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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.94 (27 verses)
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Chapter 3.94

ततः संप्रस्थितो राजा कौन्तेयो भूरिदक्षिणः अगस्त्याश्रममासाद्य दुर्जयायामुवास
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ततः | सम्प्रस्थितो | राजा | कौन्तेयो | भूरि + दक्षिणा
अगस्त्य + आश्रम | आसाद्य | दुर्जयायाम् | उवास | ह
तत्र वै लोमशं राजा पप्रच्छ वदतां वरः अगस्त्येनेह वातापिः किमर्थमुपशामितः
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तत्र | वै | लोमशं | राजा | पप्रच्छ | वदतां | वरः
अगस्त्य + इह | वातापिः | किमर्थम् | उपशामितः
आसीद्वा किंप्रभावश्च दैत्यो मानवान्तकः किमर्थं चोद्गतो मन्युरगस्त्यस्य महात्मनः
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आसीद् | वा | किम्प्रभाव + च | स | दैत्यो | मानव + अन्तक
किमर्थं | च + उद्गम् | मन्युर् | अगस्त्यस्य | महात्मनः
इल्वलो नाम दैतेय आसीत्कौरवनन्दन मणिमत्यां पुरि पुरा वातापिस्तस्य चानुजः
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इल्वलो | नाम | दैतेय | आसीत् | कौरव + नन्दन
मणिमत्यां | पुरि | पुरा | वातापिस् | तस्य | च + अनुज
ब्राह्मणं तपोयुक्तमुवाच दितिनन्दनः पुत्रं मे भगवानेकमिन्द्रतुल्यं प्रयच्छतु
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स | ब्राह्मणं | तपस् + युज् | उवाच | दिति + नन्दन
पुत्रं | मे | भगवान् | एकम् | इन्द्र + तुल्य | प्रयच्छतु
तस्मै ब्राह्मणो नादात्पुत्रं वासवसंमितम् चुक्रोध सोऽसुरस्तस्य ब्राह्मणस्य ततो भृशम्
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तस्मै | स | ब्राह्मणो | न + दा | पुत्रं | वासव + संमा
उवाच | राजा | संस्मृत्य | ब्राह्मणस्य | प्रतिश्रुतम्
समाह्वयति यं वाचा गतं वैवस्वतक्षयम् पुनर्देहमास्थाय जीवन्स्म प्रतिदृश्यते
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तस्मात् | तम् | अनुयास्यामि | यान्तं | वैवस्वत + क्षय
स | पुनर् | देहम् | आस्थाय | जीवन् | स्म | प्रतिदृश्यते
ततो वातापिमसुरं छागं कृत्वा सुसंस्कृतम् तं ब्राह्मणं भोजयित्वा पुनरेव समाह्वयत्
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ततो | वातापिम् | असुरं | छागं | कृत्वा | सु + संस्कृ
तं | ब्राह्मणं | भोजयित्वा | पुनर् | एव | समाह्वयत्
तस्य पार्श्वं विनिर्भिद्य ब्राह्मणस्य महासुरः वातापिः प्रहसन्राजन्निश्चक्राम विशां पते
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तस्य | पार्श्वं | विनिर्भिद्य | ब्राह्मणस्य | महत् + असुर
वातापिः | प्रहसन् | राजन् | निश्चक्राम | विशां | पते
एवं ब्राह्मणान्राजन्भोजयित्वा पुनः पुनः हिंसयामास दैतेय इल्वलो दुष्टचेतनः
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एवं | स | ब्राह्मणान् | राजन् | भोजयित्वा | पुनः | पुनः
हिंसयामास | दैतेय | इल्वलो | दुष् + चेतना
अगस्त्यश्चापि भगवानेतस्मिन्काल एव तु पितॄन्ददर्श गर्ते वै लम्बमानानधोमुखान्
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अगस्त्य + च + अपि | भगवान् | एतस्मिन् | काल | एव | तु
पितॄन् | ददर्श | गर्ते | वै | लम्बमानान् | अधोमुखान्
सोऽपृच्छल्लम्बमानांस्तान्भवन्त इह किंपराः संतानहेतोरिति ते तमूचुर्ब्रह्मवादिनः
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सो | प्रच्छ् + लम्ब् | तान् | भवन्त | इह | किंपराः
संतान + हेतु | इति | ते | तम् | ऊचुर् | ब्रह्मन् + वादिन्
ते तस्मै कथयामासुर्वयं ते पितरः स्वकाः गर्तमेतमनुप्राप्ता लम्बामः प्रसवार्थिनः
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ते | तस्मै | कथयामासुर् | वयं | ते | पितरः | स्वकाः
गर्तम् | एतम् | अनुप्राप्ता | लम्बामः | प्रसव + अर्थिन्
यदि नो जनयेथास्त्वमगस्त्यापत्यमुत्तमम् स्यान्नोऽस्मान्निरयान्मोक्षस्त्वं पुत्राप्नुया गतिम्
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यदि | नो | जनयेथास् | त्वम् | अगस्त्य + अपत्य | उत्तमम्
स्यान् | नो | ऽस्मान् | निरय + मोक्ष | त्वं | च | पुत्र + आप् | गतिम्
तानुवाच तेजस्वी सत्यधर्मपरायणः करिष्ये पितरः कामं व्येतु वो मानसो ज्वरः
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स | तान् | उवाच | तेजस्वी | सत्य + धर्म + परायण
करिष्ये | पितरः | कामं | व्येतु | वो | मानसो | ज्वरः
ततः प्रसवसंतानं चिन्तयन्भगवानृषिः आत्मनः प्रसवस्यार्थे नापश्यत्सदृशीं स्त्रियम्
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ततः | प्रसव + संतान | चिन्तयन् | भगवान् | ऋषिः
आत्मनः | प्रसव + अर्थ | न + पश् | सदृशीं | स्त्रियम्
तस्य तस्य सत्त्वस्य तत्तदङ्गमनुत्तमम् संभृत्य तत्समैरङ्गैर्निर्ममे स्त्रियमुत्तमाम्
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स | तस्य | तस्य | सत्त्वस्य | तत् | तद् | अङ्गम् | अनुत्तमम्
संभृत्य | तद् + सम | अङ्गैर् | निर्ममे | स्त्रियम् | उत्तमाम्
तां विदर्भराजाय पुत्रकामाय ताम्यते निर्मितामात्मनोऽर्थाय मुनिः प्रादान्महातपाः
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स | तां | विदर्भ + राज | पुत्र + काम | ताम्यते
निर्मिताम् | आत्मनो | ऽर्थाय | मुनिः | प्रादान् | महत् + तपस्
सा तत्र जज्ञे सुभगा विद्युत्सौदामिनी यथा विभ्राजमाना वपुसा व्यवर्धत शुभानना
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सखी + मध्य | अनवद्य + अङ्ग | विद्युत् | सौदामनी | यथा
विभ्राजमाना | वपुषा | व्यवर्धत | शुभ + आनन
जातमात्रां तां दृष्ट्वा वैदर्भः पृथिवीपतिः प्रहर्षेण द्विजातिभ्यो न्यवेदयत भारत
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जन् + मात्र | च | तां | दृष्ट्वा | वैदर्भः | पृथिवीपतिः
तप | आस्थाय | धर्मेण | द्विजातीन् | भर | भारत
अभ्यनन्दन्त तां सर्वे ब्राह्मणा वसुधाधिप लोपामुद्रेति तस्याश्च चक्रिरे नाम ते द्विजाः
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तं | कृताञ्जलयः | सर्वे | प्रणता | वसुधा + अधिप
लोपामुद्रा + इति | तस्याश् | च | चक्रिरे | नाम | ते | द्विजाः
ववृधे सा महाराज बिभ्रती रूपमुत्तमम् अप्स्विवोत्पलिनी शीघ्रमग्नेरिव शिखा शुभा
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ववृधे | सा | महत् + राज | बिभ्रती | रूपम् | उत्तमम्
अप् + इव + उत्पलिनी | शीघ्रम् | अग्नेर् | इव | शिखा | शुभा
तां यौवनस्थां राजेन्द्र शतं कन्याः स्वलंकृताः दाशीशतं कल्याणीमुपतस्थुर्वशानुगाः
O king of kings, when she grew youthful, one hundred damsels adorned with ornaments and also one hundred maid-servants, remaining at her command always, waited upon that blessed girl.
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आराधयस्व | राजन् + इन्द्र | पत्नीभ्यां | सह | देवताः
दाशी + शत | च | कल्याणीम् | उपतस्थुर् | वश + अनुग
सा स्म दासीशतवृता मध्ये कन्याशतस्य आस्ते तेजस्विनी कन्या रोहिणीव दिवि प्रभो
Surrounded by these one hundred maidservants and remaining in the midst of these one hundred damsels, that effulgent damsel shone, as the brilliant Rohini (star) in the sky.
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सा | स्म | दासी + शत + वृ | मध्ये | कन्या + शत | च
आस्ते | तेजस्विनी | कन्या | रोहिणी + इव | दिवि | प्रभो
यौवनस्थामपि तां शीलाचारसमन्विताम् वव्रे पुरुषः कश्चिद्भयात्तस्य महात्मनः
When she grew youthful, even then for the fear of the illustrious king none dared ask for her hand, endued as she was with good and excellent manners.
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रूप + लक्षण + सम्पद् | शील + आचार + समन्वित
न | च + अपि | संभ्रमः | कश्चिद् | आसीत् | तत्र | महात्मनः
सा तु सत्यवती कन्या रूपेणाप्सरसोऽप्यति तोषयामास पितरं शीलेन स्वजनं तथा
That truthful maiden possessed of beauty like that of an Apsara pleased her father and relatives with her good conduct.
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सा | तु | सत्यवती | कन्या | रूप + अप्सरस् | अपि + अति
तोषयामास | पितरं | शीलेन | स्व + जन | तथा
वैदर्भीं तु तथायुक्तां युवतीं प्रेक्ष्य वै पिता मनसा चिन्तयामास कस्मै दद्यां सुतामिति
Seeing her attain to puberty, her father, the king of Vidharbha thought in his mind, "To whom shall I give my this daughter?”
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वैदर्भीं | तु | तथा + युज् | युवतीं | प्रेक्ष्य | वै | पिता
मनसा | चिन्तयामास | कस्मै | दद्यां | सुताम् | इति