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Currently viewing: Parva 5 - Chapter 5.156 (15 verses)
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Chapter 5.156

तथा व्यूढेष्वनीकेषु कुरुक्षेत्रे द्विजर्षभ किमकुर्वन्त कुरवः कालेनाभिप्रचोदिताः
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तथा | व्यूह् + अनीक | कौरवेयैर् | महत् + रथ
मुह्यन्ति | हि | प्रजास् | तात | काल + अभिप्रचोदय्
तथा व्यूढेष्वनीकेषु यत्तेषु भरतर्षभ धृतराष्ट्रो महाराज संजयं वाक्यमब्रवीत्
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तथा | व्यूह् + अनीक | कौरवेयैर् | महत् + रथ
ततो | युधिष्ठिरो | राजा | नकुलं | वाक्यम् | अब्रवीत्
एहि संजय मे सर्वमाचक्ष्वानवशेषतः सेनानिवेशे यद्वृत्तं कुरुपाण्डवसेनयोः
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एहि | संजय | मे | सर्वम् | आचक्ष् + अनवशेष
सेना + निवेश | यद् + वृत् | कुरु + पाण्डव + सेना
दिष्टमेव परं मन्ये पौरुषं चाप्यनर्थकम् यदहं जानमानोऽपि युद्धदोषान्क्षयोदयान्
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दैवम् | एव | परं | मन्ये | पुरुष + अर्थ | निरर्थकः
यद् | अहं | जानमानो | ऽपि | युद्ध + दोष | क्षय + उदय
तथापि निकृतिप्रज्ञं पुत्रं दुर्द्यूतदेविनम् शक्नोमि नियन्तुं वा कर्तुं वा हितमात्मनः
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किं | पुनर् | धृतराष्ट्रस्य | पुत्रं | दुर्द्यूत + देविन्
न | शक्नोमि | नियन्तुं | वा | कर्तुं | वा | हितम् | आत्मनः
भवत्येव हि मे सूत बुद्धिर्दोषानुदर्शिनी दुर्योधनं समासाद्य पुनः सा परिवर्तते
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भू + एव | हि | मे | बुद्धिर् | दृश् + आत्मन् | सुख + च्यु
वर्धयन् | सु + महत् + तेजस् | पुनः | प्रतिनिवर्तते
एवं गते वै यद्भावि तद्भविष्यति संजय क्षत्रधर्मः किल रणे तनुत्यागोऽभिपूजितः
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एवं | गते | वै | यद् | भावि | तद् | भविष्यति | संजय
क्षत्र + धर्म | किल | रणे | तनुत्यागो | ऽभिपूजितः
त्वद्युक्तोऽयमनुप्रश्नो महाराज यथार्हसि तु दुर्योधने दोषमिममासक्तुमर्हसि शृणुष्वानवशेषेण वदतो मम पार्थिव
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त्वद् + युज् | ऽयम् | अनुप्रश्नो | यथावद् | वदतां | वर
न | तु | दुर्योधने | दोषम् | इमम् | आसक्तुम् | अर्हसि
श्रु + अनवशेष | वदतो | मम | पार्थिव
आत्मनो दुश्चरितादशुभं प्राप्नुयान्नरः एनसा दैवं वा कालं वा गन्तुमर्हति
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य | आत्मनो | दुश्चरिताद् | अशुभं | प्राप् + नर
एनसा | न | स | दैवं | वा | कालं | वा | गन्तुम् | अर्हति
महाराज मनुष्येषु निन्द्यं यः सर्वमाचरेत् वध्यः सर्वलोकस्य निन्दितानि समाचरन्
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महत् + राज | मनुष्येषु | निन्द्यं | यः | सर्वम् | आचरेत्
स | वध्यः | सर्व + लोक | निन्दितानि | समाचरन्
निकारा मनुजश्रेष्ठ पाण्डवैस्त्वत्प्रतीक्षया अनुभूताः सहामात्यैर्निकृतैरधिदेवने
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निकारा | मनुज + श्रेष्ठ | पाण्डव + त्वद् + प्रतीक्षा
अनुभूताः | सह + अमात्य | निकृतैर् | अधिदेवने
हयानां गजानां राज्ञां चामिततेजसाम् वैशसं समरे वृत्तं यत्तन्मे शृणु सर्वशः
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पाण्डवानां | कुरूणां | च | राज्ञां | च + अमित + तेजस्
वैशसं | समरे | वृत्तं | यत् | तद् + मद् | शृणु | सर्वशः
स्थिरो भूत्वा महाराज सर्वलोकक्षयोदयम् यथाभूतं महायुद्धे श्रुत्वा मा विमना भव
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स्थिरो | भूत्वा | महत् + राज | सर्व + लोक + क्षय + उदय
यथाभूतं | महत् + युद्ध | श्रुत्वा | मा | विमना | भव
ह्येव कर्ता पुरुषः कर्मणोः शुभपापयोः अस्वतन्त्रो हि पुरुषः कार्यते दारुयन्त्रवत्
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न | हि + एव | कर्ता | पुरुषः | कर्मणोः | शुभ + पाप
अस्वतन्त्रो | हि | पुरुषः | कार्यते | दारुयन्त्र + वत्
केचिदीश्वरनिर्दिष्टाः केचिदेव यदृच्छया पूर्वकर्मभिरप्यन्ये त्रैधमेतद्विकृष्यते
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केचिद् | ईश्वर + निर्दिश् | केचिद् | एव | यदृच्छया
पूर्व + कर्मन् | अपि + अन्य | त्रैधम् | एतद् | विकृष्यते