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Currently viewing: Parva 6 - Chapter 6.101 (33 verses)
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Chapter 6.101

दृष्ट्वा भीष्मं रणे क्रुद्धं पाण्डवैरभिसंवृतम् यथा मेघैर्महाराज तपान्ते दिवि भास्करम्
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दृष्ट्वा | भीष्मं | रणे | क्रुद्धं | पाण्डवैर् | अभिसंवृतम्
यथा | मेघैर् | महत् + राज | तपान्ते | दिवि | भास्करम्
दुर्योधनो महाराज दुःशासनमभाषत एष शूरो महेष्वासो भीष्मः शत्रुनिषूदनः
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दुर्योधनो | महत् + राज | दुःशासनम् | अचोदयत्
एष | शूरो | महत् + इष्वास | भीष्मः | शत्रु + निषूदन
छादितः पाण्डवैः शूरैः समन्ताद्भरतर्षभ तस्य कार्यं त्वया वीर रक्षणं सुमहात्मनः
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छादितः | पाण्डवैः | शूरैः | समन्ताद् | भरत + ऋषभ
तस्य | कार्यं | त्वया | वीर | रक्षणं | सु + महात्मन्
रक्ष्यमाणो हि समरे भीष्मोऽस्माकं पितामहः निहन्यात्समरे यत्तान्पाञ्चालान्पाण्डवैः सह
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रक्ष्यमाणो | हि | समरे | भीष्मो | ऽस्माकं | पितामहः
निहन्यात् | समरे | यत्तान् | पाञ्चालान् | पाण्डवैः | सह
तत्र कार्यमहं मन्ये भीष्मस्यैवाभिरक्षणम् गोप्ता ह्येष महेष्वासो भीष्मोऽस्माकं पितामहः
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तत्र | कार्यम् | अहं | मन्ये | भीष्म + एव + अभिरक्षण
गोप्ता | हि + एतद् | महत् + इष्वास | भीष्मो | ऽस्माकं | पितामहः
भवान्सर्वसैन्येन परिवार्य पितामहम् समरे दुष्करं कर्म कुर्वाणं परिरक्षतु
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स | भवान् | सर्व + सैन्य | परिवार्य | पितामहम्
समरे | दुष्करं | कर्म | कुर्वाणं | परिरक्षतु
एवमुक्तस्तु समरे पुत्रो दुःशासनस्तव परिवार्य स्थितो भीष्मं सैन्येन महता वृतः
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एवम् | वच् + तु | कर्णेन | पुत्रो | दुर्योधन + त्वद्
परिवार्य | रणे | भीष्मं | दंशिताः | समवस्थिताः
ततः शतसहस्रेण हयानां सुबलात्मजः विमलप्रासहस्तानामृष्टितोमरधारिणाम्
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ततः | शत + सहस्र | हयानां | सुबल + आत्मज
विमल + प्रास + हस्त | ऋष्टि + तोमर + धारिन्
दर्पितानां सुवेगानां बलस्थानां पताकिनाम् शिक्षितैर्युद्धकुशलैरुपेतानां नरोत्तमैः
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दर्पितानां | सु + वेग | बलस्थानां | पताकिनाम्
शिक्षितैर् | युद्ध + कुशल | उपेतानां | नरोत्तमैः
नकुलं सहदेवं धर्मराजं पाण्डवम् न्यवारयन्नरश्रेष्ठं परिवार्य समन्ततः
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नकुलं | सहदेवं | च | धर्मराजं | च | पाण्डवम्
रथैर् | अन्ये | नर + श्रेष्ठ | परिवव्रुः | समन्ततः
ततो दुर्योधनो राजा शूराणां हयसादिनाम् अयुतं प्रेषयामास पाण्डवानां निवारणे
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ततो | दुर्योधनो | राजा | त्वरमाणो | महत् + रथ
तम् | आपतन्तं | सम्प्रेक्ष्य | पाण्डवानां | महत् + रथ
तैः प्रविष्टैर्महावेगैर्गरुत्मद्भिरिवाहवे खुराहता धरा राजंश्चकम्पे ननाद
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तैः | प्रविष्टैर् | महत् + वेग | गरुत्मद्भिर् | इव + आहव
खुर + आहन् | धरा | राजन् + कम्प् | च | ननाद | च
खुरशब्दश्च सुमहान्वाजिनां शुश्रुवे तदा महावंशवनस्येव दह्यमानस्य पर्वते
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खुर + शब्द + च | सु + महत् | वाजिनां | शुश्रुवे | तदा
महत् + वंश + वन + इव | दह्यमानस्य | पर्वते
उत्पतद्भिश्च तैस्तत्र समुद्धूतं महद्रजः दिवाकरपथं प्राप्य छादयामास भास्करम्
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उत्पत् + च | तद् + तत्र | समुद्धूतं | महद् | रजः
दिवाकर + पथ | प्राप्य | छादयामास | भास्करम्
वेगवद्भिर्हयैस्तैस्तु क्षोभितं पाण्डवं बलम् निपतद्भिर्महावेगैर्हंसैरिव महत्सरः हेषतां चैव शब्देन प्राज्ञायत किंचन
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वेगवद्भिर् | हय + तद् + तु | क्षोभितं | पाण्डवं | बलम्
निपतद्भिर् | महत् + वेग | हंसैर् | इव | महत् | सरः
हेषतां | च + एव | शब्देन | न | प्राज्ञायत | किंचन
ततो युधिष्ठिरो राजा माद्रीपुत्रौ पाण्डवौ प्रत्यघ्नंस्तरसा वेगं समरे हयसादिनाम्
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तथा | युधिष्ठिरो | राजा | भीमसेन + च | पाण्डवः
प्रतिहन् + तरस् | वेगं | समरे | हय + सादिन्
उद्वृत्तस्य महाराज प्रावृट्कालेन पूर्यतः पौर्णमास्यामम्बुवेगं यथा वेला महोदधेः
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उद्वृत्तस्य | महत् + राज | प्रावृष् + काल | पूर्यतः
पौर्णमास्याम् | अम्बु + वेग | यथा | वेला | महोदधेः
ततस्ते रथिनो राजञ्शरैः संनतपर्वभिः न्यकृन्तन्नुत्तमाङ्गानि कायेभ्यो हयसादिनाम्
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सौभद्र + तु | रणे | रक्षः | शरैः | संनम् + पर्वन्
न्यकृन्तन्न् | उत्तमाङ्गानि | कायेभ्यो | हय + सादिन्
ते निपेतुर्महाराज निहता दृढधन्विभिः नागैरिव महानागा यथा स्युर्गिरिगह्वरे
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ते | निपेतुर् | महत् + राज | नागेषु | च | रथेषु | च
नागैर् | इव | महत् + नाग | यथा | स्युर् | गिरि + गह्वर
तेऽपि प्रासैः सुनिशितैः शरैः संनतपर्वभिः न्यकृन्तन्नुत्तमाङ्गानि विचरन्तो दिशो दश
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छादयामास | समरे | शरैः | संनम् + पर्वन्
न्यकृन्तन्न् | उत्तमाङ्गानि | कायेभ्यो | हय + सादिन्
अत्यासन्ना हयारोहा ऋष्टिभिर्भरतर्षभ अच्छिनन्नुत्तमाङ्गानि फलानीव महाद्रुमात्
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अति + आसन्न | हय + आरोह | ऋष्टिभिर् | भरत + ऋषभ
उत्तमाङ्गानि | फल + इव | महत् + द्रुम
ससादिनो हया राजंस्तत्र तत्र निषूदिताः पतिताः पात्यमानाश्च शतशोऽथ सहस्रशः
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स + सादिन् | हया | राजन् + तत्र | तत्र | निषूदिताः
न्यपतन्त | तदा | भूमौ | शतशो | ऽथ | सहस्रशः
वध्यमाना हयास्ते तु प्राद्रवन्त भयार्दिताः यथा सिंहान्समासाद्य मृगाः प्राणपरायणाः
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वध्यमाना | हय + तद् | तु | प्राद्रवन्त | भय + अर्दय्
यथा | सिंहान् | समासाद्य | मृगाः | प्राण + परायण
पाण्डवास्तु महाराज जित्वा शत्रून्महाहवे दध्मुः शङ्खांश्च भेरीश्च ताडयामासुराहवे
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पाण्डव + तु | महत् + राज | जित्वा | शत्रु + महत् + आहव
दध्मुः | शङ्ख + च | भेरी + च | ताडयामासुर् | आहवे
ततो दुर्योधनो दृष्ट्वा दीनं सैन्यमवस्थितम् अब्रवीद्भरतश्रेष्ठ मद्रराजमिदं वचः
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ततो | दुर्योधनो | दृष्ट्वा | दीनं | सैन्यम् | अवस्थितम्
अब्रवीद् | भ्रातरं | तत्र | दुःशासनम् | इदं | वचः
एष पाण्डुसुतो ज्येष्ठो जित्वा मातुल मामकान् पश्यतां नो महाबाहो सेनां द्रावयते बली
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एष | पाण्डु + सुत | ज्येष्ठो | जित्वा | मातुल | मामकान्
पश्यतां | नो | महत् + बाहु | सेनां | द्रावयते | बली
तं वारय महाबाहो वेलेव मकरालयम् त्वं हि संश्रूयसेऽत्यर्थमसह्यबलविक्रमः
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दधार | सुप्रतीको | ऽपि | वेला + इव | मकर + आलय
त्वं | हि | संश्रूयसे | ऽत्यर्थम् | असह्य + बल + विक्रम
पुत्रस्य तव तद्वाक्यं श्रुत्वा शल्यः प्रतापवान् प्रययौ रथवंशेन यत्र राजा युधिष्ठिरः
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पुत्रस्य | तव | तद् | वाक्यं | श्रुत्वा | शल्यः | प्रतापवान्
प्रययौ | रथ + वंश | यत्र | राजा | युधिष्ठिरः
तदापतद्वै सहसा शल्यस्य सुमहद्बलम् महौघवेगं समरे वारयामास पाण्डवः
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तद् | आपतद् | वै | सहसा | शल्यस्य | सु + महत् | बलम्
महत् + ओघ + वेग | समरे | वारयामास | पाण्डवः
मद्रराजं समरे धर्मराजो महारथः दशभिः सायकैस्तूर्णमाजघान स्तनान्तरे नकुलः सहदेवश्च त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः
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तद् + अन्तर | च | सम्प्रेक्ष्य | त्वरमाणो | महत् + रथ
दशभिः | सायक + तूर्णम् | आजघान | स्तनान्तरे
नकुलः | सहदेव + च | त्रि | अजिह्मगैः
मद्रराजोऽपि तान्सर्वानाजघान त्रिभिस्त्रिभिः युधिष्ठिरं पुनः षष्ट्या विव्याध निशितैः शरैः माद्रीपुत्रौ संरब्धौ द्वाभ्यां द्वाभ्यामताडयत्
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मद्र + राज | ऽपि | तान् | सर्वान् | आजघान | त्रि
युधिष्ठिरं | पुनः | षष्ट्या | विव्याध | निशितैः | शरैः
माद्री + पुत्र | च | संरब्धौ | द्वाभ्यां | द्वाभ्याम् | अताडयत्
ततो भीमो महाबाहुर्दृष्ट्वा राजानमाहवे मद्रराजवशं प्राप्तं मृत्योरास्यगतं यथा अभ्यद्रवत संग्रामे युधिष्ठिरममित्रजित्
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ततो | भीमो | महत् + बाहु | दृष्ट्वा | राजानम् | आहवे
मद्र + राजन् + वश | प्राप्तं | मृत्योर् | आस्य + गम् | यथा
अभ्यद्रवन्त | गाङ्गेयं | युधिष्ठिर + हित + ईप्सा
ततो युद्धं महाघोरं प्रावर्तत सुदारुणम् अपरां दिशमास्थाय द्योतमाने दिवाकरे
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ततो | युद्धं | महत् + घोर | प्रावर्तत | सु + दारुण
अपरां | दिशम् | आस्थाय | द्योतमाने | दिवाकरे