रणे क्रुद्धः पुनश्चैनं त्रिभिः शरैः
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दुर्योधनो | रणे | कार्ष्णिं | नवभिर् | नम् + पर्वन्
आहन् + उरस् | क्रुद्धो | नवत्या | निशितैः | शरैः
तस्य शक्तिं रणे कार्ष्णिर्मृत्योर्घोरामिव स्वसाम् प्रेषयामास संक्रुद्धो दुर्योधनरथं प्रति
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तस्य | शक्तिं | रणे | कार्ष्णिर् | मृत्योर् | घोराम् | इव | स्वसाम्
प्रेषयामास | संक्रुद्धो | दुर्योधन + रथ | प्रति
तामापतन्तीं सहसा घोररूपां विशां पते द्विधा चिच्छेद ते पुत्रः क्षुरप्रेण महारथः
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ताम् | आपतन्तीं | सहसा | घोर + रूप | विशां | पते
द्विधा | चिछेद | ते | पुत्रः | क्षुरप्रेण | महत् + रथ
तां शक्तिं पतितां दृष्ट्वा कार्ष्णिः परमकोपनः दुर्योधनं त्रिभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत्
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तां | शक्तिं | पतितां | दृष्ट्वा | कार्ष्णिः | परम + कोपन
अर्जुनं | पञ्चविंशत्या | बाह्वोर् | उरसि | च + अर्पय्
पुनश्चैनं शरैर्घोरैराजघान स्तनान्तरे दशभिर्भरतश्रेष्ठ दुर्योधनममर्षणम्
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पुनः | पञ्चाशता | तूर्णम् | आजघान | स्तनान्तरे
दशभिर् | भरत + श्रेष्ठ | दुर्योधनम् | अमर्षणम्
तद्युद्धमभवद्घोरं चित्ररूपं भारत ईक्षितृप्रीतिजननं सर्वपार्थिवपूजितम्
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तद् | युद्धम् | अभवद् | घोरं | चित्र + रूप | च | भारत
ईक्षितृ + प्रीति + जनन | सर्व + पार्थिव + पूजय्
भीष्मस्य निधनार्थाय पार्थस्य विजयाय युयुधाते रणे वीरौ सौभद्रकुरुपुंगवौ
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भीष्मस्य | निधन + अर्थ | पार्थस्य | विजयाय | च
युयुधाते | रणे | वीरौ | सौभद्र + कुरु + पुंगव
सात्यकिं रभसं युद्धे द्रौणिर्ब्राह्मणपुंगवः आजघानोरसि क्रुद्धो नाराचेन परंतपः
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सात्यकिं | रभसं | युद्धे | द्रौणिर् | ब्राह्मण + पुंगव
आहन् + उरस् | क्रुद्धः | प्रहसञ् | शत्रु + कर्शन
शैनेयोऽपि गुरोः पुत्रं सर्वमर्मसु भारत अताडयदमेयात्मा नवभिः कङ्कपत्रिभिः
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शैनेयो | ऽपि | गुरोः | पुत्रं | सर्व + मर्मन् | भारत
स | बिभेद | शतघ्नीं | च | नवभिः | कङ्क + पत्त्रिन्
अश्वत्थामा तु समरे सात्यकिं नवभिः शरैः त्रिंशता पुनस्तूर्णं बाह्वोरुरसि चार्पयत्
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छित्त्वा | तु | शक्तिं | गाङ्गेयः | सात्यकिं | नवभिः | शरैः
अर्जुनं | पञ्चविंशत्या | बाह्वोर् | उरसि | च + अर्पय्
सोऽतिविद्धो महेष्वासो द्रोणपुत्रेण सात्वतः द्रोणपुत्रं त्रिभिर्बाणैराजघान महायशाः
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सो | ऽतिविद्धो | महत् + इष्वास | पुत्रेण | तव | धन्विना
द्रोणपुत्रं | त्रिभिर् | बाणैर् | आजघान | महत् + यशस्
पौरवो धृष्टकेतुं शरैरासाद्य संयुगे बहुधा दारयां चक्रे महेष्वासं महारथम्
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पौरवो | धृष्टकेतुं | च | शरैर् | आसाद्य | संयुगे
बहुधा | दारयांचक्रे | महत् + इष्वास | महत् + रथ
तथैव पौरवं युद्धे धृष्टकेतुर्महारथः त्रिंशता निशितैर्बाणैर्विव्याध सुमहाबलः
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तथा + एव | पौरवं | युद्धे | धृष्टकेतुर् | महत् + रथ
त्रिंशता | निशितैर् | बाणैर् | विव्याध | सु + महत् + बल
पौरवस्तु धनुश्छित्त्वा धृष्टकेतोर्महारथः ननाद बलवन्नादं विव्याध दशभिः शरैः
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तथा + एव | पौरवं | युद्धे | धृष्टकेतुर् | महत् + रथ
अथ + एनद् | छिद् + धन्वन् | विव्याध | नवभिः | शरैः
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय पौरवं निशितैः शरैः आजघान महाराज त्रिसप्तत्या शिलीमुखैः
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सो | ऽन्यत् | कार्मुकम् | आदाय | पौरवं | निशितैः | शरैः
आजघान | महत् + राज | त्रिसप्तत्या | शिलीमुखैः
तौ तु तत्र महेष्वासौ महामात्रौ महारथौ महता शरवर्षेण परस्परमवर्षताम्
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तौ | तु | तत्र | महत् + इष्वास | महामात्रौ | महत् + रथ
महता | शर + वर्ष | परस्परम् | अवर्षताम्
अन्योन्यस्य धनुश्छित्त्वा हयान्हत्वा भारत विरथावसियुद्धाय संगतौ तौ महारथौ
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अन्योन्यस्य | धनुस् + छिद् | हयान् | हत्वा | च | भारत
विरथ + असि + युद्ध | संगतौ | तौ | महत् + रथ
आर्षभे चर्मणी चित्रे शतचन्द्रपरिष्कृते तारकाशतचित्रौ निस्त्रिंशौ सुमहाप्रभौ
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आर्षभे | चर्मणी | चित्रे | शत + चन्द्र + परिष्कृ
तारका + शत + चित्र | च | निस्त्रिंशौ | सु + महत् + प्रभा
प्रगृह्य विमलौ राजंस्तावन्योन्यमभिद्रुतौ वाशितासंगमे यत्तौ सिंहाविव महावने
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प्रगृह्य | विमलौ | राजन् + तद् + अन्योन्य | अभिद्रुतौ
वाशिता + संगम | यत्तौ | सिंह + इव | महत् + वन
मण्डलानि विचित्राणि गतप्रत्यागतानि चेरतुर्दर्शयन्तौ प्रार्थयन्तौ परस्परम्
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मण्डलानि | विचित्राणि | गम् + प्रत्यागम् | च
चेरतुर् | दर्शयन्तौ | च | प्रार्थयन्तौ | परस्परम्
पौरवो धृष्टकेतुं तु शङ्खदेशे महासिना ताडयामास संक्रुद्धस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत्
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पौरवो | धृष्टकेतुं | तु | शङ्ख + देश | महत् + असि
भीमं | विव्याध | सप्तत्या | तिष्ठ | स्था + इति | च + ब्रू
चेदिराजोऽपि समरे पौरवं पुरुषर्षभम् आजघान शिताग्रेण जत्रुदेशे महासिना
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चेदि + राज | ऽपि | समरे | पौरवं | पुरुष + ऋषभ
आजघान | शा + अग्र | जत्रु + देश | महत् + असि
तावन्योन्यं महाराज समासाद्य महाहवे अन्योन्यवेगाभिहतौ निपेततुररिंदमौ
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तद् + अन्योन्य | महत् + राज | समासाद्य | महत् + आहव
अन्योन्य + वेग + अभिहन् | निपेततुर् | अरिंदमौ
ततः स्वरथमारोप्य पौरवं तनयस्तव जयत्सेनो रथे राजन्नपोवाह रणाजिरात्
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ततः | स्व + रथ | आरोप्य | पौरवं | तनय + त्वद्
जयत्सेनो | रथे | राजन्न् | अपोवाह | रण + अजिर
धृष्टकेतुं समरे माद्रीपुत्रः परंतपः अपोवाह रणे राजन्सहदेवः प्रतापवान्
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धृष्टकेतुं | च | समरे | माद्री + पुत्र | परंतपः
अपोवाह | रणे | राजन् | सहदेवः | प्रतापवान्
चित्रसेनः सुशर्माणं विद्ध्वा नवभिराशुगैः पुनर्विव्याध तं षष्ट्या पुनश्च नवभिः शरैः
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अर्जुन + तु | सुशर्माणं | विद्ध्वा | बहुभिर् | आयसैः
शल्यं | विव्याध | सप्तत्या | पुनर् + च | दशभिः | शरैः
सुशर्मा तु रणे क्रुद्धस्तव पुत्रं विशां पते दशभिर्दशभिश्चैव विव्याध निशितैः शरैः
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सुशर्मा | तु | रणे | क्रुध् + त्वद् | पुत्रं | विशां | पते
युधिष्ठिरं | पुनः | षष्ट्या | विव्याध | निशितैः | शरैः
चित्रसेनश्च तं राजंस्त्रिंशता नतपर्वणाम् आजघान रणे क्रुद्धः तं प्रत्यविध्यत भीष्मस्य समरे राजन्यशो मानं वर्धयन्
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चित्रसेन + च | तं | राजन् + त्रिंशत् | नम् + पर्वन्
आजघान | रणे | क्रुद्धः | पुनर् + च + एनद् | त्रिभिः | शरैः
भीष्मस्य | समरे | राजन् | यशो | मानं | च | वर्धयन्
सौभद्रो राजपुत्रं तु बृहद्बलमयोधयत् आर्जुनिं कोसलेन्द्रस्तु विद्ध्वा पञ्चभिरायसैः पुनर्विव्याध विंशत्या शरैः संनतपर्वभिः
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प्रत्युज्जगाम | सौभद्रं | राजन् + पुत्र | बृहद्बलः
आर्जुनिं | कोसल + इन्द्र + तु | विद्ध्वा | पञ्चभिर् | आयसैः
निघ्नतः | समरे | शत्रूञ् | शरैः | संनम् + पर्वन्
बृहद्बलं सौभद्रो विद्ध्वा नवभिरायसैः नाकम्पयत संग्रामे विव्याध पुनः पुनः
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बृहद्बलं | च | सौभद्रो | विद्ध्वा | नवभिर् | आयसैः
न + कम्पय् | संग्रामे | विव्याध | च | पुनः | पुनः
कौसल्यस्य पुनश्चापि धनुश्चिच्छेद फाल्गुणिः आजघान शरैश्चैव त्रिंशता कङ्कपत्रिभिः
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कौसल्यस्य | पुनर् + च + अपि | धनुस् + छिद् | फाल्गुणिः
आजघान | शर + च + एव | त्रिंशता | कङ्क + पत्त्रिन्
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय राजपुत्रो बृहद्बलः फाल्गुनिं समरे क्रुद्धो विव्याध बहुभिः शरैः
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प्रत्युज्जगाम | सौभद्रं | राजन् + पुत्र | बृहद्बलः
भगदत्तं | रणे | क्रुद्धो | विव्याध | निशितैः | शरैः
तयोर्युद्धं समभवद्भीष्महेतोः परंतप संरब्धयोर्महाराज समरे चित्रयोधिनोः यथा देवासुरे युद्धे मयवासवयोरभूत्
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तत्र | तौ | नर + शार्दूल | भीष्म + हेतु | परंतपौ
संरब्धयोर् | महत् + राज | समरे | चित्र + योधिन्
यथा | देवासुरे | युद्धे | मय + वासव | अभूत्
भीमसेनो गजानीकं योधयन्बह्वशोभत यथा शक्रो वज्रपाणिर्दारयन्पर्वतोत्तमान्
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भीमसेनो | गज + अनीक | योधयन् | बहु + शुभ्
यथा | शक्रो | वज्रपाणिर् | दारयन् | पर्वत + उत्तम
ते वध्यमाना भीमेन मातङ्गा गिरिसंनिभाः निपेतुरुर्व्यां सहिता नादयन्तो वसुंधराम्
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ते | वध्यमाना | भीमेन | मातङ्गा | गिरि + संनिभ
निपेतुर् | उर्व्यां | सहिता | नादयन्तो | वसुंधराम्
गिरिमात्रा हि ते नागा भिन्नाञ्जनचयोपमाः विरेजुर्वसुधां प्राप्य विकीर्णा इव पर्वताः
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गिरि + मात्र | हि | ते | नागा | भिन्नाञ्जन + चय + उपम
विरेजुर् | वसुधां | प्राप्य | विकीर्णा | इव | पर्वताः
युधिष्ठिरो महेष्वासो मद्रराजानमाहवे महत्या सेनया गुप्तं पीडयामास संगतः
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युधिष्ठिरो | महत् + इष्वास | मद्र + राजन् | आहवे
महत्या | सेनया | गुप्तं | पीडयामास | संगतः
मद्रेश्वरश्च समरे धर्मपुत्रं महारथम् पीडयामास संरब्धो भीष्महेतोः पराक्रमी
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मद्र + राज | च | समरे | धर्मराजो | महत् + रथ
पीड्यमानं | बलं | पार्थैर् | दृष्ट्वा | भीष्मः | पराक्रमी
विराटं सैन्धवो राजा विद्ध्वा संनतपर्वभिः नवभिः सायकैस्तीक्ष्णैस्त्रिंशता पुनरर्दयत्
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विराटं | सैन्धवो | राजा | विद्ध्वा | संनम् + पर्वन्
नवभिः | सायक + तीक्ष्ण + त्रिंशत् | पुनर् | अर्दयत्
विराटश्च महाराज सैन्धवं वाहिनीमुखे त्रिंशता निशितैर्बाणैराजघान स्तनान्तरे
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विराट + च | महत् + राज | सैन्धवं | वाहिनी + मुख
पुनः | पञ्चाशता | तूर्णम् | आजघान | स्तनान्तरे
चित्रकार्मुकनिस्त्रिंशौ चित्रवर्मायुधध्वजौ रेजतुश्चित्ररूपौ तौ संग्रामे मत्स्यसैन्धवौ
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चित्र + कार्मुक + निस्त्रिंश | चित्र + वर्मन् + आयुध + ध्वज
राज् + चित्र + रूप | तौ | संग्रामे | मत्स्य + सैन्धव
द्रोणः पाञ्चालपुत्रेण समागम्य महारणे महासमुदयं चक्रे शरैः संनतपर्वभिः
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द्रोणः | पाञ्चाल + पुत्र | समागम्य | महत् + रण
निघ्नतः | समरे | शत्रूञ् | शरैः | संनम् + पर्वन्
ततो द्रोणो महाराज पार्षतस्य महद्धनुः छित्त्वा पञ्चाशतेषूणां पार्षतं समविध्यत
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ततो | द्रोणो | महत् + इष्वास | पुत्र + च + इदम् | महत् + रथ
छित्त्वा | पञ्चाशत् + इषु | पार्षतं | समविध्यत
सोऽन्यत्कार्मुकमादाय पार्षतः परवीरहा द्रोणस्य मिषतो युद्धे प्रेषयामास सायकान्
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सो | ऽन्यत् | कार्मुकम् | आदाय | समरे | भार + साधन
द्रोणस्य | मिषतो | युद्धे | प्रेषयामास | सायकान्
ताञ्शराञ्शरसंघैस्तु संनिवार्य महारथः द्रोणो द्रुपदपुत्राय प्राहिणोत्पञ्च सायकान्
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ततस् + तद् | शर + जाल | संनिवार्य | महत् + रथ
द्रोणो | द्रुपद + पुत्र | प्राहिणोत् | पञ्च | सायकान्
तस्य क्रुद्धो महाराज पार्षतः परवीरहा द्रोणाय चिक्षेप गदां यमदण्डोपमां रणे
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तस्य | क्रुद्धो | महत् + राज | पाण्डवः | शत्रु + कर्शन
द्रोणाय | चिक्षेप | गदां | यम + दण्ड + उपम | रणे
तामापतन्तीं सहसा हेमपट्टविभूषिताम् शरैः पञ्चाशता द्रोणो वारयामास संयुगे
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ताम् | आपतन्तीं | सहसा | तस्य | बाहोर् | बल + ईरय्
शरैः | पञ्चाशता | द्रोणो | वारयामास | संयुगे
सा छिन्ना बहुधा राजन्द्रोणचापच्युतैः शरैः चूर्णीकृता विशीर्यन्ती पपात वसुधातले
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सा | छिन्ना | बहुधा | राजन् | द्रोण + चाप + च्यु | शरैः
चूर्णीकृता | विशीर्यन्ती | पपात | वसुधा + तल
गदां विनिहतां दृष्ट्वा पार्षतः शत्रुसूदनः द्रोणाय शक्तिं चिक्षेप सर्वपारशवीं शुभाम्
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तां | शक्तिं | पतितां | दृष्ट्वा | कार्ष्णिः | परम + कोपन
द्रोणाय | शक्तिं | चिक्षेप | सर्व + पारशव | शुभाम्
तां द्रोणो नवभिर्बाणैश्चिच्छेद युधि भारत पार्षतं महेष्वासं पीडयामास संयुगे
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तां | द्रोणो | नवभिर् | बाणैश् | चिछेद | युधि | भारत
दुःशासनो | महत् + इष्वास | वारयामास | संयुगे
एवमेतन्महद्युद्धं द्रोणपार्षतयोरभूत् भीष्मं प्रति महाराज घोररूपं भयानकम्
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एवम् | एतद् + महत् | युद्धं | द्रोण + पार्षत | अभूत्
भीष्मं | प्रति | महत् + राज | घोर + रूप | भयानकम्
अर्जुनः प्राप्य गाङ्गेयं पीडयन्निशितैः शरैः अभ्यद्रवत संयत्तं वने मत्तमिव द्विपम्
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अर्जुनः | प्राप्य | गाङ्गेयं | पीडय् + निशा | शरैः
अभ्यद्रवत | संयत्तं | वने | मत्तम् | इव | द्विपम्
प्रत्युद्ययौ तं पार्थं भगदत्तः प्रतापवान् त्रिधा भिन्नेन नागेन मदान्धेन महाबलः
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प्रत्युद्ययौ | च | तं | पार्थं | भगदत्तः | प्रतापवान्
त्रिधा | भिन्नेन | नागेन | मद + अन्ध | महत् + बल
तमापतन्तं सहसा महेन्द्रगजसंनिभम् परं यत्नं समास्थाय बीभत्सुः प्रत्यपद्यत
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ताम् | आपतन्तीं | सहसा | हेमन् + पट्ट + विभूषय्
परं | यत्नं | समास्थाय | बीभत्सुः | प्रत्यपद्यत
ततो गजगतो राजा भगदत्तः प्रतापवान् अर्जुनं शरवर्षेण वारयामास संयुगे
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प्रत्युद्ययौ | च | तं | पार्थं | भगदत्तः | प्रतापवान्
आर्श्यशृङ्गिर् | महत् + इष्वास | वारयामास | संयुगे
अर्जुनस्तु रणे नागमायान्तं रजतोपमम् विमलैरायसैस्तीक्ष्णैरविध्यत महारणे
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अर्जुन + तु | रणे | शल्यं | यतमानं | महत् + रथ
अथ + एनद् | सायक + तीक्ष्ण | भृशं | विव्याध | मर्मणि
शिखण्डिनं कौन्तेयो याहि याहीत्यचोदयत् भीष्मं प्रति महाराज जह्येनमिति चाब्रवीत्
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शिखण्डिनं | च | कौन्तेयो | याहि | या + इति + चोदय्
भीष्मं | प्रति | महत् + राज | घोर + रूप | भयानकम्
प्राग्ज्योतिषस्ततो हित्वा पाण्डवं पाण्डुपूर्वज प्रययौ त्वरितो राजन्द्रुपदस्य रथं प्रति
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प्राग्ज्योतिष + ततस् | हित्वा | पाण्डवं | पाण्डु + पूर्वज
प्रययौ | त्वरितो | राजन् | द्रुपदस्य | रथं | प्रति
ततोऽर्जुनो महाराज भीष्ममभ्यद्रवद्द्रुतम् शिखण्डिनं पुरस्कृत्य ततो युद्धमवर्तत
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ततो | ऽर्जुनो | महत् + राज | भीष्मम् | अभ्यद्रवद् | द्रुतम्
शिखण्डिनं | पुरस्कृत्य | निर्याताः | पाण्डवा | युधि
ततस्ते तावकाः शूराः पाण्डवं रभसं रणे सर्वेऽभ्यधावन्क्रोशन्तस्तदद्भुतमिवाभवत्
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ततस् + तद् | तावकाः | शूराः | पाण्डवं | रभसं | रणे
सर्वे | ऽभ्यधावन् | क्रुश् + तद् | अद्भुतम् | इव + भू
नानाविधान्यनीकानि पुत्राणां ते जनाधिप अर्जुनो व्यधमत्काले दिवीवाभ्राणि मारुतः
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नानाविध + अनीक | पुत्राणां | ते | जनाधिप
अर्जुनो | व्यधमत् | काले | दिव् + इव + अभ्र | मारुतः
शिखण्डी तु समासाद्य भरतानां पितामहम् इषुभिस्तूर्णमव्यग्रो बहुभिः समाचिनोत्
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शिखण्डी | तु | समासाद्य | भारतानां | पितामहम्
इषु + तूर्णम् | अव्यग्रो | बहुभिः | स | समाचिनोत्
सोमकांश्च रणे भीष्मो जघ्ने पार्थपदानुगान् न्यवारयत सैन्यं पाण्डवानां महारथः
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सोमक + च | रणे | भीष्मो | जघ्ने | पार्थ + पदानुग
पृतनां | पाण्डवेयानां | पातयानो | महत् + रथ
रथाग्न्यगारश्चापार्चिरसिशक्तिगदेन्धनः शरसंघमहाज्वालः क्षत्रियान्समरेऽदहत्
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रथ + अग्नि + अगार + चाप + अर्चिस् | असि + शक्ति + गदा + इन्धन
शर + संघ + महत् + ज्वाला | क्षत्रियान् | समरे | ऽदहत्
यथा हि सुमहानग्निः कक्षे चरति सानिलः तथा जज्वाल भीष्मोऽपि दिव्यान्यस्त्राण्युदीरयन्
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यथा | हि | सु + महत् | अग्निः | कक्षे | चरति | स + अनिल
तथा | जज्वाल | भीष्मो | ऽपि | दिव्य + अस्त्र + उदीरय्
सुवर्णपुङ्खैरिषुभिः शितैः संनतपर्वभिः नादयन्स दिशो भीष्मः प्रदिशश्च महायशाः
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सुवर्ण + पुङ्ख | इषुभिः | शितैः | संनम् + पर्वन्
नादयन् | स | दिशो | भीष्मः | प्रदिश् + च | महत् + यशस्
पातयन्रथिनो राजन्गजांश्च सह सादिभिः मुण्डतालवनानीव चकार रथव्रजान्
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पातयन् | रथिनो | राजन् | गज + च | सह | सादिभिः
मुण्ड + ताल + वन + इव | चकार | स | रथ + व्रज
निर्मनुष्यान्रथान्राजन्गजानश्वांश्च संयुगे चकार तदा भीष्मः सर्वशस्त्रभृतां वरः
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निर्मनुष्यान् | रथान् | राजन् | गजान् | अश्व + च | संयुगे
अकरोत् | स | महत् + बाहु | सर्व + शस्त्रभृत् | वरः
तस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः निशम्य सर्वतो राजन्समकम्पन्त सैनिकाः
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तस्य | ज्या + तल + निर्घोष | विस्फूर्जितम् | इव + अशनि
निशम्य | सर्व + भूत | समकम्पन्त | भारत
अमोघा ह्यपतन्बाणाः पितुस्ते मनुजेश्वर नासज्जन्त शरीरेषु भीष्मचापच्युताः शराः
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अमोघा | हि + पत् | बाणाः | पितृ + त्वद् | भरत + ऋषभ
न + सञ्ज् | तनुत्रेषु | भीष्म + चाप + च्यु | शराः
निर्मनुष्यान्रथान्राजन्सुयुक्ताञ्जवनैर्हयैः वातायमानान्पश्याम ह्रियमाणान्विशां पते
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हन् + वीर | रथान् | राजन् | संयुक्ताञ् | जवनैर् | हयैः
वातायमानान् | पश्याम | ह्रियमाणान् | विशां | पते
चेदिकाशिकरूषाणां सहस्राणि चतुर्दश महारथाः समाख्याताः कुलपुत्रास्तनुत्यजः
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चेदि + काशि + करूष | सहस्राणि | चतुर्दश
महत् + रथ | समाख्याताः | कुल + पुत्र + तनुत्यज्
अपरावर्तिनः शूराः सुवर्णविकृतध्वजाः संग्रामे भीष्ममासाद्य सवाजिरथकुञ्जराः जग्मुस्ते परलोकाय व्यादितास्यमिवान्तकम्
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अपरावर्तिनः | सर्वे | सुवर्ण + विकृ + ध्वज
संग्रामे | भीष्मम् | आसाद्य | व्यादा + आस्य | इव + अन्तक
संग्रामे | भीष्मम् | आसाद्य | व्यादा + आस्य | इव + अन्तक
तत्रासीन्महाराज सोमकानां महारथः यः संप्राप्य रणे भीष्मं जीविते स्म मनो दधे
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अनेक + शत + साहस्र + तावक | महत् + रथ
यः | सम्प्राप्य | रणे | भीष्मं | जीविते | स्म | मनो | दधे
तांश्च सर्वान्रणे योधान्प्रेतराजपुरं प्रति नीतानमन्यन्त जना दृष्ट्वा भीष्मस्य विक्रमम्
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तद् + च | सर्वान् | रणे | योधान् | प्रेतराज + पुर | प्रति
अर्जुन + तु | रणे | राजन् | दृष्ट्वा | भीष्मस्य | विक्रमम्
कश्चिदेनं समरे प्रत्युद्याति महारथः ऋते पाण्डुसुतं वीरं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् शिखण्डिनं समरे पाञ्चाल्यममितौजसम्
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न | कश्चिद् | एनं | समरे | प्रत्युद्याति | महत् + रथ
एष | पाण्डु + सुत + तात | श्वेताश्वः | कृष्णसारथिः
शिखण्डिनं | च | समरे | पाञ्चाल्यम् | अमित + ओजस्
शिखण्डी तु रणे भीष्ममासाद्य भरतर्षभ दशभिर्दशभिर्बाणैराजघान महाहवे
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शिखण्डी | तु | समासाद्य | भारतानां | पितामहम्
दशभिर् | दशभिर् | बाणैर् | आजघान | महत् + आहव
शिखण्डिनं तु गाङ्गेयः क्रोधदीप्तेन चक्षुषा अवैक्षत कटाक्षेण निर्दहन्निव भारत
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शिखण्डिनं | तु | गाङ्गेयः | क्रोध + दीप् | चक्षुषा
अवैक्षत | कटाक्षेण | निर्दहन्न् | इव | भारत
स्त्रीत्वं तत्संस्मरन्राजन्सर्वलोकस्य पश्यतः जघान रणे भीष्मः तं नावबुद्धवान्
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स्त्री + त्व | तत् | संस्मरन् | राजन् | सर्व + लोक | पश्यतः
न | जघान | रणे | भीष्मः | स | च | तं | न + अवबुध्
अर्जुनस्तु महाराज शिखण्डिनमभाषत अभित्वरस्व त्वरितो जहि चैनं पितामहम्
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अर्जुन + तु | महत् + राज | शिखण्डिनम् | अभाषत
अभित्वरस्व | त्वरितो | जहि | च + एनद् | पितामहम्
किं ते विवक्षया वीर जहि भीष्मं महारथम् ह्यन्यमनुपश्यामि कंचिद्यौधिष्ठिरे बले
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किं | ते | विवक्षया | वीर | जहि | भीष्मं | महत् + रथ
न | हि + अन्य | अनुपश्यामि | कंचिद् | यौधिष्ठिरे | बले
यः शक्तः समरे भीष्मं योधयेत पितामहम् ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र सत्यमेतद्ब्रवीमि ते
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यः | शक्तः | समरे | भीष्मं | योधयेत | पितामहम्
ऋते | त्वां | पुरुष + व्याघ्र | देव + तुल्य + पराक्रम
एवमुक्तस्तु पार्थेन शिखण्डी भरतर्षभ शरैर्नानाविधैस्तूर्णं पितामहमुपाद्रवत्
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एवम् | वच् + तु | पार्थेन | शिखण्डी | भरत + ऋषभ
शरैर् | नानाविध + तूर्णम् | पितामहम् | उपाद्रवत्
अचिन्तयित्वा तान्बाणान्पिता देवव्रतस्तव अर्जुनं समरे क्रुद्धं वारयामास सायकैः
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चिन्तयित्वा | महत् + बाहु | पिता | देवव्रत + त्वद्
फाल्गुनिं | समरे | क्रुद्धो | विव्याध | बहुभिः | शरैः
तथैव चमूं सर्वां पाण्डवानां महारथः अप्रैषीत्समरे तीक्ष्णैः परलोकाय मारिष
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इति | सेनापतेः | श्रुत्वा | पाण्डवानां | महत् + रथ
अप्रैषीत् | समरे | तीक्ष्णैः | पर + लोक | मारिष
तथैव पाण्डवा राजन्सैन्येन महता वृताः भीष्मं प्रच्छादयामासुर्मेघा इव दिवाकरम्
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तथा + एव | पाण्डवा | राजन् | सैन्येन | महता | वृताः
भीष्मं | प्रच्छादयामासुर् | मेघा | इव | दिवाकरम्
समन्तात्परिवृतो भारतो भरतर्षभ निर्ददाह रणे शूरान्वनं वह्निरिव ज्वलन्
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स | समन्तात् | परिवृतो | भारतो | भरत + ऋषभ
निर्ददाह | रणे | शूरान् | वनं | वह्निर् | इव | ज्वलन्
तत्राद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य पौरुषम् अयोधयत यत्पार्थं जुगोप यतव्रतम्
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तत्र + अद्भुत | अपश्याम | रणे | पार्थस्य | विक्रमम्
अयोधयत | यत् | पार्थं | जुगोप | च | यम् + व्रत
कर्मणा तेन समरे तव पुत्रस्य धन्विनः दुःशासनस्य तुतुषुः सर्वे लोका महात्मनः
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सा | वध्यमाना | समरे | पुत्रस्य | तव | वाहिनी
दुःशासनस्य | तुतुषुः | सर्वे | लोका | महात्मनः
यदेकः समरे पार्थान्सानुगान्समयोधयत् चैनं पाण्डवा युद्धे वारयामासुरुल्बणम्
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यद् | एकः | समरे | पार्थान् | स + अनुग | समयोधयत्
न | च + एनद् | पाण्डवा | युद्धे | वारयामासुर् | उल्बणम्
दुःशासनेन समरे रथिनो विरथीकृताः सादिनश्च महाराज दन्तिनश्च महाबलाः
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दुःशासनेन | समरे | रथिनो | विरथीकृताः
सादिन् + च | महत् + राज | दन्तिन् + च | महत् + बल
विनिर्भिन्नाः शरैस्तीक्ष्णैर्निपेतुर्धरणीतले शरातुरास्तथैवान्ये दन्तिनो विद्रुता दिशः
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विनिर्भिन्नाः | शर + तीक्ष्ण | निपेतुर् | धरणी + तल
शर + आतुर + तथा + एव + अन्य | दन्तिनो | विद्रुता | दिशः
यथाग्निरिन्धनं प्राप्य ज्वलेद्दीप्तार्चिरुल्बणः तथा जज्वाल पुत्रस्ते पाण्डवान्वै विनिर्दहन्
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यथा + अग्नि | इन्धनं | प्राप्य | ज्वलेद् | दीप् + अर्चिस् | उल्बणः
तथा | जज्वाल | पुत्र + त्वद् | पाण्डवान् | वै | विनिर्दहन्
तं भारतमहामात्रं पाण्डवानां महारथः जेतुं नोत्सहते कश्चिन्नाप्युद्यातुं कथंचन ऋते महेन्द्रतनयं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम्
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इति | सेनापतेः | श्रुत्वा | पाण्डवानां | महत् + रथ
जेतुं | न + उत्सह् | कश्चित् + न + अपि + उद्या | कथंचन
एष | पाण्डु + सुत + तात | श्वेताश्वः | कृष्णसारथिः
हि तं समरे राजन्विजित्य विजयोऽर्जुनः भीष्ममेवाभिदुद्राव सर्वसैन्यस्य पश्यतः
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स | हि | तं | समरे | राजन् | विजित्य | विजयो | ऽर्जुनः
मागधो | ऽपहृतो | राजा | सर्व + सैन्य | पश्यतः
विजितस्तव पुत्रोऽपि भीष्मबाहुव्यपाश्रयः पुनः पुनः समाश्वस्य प्रायुध्यत रणोत्कटः अर्जुनं रणे राजन्योधयन्स व्यराजत
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विजि + त्वद् | पुत्रो | ऽपि | भीष्म + बाहु + व्यपाश्रय
पुनः | पुनः | समाश्वस्य | प्रायुध्यत | रण + उत्कट
ये | स्म | भीमं | रणे | राजन् | योधयन्तो | व्यवस्थिताः
शिखण्डी तु रणे राजन्विव्याधैव पितामहम् शरैरशनिसंस्पर्शैस्तथा सर्पविषोपमैः
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शिखण्डी | तु | समासाद्य | भारतानां | पितामहम्
शरैर् | अशनि + संस्पर्श + तथा | सर्प + विष + उपम
तेऽस्य रुजं चक्रुः पितुस्तव जनेश्वर स्मयमानश्च गाङ्गेयस्तान्बाणाञ्जगृहे तदा
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न | च | ते | ऽस्य | रुजं | चक्रुः | पितृ + त्वद् | जनेश्वर
स्मि + च | गाङ्गेय + तद् | बाणाञ् | जगृहे | तदा
Verse 100 View Details
उष्णार्तो हि नरो यद्वज्जलधाराः प्रतीच्छति तथा जग्राह गाङ्गेयः शरधाराः शिखण्डिनः
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उष्ण + आर्त | हि | नरो | यद्वत् + जल + धारा | प्रतीच्छति
तथा | जग्राह | गाङ्गेयः | शर + धारा | शिखण्डिनः
Verse 101 View Details
तं क्षत्रिया महाराज ददृशुर्घोरमाहवे भीष्मं दहन्तं सैन्यानि पाण्डवानां महात्मनाम्
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तं | क्षत्रिया | महत् + राज | ददृशुर् | घोरम् | आहवे
अस्मिन् | हते | हतं | मन्ये | पाण्डवानां | महद् | बलम्
Verse 102 View Details
ततोऽब्रवीत्तव सुतः सर्वसैन्यानि मारिष अभिद्रवत संग्रामे फल्गुनं सर्वतो रथैः
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ततो | ऽब्रवीत् | तव | सुतः | सर्व + सैन्य | मारिष
अभिद्रवत | संग्रामे | फल्गुनं | सर्वतो | रथैः
Verse 103 View Details
भीष्मो वः समरे सर्वान्पालयिष्यति धर्मवित् ते भयं सुमहत्त्यक्त्वा पाण्डवान्प्रतियुध्यत
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भीमसेन + च | समरे | पालयिष्यति | वो | ध्रुवम्
ते | भयं | सु + महत् | त्यक्त्वा | पाण्डवान् | प्रतियुध्यत
Verse 104 View Details
एष तालेन दीप्तेन भीष्मस्तिष्ठति पालयन् सर्वेषां धार्तराष्ट्राणां रणे शर्म वर्म
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एष | तालेन | दीप्तेन | भीष्म + स्था | पालयन्
सर्वेषां | धार्तराष्ट्राणां | रणे | शर्म | च | वर्म | च
Verse 105 View Details
त्रिदशापि समुद्युक्ता नालं भीष्मं समासितुम् किमु पार्था महात्मानं मर्त्यभूतास्तथाबलाः तस्माद्द्रवत हे योधाः फल्गुनं प्राप्य संयुगे
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त्रिदश + अपि | समुद्युक्ता | न + अलम् | भीष्मं | समासितुम्
किमु | पार्था | महात्मानं | मर्त्य + भू + तथा + अबल
तस्माद् | द्रवत | हे | योधाः | फल्गुनं | प्राप्य | संयुगे
Verse 106 View Details
अहमद्य रणे यत्तो योधयिष्यामि फल्गुनम् सहितः सर्वतो यत्तैर्भवद्भिर्वसुधाधिपाः
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अद्य | त्वा | योधयिष्यामि | रणे | पुरुष + सत्तम
सहितः | सर्वतो | यत्तैर् | भवद्भिर् | वसुधाधिपाः
Verse 107 View Details
तच्छ्रुत्वा तु वचो राजंस्तव पुत्रस्य धन्विनः अर्जुनं प्रति संयत्ता बलवन्तो महारथाः
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कर्मणा | तेन | समरे | तव | पुत्रस्य | धन्विनः
अर्जुनं | प्रति | संयत्ता | बलवन्तो | महत् + रथ
Verse 108 View Details
ते विदेहाः कलिङ्गाश्च दाशेरकगणैः सह अभिपेतुर्निषादाश्च सौवीराश्च महारणे
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ते | विदेहाः | कलिङ्ग + च | दाशेरक + गण | सह
अभिपेतुर् | निषाद + च | सौवीर + च | महत् + रण
Verse 109 View Details
बाह्लिका दरदाश्चैव प्राच्योदीच्याश्च मालवाः अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः
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बाह्लिका | दरद + च + एव | प्राच्य + उदीच्य + च | मालवाः
अभीषाहाः | शूरसेनाः | शिबयो | ऽथ | वसातयः
Verse 110 View Details
शाल्वाश्रयास्त्रिगर्ताश्च अम्बष्ठाः केकयैः सह अभिपेतू रणे पार्थं पतंगा इव पावकम्
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शाल्व + आश्रय + त्रिगर्त + च | अम्बष्ठाः | केकयैः | सह
अभिपेतू | रणे | पार्थं | पतंगा | इव | पावकम्
Verse 111 View Details
तान्सर्वान्सहानीकान्महाराज महारथान् दिव्यान्यस्त्राणि संचिन्त्य प्रसंधाय धनंजयः
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स | तान् | सर्व + महत् + राज | भ्राजमानान् | पृथक् | पृथक्
दिव्य + अस्त्र | संचिन्त्य | प्रसंधाय | धनंजयः
Verse 112 View Details
तैरस्त्रैर्महावेगैर्ददाहाशु महाबलः शरप्रतापैर्बीभत्सुः पतंगानिव पावकः
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स | तैर् | अस्त्रैर् | महत् + वेग | दह् + आशु | महत् + बल
शर + प्रताप | बीभत्सुः | पतंगान् | इव | पावकः
Verse 113 View Details
तस्य बाणसहस्राणि सृजतो दृढधन्विनः दीप्यमानमिवाकाशे गाण्डीवं समदृश्यत
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तस्य | बाण + सहस्र | सृजतो | दृढ + धन्विन्
दीप्यमानम् | इव + आकाश | गाण्डीवं | समदृश्यत
Verse 114 View Details
ते शरार्ता महाराज विप्रकीर्णरथध्वजाः नाभ्यवर्तन्त राजानः सहिता वानरध्वजम्
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ते | शर + आर्त | महत् + राज | विप्रकृ + रथ + ध्वज
न + अभिवृत् | राजानः | सहिता | वानरध्वजम्
Verse 115 View Details
सध्वजा रथिनः पेतुर्हयारोहा हयैः सह गजाः सह गजारोहैः किरीटिशरताडिताः
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स + ध्वज | रथिनः | पेतुर् | हय + आरोह | हयैः | सह
गजाः | सह | गज + आरोह | किरीटिन् + शर + ताडय्
Verse 116 View Details
ततोऽर्जुनभुजोत्सृष्टैरावृतासीद्वसुंधरा विद्रवद्भिश्च बहुधा बलै राज्ञां समन्ततः
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ततो | अर्जुन + भुज + उत्सृज् | आवृ + अस् | वसुंधरा
विद्रु + च | बहुधा | बलै | राज्ञां | समन्ततः
Verse 117 View Details
अथ पार्थो महाबाहुर्द्रावयित्वा वरूथिनीम् दुःशासनाय समरे प्रेषयामास सायकान्
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अथ | पार्थो | महत् + बाहु | द्रावयित्वा | वरूथिनीम्
द्रोणस्य | मिषतो | युद्धे | प्रेषयामास | सायकान्
Verse 118 View Details
ते तु भित्त्वा तव सुतं दुःशासनमयोमुखाः धरणीं विविशुः सर्वे वल्मीकमिव पन्नगाः हयांश्चास्य ततो जघ्ने सारथिं न्यपातयत्
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ते | तु | भित्त्वा | तव | सुतं | दुःशासनम् | अयोमुखाः
धरणीं | विविशुः | सर्वे | वल्मीकम् | इव | पन्नगाः
हय + च + इदम् | ततो | जघ्ने | सारथिं | च | न्यपातयत्
Verse 119 View Details
विविंशतिं विंशत्या विरथं कृतवान्प्रभो आजघान भृशं चैव पञ्चभिर्नतपर्वभिः
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विविंशतिं | च | विंशत्या | विरथं | कृतवान् | प्रभो
एवम् | उक्त्वा | ततो | भीष्मं | पञ्चभिर् | नम् + पर्वन्
Verse 120 View Details
कृपं शल्यं विकर्णं विद्ध्वा बहुभिरायसैः चकार विरथांश्चैव कौन्तेयः श्वेतवाहनः
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शल्यं | च | नवभिर् | बाणैर् | भृशं | विद्ध्वा | महत् + यशस्
चकार | विरथ + च + एव | कौन्तेयः | श्वेतवाहनः
Verse 121 View Details
एवं ते विरथाः पञ्च कृपः शल्यश्च मारिष दुःशासनो विकर्णश्च तथैव विविंशतिः संप्राद्रवन्त समरे निर्जिताः सव्यसाचिना
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एवं | ते | विरथाः | पञ्च | कृपः | शल्य + च | मारिष
दुःशासनो | विकर्ण + च | तथा + एव | च | विविंशतिः
सम्प्राद्रवन्त | समरे | निर्जिताः | सव्यसाचिना
Verse 122 View Details
पूर्वाह्णे तु तथा राजन्पराजित्य महारथान् प्रजज्वाल रणे पार्थो विधूम इव पावकः
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पूर्वाह्णे | तु | तथा | राजन् | पराजित्य | महत् + रथ
प्रजज्वाल | रणे | भीष्मो | विधूम | इव | पावकः
Verse 123 View Details
तथैव शरवर्षेण भास्करो रश्मिवानिव अन्यानपि महाराज पातयामास पार्थिवान्
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तथा + एव | शर + वर्ष | भास्करो | रश्मिवान् | इव
अन्यान् | अपि | महत् + राज | पातयामास | पार्थिवान्
Verse 124 View Details
पराङ्मुखीकृत्य तदा शरवर्षैर्महारथान् प्रावर्तयत संग्रामे शोणितोदां महानदीम् मध्येन कुरुसैन्यानां पाण्डवानां भारत
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पराङ्मुखीकृत्य | तदा | शर + वर्ष | महत् + रथ
प्रावर्तयत | संग्रामे | शोणित + उद | महत् + नदी
न्यवारयत | सैन्यं | च | पाण्डवानां | महत् + रथ
Verse 125 View Details
गजाश्च रथसंघाश्च बहुधा रथिभिर्हताः रथाश्च निहता नागैर्नागा हयपदातिभिः
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गज + च | रथ + संघ + च | बहुधा | रथिभिर् | हताः
रथ + च | निहता | नागैर् | नागा | हय + पदाति
Verse 126 View Details
अन्तरा छिध्यमानानि शरीराणि शिरांसि निपेतुर्दिक्षु सर्वासु गजाश्वरथयोधिनाम्
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अन्तरा | छिद्यमानानि | शरीराणि | शिरांसि | च
निपेतुर् | दिक्षु | सर्वासु | गज + अश्व + रथ + योधिन्
Verse 127 View Details
छन्नमायोधनं रेजे कुण्डलाङ्गदधारिभिः पतितैः पात्यमानैश्च राजपुत्रैर्महारथैः
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छन्नम् | आयोधनं | रेजे | कुण्डल + अङ्गद + धारिन्
पतितैः | पातय् + च | राजन् + पुत्र | महत् + रथ
Verse 128 View Details
रथनेमिनिकृत्ताश्च गजैश्चैवावपोथिताः पादाताश्चाप्यदृश्यन्त साश्वाः सहयसादिनः
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रथ + नेमि + निकृत् + च | गज + च + एव + अवपोथय्
पादात + च + अपि + दृश् | स + अश्व | स + हय + सादिन्
Verse 129 View Details
गजाश्वरथसंघाश्च परिपेतुः समन्ततः विशीर्णाश्च रथा भूमौ भग्नचक्रयुगध्वजाः
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गज + अश्व + रथ + संघ + च | परिपेतुः | समन्ततः
विशृ + च | रथा | भूमौ | भञ्ज् + चक्र + युग + ध्वज
Verse 130 View Details
तद्गजाश्वरथौघानां रुधिरेण समुक्षितम् छन्नमायोधनं रेजे रक्ताभ्रमिव शारदम्
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तद् | गज + अश्व + रथ + ओघ | रुधिरेण | समुक्षितम्
छन्नम् | आयोधनं | रेजे | रक्त + अभ्र | इव | शारदम्
Verse 131 View Details
श्वानः काकाश्च गृध्राश्च वृका गोमायुभिः सह प्रणेदुर्भक्ष्यमासाद्य विकृताश्च मृगद्विजाः
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श्वानः | काक + च | गृध्र + च | वृका | गोमायुभिः | सह
प्रणेदुर् | भक्ष्यम् | आसाद्य | विकृ + च | मृग + द्विज
Verse 132 View Details
ववुर्बहुविधाश्चैव दिक्षु सर्वासु मारुताः दृश्यमानेषु रक्षःसु भूतेषु विनदत्सु
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ववुर् | बहुविध + च + एव | दिक्षु | सर्वासु | मारुताः
दृश्यमानेषु | रक्षःसु | भूतेषु | विनदत्सु | च
Verse 133 View Details
काञ्चनानि दामानि पताकाश्च महाधनाः धूमायमाना दृश्यन्ते सहसा मारुतेरिताः
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काञ्चनानि | च | दामानि | पताका + च | महाधनाः
धूमायमाना | दृश्यन्ते | सहसा | मारुत + ईरय्
Verse 134 View Details
श्वेतच्छत्रसहस्राणि सध्वजाश्च महारथाः विनिकीर्णाः स्म दृश्यन्ते शतशोऽथ सहस्रशः सपताकाश्च मातङ्गा दिशो जग्मुः शरातुराः
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श्वेत + छत्त्र + सहस्र | स + ध्वज + च | महत् + रथ
विनिकीर्णाः | स्म | दृश्यन्ते | शतशो | ऽथ | सहस्रशः
स + पताका + च | मातङ्गा | दिशो | जग्मुः | शर + आतुर
Verse 135 View Details
क्षत्रियाश्च मनुष्येन्द्र गदाशक्तिधनुर्धराः समन्ततो व्यदृश्यन्त पतिता धरणीतले
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क्षत्रिय + च | मनुष्य + इन्द्र | गदा + शक्ति + धनुस् + धर
समन्ततो | व्यदृश्यन्त | पतिता | धरणी + तल
Verse 136 View Details
ततो भीष्मो महाराज दिव्यमस्त्रमुदीरयन् अभ्यधावत कौन्तेयं मिषतां सर्वधन्विनाम्
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तथा | जज्वाल | भीष्मो | ऽपि | दिव्य + अस्त्र + उदीरय्
अभ्यधावत | कौन्तेयं | मिषतां | सर्व + धन्विन्
Verse 137 View Details
तं शिखण्डी रणे यत्तमभ्यधावत दंशितः संजहार ततो भीष्मस्तदस्त्रं पावकोपमम्
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तं | शिखण्डी | रणे | यत्तम् | अभ्यधावत | दंशितः
संजहार | ततो | भीष्म + तद् | अस्त्रं | पावक + उपम
Verse 138 View Details
एतस्मिन्नेव काले तु कौन्तेयः श्वेतवाहनः निजघ्ने तावकं सैन्यं मोहयित्वा पितामहम्
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चकार | विरथ + च + एव | कौन्तेयः | श्वेतवाहनः
निजघ्ने | तावकं | सैन्यं | मोहयित्वा | पितामहम्