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Currently viewing: Parva 5 - Chapter 5.144 (26 verses)
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Chapter 5.144

ततः सूर्यान्निश्चरितां कर्णः शुश्राव भारतीम् दुरत्ययां प्रणयिनीं पितृवद्भास्करेरिताम्
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ततः | सूर्य + निश्चर् | कर्णः | शुश्राव | भारतीम्
दुरत्ययां | प्रणयिनीं | पितृ + वत् | भास्कर + ईरय्
सत्यमाह पृथा वाक्यं कर्ण मातृवचः कुरु श्रेयस्ते स्यान्नरव्याघ्र सर्वमाचरतस्तथा
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सत्यम् | आह | पृथा | वाक्यं | कर्ण | मातृ + वचस् | कुरु
श्रेयस् + त्वद् | अस् + नर + व्याघ्र | सर्वम् | आचर् + तथा
एवमुक्तस्य मात्रा स्वयं पित्रा भानुना चचाल नैव कर्णस्य मतिः सत्यधृतेस्तदा
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एवम् | उक्तस्य | मात्रा | च | स्वयं | पित्रा | च | भानुना
चचाल | न + एव | कर्णस्य | मतिः | सत्य + धृति + तदा
ते श्रद्दधे वाक्यं क्षत्रिये भाषितं त्वया धर्मद्वारं ममैतत्स्यान्नियोगकरणं तव
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यदि | सत्यम् | इदं | वाक्यं | निश्चयाद् | भाषितं | त्वया
धर्म + द्वार | मद् + एतद् | अस् + नियोग + करण | तव
अकरोन्मयि यत्पापं भवती सुमहात्ययम् अवकीर्णोऽस्मि ते तेन तद्यशःकीर्तिनाशनम्
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कृ + मद् | यत् | पापं | भवती | सु + महत् + अत्यय
अवकीर्णो | ऽस्मि | ते | तेन | तद् | यशस् + कीर्ति + नाशन
अहं क्षत्रियो जातो प्राप्तः क्षत्रसत्क्रियाम् त्वत्कृते किं नु पापीयः शत्रुः कुर्यान्ममाहितम्
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अहं | च | क्षत्रियो | जातो | न | प्राप्तः | क्षत्र + सत्क्रिया
त्वद् + कृते | किं | नु | पापीयः | शत्रुः | कृ + मद् + अहित
क्रियाकाले त्वनुक्रोशमकृत्वा त्वमिमं मम हीनसंस्कारसमयमद्य मां समचूचुदः
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क्रिया + काल | तु + अनुक्रोश | अकृत्वा | त्वम् | इमं | मम
हा + संस्कार + समय | अद्य | मां | समचूचुदः
वै मम हितं पूर्वं मातृवच्चेष्टितं त्वया सा मां संबोधयस्यद्य केवलात्महितैषिणी
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न | वै | मम | हितं | पूर्वं | मातृ + वत् + चेष्ट् | त्वया
सा | मां | सम्बोधय् + अद्य | केवल + आत्मन् + हित + एषिन्
कृष्णेन सहितात्को वै व्यथेत धनंजयात् कोऽद्य भीतं मां विद्यात्पार्थानां समितिं गतम्
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कृष्णेन | सहितात् | को | वै | न | व्यथेत | धनंजयात्
को | ऽद्य | भीतं | न | मां | विद्यात् | पार्थानां | समितिं | गतम्
अभ्राता विदितः पूर्वं युद्धकाले प्रकाशितः पाण्डवान्यदि गच्छामि किं मां क्षत्रं वदिष्यति
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अभ्राता | विदितः | पूर्वं | युद्ध + काल | प्रकाशितः
पाण्डवान् | यदि | गच्छामि | किं | मां | क्षत्रं | वदिष्यति
सर्वकामैः संविभक्तः पूजितश्च सदा भृशम् अहं वै धार्तराष्ट्राणां कुर्यां तदफलं कथम्
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सर्व + काम | संविभक्तः | पूजय् + च | सदा | भृशम्
त्रासनीं | धार्तराष्ट्राणां | मृदु + पूर्व | सु + दारुण
उपनह्य परैर्वैरं ये मां नित्यमुपासते नमस्कुर्वन्ति सदा वसवो वासवं यथा
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उपनह्य | परैर् | वैरं | ये | मां | नित्यम् | उपासते
नमस्कुर्वन्ति | च | सदा | वसवो | वासवं | यथा
मम प्राणेन ये शत्रूञ्शक्ताः प्रतिसमासितुम् मन्यन्तेऽद्य कथं तेषामहं भिन्द्यां मनोरथम्
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मम | प्राणेन | ये | शत्रूञ् | शक्ताः | प्रतिसमासितुम्
मन्यन्ते | ऽद्य | कथं | तेषाम् | अहं | भिन्द्यां | मनोरथम्
मया प्लवेन संग्रामं तितीर्षन्ति दुरत्ययम् अपारे पारकामा ये त्यजेयं तानहं कथम्
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मया | प्लवेन | संग्रामं | तितीर्षन्ति | दुरत्ययम्
अपारे | पार + काम | ये | त्यजेयं | तान् | अहं | कथम्
अयं हि कालः संप्राप्तो धार्तराष्ट्रोपजीविनाम् निर्वेष्टव्यं मया तत्र प्राणानपरिरक्षता
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एवम् | उक्तः | प्रत्युवाच | धार्तराष्ट्रो | जनार्दनम्
निर्वेष्टव्यं | मया | तत्र | प्राणान् | अपरिरक्षता
कृतार्थाः सुभृता ये हि कृत्यकाल उपस्थिते अनवेक्ष्य कृतं पापा विकुर्वन्त्यनवस्थिताः
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कृतार्थाः | सु + भृ | ये | हि | कृत्य + काल | उपस्थिते
अनवेक्ष्य | कृतं | पापा | विकृ + अनवस्थित
राजकिल्बिषिणां तेषां भर्तृपिण्डापहारिणाम् नैवायं परो लोको विद्यते पापकर्मणाम्
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राजन् + किल्बिषिन् | तेषां | भर्तृ + पिण्ड + अपहारिन्
विनयं | कृ + विद्या | विनाशं | पाप + कर्मन्
धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामर्थे योत्स्यामि ते सुतैः बलं शक्तिं चास्थाय वै त्वय्यनृतं वदे
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त्वं | हि | राष्ट्रस्य | परमा | गतिर् | मत्स्य + पति | सुतः
बलं | च | शक्तिं | च + आस्था | न | वै | त्वद् + अनृत | वदे
आनृशंस्यमथो वृत्तं रक्षन्सत्पुरुषोचितम् अतोऽर्थकरमप्येतन्न करोम्यद्य ते वचः
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आनृशंस्यम् | अथो | वृत्तं | रक्षन् | सत् + पुरुष + उचित
अतो | अर्थ + कर | अपि + एतद् + न | कृ + अद्य | ते | वचः
तु तेऽयं समारम्भो मयि मोघो भविष्यति वध्यान्विषह्यान्संग्रामे हनिष्यामि ते सुतान् युधिष्ठिरं भीमं यमौ चैवार्जुनादृते
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न | तु | ते | ऽयं | समारम्भो | मयि | मोघो | भविष्यति
वध्यान् | विषह्यान् | संग्रामे | न | हनिष्यामि | ते | सुतान्
युधिष्ठिरं | च | भीमं | च | माद्री + पुत्र | च | पाण्डवौ
अर्जुनेन समं युद्धं मम यौधिष्ठिरे बले अर्जुनं हि निहत्याजौ संप्राप्तं स्यात्फलं मया यशसा चापि युज्येयं निहतः सव्यसाचिना
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अर्जुनेन | समं | युद्धं | मम | यौधिष्ठिरे | बले
अर्जुनं | हि | निहन् + आजि | सम्प्राप्तं | स्यात् | फलं | मया
यशसा | च + अपि | युज्येयं | निहतः | सव्यसाचिना
ते जातु नशिष्यन्ति पुत्राः पञ्च यशस्विनि निरर्जुनाः सकर्णा वा सार्जुना वा हते मयि
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न | ते | जातु | नशिष्यन्ति | पुत्राः | पञ्च | यशस्विनि
निरर्जुनाः | स + कर्ण | वा | स + अर्जुन | वा | हते | मयि
इति कर्णवचः श्रुत्वा कुन्ती दुःखात्प्रवेपती उवाच पुत्रमाश्लिष्य कर्णं धैर्यादकम्पितम्
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इति | कर्ण + वचस् | श्रुत्वा | कुन्ती | दुःखात् | प्रवेपती
उवाच | पुत्रम् | आश्लिष्य | कर्णं | धैर्याद् | अकम्पितम्
एवं वै भाव्यमेतेन क्षयं यास्यन्ति कौरवाः यथा त्वं भाषसे कर्ण दैवं तु बलवत्तरम्
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तव | च + एव | प्रभावेन | स्वर्गं | यास्यन्ति | सागराः
यथा | त्वं | भाषसे | कर्ण | दैवं | तु | बलवत्तरम्
त्वया चतुर्णां भ्रातॄणामभयं शत्रुकर्शन दत्तं तत्प्रतिजानीहि संगरप्रतिमोचनम्
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त्वया | चतुर्णां | भ्रातॄणाम् | अभयं | शत्रु + कर्शन
दत्तं | तत् | प्रतिजानीहि | संगर + प्रतिमोचन
अनामयं स्वस्ति चेति पृथाथो कर्णमब्रवीत् तां कर्णोऽभ्यवदत्प्रीतस्ततस्तौ जग्मतुः पृथक्
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अनामयं | स्वस्ति | च + इति | पृथा + अथो | कर्णम् | अब्रवीत्
तां | कर्णो | ऽभ्यवदत् | प्री + ततस् + तद् | जग्मतुः | पृथक्