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Currently viewing: Parva 5 -
Chapter 5.131
(42 verses)
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Sanskrit Text
शत्रुर्निमज्जता
ग्राह्यो
जङ्घायां
प्रपतिष्यता
।
विपरिच्छिन्नमूलोऽपि
न
विषीदेत्कथंचन
।
उद्यम्य
धुरमुत्कर्षेदाजानेयकृतं
स्मरन्
॥
Padaccheda (Word Analysis)
शत्रुर् | निमज्जता | ग्राह्यो | जङ्घायां | प्रपतिष्यता
विपरिच्छिद् + मूल | ऽपि | न | विषीदेत् | कथंचन
उद्यम्य | धुरम् | उत्कर्षेद् | आजानेय + कृ | स्मरन्
विपरिच्छिद् + मूल | ऽपि | न | विषीदेत् | कथंचन
उद्यम्य | धुरम् | उत्कर्षेद् | आजानेय + कृ | स्मरन्