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Currently viewing: Parva 6 - Chapter 6.100 (37 verses)
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Chapter 6.100

अर्जुनस्तु नरव्याघ्र सुशर्मप्रमुखान्नृपान् अनयत्प्रेतराजस्य भवनं सायकैः शितैः
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अर्जुन + तु | नर + व्याघ्र | सुशर्मन् + प्रमुख + नृप
अनयत् | प्रेतराजस्य | भवनं | सायकैः | शितैः
सुशर्मापि ततो बाणैः पार्थं विव्याध संयुगे वासुदेवं सप्तत्या पार्थं नवभिः पुनः
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सुशर्मन् + अपि | ततो | बाणैः | पार्थं | विव्याध | संयुगे
वासुदेवं | च | सप्तत्या | पार्थं | च | नवभिः | पुनः
तान्निवार्य शरौघेण शक्रसूनुर्महारथः सुशर्मणो रणे योधान्प्राहिणोद्यमसादनम्
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तद् + निवारय् | शर + ओघ | शक्र + सूनु | महत् + रथ
रथी | रथिनम् | आसाद्य | प्राहिणोद् | यम + सादन
ते वध्यमानाः पार्थेन कालेनेव युगक्षये व्यद्रवन्त रणे राजन्भये जाते महारथाः
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ते | वध्यमानाः | पार्थेन | काल + इव | युग + क्षय
व्यद्रवन्त | रणे | राजन् | भये | जाते | महत् + रथ
उत्सृज्य तुरगान्केचिद्रथान्केचिच्च मारिष गजानन्ये समुत्सृज्य प्राद्रवन्त दिशो दश
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उत्सृज्य | तुरगान् | केचिद् | रथान् | कश्चित् + च | मारिष
गजान् | अन्ये | समुत्सृज्य | प्राद्रवन्त | दिशो | दश
अपरे तुद्यमानास्तु वाजिनागरथा रणात् त्वरया परया युक्ताः प्राद्रवन्त विशां पते
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अपरे | तुद् + तु | वाजिन् + नाग + रथ | रणात्
त्वरया | परया | युक्ताः | प्राद्रवन्त | विशां | पते
पादाताश्चापि शस्त्राणि समुत्सृज्य महारणे निरपेक्षा व्यधावन्त तेन तेन स्म भारत
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नानाविधानि | शस्त्राणि | विसृजन्तो | महत् + रथ
निरपेक्षा | व्यधावन्त | तेन | तेन | स्म | भारत
वार्यमाणाः स्म बहुशस्त्रैगर्तेन सुशर्मणा तथान्यैः पार्थिवश्रेष्ठैर्न व्यतिष्ठन्त संयुगे
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वार्यमाणाः | स्म | बहुशस् + त्रैगर्त | सुशर्मणा
तथा + अन्य | पार्थिव + श्रेष्ठ | न | व्यतिष्ठन्त | संयुगे
तद्बलं प्रद्रुतं दृष्ट्वा पुत्रो दुर्योधनस्तव पुरस्कृत्य रणे भीष्मं सर्वसैन्यपुरस्कृतम्
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अभिद्रुतं | परीप्सन्तः | पुत्रं | दुर्योधनं | तव
पुरस्कृत्य | रणे | भीष्मं | सर्व + सैन्य + पुरस्कृ
सर्वोद्योगेन महता धनंजयमुपाद्रवत् त्रिगर्ताधिपतेरर्थे जीवितस्य विशां पते
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सर्व + उद्योग | महता | धनंजयम् | उपाद्रवत्
त्रिगर्त + अधिपति | अर्थे | जीवितस्य | विशां | पते
एकः समरे तस्थौ किरन्बहुविधाञ्शरान् भ्रातृभिः सहितः सर्वैः शेषा विप्रद्रुता नराः
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स | एकः | समरे | तस्थौ | किरन् | बहुविधाञ् | शरान्
भ्रातृभिः | सहितः | सर्वैः | शेषा | विप्रद्रुता | नराः
तथैव पाण्डवा राजन्सर्वोद्योगेन दंशिताः प्रययुः फल्गुनार्थाय यत्र भीष्मो व्यवस्थितः
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तथा + एव | पाण्डवा | राजन् | भीमसेन + पुरोगम
प्रययुः | फल्गुन + अर्थ | यत्र | भीष्मो | व्यवस्थितः
जानन्तोऽपि रणे शौर्यं घोरं गाण्डीवधन्वनः हाहाकारकृतोत्साहा भीष्मं जग्मुः समन्ततः
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जानन्तो | ऽपि | रणे | शौर्यं | घोरं | गाण्डीवधन्वनः
हाहाकार + कृ + उत्साह | भीष्मं | जग्मुः | समन्ततः
ततस्तालध्वजः शूरः पाण्डवानामनीकिनीम् छादयामास समरे शरैः संनतपर्वभिः
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तावकाः | समवर्तन्त | पाण्डवानाम् | अनीकिनीम्
छादयामास | समरे | शरैः | संनम् + पर्वन्
एकीभूतास्ततः सर्वे कुरवः पाण्डवैः सह अयुध्यन्त महाराज मध्यं प्राप्ते दिवाकरे
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एकीभू + ततस् | सर्वे | कुरवः | पाण्डवैः | सह
अयुध्यन्त | महत् + राज | मध्यं | प्राप्ते | दिवाकरे
सात्यकिः कृतवर्माणं विद्ध्वा पञ्चभिरायसैः अतिष्ठदाहवे शूरः किरन्बाणान्सहस्रशः
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सात्यकिः | कृतवर्माणं | विद्ध्वा | पञ्चभिर् | आयसैः
अतिष्ठद् | आहवे | शूरः | किरन् | बाणान् | सहस्रशः
तथैव द्रुपदो राजा द्रोणं विद्ध्वा शितैः शरैः पुनर्विव्याध सप्तत्या सारथिं चास्य सप्तभिः
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तथा + एव | द्रुपदो | राजा | द्रोणं | विद्ध्वा | शितैः | शरैः
पुनर् | विव्याध | सप्तत्या | सारथिं | च + इदम् | सप्तभिः
भीमसेनस्तु राजानं बाह्लिकं प्रपितामहम् विद्ध्वानदन्महानादं शार्दूल इव कानने
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भीमसेन + तु | राजानं | बाह्लिकं | प्रपितामहम्
व्यध् + नद् + महत् + नाद | शार्दूल | इव | कानने
आर्जुनिश्चित्रसेनेन विद्धो बहुभिराशुगैः चित्रसेनं त्रिभिर्बाणैर्विव्याध हृदये भृशम्
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आर्जुनि + चित्रसेन | विद्धो | बहुभिर् | आशुगैः
चित्रसेनं | त्रिभिर् | बाणैर् | विव्याध | हृदये | भृशम्
समागतौ तौ तु रणे महामात्रौ व्यरोचताम् यथा दिवि महाघोरौ राजन्बुधशनैश्चरौ
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समागतौ | तौ | तु | रणे | महामात्रौ | व्यरोचताम्
यथा | दिवि | महत् + घोर | राजन् | बुध + शनैश्चर
तस्याश्वांश्चतुरो हत्वा सूतं नवभिः शरैः ननाद बलवन्नादं सौभद्रः परवीरहा
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तद् + अश्व + चतुर् | हत्वा | सूतं | च | नवभिः | शरैः
लाघवाद् | व्यंसयामास | सौभद्रः | पर + वीर + हन्
हताश्वात्तु रथात्तूर्णमवप्लुत्य महारथः आरुरोह रथं तूर्णं दुर्मुखस्य विशां पते
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हन् + अश्व | तु | रथात् | तूर्णम् | अवप्लुत्य | महत् + रथ
आरुरोह | रथं | तूर्णं | दुर्मुखस्य | विशां | पते
द्रोणश्च द्रुपदं विद्ध्वा शरैः संनतपर्वभिः सारथिं चास्य विव्याध त्वरमाणः पराक्रमी
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द्रोण + च | द्रुपदं | विद्ध्वा | शरैः | संनम् + पर्वन्
सारथिं | च + इदम् | विव्याध | त्वरमाणः | पराक्रमी
पीड्यमानस्ततो राजा द्रुपदो वाहिनीमुखे अपायाज्जवनैरश्वैः पूर्ववैरमनुस्मरन्
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पीडय् + ततस् | राजा | द्रुपदो | वाहिनी + मुख
अपया + जवन | अश्वैः | पूर्व + वैर | अनुस्मरन्
भीमसेनस्तु राजानं मुहूर्तादिव बाह्लिकम् व्यश्वसूतरथं चक्रे सर्वसैन्यस्य पश्यतः
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भीमसेन + तु | राजानं | बाह्लिकं | प्रपितामहम्
व्यश्व + सूत + रथ | चक्रे | सर्व + सैन्य | पश्यतः
ससंभ्रमो महाराज संशयं परमं गतः अवप्लुत्य ततो वाहाद्बाह्लिकः पुरुषोत्तमः आरुरोह रथं तूर्णं लक्ष्मणस्य महारथः
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स + सम्भ्रम | महत् + राज | संशयं | परमं | गतः
अवप्लुत्य | ततो | वाहाद् | बाह्लिकः | पुरुष + उत्तम
आरुरोह | रथं | च + एव | हार्दिक्यस्य | महात्मनः
सात्यकिः कृतवर्माणं वारयित्वा महारथः शरैर्बहुविधै राजन्नाससाद पितामहम्
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सात्यकिः | कृतवर्माणं | विद्ध्वा | पञ्चभिर् | आयसैः
शरैर् | बहुविधै | राजन्न् | आससाद | पितामहम्
विद्ध्वा भारतं षष्ट्या निशितैर्लोमवाहिभिः ननर्तेव रथोपस्थे विधुन्वानो महद्धनुः
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स | विद्ध्वा | भारतं | षष्ट्या | निशितैर् | लोमवाहिभिः
नृत् + इव | रथोपस्थे | विधुन्वानो | महद् | धनुः
तस्यायसीं महाशक्तिं चिक्षेपाथ पितामहः हेमचित्रां महावेगां नागकन्योपमां शुभाम्
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तद् + आयस | महत् + शक्ति | क्षिप् + अथ | पितामहः
हेमन् + चित्र | महत् + वेग | नाग + कन्या + उपम | शुभाम्
तामापतन्तीं सहसा मृत्युकल्पां सुतेजनाम् ध्वंसयामास वार्ष्णेयो लाघवेन महायशाः
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ताम् | आपतन्तीं | सहसा | कौरवाणां | महत् + चमू
ध्वंसयामास | वार्ष्णेयो | लाघवेन | महत् + यशस्
अनासाद्य तु वार्ष्णेयं शक्तिः परमदारुणा न्यपतद्धरणीपृष्ठे महोल्केव गतप्रभा
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अन् + आसादय् | तु | वार्ष्णेयं | शक्तिः | परम + दारुण
न्यपतद् | धरणी + पृष्ठ | महत् + उल्का + इव | गम् + प्रभा
वार्ष्णेयस्तु ततो राजन्स्वां शक्तिं घोरदर्शनाम् वेगवद्गृह्य चिक्षेप पितामहरथं प्रति
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वार्ष्णेय + तु | ततो | राजन् | स्वां | शक्तिं | घोर + दर्शन
वेगवद् | गृह्य | चिक्षेप | पितामह + रथ | प्रति
वार्ष्णेयभुजवेगेन प्रणुन्ना सा महाहवे अभिदुद्राव वेगेन कालरात्रिर्यथा नरम्
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वार्ष्णेय + भुज + वेग | प्रणुन्ना | सा | महत् + आहव
अभिदुद्राव | वेगेन | पाण्डवानां | महत् + रथ
तामापतन्तीं सहसा द्विधा चिच्छेद भारत क्षुरप्राभ्यां सुतीक्ष्णाभ्यां सान्वकीर्यत भूतले
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तस्य | द्रोण + सुत + चाप | द्विधा | चिछेद | भारत
क्षुरप्राभ्यां | सु + तीक्ष्ण | तद् + अनुकृ | भू + तल
छित्त्वा तु शक्तिं गाङ्गेयः सात्यकिं नवभिः शरैः आजघानोरसि क्रुद्धः प्रहसञ्शत्रुकर्शनः
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छित्त्वा | तु | शक्तिं | गाङ्गेयः | सात्यकिं | नवभिः | शरैः
आहन् + उरस् | क्रुद्धः | प्रहसञ् | शत्रु + कर्शन
ततः सरथनागाश्वाः पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज परिवव्रू रणे भीष्मं माधवत्राणकारणात्
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ततः | स + रथ + नाग + अश्व | पुत्र + त्वद् | विशां | पते
परिवव्रू | रणे | भीष्मं | गुप् + च | समन्ततः
ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् पाण्डवानां कुरूणां समरे विजयैषिणाम्
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ततः | समभवद् | युद्धं | तुमुलं | लोमन् + हर्षण
पाण्डवानां | कुरूणां | च | समरे | विजय + एषिन्