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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.68 (24 verses)
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Chapter 3.68

अथ दीर्घस्य कालस्य पर्णादो नाम वै द्विजः प्रत्येत्य नगरं भैमीमिदं वचनमब्रवीत्
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अथ | दीर्घस्य | कालस्य | देवयानी | नृप + उत्तम
मूर्ध्ना | प्रणम्य | चरण + इदम् | वचनम् | अब्रवीत्
नैषधं मृगयानेन दमयन्ति दिवानिशम् अयोध्यां नगरीं गत्वा भाङ्गस्वरिरुपस्थितः
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नैषधं | मृग + यान | दमयन्ति | दिवानिशम्
अयोध्यां | नगरीं | गत्वा | उपस्थितः
श्रावितश्च मया वाक्यं त्वदीयं महाजने ऋतुपर्णो महाभागो यथोक्तं वरवर्णिनि
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श्रावितश् | च | मया | वाक्यं | त्वदीयं | स | महाजने
ऋतुपर्णो | महाभागो | यथोक्तं | वरवर्णिनि
तच्छ्रुत्वा नाब्रवीत्किंचिदृतुपर्णो नराधिपः पारिषदः कश्चिद्भाष्यमाणो मयासकृत्
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एतद् + श्रु | तु | वचनं | विदुरस्य | नर + अधिप
न | च | पारिषदः | कश्चिद् | भाष्यमाणो | मद् + असकृत्
अनुज्ञातं तु मां राज्ञा विजने कश्चिदब्रवीत् ऋतुपर्णस्य पुरुषो बाहुको नाम नामतः
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अनुज्ञातं | तु | मां | राज्ञा | विजने | कश्चिद् | अब्रवीत्
ऋतुपर्णस्य | पुरुषो | बाहुको | नाम | नामतः
सूतस्तस्य नरेन्द्रस्य विरूपो ह्रस्वबाहुकः शीघ्रयाने सुकुशलो मृष्टकर्ता भोजने
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ततस् + तद् | नरेन्द्रस्य | उपयाजो | महत् + तपस्
शीघ्र + यान | सु + कुशल | मृज् + कर्तृ | च | भोजने
विनिःश्वस्य बहुशो रुदित्वा मुहुर्मुहुः कुशलं चैव मां पृष्ट्वा पश्चादिदमभाषत
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स | विनिःश्वस्य | बहुशो | रुदित्वा | च | मुहुर् | मुहुः
कुशलं | च + एव | मां | पृष्ट्वा | पश्चाद् | इदम् | अभाषत
वैषम्यमपि संप्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रियः आत्मानमात्मना सत्यो जितस्वर्गा संशयः रहिता भर्तृभिश्चैव क्रुध्यन्ति कदाचन
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वैषम्यम् | अपि | सम्प्राप्ता | गोपायन्ति | कुलस्त्रियः
आत्मानम् | आत्मना | सत्यो | जि + स्वर्ग | न | संशयः
रहिता | भर्तृभिश् | च + एव | न | क्रुध्यन्ति | कदाचन
विषमस्थेन मूढेन परिभ्रष्टसुखेन यत्सा तेन परित्यक्ता तत्र क्रोद्धुमर्हति
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विषम + स्थ | मूढेन | परिभ्रंश् + सुख | च
यत् | सा | तेन | परित्यक्ता | तत्र | न | क्रोद्धुम् | अर्हति
प्राणयात्रां परिप्रेप्सोः शकुनैर्हृतवाससः आधिभिर्दह्यमानस्य श्यामा क्रोद्धुमर्हति
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प्राणयात्रां | परिप्रेप्सोः | शकुनैर् | हृ + वासस्
आधिभिर् | दह्यमानस्य | श्यामा | न | क्रोद्धुम् | अर्हति
सत्कृतासत्कृता वापि पतिं दृष्ट्वा तथागतम् भ्रष्टराज्यं श्रिया हीनं श्यामा क्रोद्धुमर्हति
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सत्कृ + असत्कृ | वा + अपि | पतिं | दृष्ट्वा | तथागतम्
आधिभिर् | दह्यमानस्य | श्यामा | न | क्रोद्धुम् | अर्हति
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा त्वरितोऽहमिहागतः श्रुत्वा प्रमाणं भवती राज्ञश्चैव निवेदय
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तस्य | तद् | वचनं | श्रुत्वा | प्ररुरोद | शकुन्तला
श्रुत्वा | प्रमाणं | भवती | राज्ञश् | च + एव | निवेदय
एतच्छ्रुत्वाश्रुपूर्णाक्षी पर्णादस्य विशां पते दमयन्ती रहोऽभ्येत्य मातरं प्रत्यभाषत
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तद् + श्रु | कौरवेय + तद् | तूष्णीम् | आसन् | विशां | पते
एवम् | उक्तो | महत् + ऋषि + तद् | मातरं | प्रत्यभाषत
अयमर्थो संवेद्यो भीमे मातः कथंचन त्वत्संनिधौ समादेक्ष्ये सुदेवं द्विजसत्तमम्
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अयम् | अर्थो | न | संवेद्यो | भीमे | मातः | कथंचन
त्वद् + संनिधि | समादेक्ष्ये | सुदेवं | द्विज + सत्तम
यथा नृपतिर्भीमः प्रतिपद्येत मे मतम् तथा त्वया प्रयत्तव्यं मम चेत्प्रियमिच्छसि
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यथा | न | नृपतिर् | भीमः | प्रतिपद्येत | मे | मतम्
तथा | कुरुत | भद्रं | वो | मम | चेत् | प्रियम् | इच्छथ
यथा चाहं समानीता सुदेवेनाशु बान्धवान् तेनैव मङ्गलेनाशु सुदेवो यातु माचिरम् समानेतुं नलं मातरयोध्यां नगरीमितः
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यथा | च + मद् | समानीता | सुदेव + आशु | बान्धवान्
तद् + एव | मङ्गल + आशु | सुदेवो | यातु | माचिरम्
समानेतुं | नलं | अयोध्यां | नगरीम् | इतः
विश्रान्तं ततः पश्चात्पर्णादं द्विजसत्तमम् अर्चयामास वैदर्भी धनेनातीव भामिनी
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विश्रान्तं | च | ततः | पश्चात् | पर्णादं | द्विज + सत्तम
अर्चयामास | वैदर्भी | धन + अतीव | भामिनी
नले चेहागते विप्र भूयो दास्यामि ते वसु त्वया हि मे बहु कृतं यथा नान्यः करिष्यति यद्भर्त्राहं समेष्यामि शीघ्रमेव द्विजोत्तम
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नले | च + इह + आगम् | विप्र | भूयो | दास्यामि | ते | वसु
त्वया | हि | मे | बहु | कृतं | यथा | न + अन्य | करिष्यति
यद् | भर्तृ + मद् | समेष्यामि | शीघ्रम् | एव | द्विज + उत्तम
एवमुक्तोऽर्चयित्वा तामाशीर्वादैः सुमङ्गलैः गृहानुपययौ चापि कृतार्थः महामनाः
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एवम् | उक्तो | ऽर्चयित्वा | ताम् | आशीर्वादैः | सु + मङ्गल
गृहान् | उपययौ | च + अपि | कृतार्थः | स | महामनाः
ततश्चानाय्य तं विप्रं दमयन्ती युधिष्ठिर अब्रवीत्संनिधौ मातुर्दुःखशोकसमन्विता
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अभिज्ञाय | सुदेवं | तु | दमयन्ती | युधिष्ठिर
अब्रवीत् | संनिधौ | मातुर् | दुःख + शोक + समन्वित
गत्वा सुदेव नगरीमयोध्यावासिनं नृपम् ऋतुपर्णं वचो ब्रूहि पतिमन्यं चिकीर्षती आस्थास्यति पुनर्भैमी दमयन्ती स्वयंवरम्
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गत्वा | सुदेव | नगरीम् | अयोध्या + वासिन् | नृपम्
ऋतुपर्णं | वचो | ब्रूहि | पतिम् | अन्यं | चिकीर्षती
आस्थास्यति | पुनर् | भैमी | दमयन्ती | स्वयंवरम्
तत्र गच्छन्ति राजानो राजपुत्राश्च सर्वशः यथा गणितः कालः श्वोभूते भविष्यति
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इति + भाष् | राजानो | राजन् + अमात्य + च | संगताः
यथा | च | गणितः | कालः | श्वोभूते | स | भविष्यति
यदि संभावनीयं ते गच्छ शीघ्रमरिंदम सूर्योदये द्वितीयं सा भर्तारं वरयिष्यति हि ज्ञायते वीरो नलो जीवन्मृतोऽपि वा
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यदि | संभावनीयं | ते | गच्छ | शीघ्रम् | अरिंदम
सूर्य + उदय | द्वितीयं | सा | भर्तारं | वरयिष्यति
न | हि | स | ज्ञायते | वीरो | नलो | जीवन् | मृ + अपि | वा
एवं तया यथोक्तं वै गत्वा राजानमब्रवीत् ऋतुपर्णं महाराज सुदेवो ब्राह्मणस्तदा
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एवं | तया | यथोक्तं | वै | गत्वा | राजानम् | अब्रवीत्
अनुकीर्णं | महत् + अरण्य | ब्राह्मणैः | समपद्यत