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Currently viewing: Parva 5 - Chapter 5.145 (40 verses)
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Chapter 5.145

आगम्य हास्तिनपुरादुपप्लव्यमरिंदमः पाण्डवानां यथावृत्तं केशवः सर्वमुक्तवान्
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आगम्य | हास्तिनपुराद् | उपप्लव्यम् | अरिंदमः
पाण्डवानां | प्रवृत्तिं | वा | विद्मः | कर्मन् + अपि | वा | कृतम्
संभाष्य सुचिरं कालं मन्त्रयित्वा पुनः पुनः स्वमेवावसथं शौरिर्विश्रामार्थं जगाम
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पूरण + अर्थ | समुद्रस्य | मन्त्रयित्वा | पुनः | पुनः
स्वम् | एव + आवसथ | शौरिर् | विश्राम + अर्थ | जगाम | ह
विसृज्य सर्वान्नृपतीन्विराटप्रमुखांस्तदा पाण्डवा भ्रातरः पञ्च भानावस्तंगते सति
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विसृज्य | सर्व + नृपति | विराट + प्रमुख + तदा
पाण्डवा | भ्रातरः | पञ्च | भानाव् | अस्तं | गते | सति
संध्यामुपास्य ध्यायन्तस्तमेव गतमानसाः आनाय्य कृष्णं दाशार्हं पुनर्मन्त्रममन्त्रयन्
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संध्याम् | उपास्य | ध्या + तद् | एव | गम् + मानस
आनाय्य | कृष्णं | दाशार्हं | पुनर् | मन्त्रम् | अमन्त्रयन्
त्वया नागपुरं गत्वा सभायां धृतराष्ट्रजः किमुक्तः पुण्डरीकाक्ष तन्नः शंसितुमर्हसि
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त्वया | नागपुरं | गत्वा | सभायां | धृतराष्ट्र + ज
किम् | उक्तः | पुण्डरीकाक्ष | तद् + मद् | शंसितुम् | अर्हसि
मया नागपुरं गत्वा सभायां धृतराष्ट्रजः तथ्यं पथ्यं हितं चोक्तो गृह्णाति दुर्मतिः
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त्वया | नागपुरं | गत्वा | सभायां | धृतराष्ट्र + ज
तथ्यं | पथ्यं | हितं | च + वच् | न | च | गृह्णाति | दुर्मतिः
तस्मिन्नुत्पथमापन्ने कुरुवृद्धः पितामहः किमुक्तवान्हृषीकेश दुर्योधनममर्षणम् आचार्यो वा महाबाहो भारद्वाजः किमब्रवीत्
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तस्मिन् | उत्पथम् | आपन्ने | कुरुवृद्धः | पितामहः
एवम् | उक्त्वा | महत् + बाहु | दुर्योधनम् | अमर्षणम्
आचार्यो | वा | महत् + बाहु | भारद्वाजः | किम् | अब्रवीत्
पिता यवीयानस्माकं क्षत्ता धर्मभृतां वरः पुत्रशोकाभिसंतप्तः किमाह धृतराष्ट्रजम्
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तान् | आगतान् | अभिप्रेक्ष्य | मत्स्यो | धर्म + भृत् | वरः
पुत्र + शोक + अभिसंतप् | किम् | आह | धृतराष्ट्र + ज
किं सर्वे नृपतयः सभायां ये समासते उक्तवन्तो यथातत्त्वं तद्ब्रूहि त्वं जनार्दन
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किं | च | सर्वे | नृपतयः | सभायां | ये | समासते
उक्तवन्तो | यथातत्त्वं | तद् | ब्रूहि | त्वं | जनार्दन
उक्तवान्हि भवान्सर्वं वचनं कुरुमुख्ययोः कामलोभाभिभूतस्य मन्दस्य प्राज्ञमानिनः
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उक्तवान् | हि | भवान् | सर्वं | वचनं | कुरु + मुख्य
काम + लोभ + अभिभू | मन्दस्य | प्राज्ञ + मानिन्
अप्रियं हृदये मह्यं तन्न तिष्ठति केशव तेषां वाक्यानि गोविन्द श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो
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अप्रियं | हृदये | मह्यं | तद् + न | तिष्ठति | केशव
तेषां | वाक्यानि | गोविन्द | श्रोतुम् | इष् + मद् | विभो
यथा नाभिपद्येत कालस्तात तथा कुरु भवान्हि नो गतिः कृष्ण भवान्नाथो भवान्गुरुः
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यथा | च | न + अभिपद् | काल + तात | तथा | कुरु
भवान् | हि | नो | गतिः | कृष्ण | भवत् + नाथ | भवान् | गुरुः
शृणु राजन्यथा वाक्यमुक्तो राजा सुयोधनः मध्ये कुरूणां राजेन्द्र सभायां तन्निबोध मे
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शृणु | राजन् | यथा | वाक्यम् | उक्तो | राजा | सुयोधनः
मध्ये | कुरूणां | राजन् + इन्द्र | सभायां | तद् + निबुध् | मे
मया वै श्राविते वाक्ये जहास धृतराष्ट्रजः अथ भीष्मः सुसंक्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत्
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मया | वै | श्राविते | वाक्ये | जहास | धृतराष्ट्र + ज
यद् + अर्थ | मां | सुर + श्रेष्ठ | इदं | वचनम् | अब्रवीत्
दुर्योधन निबोधेदं कुलार्थे यद्ब्रवीमि ते तच्छ्रुत्वा राजशार्दूल स्वकुलस्य हितं कुरु
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दुर्योधन | निबुध् + इदम् | कुल + अर्थ | यद् | ब्रवीमि | ते
तद् + श्रु | राजन् + शार्दूल | स्व + कुल | हितं | कुरु
मम तात पिता राजञ्शंतनुर्लोकविश्रुतः तस्याहमेक एवासं पुत्रः पुत्रवतां वरः
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मम | तात | पिता | राजञ् | शंतनुर् | लोक + विश्रु
गावः | प्रतिष्ठमानानां | पुत्रः | प्रवदतां | वरः
तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना द्वितीयः स्यात्कथं सुतः एकपुत्रमपुत्रं वै प्रवदन्ति मनीषिणः
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तस्य | बुद्धिः | समुत्पन्ना | द्वितीयः | स्यात् | कथं | सुतः
अश्वमेधं | दशगुणं | प्रवदन्ति | मनीषिणः
चोच्छेदं कुलं यायाद्विस्तीर्येत कथं यशः तस्याहमीप्सितं बुद्ध्वा कालीं मातरमावहम्
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न | च + उच्छेद | कुलं | यायाद् | विस्तीर्येत | कथं | यशः
तद् + मद् | ईप्सितं | बुद्ध्वा | कालीं | मातरम् | आवहम्
प्रतिज्ञां दुष्करां कृत्वा पितुरर्थे कुलस्य अराजा चोर्ध्वरेताश्च यथा सुविदितं तव प्रतीतो निवसाम्येष प्रतिज्ञामनुपालयन्
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प्रतिज्ञां | दुष्करां | कृत्वा | पितुर् | अर्थे | कुलस्य | च
अ + राजन् | च + ऊर्ध्वरेतस् | यथा | सु + विद् | तव
प्रतीतो | निवस् + एतद् | प्रतिज्ञाम् | अनुपालयन्
तस्यां जज्ञे महाबाहुः श्रीमान्कुरुकुलोद्वहः विचित्रवीर्यो धर्मात्मा कनीयान्मम पार्थिवः
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तस्यां | जज्ञे | महत् + बाहु | श्रीमान् | कुरु + कुल + उद्वह
विचित्रवीर्यो | धर्म + आत्मन् | कनीयस् + मद् | पार्थिवः
स्वर्यातेऽहं पितरि तं स्वराज्ये संन्यवेशयम् विचित्रवीर्यं राजानं भृत्यो भूत्वा ह्यधश्चरः
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स्वर्याते | ऽहं | पितरि | तं | स्व + राज्य | संन्यवेशयम्
वैचित्रवीर्यं | राजानम् | अभ्यगच्छद् | अरिंदमः
तस्याहं सदृशान्दारान्राजेन्द्र समुदावहम् जित्वा पार्थिवसंघातमपि ते बहुशः श्रुतम्
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तद् + मद् | सदृशान् | दारान् | राजन् + इन्द्र | समुदावहम्
जित्वा | पार्थिव + संघात | अपि | ते | बहुशः | श्रुतम्
ततो रामेण समरे द्वन्द्वयुद्धमुपागमम् हि रामभयादेभिर्नागरैर्विप्रवासितः दारेष्वतिप्रसक्तश्च यक्ष्माणं समपद्यत
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ततो | रामेण | समरे | द्वंद्व + युद्ध | उपागमम्
स | हि | राम + भय | एभिर् | नागरैर् | विप्रवासितः
दार + अति + प्रसञ्ज् + च | यक्ष्माणं | समपद्यत
यदा त्वराजके राष्ट्रे ववर्ष सुरेश्वरः तदाभ्यधावन्मामेव प्रजाः क्षुद्भयपीडिताः
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यदा | तु + अराजक | राष्ट्रे | न | ववर्ष | सुरेश्वरः
तदा + अभिधाव् + मद् | एव | प्रजाः | क्षुध् + भय + पीडय्
उपक्षीणाः प्रजाः सर्वा राजा भव भवाय नः ईतयो नुद भद्रं ते शंतनोः कुलवर्धन
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उपक्षीणाः | प्रजाः | सर्वा | राजा | भव | भवाय | नः
ईतयो | नुद | भद्रं | ते | शंतनोः | कुल + वर्धन
पीड्यन्ते ते प्रजाः सर्वा व्याधिभिर्भृशदारुणैः अल्पावशिष्टा गाङ्गेय ताः परित्रातुमर्हसि
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पीड्यन्ते | ते | प्रजाः | सर्वा | व्याधिभिर् | भृश + दारुण
अल्प + अवशिष् | गाङ्गेय | ताः | परित्रातुम् | अर्हसि
व्याधीन्प्रणुद्य वीर त्वं प्रजा धर्मेण पालय त्वयि जीवति मा राष्ट्रं विनाशमुपगच्छतु
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स्व + राज्य | च + वस् | प्रीतः | प्रजा | धर्मेण | पालयन्
त्वयि | जीवति | मा | राष्ट्रं | विनाशम् | उपगच्छतु
प्रजानां क्रोशतीनां वै नैवाक्षुभ्यत मे मनः प्रतिज्ञां रक्षमाणस्य सद्वृत्तं स्मरतस्तथा
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प्रजानां | क्रोशतीनां | वै | न + एव + क्षुभ् | मे | मनः
प्रतिज्ञां | रक्षमाणस्य | सत् + वृत्त | स्मृ + तथा
ततः पौरा महाराज माता काली मे शुभा भृत्याः पुरोहिताचार्या ब्राह्मणाश्च बहुश्रुताः मामूचुर्भृशसंतप्ता भव राजेति संततम्
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ततः | पौरा | महत् + राज | माता | काली | च | मे | शुभा
कृष्णया | सहिता | वीरा | ब्राह्मणैश् | च | महात्मभिः
माम् | ऊचुर् | भृश + संतप् | भव | राजन् + इति | संततम्
प्रतीपरक्षितं राष्ट्रं त्वां प्राप्य विनशिष्यति त्वमस्मद्धितार्थं वै राजा भव महामते
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स्वेन | राजर्षि + तपस् | पूर्णं | त्वां | पूरयिष्यति
स | त्वम् | मद् + हित + अर्थ | वै | राजा | भव | महामते
इत्युक्तः प्राञ्जलिर्भूत्वा दुःखितो भृशमातुरः तेभ्यो न्यवेदयं पुत्र प्रतिज्ञां पितृगौरवात् ऊर्ध्वरेता ह्यराजा कुलस्यार्थे पुनः पुनः
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इति + वच् | प्राञ्जलिर् | भूत्वा | दुःखितो | भृशम् | आतुरः
तेभ्यो | न्यवेदयं | पुत्र | प्रतिज्ञां | पितृ + गौरव
ऊर्ध्वरेता | हि + अ + राजन् | च | कुल + अर्थ | पुनः | पुनः
ततोऽहं प्राञ्जलिर्भूत्वा मातरं संप्रसादयम् नाम्ब शंतनुना जातः कौरवं वंशमुद्वहन् प्रतिज्ञां वितथां कुर्यामिति राजन्पुनः पुनः
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ततः | सा | प्राञ्जलिर् | भूत्वा | लज्ज् + इव | भामिनी
शंतनुना | जातः | कौरवं | वंशम् | उद्वहन्
मया | संबन्धकं | तुल्यम् | इति | राजन् | पुनः | पुनः
विशेषतस्त्वदर्थं धुरि मा मां नियोजय अहं प्रेष्यश्च दासश्च तवाम्ब सुतवत्सले
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विशेषतः + त्वद् + अर्थ | च | धुरि | मा | मां | नियोजय
अहं | प्रेष्य + च | दास + च | सुत + वत्सल
एवं तामनुनीयाहं मातरं जनमेव अयाचं भ्रातृदारेषु तदा व्यासं महामुनिम्
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एवं | ताम् | अनुनी + मद् | मातरं | जनम् | एव | च
अयाचं | भ्रातृ + दार | तदा | व्यासं | महत् + मुनि
सह मात्रा महाराज प्रसाद्य तमृषिं तदा अपत्यार्थमयाचं वै प्रसादं कृतवांश्च सः त्रीन्स पुत्रानजनयत्तदा भरतसत्तम
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सह | मात्रा | महत् + राज | प्रसाद्य | तम् | ऋषिं | तदा
अपत्य + अर्थ | अयाचं | वै | प्रसादं | कृ + च | सः
शृङ्गी | तत्र + आगम् + आशु | तदा | भरत + सत्तम
अन्धः करणहीनेति वै राजा पिता तव राजा तु पाण्डुरभवन्महात्मा लोकविश्रुतः
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अन्धः | करण + हा + इति | न | वै | राजा | पिता | तव
राजा | तु | पाण्डुर् | भू + महात्मन् | लोक + विश्रु
राजा तस्य ते पुत्राः पितुर्दायाद्यहारिणः मा तात कलहं कार्षी राज्यस्यार्धं प्रदीयताम्
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स | राजा | तस्य | ते | पुत्राः | पितुर् | दायाद्य + हारिन्
मा | तात | कलहं | कार्षी | राज्य + अर्ध | प्रदीयताम्
मयि जीवति राज्यं कः संप्रशासेत्पुमानिह मावमंस्था वचो मह्यं शममिच्छामि वः सदा
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मयि | जीवति | राज्यं | कः | सम्प्रशासेत् | पुमान् | इह
मा + अवमन् | वचो | मह्यं | शमम् | इच्छामि | वः | सदा
विशेषोऽस्ति मे पुत्र त्वयि तेषु पार्थिव मतमेतत्पितुस्तुभ्यं गान्धार्या विदुरस्य
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न | विशेषो | ऽस्ति | मे | पुत्र | त्वयि | तेषु | च | पार्थिव
मतम् | एतत् | पितृ + त्वद् | गान्धार्या | विदुरस्य | च
श्रोतव्यं यदि वृद्धानां मातिशङ्कीर्वचो मम नाशयिष्यसि मा सर्वमात्मानं पृथिवीं तथा
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श्रोतव्यं | यदि | वृद्धानां | मा + अतिशङ्क् | वचो | मम
नाशयिष्यसि | मा | सर्वम् | आत्मानं | पृथिवीं | तथा