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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.84 (20 verses)
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Chapter 3.84

भ्रातॄणां मतमाज्ञाय नारदस्य धीमतः पितामहसमं धौम्यं प्राह राजा युधिष्ठिरः
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सभां | तु | पितृराजस्य | वरुणस्य | च | धीमतः
चिन्तयामास | मतिमान् | धर्मपुत्रो | युधिष्ठिरः
मया पुरुषव्याघ्रो जिष्णुः सत्यपराक्रमः अस्त्रहेतोर्महाबाहुरमितात्मा विवासितः
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विद्यते | पुरुष + व्याघ्र | त्वयि | सत्यं | महत् + व्रत
अस्त्र + हेतु | महत् + बाहु | अमित + आत्मन् | विवासितः
हि वीरोऽनुरक्तश्च समर्थश्च तपोधन कृती भृशमप्यस्त्रे वासुदेव इव प्रभुः
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स | हि | वीरो | अनुरञ्ज् + च | समर्थश् | च | तपोधन
कृती | च | भृशम् | अपि + अस्त्र | वासुदेव | इव | प्रभुः
अहं ह्येतावुभौ ब्रह्मन्कृष्णावरिनिघातिनौ अभिजानामि विक्रान्तौ तथा व्यासः प्रतापवान् त्रियुगौ पुण्डरीकाक्षौ वासुदेवधनंजयौ
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अहं | हि + एतद् + उभ् | ब्रह्मन् | कृष्ण + अरि + निघातिन्
अभिजानामि | विक्रान्तौ | तथा | व्यासः | प्रतापवान्
त्रि + युग | पुण्डरीक + अक्ष | वासुदेव + धनंजय
नारदोऽपि तथा वेद सोऽप्यशंसत्सदा मम तथाहमपि जानामि नरनारायणावृषी
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नारदो | ऽपि | तथा | वेद | सो | अपि + शंस् | सदा | मम
तथा + मद् | अपि | जानामि | नर + नारायण + ऋषि
शक्तोऽयमित्यतो मत्वा मया संप्रेषितोऽर्जुनः इन्द्रादनवरः शक्तः सुरसूनुः सुराधिपम् द्रष्टुमस्त्राणि चादातुमिन्द्रादिति विवासितः
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शक्तो | ऽयम् | इति + अतस् | मत्वा | मया | संप्रेषितो | ऽर्जुनः
इन्द्राद् | अनवरः | शक्तः | सुर + सूनु | सुराधिपम्
द्रष्टुम् | अस्त्राणि | च + आदा | इन्द्राद् | इति | विवासितः
भीष्मद्रोणावतिरथौ कृपो द्रौणिश्च दुर्जयः धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण वृता युधि महाबलाः सर्वे वेदविदः शूराः सर्वेऽस्त्रकुशलास्तथा
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भीष्मं | द्रोणं | कृपं | द्रौणिं | दुर्योधन + विविंशति
धृतराष्ट्र + आत्मज + च + एव | पाण्डव + च | महत् + बल
सर्वे | वेद + विद् | शूराः | सर्वे | भास्वर + मूर्ति
योद्धुकामश्च पार्थेन सततं यो महाबलः दिव्यास्त्रवित्कर्णः सूतपुत्रो महारथः
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योद्धु + काम | च | पार्थेन | सततं | यो | महत् + बल
स | च | दिव्य + अस्त्र + विद् | कर्णः | सूत + पुत्र | महत् + रथ
सोऽश्ववेगानिलबलः शरार्चिस्तलनिस्वनः रजोधूमोऽस्त्रसंतापो धार्तराष्ट्रानिलोद्धतः
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सो | अश्व + वेग + अनिल + बल | शर + अर्चिस् | तल + निस्वन
रजस् + धूम | अस्त्र + संताप | धार्तराष्ट्र + अनिल + उद्धन्
निसृष्ट इव कालेन युगान्तज्वलनो यथा मम सैन्यमयं कक्षं प्रधक्ष्यति संशयः
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निसृष्ट | इव | कालेन | युग + अन्त + ज्वलन | यथा
मम | सैन्य + मय | कक्षं | प्रधक्ष्यति | न | संशयः
तं कृष्णानिलोद्धूतो दिव्यास्त्रजलदो महान् श्वेतवाजिबलाकाभृद्गाण्डीवेन्द्रायुधोज्ज्वलः
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तं | स | कृष्ण + अनिल + उद्धू | दिव्य + अस्त्र + जलद | महान्
श्वेतवाजिन् + बलाका + भृत् | गाण्डीव + इन्द्रायुध + उज्ज्वल
सततं शरधाराभिः प्रदीप्तं कर्णपावकम् उदीर्णोऽर्जुनमेघोऽयं शमयिष्यति संयुगे
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सततं | शर + धारा | प्रदीप्तं | कर्ण + पावक
उदीर्णो | अर्जुन + मेघ | ऽयं | शमयिष्यति | संयुगे
साक्षादेव सर्वाणि शक्रात्परपुरंजयः दिव्यान्यस्त्राणि बीभत्सुस्तत्त्वतः प्रतिपत्स्यते
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स | साक्षाद् | एव | सर्वाणि | शक्रात् | पर + पुरंजय
तद् + एकस्थ | सर्वाणि | ततस् | त्वं | प्रतिपत्स्यसे
अलं तेषां सर्वेषामिति मे धीयते मतिः नास्ति त्वतिक्रिया तस्य रणेऽरीणां प्रतिक्रिया
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लता + गृह | वसताम् | इति | मे | धीयते | मतिः
न + अस् | तु + अति + क्रिया | तस्य | रणे | ऽरीणां | प्रतिक्रिया
तं वयं पाण्डवं सर्वे गृहीतास्त्रं धनंजयम् द्रष्टारो हि बीभत्सुर्भारमुद्यम्य सीदति
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यदा | च | पाण्डवाः | सर्वे | कृतास्त्राः | कृ + निश्रम
द्रष्टारो | न | हि | बीभत्सुर् | भारम् | उद्यम्य | सीदति
वयं तु तमृते वीरं वनेऽस्मिन्द्विपदां वर अवधानं गच्छामः काम्यके सह कृष्णया
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वयं | तु | तम् | ऋते | वीरं | वने | ऽस्मिन् | द्विपदां | वर
अवधानं | न | गच्छामः | काम्यके | सह | कृष्णया
भवानन्यद्वनं साधु बह्वन्नं फलवच्छुचि आख्यातु रमणीयं सेवितं पुण्यकर्मभिः
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भवान् | अन्यद् | वनं | साधु | बहु + अन्न | फलवत् + शुचि
आख्यातु | रमणीयं | च | सेवितं | पुण्य + कर्मन्
यत्र कंचिद्वयं कालं वसन्तः सत्यविक्रमम् प्रतीक्षामोऽर्जुनं वीरं वर्षकामा इवाम्बुदम्
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यत्र | कंचिद् | वयं | कालं | वसन्तः | सत्य + विक्रम
प्रतीक्षामो | ऽर्जुनं | वीरं | वर्ष + काम | इव + अम्बुद
विविधानाश्रमान्कांश्चिद्द्विजातिभ्यः परिश्रुतान् सरांसि सरितश्चैव रमणीयांश्च पर्वतान्
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विविधान् | आश्रमान् | कांश्चिद् | द्विजातिभ्यः | परिश्रुतान्
वनानि | सरित् + च + एव | शैल + च | विविध + द्रुम
आचक्ष्व हि नो ब्रह्मन्रोचते तमृतेऽर्जुनम् वनेऽस्मिन्काम्यके वासो गच्छामोऽन्यां दिशं प्रति
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आचक्ष्व | न | हि | नो | ब्रह्मन् | रोचते | तम् | ऋते | ऽर्जुनम्
वने | ऽस्मिन् | काम्यके | वासो | गच्छामो | ऽन्यां | दिशं | प्रति