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Currently viewing: Parva 5 - Chapter 5.123 (27 verses)
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Chapter 5.123

ततः शांतनवो भीष्मो दुर्योधनममर्षणम् केशवस्य वचः श्रुत्वा प्रोवाच भरतर्षभ
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ततः | शांतनवो | भीष्मो | भरतानां | पितामहः
केशवस्य | वचः | श्रुत्वा | किरीटी | श्वेतवाहनः
कृष्णेन वाक्यमुक्तोऽसि सुहृदां शममिच्छता अनुपश्यस्व तत्तात मा मन्युवशमन्वगाः
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कृष्णेन | वाक्यम् | उक्तो | ऽसि | सुहृदां | शमम् | इच्छता
अनुपश्यस्व | तत् | तात | मा | मन्यु + वश | अन्वगाः
अकृत्वा वचनं तात केशवस्य महात्मनः श्रेयो जातु सुखं कल्याणमवाप्स्यसि
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श्रुत्वा | तु | वचनं | तस्य | पाण्डवस्य | महात्मनः
श्रेयो | न | जातु | न | सुखं | न | कल्याणम् | अवाप्स्यसि
धर्म्यमर्थं महाबाहुराह त्वां तात केशवः तमर्थमभिपद्यस्व मा राजन्नीनशः प्रजाः
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धर्म्यम् | अर्थं | महत् + बाहु | आह | त्वां | तात | केशवः
धर्माद् | अर्थात् | सुख + च + एव | मा | राजन् + नश् | प्रजाः
इमां श्रियं प्रज्वलितां भारतीं सर्वराजसु जीवतो धृतराष्ट्रस्य दौरात्म्याद्भ्रंशयिष्यसि
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इमां | श्रियं | प्रज्वलितां | भारतीं | सर्व + राजन्
जीवतो | धृतराष्ट्रस्य | दौरात्म्याद् | भ्रंशयिष्यसि
आत्मानं सहामात्यं सपुत्रपशुबान्धवम् सहमित्रमसद्बुद्ध्या जीविताद्भ्रंशयिष्यसि
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विराट + राज | रमयन् | स + अमात्य | सहबान्धवम्
सह + मित्र | असत् + बुद्धि | जीविताद् | भ्रंशयिष्यसि
अतिक्रामन्केशवस्य तथ्यं वचनमर्थवत् पितुश्च भरतश्रेष्ठ विदुरस्य धीमतः
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अतिक्रामन् | केशवस्य | तथ्यं | वचनम् | अर्थवत्
यूपश् | च | भरत + श्रेष्ठ | वरुणस्रोतसे | गिरौ
मा कुलघ्नोऽन्तपुरुषो दुर्मतिः कापथं गमः पितरं मातरं चैव वृद्धौ शोकाय मा ददः
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मा | कुल + घ्न | अन्त + पुरुष | दुर्मतिः | कापथं | गमः
पितरं | मातरं | च + एव | वृद्धौ | शोकाय | मा | ददः
अथ द्रोणोऽब्रवीत्तत्र दुर्योधनमिदं वचः अमर्षवशमापन्नं निःश्वसन्तं पुनः पुनः
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अथ | द्रोणो | ऽब्रवीत् | तत्र | दुर्योधनम् | इदं | वचः
सा | बाष्प + कल | वाचा | निःश्वसन्ती | पुनः | पुनः
धर्मार्थयुक्तं वचनमाह त्वां तात केशवः तथा भीष्मः शांतनवस्तज्जुषस्व नराधिप
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धर्म्यम् | अर्थं | महत् + बाहु | आह | त्वां | तात | केशवः
तथा | भीष्मः | शांतनव + तद् + जुष् | नराधिप
प्राज्ञौ मेधाविनौ दान्तावर्थकामौ बहुश्रुतौ आहतुस्त्वां हितं वाक्यं तदादत्स्व परंतप
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प्राज्ञौ | मेधाविनौ | दम् + अर्थ + काम | बहु + श्रुत
अह् + त्वद् | हितं | वाक्यं | तद् | आदत्स्व | परंतप
अनुतिष्ठ महाप्राज्ञ कृष्णभीष्मौ यदूचतुः मा वचो लघुबुद्धीनां समास्थास्त्वं परंतप
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अनुतिष्ठ | महत् + प्राज्ञ | कृष्ण + भीष्म | यद् | ऊचतुः
मा | वचो | लघु + बुद्धि | समास्थास् | त्वं | परंतप
ये त्वां प्रोत्साहयन्त्येते नैते कृत्याय कर्हिचित् वैरं परेषां ग्रीवायां प्रतिमोक्ष्यन्ति संयुगे
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ये | त्वां | प्रोत्साहय् + एतद् | न + एतद् | कृत्याय | कर्हिचित्
वैरं | परेषां | ग्रीवायां | प्रतिमोक्ष्यन्ति | संयुगे
मा कुरूञ्जीघनः सर्वान्पुत्रान्भ्रातॄंस्तथैव वासुदेवार्जुनौ यत्र विद्ध्यजेयं बलं हि तत्
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मा | कुरूञ् | जीघनः | सर्वान् | पुत्रान् | भ्रातृ + तथा + एव | च
वासुदेव + अर्जुन | यत्र | विद् + अजेय | बलं | हि | तत्
एतच्चैव मतं सत्यं सुहृदोः कृष्णभीष्मयोः यदि नादास्यसे तात पश्चात्तप्स्यसि भारत
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एतद् + च + एव | मतं | सत्यं | सुहृदोः | कृष्ण + भीष्म
यदि | न + आदा | तात | पश्चात् | तप्स्यसि | भारत
यथोक्तं जामदग्न्येन भूयानेव ततोऽर्जुनः कृष्णो हि देवकीपुत्रो देवैरपि दुरुत्सहः
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यथा + वच् | जामदग्न्येन | भूयान् | एव | ततो | ऽर्जुनः
कृष्णो | हि | देवकीपुत्रो | देवैर् | अपि | दुरुत्सहः
किं ते सुखप्रियेणेह प्रोक्तेन भरतर्षभ एतत्ते सर्वमाख्यातं यथेच्छसि तथा कुरु हि त्वामुत्सहे वक्तुं भूयो भरतसत्तम
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किं | ते | जन + क्षय + इह | कृतेन | भरत + ऋषभ
एतत् | ते | सर्वम् | आख्यातं | यथा | पुत्रो | महात्मना
न | हि | ताम् | उत्सहे | वक्तुं | स्वयं | गन्धर्व + रक्ष्
तस्मिन्वाक्यान्तरे वाक्यं क्षत्तापि विदुरोऽब्रवीत् दुर्योधनमभिप्रेक्ष्य धार्तराष्ट्रममर्षणम्
This being said Dhritarashtra the Kshatta Vidura too said, with his eyes on the wrathful son of Dhritarashtra, Duryodhana.
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तस्मिन् | वाक्य + अन्तर | वाक्यं | क्षत्तृ + अपि | विदुरो | ऽब्रवीत्
दुर्योधनम् | अभिप्रेक्ष्य | धार्तराष्ट्रम् | अमर्षणम्
दुर्योधन शोचामि त्वामहं भरतर्षभ इमौ तु वृद्धौ शोचामि गान्धारीं पितरं ते
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दुर्योधन | न | शोचामि | त्वाम् | अहं | भरत + ऋषभ
इमौ | तु | वृद्धौ | शोचामि | गान्धारीं | पितरं | च | ते
यावनाथौ चरिष्येते त्वया नाथेन दुर्हृदा हतमित्रौ हतामात्यौ लूनपक्षाविव द्विजौ
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यद् + अनाथ | चरिष्येते | त्वया | नाथेन | दुर्हृदा
हन् + मित्र | हन् + अमात्य | लू + पक्ष + इव | द्विजौ
भिक्षुकौ विचरिष्येते शोचन्तौ पृथिवीमिमाम् कुलघ्नमीदृशं पापं जनयित्वा कुपूरुषम्
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भिक्षुकौ | विचरिष्येते | शोचन्तौ | पृथिवीम् | इमाम्
कुल + घ्न | ईदृशं | पापं | जनयित्वा | कुपूरुषम्
अथ दुर्योधनं राजा धृतराष्ट्रोऽभ्यभाषत आसीनं भ्रातृभिः सार्धं राजभिः परिवारितम्
Then did Kshattri again cause Duryodhana to enter the council chamber, unwilling as he was along with his brothers, and surrounded by the kings.
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राजा | दुर्योधनो | नाम | धृतराष्ट्र + सुत | बली
तापसैर् | भ्रातृभिश् | च + एव | सर्वतः | परिवारितम्
दुर्योधन निबोधेदं शौरिणोक्तं महात्मना आदत्स्व शिवमत्यन्तं योगक्षेमवदव्ययम्
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दुर्योधन | निबुध् + इदम् | मद् + वाक्य | कुरु + सत्तम
आदत्स्व | शिवम् | अत्यन्तं | योगक्षेम + वत् | अव्ययम्
अनेन हि सहायेन कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा इष्टान्सर्वानभिप्रायान्प्राप्स्यामः सर्वराजसु
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स | वै | पथि | समागम्य | भीष्म + अक्लिष्ट + कर्मन्
कृत्स्नान् | सर्वान् | अभिप्रायान् | प्राप्स्यामः | सर्व + राजन्
सुसंहितः केशवेन गच्छ तात युधिष्ठिरम् चर स्वस्त्ययनं कृत्स्नं भारतानामनामयम्
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सु + संधा | केशवेन | गच्छ | तात | युधिष्ठिरम्
चर | स्वस्त्ययनं | कृत्स्नं | भारतानाम् | अनामयम्
वासुदेवेन तीर्थेन तात गच्छस्व संगमम् कालप्राप्तमिदं मन्ये मा त्वं दुर्योधनातिगाः
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वासुदेवेन | तीर्थेन | क्षिप्रं | संशाम्य | पाण्डवैः
काल + प्राप् | इदं | मन्ये | मा | त्वं | दुर्योधन + अतिगा
शमं चेद्याचमानं त्वं प्रत्याख्यास्यसि केशवम् त्वदर्थमभिजल्पन्तं तवास्त्यपराभवः
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यदि | चेद् | भजमानां | मां | प्रत्याख्यास्यसि | मानद
त्वद् + अर्थ | अभिजल्पन्तं | न | त्वद् + अस् + अपराभव