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Currently viewing: Parva 5 - Chapter 5.160 (29 verses)
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Chapter 5.160

दुर्योधनस्य तद्वाक्यं निशम्य भरतर्षभः नेत्राभ्यामतिताम्राभ्यां कैतव्यं समुदैक्षत
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कुरुक्षेत्रस्य | तद् | द्वारं | विश्रुतं | भरत + ऋषभ
नेत्राभ्याम् | अति + ताम्र | कैतव्यं | समुदैक्षत
केशवमभिप्रेक्ष्य गुडाकेशो महायशाः अभ्यभाषत कैतव्यं प्रगृह्य विपुलं भुजम्
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स | केशवम् | अभिप्रेक्ष्य | गुडाकेशो | महत् + यशस्
ओघ + मेघ + स्वन | काले | प्रगृह्य | विपुलं | भुजम्
स्ववीर्यं यः समाश्रित्य समाह्वयति वै परान् अभीतः पूरयञ्शक्तिं वै पुरुष उच्यते
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स्व + वीर्य | यः | समाश्रित्य | समाह्वयति | वै | परान्
अभीतः | पूरयञ् | शक्तिं | स | वै | पुरुष | उच्यते
परवीर्यं समाश्रित्य यः समाह्वयते परान् क्षत्रबन्धुरशक्तत्वाल्लोके पुरुषाधमः
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स्व + वीर्य | यः | समाश्रित्य | समाह्वयति | वै | परान्
क्षत्रबन्धुर् | अशक्त + त्व | लोके | स | पुरुष + अधम
त्वं परेषां वीर्येण मन्यसे वीर्यमात्मनः स्वयं कापुरुषो मूढः परांश्च क्षेप्तुमिच्छसि
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स | त्वं | परेषां | वीर्येण | मन्यसे | वीर्यम् | आत्मनः
स्वयं | कापुरुषो | मूढः | पर + च | क्षेप्तुम् | इच्छसि
यस्त्वं वृद्धं सर्वराज्ञां हितबुद्धिं जितेन्द्रियम् मरणाय महाबुद्धिं दीक्षयित्वा विकत्थसे
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यद् + त्वद् | वृद्धं | सर्व + राजन् | हित + बुद्धि | जि + इन्द्रिय
मरणाय | महाबुद्धिं | दीक्षयित्वा | विकत्थसे
भावस्ते विदितोऽस्माभिर्दुर्बुद्धे कुलपांसन हनिष्यन्ति गङ्गेयं पाण्डवा घृणयेति
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भाव + त्वद् | विदितो | ऽस्माभिर् | दुर्बुद्धे | कुल + पांसन
वरान् | वरान् | हनिष्यन्ति | समेता | युधि | पाण्डवाः
यस्य वीर्यं समाश्रित्य धार्तराष्ट्र विकत्थसे हन्तास्मि प्रथमं भीष्मं मिषतां सर्वधन्विनाम्
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यथा | न + इदम् | समायुज्याद् | धार्तराष्ट्रान् | कथंचन
हन्तास्मि | प्रथमं | भीष्मं | मिषतां | सर्व + धन्विन्
कैतव्य गत्वा भरतान्समेत्य; सुयोधनं धार्तराष्ट्रं ब्रवीहि तथेत्याह अर्जुनः सव्यसाची; निशाव्यपाये भविता विमर्दः
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कैतव्य | गत्वा | भरतान् | समेत्य | सुयोधनं | धार्तराष्ट्रं | ब्रवीहि
तथा + इति + अह् | अर्जुनः | सव्यसाची | निशा + व्यपाय | भविता | विमर्दः
यद्वोऽब्रवीद्वाक्यमदीनसत्त्वो; मध्ये कुरूणां हर्षयन्सत्यसंधः अहं हन्ता पाण्डवानामनीकं; शाल्वेयकांश्चेति ममैष भारः
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यद् | वो | ऽब्रवीद् | वाक्यम् | अदीन + सत्त्व | मध्ये | कुरूणां | हर्षयन् | सत्य + संधा
अहं | हन्ता | पाण्डवानाम् | अनीकं | शाल्वेयक + च + इति | मद् + एतद् | भारः
हन्यामहं द्रोणमृते हि लोकं; ते भयं विद्यते पाण्डवेभ्यः ततो हि ते लब्धतमं राज्यं; क्षयं गताः पाण्डवाश्चेति भावः
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हन्याम् | अहं | द्रोणम् | ऋते | हि | लोकं | न | ते | भयं | विद्यते | पाण्डवेभ्यः
ततो | हि | ते | लब्धतमं | च | राज्यं | क्षयं | गताः | पाण्डव + च + इति | भावः
दर्पपूर्णो समीक्षसे त्व;मनर्थमात्मन्यपि वर्तमानम् तस्मादहं ते प्रथमं समूहे; हन्ता समक्षं कुरुवृद्धमेव
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स | दर्प + पृ | न | समीक्षसे | त्वम् | अनर्थम् | आत्मन् + अपि | वर्तमानम्
तस्माद् | अहं | ते | प्रथमं | समूहे | हन्ता | समक्षं | कुरुवृद्धम् | एव
सूर्योदये युक्तसेनः प्रतीक्ष्य; ध्वजी रथी रक्ष सत्यसंधम् अहं हि वः पश्यतां द्वीपमेनं; रथाद्भीष्मं पातयितास्मि बाणैः
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सूर्य + उदय | युज् + सेना | प्रतीक्ष्य | ध्वजी | रथी | रक्ष | च | सत्य + संधा
अहं | हि | वः | पश्यतां | द्वीपम् | एनं | रथाद् | भीष्मं | पातयितास्मि | बाणैः
श्वोभूते कत्थनावाक्यं विज्ञास्यति सुयोधनः अर्दितं शरजालेन मया दृष्ट्वा पितामहम्
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श्वोभूते | कत्थना + वाक्य | विज्ञास्यति | सुयोधनः
अर्दितं | शर + जाल | मया | दृष्ट्वा | पितामहम्
यदुक्तश्च सभामध्ये पुरुषो ह्रस्वदर्शनः क्रुद्धेन भीमसेनेन भ्राता दुःशासनस्तव
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यद् | वच् + च | सभा + मध्य | पुरुषो | ह्रस्व + दर्शन
तथा | क्षुद्रस्य | पापस्य | भ्रातुर् | दुःशासनस्य | च
अधर्मज्ञो नित्यवैरी पापबुद्धिर्नृशंसकृत् सत्यां प्रतिज्ञां नचिराद्रक्ष्यसे तां सुयोधन
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अधर्म + ज्ञ | नित्य + वैरिन् | पाप + बुद्धि | नृशंस + कृत्
सत्यां | प्रतिज्ञां | नचिराद् | रक्ष्यसे | तां | सुयोधन
अभिमानस्य दर्पस्य क्रोधपारुष्ययोस्तथा नैष्ठुर्यस्यावलेपस्य आत्मसंभावनस्य
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अभिमानस्य | दर्पस्य | क्रोध + पारुष्य + तथा
नैष्ठुर्य + अवलेप | आत्मन् + सम्भावना | च
नृशंसतायास्तैक्ष्ण्यस्य धर्मविद्वेषणस्य अधर्मस्यातिवादस्य वृद्धातिक्रमणस्य
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नृशंस + ता + तैक्ष्ण्य | धर्म + विद्वेषण | च
अधर्म + अतिवाद | वृद्ध + अतिक्रमण | च
दर्शनस्य वक्रस्य कृत्स्नस्यापनयस्य द्रक्ष्यसि त्वं फलं तीव्रमचिरेण सुयोधन
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दर्शनस्य | च | वक्रस्य | कृत्स्न + अपनय | च
द्रक्ष्यसि | त्वं | फलं | तीव्रम् | अचिरेण | सुयोधन
वासुदेवद्वितीये हि मयि क्रुद्धे नराधिप आशा ते जीविते मूढ राज्ये वा केन हेतुना
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वासुदेव + द्वितीय | हि | मयि | क्रुद्धे | नराधिप
आशा | ते | जीविते | मूढ | राज्ये | वा | केन | हेतुना
शान्ते भीष्मे तथा द्रोणे सूतपुत्रे पातिते निराशो जीविते राज्ये पुत्रेषु भविष्यसि
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शान्ते | भीष्मे | तथा | द्रोणे | सूतपुत्रे | च | पातिते
निराशो | जीविते | राज्ये | पुत्रेषु | च | भविष्यसि
भ्रातॄणां निधनं दृष्ट्वा पुत्राणां सुयोधन भीमसेनेन निहतो दुष्कृतानि स्मरिष्यसि
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भ्रातॄणां | निधनं | दृष्ट्वा | पुत्राणां | च | सुयोधन
भीमसेनेन | निहतो | दुष्कृतानि | स्मरिष्यसि
द्वितीयां प्रतिज्ञां हि प्रतिज्ञास्यति केशवः सत्यं ब्रवीम्यहं ह्येतत्सर्वं सत्यं भविष्यति
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कृत्वा | प्रतिज्ञां | न + अहत्वा | निवर्तिष्यामि | केशवम्
सत्यं | ब्रू + मद् | हि + एतद् | सर्वं | सत्यं | भविष्यति
इत्युक्तः कैतवो राजंस्तद्वाक्यमुपधार्य अनुज्ञातो निववृते पुनरेव यथागतम्
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इति + वच् | कैतवो | राजन् + तद् | वाक्यम् | उपधार्य | च
अनुज्ञातो | निववृते | परिष्वज्य | जनार्दनम्
उपावृत्य तु पाण्डुभ्यः कैतव्यो धृतराष्ट्रजम् गत्वा यथोक्तं तत्सर्वमुवाच कुरुसंसदि
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उपावृत्य | तु | पाण्डुभ्यः | कैतव्यो | धृतराष्ट्र + ज
गत्वा | यथोक्तं | तत् | सर्वम् | उवाच | कुरु + संसद्
केशवार्जुनयोर्वाक्यं निशम्य भरतर्षभः दुःशासनं कर्णं शकुनिं चाभ्यभाषत
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दुर्योधनस्य | तद् | वाक्यं | निशम्य | भरत + ऋषभ
दुःशासनं | विकर्णं | च | तथा | दुर्योधनं | नृपम्
आज्ञापयत राज्ञश्च बलं मित्रबलं तथा यथा प्रागुदयात्सर्वा युक्ता तिष्ठत्यनीकिनी
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आज्ञापयत | राजन् + च | बलं | मित्र + बल | तथा
यथा | प्राग् | उदयात् | सर्वा | युक्ता | स्था + अनीकिनी
ततः कर्णसमादिष्टा दूताः प्रत्वरिता रथैः उष्ट्रवामीभिरप्यन्ये सदश्वैश्च महाजवैः
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ततः | कर्ण + समादिस् | दूताः | प्रत्वरिता | रथैः
उष्ट्र + वामी | अपि + अन्य | सत् + अश्व + च | महत् + जव
तूर्णं परिययुः सेनां कृत्स्नां कर्णस्य शासनात् आज्ञापयन्तो राज्ञस्तान्योगः प्रागुदयादिति
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तूर्णं | परिययुः | सेनां | कृत्स्नां | कर्णस्य | शासनात्
आज्ञापयन्तो | राजन् + तद् | योगः | प्राग् | उदयाद् | इति