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Currently viewing: Parva 6 - Chapter 6.104 (58 verses)
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Chapter 6.104

कथं शिखण्डी गाङ्गेयमभ्यवर्तत संयुगे पाण्डवाश्च तथा भीष्मं तन्ममाचक्ष्व संजय
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कथं | शिखण्डी | गाङ्गेयम् | अभ्यवर्तत | संयुगे
पाण्डव + च | तथा | भीष्मं | तद् + मद् + आचक्ष् | संजय
ततः प्रभाते विमले सूर्यस्योदयनं प्रति वाद्यमानासु भेरीषु मृदङ्गेष्वानकेषु
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ततः | प्रभाते | विमले | सूर्य + उदयन | प्रति
वाद्यमानासु | भेरीषु | मृदङ्ग + आनक | च
ध्मायत्सु दधिवर्णेषु जलजेषु समन्ततः शिखण्डिनं पुरस्कृत्य निर्याताः पाण्डवा युधि
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ध्मायत्सु | दधि + वर्ण | जलजेषु | समन्ततः
शिखण्डिनं | पुरस्कृत्य | निर्याताः | पाण्डवा | युधि
कृत्वा व्यूहं महाराज सर्वशत्रुनिबर्हणम् शिखण्डी सर्वसैन्यानामग्र आसीद्विशां पते
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कृत्वा | व्यूहं | महत् + राज | सर्व + शत्रु + निबर्हण
साधु | साधु + इति | सैन्यानां | प्रणादो | ऽभूद् | विशां | पते
चक्ररक्षौ ततस्तस्य भीमसेनधनंजयौ पृष्ठतो द्रौपदेयाश्च सौभद्रश्चैव वीर्यवान्
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चक्ररक्षौ | ततस् + तद् | भीमसेन + धनंजय
पृष्ठतो | द्रौपदेय + च | सौभद्र + च + एव | वीर्यवान्
सात्यकिश्चेकितानश्च तेषां गोप्ता महारथः धृष्टद्युम्नस्ततः पश्चात्पाञ्चालैरभिरक्षितः
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सात्यकि + चेकितान + च | तेषां | गोप्ता | महत् + रथ
धृष्टद्युम्न + च | सप्तत्या | भीमसेन + च | पञ्चभिः
ततो युधिष्ठिरो राजा यमाभ्यां सहितः प्रभुः प्रययौ सिंहनादेन नादयन्भरतर्षभ
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ततो | युधिष्ठिरो | राजा | माद्री + पुत्र | च | पाण्डवौ
प्रययौ | सिंहनादेन | नादयन् | भरत + ऋषभ
विराटस्तु ततः पश्चात्स्वेन सैन्येन संवृतः द्रुपदश्च महाराज ततः पश्चादुपाद्रवत्
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विराट + तु | ततः | पश्चात् | स्वेन | सैन्येन | संवृतः
द्रुपद + च | महत् + राज | ततः | पश्चाद् | उपाद्रवत्
केकया भ्रातरः पञ्च धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् जघनं पालयामास पाण्डुसैन्यस्य भारत
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केकया | भ्रातरः | पञ्च | सात्यकि + च + एव | सात्वतः
जघनं | पालयामास | पाण्डु + सैन्य | भारत
एवं व्यूह्य महत्सैन्यं पाण्डवास्तव वाहिनीम् अभ्यद्रवन्त संग्रामे त्यक्त्वा जीवितमात्मनः
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एवं | व्यूह्य | महत् | सैन्यं | पाण्डव + त्वद् | वाहिनीम्
अभ्यद्रवन्त | संग्रामे | त्यक्त्वा | जीवितम् | आत्मनः
तथैव कुरवो राजन्भीष्मं कृत्वा महाबलम् अग्रतः सर्वसैन्यानां प्रययुः पाण्डवान्प्रति
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तथा + एव | कुरवो | राजन् | भीष्मं | कृत्वा | महत् + बल
अग्रतः | सर्व + सैन्य | व्यूहस्य | प्रमुखे | स्थिताः
पुत्रैस्तव दुराधर्षै रक्षितः सुमहाबलैः ततो द्रोणो महेष्वासः पुत्रश्चास्य महारथः
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पुत्र + त्वद् | दुराधर्षै | रक्षितः | सु + महत् + बल
अभिमन्युर् | महत् + इष्वास | द्रुपद + च | महत् + रथ
भगदत्तस्ततः पश्चाद्गजानीकेन संवृतः कृपश्च कृतवर्मा भगदत्तमनुव्रतौ
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भगदत्त + ततस् | पश्चाद् | गज + अनीक | संवृतः
कृप + च | कृतवर्मा | च | शैब्य + च + एव | महत् + रथ
काम्बोजराजो बलवांस्ततः पश्चात्सुदक्षिणः मागधश्च जयत्सेनः सौबलश्च बृहद्बलः
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काम्बोज + राज | बलवत् + ततस् | पश्चात् | सुदक्षिणः
मागध + च | जयत्सेनः | सौबल + च | बृहद्बलः
तथेतरे महेष्वासाः सुशर्मप्रमुखा नृपाः जघनं पालयामासुस्तव सैन्यस्य भारत
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तथा + इतर | महत् + इष्वास | सुशर्मन् + प्रमुख | नृपाः
जघनं | पालयामास | पाण्डु + सैन्य | भारत
दिवसे दिवसे प्राप्ते भीष्मः शांतनवो युधि आसुरानकरोद्व्यूहान्पैशाचानथ राक्षसान्
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दिवसे | दिवसे | प्राप्ते | भीष्मः | शांतनवो | युधि
आसुरान् | अकरोद् | व्यूहान् | पैशाचान् | अथ | राक्षसान्
ततः प्रववृते युद्धं तव तेषां भारत अन्योन्यं निघ्नतां राजन्यमराष्ट्रविवर्धनम्
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तत्र + अस् | सु + महत् | युद्धं | तव | तेषां | च | संकुलम्
नर + अश्व + रथ + नाग | यम + राष्ट्र + विवर्धन
अर्जुनप्रमुखाः पार्थाः पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् भीष्मं युद्धेऽभ्यवर्तन्त किरन्तो विविधाञ्शरान्
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अर्जुनः | समरे | शूरः | पुरस्कृत्य | शिखण्डिनम्
भीष्मं | युद्धे | ऽभ्यवर्तन्त | किरन्तो | विविधाञ् | शरान्
तत्र भारत भीमेन पीडितास्तावकाः शरैः रुधिरौघपरिक्लिन्नाः परलोकं ययुस्तदा
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तत्र | भारत | भीमेन | पीडय् + तावक | शरैः
रुधिर + ओघ + परिक्लिद् | पर + लोक | या + तदा
नकुलः सहदेवश्च सात्यकिश्च महारथः तव सैन्यं समासाद्य पीडयामासुरोजसा
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धृष्टद्युम्नो | विराट + च | सात्यकि + च | महत् + रथ
तव | सैन्यं | समासाद्य | पीडयामासुर् | ओजसा
ते वध्यमानाः समरे तावका भरतर्षभ नाशक्नुवन्वारयितुं पाण्डवानां महद्बलम्
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ते | वध्यमानाः | समरे | तावका | भरत + ऋषभ
न + शक् | वारयितुं | भीष्म + बाण + प्रपीडय्
ततस्तु तावकं सैन्यं वध्यमानं समन्ततः संप्राद्रवद्दिशो राजन्काल्यमानं महारथैः
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ततस् + तु | तावकं | सैन्यं | वध्यमानं | समन्ततः
सम्प्राद्रवद् | दिशो | राजन् | काल्यमानं | महत् + रथ
त्रातारं नाध्यगच्छन्त तावका भरतर्षभ वध्यमानाः शितैर्बाणैः पाण्डवैः सहसृञ्जयैः
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त्रातारं | न + अधिगम् | पङ्के | मग्ना | इव | द्विपाः
स्वयं | वैरं | महत् | कृत्वा | पाण्डवैः | सह + सृञ्जय
पीड्यमानं बलं पार्थैर्दृष्ट्वा भीष्मः पराक्रमी यदकार्षीद्रणे क्रुद्धस्तन्ममाचक्ष्व संजय
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पीड्यमानं | बलं | पार्थैर् | दृष्ट्वा | भीष्मः | पराक्रमी
समीयतू | रणे | शूरौ | तद् + मद् + आचक्ष् | संजय
कथं वा पाण्डवान्युद्धे प्रत्युद्यातः परंतपः विनिघ्नन्सोमकान्वीरांस्तन्ममाचक्ष्व संजय
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स | कथं | पाण्डवान् | युद्धे | जेष्यते | तात | संगतान्
यद् | अकार्षीद् | रणे | क्रुध् + तद् + मद् + आचक्ष् | संजय
आचक्षे ते महाराज यदकार्षीत्पितामहः पीडिते तव पुत्रस्य सैन्ये पाण्डवसृञ्जयैः
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आचक्षे | ते | महत् + राज | यद् | अकार्षीत् | पितामहः
पीडिते | तव | पुत्रस्य | सैन्ये | पाण्डव + सृञ्जय
प्रहृष्टमनसः शूराः पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज अभ्यवर्तन्त निघ्नन्तस्तव पुत्रस्य वाहिनीम्
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ततः | स + रथ + नाग + अश्व | पाण्डवाः | पाण्डु + पूर्वज
अभ्यवर्तन्त | निहन् + त्वद् | पुत्रस्य | वाहिनीम्
तं विनाशं मनुष्येन्द्र नरवारणवाजिनाम् नामृष्यत तदा भीष्मः सैन्यघातं रणे परैः
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तं | विनाशं | मनुष्य + इन्द्र | नर + वारण + वाजिन्
न + मृष् | तदा | भीष्मः | सैन्य + घात | रणे | परैः
पाण्डवान्महेष्वासः पाञ्चालांश्च ससृञ्जयान् अभ्यद्रवत दुर्धर्षस्त्यक्त्वा जीवितमात्मनः
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स | पाण्डव + महत् + इष्वास | पाञ्चाल + च | स + सृञ्जय
अभ्यद्रवन्त | संग्रामे | त्यक्त्वा | जीवितम् | आत्मनः
पाण्डवानां प्रवरान्पञ्च राजन्महारथान् आत्तशस्त्रान्रणे यत्तान्वारयामास सायकैः नाराचैर्वत्सदन्तैश्च शितैरञ्जलिकैस्तथा
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स | पाण्डवानां | प्रवरान् | पञ्च | राजन् + महत् + रथ
आदा + शस्त्र | रणे | यत्तो | ग्रह् + वर + कार्मुक
नाराचैर् | वत्सदन्त + च | शितैर् | अञ्जलिक + तथा
निजघ्ने समरे क्रुद्धो हस्त्यश्वममितं बहु रथिनोऽपातयद्राजन्रथेभ्यः पुरुषर्षभः
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निजघ्ने | समरे | क्रुद्धो | हस्तिन् + अश्व | अमितं | बहु
रथिनो | ऽपातयद् | राजन् | रथेभ्यः | पुरुष + ऋषभ
सादिनश्चाश्वपृष्ठेभ्यः पदातींश्च समागतान् गजारोहान्गजेभ्यश्च परेषां विदधद्भयम्
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सादिन् + च + अश्व + पृष्ठ | पदाति + च | समागतान्
गज + आरोह | गज + च | परेषां | विदधद् | भयम्
तमेकं समरे भीष्मं त्वरमाणं महारथम् पाण्डवाः समवर्तन्त वज्रपाणिमिवासुराः
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तथा + एव | कुरवो | राजन् | भीष्मं | कृत्वा | महत् + बल
पाण्डवाः | समवर्तन्त | वज्रपाणिम् | इव + असुर
शक्राशनिसमस्पर्शान्विमुञ्चन्निशिताञ्शरान् दिक्ष्वदृश्यत सर्वासु घोरं संधारयन्वपुः
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शक्र + अशनि + सम + स्पर्श | विमुच् + निशा | शरान्
दिश् + दृश् | सर्वासु | घोरं | संधारयन् | वपुः
मण्डलीकृतमेवास्य नित्यं धनुरदृश्यत संग्रामे युध्यमानस्य शक्रचापनिभं महत्
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मण्डलीकृतम् | एव + इदम् | धनुः | पश्याम | मारिष
संग्रामे | युध्यमानस्य | शक्र + चाप + निभ | महत्
तद्दृष्ट्वा समरे कर्म तव पुत्रा विशां पते विस्मयं परमं प्राप्ताः पितामहमपूजयन्
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त्वरया | परया | युक्ताः | प्राद्रवन्त | विशां | पते
विस्मयं | परमं | प्राप्ताः | पितामहम् | अपूजयन्
पार्था विमनसो भूत्वा प्रैक्षन्त पितरं तव युध्यमानं रणे शूरं विप्रचित्तिमिवामराः चैनं वारयामासुर्व्यात्ताननमिवान्तकम्
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पार्था | विमनसो | भूत्वा | प्रैक्षन्त | पितरं | तव
युध्यमानं | रणे | शूरं | विप्रचित्तिम् | इव + अमर
न | हि | भीष्मं | दुराधर्षं | व्यात्त + आनन | इव + अन्तक
दशमेऽहनि संप्राप्ते रथानीकं शिखण्डिनः अदहन्निशितैर्बाणैः कृष्णवर्त्मेव काननम्
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दशमे | ऽहनि | सम्प्राप्ते | रथ + अनीक | शिखण्डिनः
दह् + निशा | बाणैः | कृष्णवर्त्मन् + इव | काननम्
तं शिखण्डी त्रिभिर्बाणैरभ्यविध्यत्स्तनान्तरे आशीविषमिव क्रुद्धं कालसृष्टमिवान्तकम्
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तं | शिखण्डी | त्रिभिर् | बाणैर् | अभ्यविध्यत् | स्तनान्तरे
आशीविषम् | इव | क्रुद्धं | काल + सृज् | इव + अन्तक
तेनातिभृशं विद्धः प्रेक्ष्य भीष्मः शिखण्डिनम् अनिच्छन्नपि संक्रुद्धः प्रहसन्निदमब्रवीत्
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स | तद् + अति + भृशम् | विद्धः | प्रेक्ष्य | भीष्मः | शिखण्डिनम्
अनिच्छन्न् | अपि | संक्रुद्धः | प्रहसन्न् | इदम् | अब्रवीत्
काममभ्यस वा मा वा त्वां योत्स्ये कथंचन यैव हि त्वं कृता धात्रा सैव हि त्वं शिखण्डिनी
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मन्त्रयिष्ये | त्वद् + अर्थ | न | तु | योत्स्ये | कथंचन
यद् + अदस् | प्राङ् | निर्मिता | धात्रा | तद् + एतद् | वै | स्त्री | शिखण्डिनी
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शिखण्डी क्रोधमूर्छितः उवाच भीष्मं समरे सृक्किणी परिलेलिहन्
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तस्य | तद् | वचनं | श्रुत्वा | शिखण्डी | क्रोध + मूर्छय्
उवाच | भीष्मं | समरे | परिलेलिहन्
जानामि त्वां महाबाहो क्षत्रियाणां क्षयंकरम् मया श्रुतं ते युद्धं जामदग्न्येन वै सह
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जानामि | त्वां | महत् + बाहु | क्षत्रियाणां | क्षयंकरम्
मया | श्रुतं | च | ते | युद्धं | जामदग्न्येन | वै | सह
दिव्यश्च ते प्रभावोऽयं मया बहुशः श्रुतः जानन्नपि प्रभावं ते योत्स्येऽद्याहं त्वया सह
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दिव्य + च | ते | प्रभावो | ऽयं | स | मया | बहुशः | श्रुतः
जानन्न् | अपि | प्रभावं | ते | योत्स्ये | अद्य + मद् | त्वया | सह
पाण्डवानां प्रियं कुर्वन्नात्मनश्च नरोत्तम अद्य त्वा योधयिष्यामि रणे पुरुषसत्तम
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पाण्डवानां | प्रियं | कुर्वन्न् | आत्मन् + च | नर + उत्तम
अद्य | त्वा | योधयिष्यामि | रणे | पुरुष + सत्तम
ध्रुवं त्वा हनिष्यामि शपे सत्येन तेऽग्रतः एतच्छ्रुत्वा वचो मह्यं यत्क्षमं तत्समाचर
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ध्रुवं | च | त्वा | हनिष्यामि | शपे | सत्येन | ते | ऽग्रतः
एतद् + श्रु | वचो | मह्यं | यत् | क्षमं | तत् | समाचर
काममभ्यस वा मा वा मे जीवन्विमोक्ष्यसे सुदृष्टः क्रियतां भीष्म लोकोऽयं समितिंजय
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कामम् | अभ्यस | वा | मा | वा | न | मे | जीवन् | विमोक्ष्यसे
सु + दृश् | क्रियतां | भीष्म | लोको | ऽयं | समितिंजय
एवमुक्त्वा ततो भीष्मं पञ्चभिर्नतपर्वभिः अविध्यत रणे राजन्प्रणुन्नं वाक्यसायकैः
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एवम् | उक्त्वा | ततो | भीष्मं | पञ्चभिर् | नम् + पर्वन्
अविध्यत | रणे | राजन् | प्रणुन्नं | वाक्य + सायक
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सव्यसाची परंतपः कालोऽयमिति संचिन्त्य शिखण्डिनमचोदयत्
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पुत्रस्य | तव | तद् | वाक्यं | श्रुत्वा | शल्यः | प्रतापवान्
कालो | ऽयम् | इति | संचिन्त्य | शिखण्डिनम् | अचोदयत्
अहं त्वामनुयास्यामि परान्विद्रावयञ्शरैः अभिद्रव सुसंरब्धो भीष्मं भीमपराक्रमम्
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अहं | त्वाम् | अनुयास्यामि | परान् | विद्रावयञ् | शरैः
न + वच् | वचनं | किंचिद् | भीष्मं | भीम + पराक्रम
हि ते संयुगे पीडां शक्तः कर्तुं महाबलः तस्मादद्य महाबाहो वीर भीष्ममभिद्रव
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न | हि | ते | संयुगे | पीडां | शक्तः | कर्तुं | महत् + बल
तस्माद् | अद्य | महत् + बाहु | वीर | भीष्मम् | अभिद्रव
अहत्वा समरे भीष्मं यदि यास्यसि मारिष अवहास्योऽस्य लोकस्य भविष्यसि मया सह
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अहत्वा | समरे | भीष्मं | यदि | यास्यसि | मारिष
अवहास्यो | ऽस्य | लोकस्य | भविष्यसि | मया | सह
नावहास्या यथा वीर भवेम परमाहवे तथा कुरु रणे यत्नं साधयस्व पितामहम्
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न + अवहस् | यथा | वीर | भवेम | परम + आहव
तथा | कुरु | रणे | यत्नं | साधयस्व | पितामहम्
अहं ते रक्षणं युद्धे करिष्यामि परंतप वारयन्रथिनः सर्वान्साधयस्व पितामहम्
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अहं | ते | रक्षणं | युद्धे | करिष्यामि | परंतप
स | भवान् | सर्व + सैन्य | परिवार्य | पितामहम्
द्रोणं द्रोणपुत्रं कृपं चाथ सुयोधनम् चित्रसेनं विकर्णं सैन्धवं जयद्रथम्
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कर्णं | च | त्वां | च | द्रौणिं | च | कृपं | च | सु + महत् + रथ
चित्रसेनं | विकर्णं | च | सैन्धवं | च | जयद्रथम्
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजं सुदक्षिणम् भगदत्तं तथा शूरं मागधं महारथम्
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विन्द + अनुविन्द + आवन्त्य | बाह्लिक + च | स + बाह्लिक
भगदत्तं | तथा | शूरं | मागधं | च | महत् + रथ
सौमदत्तिं रणे शूरमार्श्यशृङ्गिं राक्षसम् त्रिगर्तराजं रणे सह सर्वैर्महारथैः अहमावारयिष्यामि वेलेव मकरालयम्
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सौमदत्तिं | रणे | शूरम् | आर्श्यशृङ्गिं | च | राक्षसम्
मद्र + राज | च | समरे | धर्मराजो | महत् + रथ
तं | वारय | महत् + बाहु | वेला + इव | मकर + आलय
कुरूंश्च सहितान्सर्वान्ये चैषां सैनिकाः स्थिताः निवारयिष्यामि रणे साधयस्व पितामहम्
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कुरु + च | सहितान् | सर्वान् | ये | च + इदम् | सैनिकाः | स्थिताः
तथा | कुरु | रणे | यत्नं | साधयस्व | पितामहम्