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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.85 (23 verses)
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Chapter 3.85

तान्सर्वानुत्सुकान्दृष्ट्वा पाण्डवान्दीनचेतसः आश्वासयंस्तदा धौम्यो बृहस्पतिसमोऽब्रवीत्
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तथा | तान् | दुःखितान् | दृष्ट्वा | पाण्डवान् | धृतराष्ट्र + ज
आश्वासयंस् | तदा | धौम्यो | बृहस्पति + सम | ऽब्रवीत्
ब्राह्मणानुमतान्पुण्यानाश्रमान्भरतर्षभ दिशस्तीर्थानि शैलांश्च शृणु मे गदतो नृप
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ब्राह्मण + अनुमन् | पुण्यान् | आश्रमान् | भरत + ऋषभ
दिशस् | तीर्थानि | शैलांश् | च | शृणु | मे | गदतो | नृप
पूर्वं प्राचीं दिशं राजन्राजर्षिगणसेविताम् रम्यां ते कीर्तयिष्यामि युधिष्ठिर यथास्मृति
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पूर्वं | प्राचीं | दिशं | राजन् | राजन् + ऋषि + गण + सेव्
रम्यां | ते | कीर्तयिष्यामि | युधिष्ठिर | यथास्मृति
तस्यां देवर्षिजुष्टायां नैमिषं नाम भारत यत्र तीर्थानि देवानां सुपुण्यानि पृथक्पृथक्
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तस्यां | देव + ऋषि + जुष् | नैमिषं | नाम | भारत
यत्र | तीर्थानि | देवानां | सु + पुण्य | पृथक् | पृथक्
यत्र सा गोमती पुण्या रम्या देवर्षिसेविता यज्ञभूमिश्च देवानां शामित्रं विवस्वतः
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क्व | सा | पुण्य + जल | रम्या | नाना + द्विज + निषेव्
यज्ञ + भूमि | च | देवानां | शामित्रं | च | विवस्वतः
तस्यां गिरिवरः पुण्यो गयो राजर्षिसत्कृतः शिवं ब्रह्मसरो यत्र सेवितं त्रिदशर्षिभिः
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तस्यां | गिरि + वर | पुण्यो | गयो | राजन् + ऋषि + सत्कृ
शिवं | ब्रह्मसरो | यत्र | सेवितं | त्रिदश + ऋषि
यदर्थं पुरुषव्याघ्र कीर्तयन्ति पुरातनाः एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्
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यद् | एषां | पुरुष + व्याघ्र | श्रेयो | ध्यायति | केशवः
एष्टव्या | बहवः | पुत्रा | यदि + एक | ऽपि | गयां | व्रजेत्
महानदी तत्रैव तथा गयशिरोऽनघ यत्रासौ कीर्त्यते विप्रैरक्षय्यकरणो वटः यत्र दत्तं पितृभ्योऽन्नमक्षय्यं भवति प्रभो
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महानदी | च | तत्र + एव | तथा | गयशिरो | ऽनघ
यत्र + अदस् | कीर्त्यते | विप्रैर् | अक्षय्य + करण | वटः
पितॄणां | तत्र | वै | दत्तम् | अक्षयं | भवति | प्रभो
सा पुण्यजला यत्र फल्गुनामा महानदी बहुमूलफला चापि कौशिकी भरतर्षभ विश्वामित्रोऽभ्यगाद्यत्र ब्राह्मणत्वं तपोधनः
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सा | च | पुण्य + जल | यत्र | फल्गु + नामन् | महत् + नदी
बहु + मूल + फल | च + अपि | कौशिकी | भरत + ऋषभ
विश्वामित्रो | ब्राह्मण + त्व | लुब्धः | काम + परायण
गङ्गा यत्र नदी पुण्या यस्यास्तीरे भगीरथः अयजत्तात बहुभिः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः
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गङ्गा | यत्र | नदी | पुण्या | यस्यास् | तीरे | भगीरथः
आजमीढो | महत् + यज्ञ | बहुभिर् | भूरि + दक्षिणा
पाञ्चालेषु कौरव्य कथयन्त्युत्पलावतम् विश्वामित्रोऽयजद्यत्र शक्रेण सह कौशिकः यत्रानुवंशं भगवाञ्जामदग्न्यस्तथा जगौ
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पाञ्चालेषु | च | कौरव्य | कथयन्त्य् | उत्पलावतम्
विश्वामित्रो | ऽभ्यगाद् | यत्र | ब्राह्मण + त्व | तपोधनः
यत्र + अनुवंश | भगवत् + जामदग्न्य | तथा | जगौ
विश्वामित्रस्य तां दृष्ट्वा विभूतिमतिमानुषीम् कन्यकुब्जेऽपिबत्सोममिन्द्रेण सह कौशिकः ततः क्षत्रादपाक्रामद्ब्राह्मणोऽस्मीति चाब्रवीत्
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ततस् + तद् | विस्मिताः | सर्वे | कर्म | दृश् + अतिमानुष
पा + च | सुतं | सोमम् | इन्द्रेण | सह | कौशिकः
ततः | क्षत्राद् | अपाक्रामद् | ब्राह्मणो | अस् + इति | च + ब्रू
पवित्रमृषिभिर्जुष्टं पुण्यं पावनमुत्तमम् गङ्गायमुनयोर्वीर संगमं लोकविश्रुतम्
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पवित्रम् | ऋषिभिर् | जुष्टं | पुण्यं | पावनम् | उत्तमम्
ततो | गच्छेत | राजन् + इन्द्र | संगमं | लोक + विश्रु
यत्रायजत भूतात्मा पूर्वमेव पितामहः प्रयागमिति विख्यातं तस्माद्भरतसत्तम
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सर्व | एव | महात्मानः | पूर्वे | मम | पितामहाः
प्रयागम् | इति | विख्यातं | तस्माद् | भरत + सत्तम
अगस्त्यस्य राजेन्द्र तत्राश्रमवरो महान् हिरण्यबिन्दुः कथितो गिरौ कालंजरे नृप
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गो + सहस्र | राजन् + इन्द्र | फलं | प्राप्नोति | मानवः
हिरण्यबिन्दुः | कथितो | गिरौ | कालञ्जरे | नृप
अत्यन्यान्पर्वतान्राजन्पुण्यो गिरिवरः शिवः महेन्द्रो नाम कौरव्य भार्गवस्य महात्मनः
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अति + अन्य | पर्वतान् | राजन् | पुण्यो | गिरि + वर | शिवः
आत्मन् + प्राण | प्रियतमा | भार्गवस्य | महात्मनः
अयजद्यत्र कौन्तेय पूर्वमेव पितामहः यत्र भागीरथी पुण्या सदस्यासीद्युधिष्ठिर
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यत्र + यज् | भूतात्मा | पूर्वम् | एव | पितामहः
यत्र | भागीरथी | पुण्या | सदस् + अस् | युधिष्ठिर
यत्रासौ ब्रह्मशालेति पुण्या ख्याता विशां पते धूतपाप्मभिराकीर्णा पुण्यं तस्याश्च दर्शनम्
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यत्र + अदस् | ब्रह्मशाला + इति | पुण्या | ख्याता | विशां | पते
धू + पाप्मन् | आकीर्णा | पुण्यं | तस्याश् | च | दर्शनम्
पवित्रो मङ्गलीयश्च ख्यातो लोके सनातनः केदारश्च मतङ्गस्य महानाश्रम उत्तमः
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पवित्रो | मङ्गलीय + च | ख्यातो | लोके | सनातनः
केदार + च | मतंगस्य | महान् | आश्रम | उत्तमः
कुण्डोदः पर्वतो रम्यो बहुमूलफलोदकः नैषधस्तृषितो यत्र जलं शर्म लब्धवान्
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कुण्डोदः | पर्वतो | रम्यो | बहु + मूलफल + उदक
नैषधस् | तृषितो | यत्र | जलं | शर्म | च | लब्धवान्
यत्र देववनं रम्यं तापसैरुपशोभितम् बाहुदा नदी यत्र नन्दा गिरिमूर्धनि
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यत्र | देव + वन | रम्यं | तापसैर् | उपशोभितम्
बाहुदा | च | नदी | यत्र | नन्दा | च | गिरि + मूर्धन्
तीर्थानि सरितः शैलाः पुण्यान्यायतनानि प्राच्यां दिशि महाराज कीर्तितानि मया तव
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जगाम | तानि | सर्वाणि | तीर्थ + आयतन | च
प्राच्यां | दिशि | महत् + राज | कीर्तितानि | मया | तव
तिसृष्वन्यासु पुण्यानि दिक्षु तीर्थानि मे शृणु सरितः पर्वतांश्चैव पुण्यान्यायतनानि
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त्रि + अन्य | पुण्यानि | दिक्षु | तीर्थानि | मे | शृणु
दृष्टवान् | पर्वत + श्रेष्ठ | पुण्य + आयतन | च