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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.65 (37 verses)
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Chapter 3.65

हृतराज्ये नले भीमः सभार्ये प्रेष्यतां गते द्विजान्प्रस्थापयामास नलदर्शनकाङ्क्षया
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हृ + राज्य | नले | भीमः | स + भार्या | प्रेष्य + ता | गते
द्विजान् | प्रस्थापयामास | नल + दर्शन + काङ्क्षा
संदिदेश तान्भीमो वसु दत्त्वा पुष्कलम् मृगयध्वं नलं चैव दमयन्तीं मे सुताम्
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संदिदेश | च | तान् | भीमो | वसु | दत्त्वा | च | पुष्कलम्
मृगयध्वं | नलं | च + एव | दमयन्तीं | च | मे | सुताम्
अस्मिन्कर्मणि निष्पन्ने विज्ञाते निषधाधिपे गवां सहस्रं दास्यामि यो वस्तावानयिष्यति अग्रहारं दास्यामि ग्रामं नगरसंमितम्
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अस्मिन् | कर्मणि | निष्पन्ने | विज्ञाते | निषध + अधिप
गवां | सहस्रं | दास्यामि | यो | वस् | तद् + आनी
अग्रहारं | च | दास्यामि | ग्रामं | नगर + संमा
चेच्छक्याविहानेतुं दमयन्ती नलोऽपि वा ज्ञातमात्रेऽपि दास्यामि गवां दशशतं धनम्
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न | चेद् + शक्य + इह + आनी | दमयन्ती | नलो | ऽपि | वा
ज्ञा + मात्र | ऽपि | दास्यामि | गवां | दशन् + शत | धनम्
इत्युक्तास्ते ययुर्हृष्टा ब्राह्मणाः सर्वतोदिशम् पुरराष्ट्राणि चिन्वन्तो नैषधं सह भार्यया
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इति + वच् | ते | ययुर् | हृष्टा | ब्राह्मणाः | सर्वतोदिशम्
पुर + राष्ट्र | चिन्वन्तो | नैषधं | सह | भार्यया
ततश्चेदिपुरीं रम्यां सुदेवो नाम वै द्विजः विचिन्वानोऽथ वैदर्भीमपश्यद्राजवेश्मनि पुण्याहवाचने राज्ञः सुनन्दासहितां स्थिताम्
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ततश् | चेदि + पुरी | रम्यां | सुदेवो | नाम | वै | द्विजः
विचिन्वानो | ऽथ | वैदर्भीम् | अपश्यद् | राजन् + वेश्मन्
पुण्याह + वाचन | राज्ञः | सुनन्दा + सहित | स्थिताम्
मन्दप्रख्यायमानेन रूपेणाप्रतिमेन ताम् पिनद्धां धूमजालेन प्रभामिव विभावसोः
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मन्द + प्रख्या | रूप + अप्रतिम | ताम्
पिनद्धां | धूम + जाल | प्रभाम् | इव | विभावसोः
तां समीक्ष्य विशालाक्षीमधिकं मलिनां कृशाम् तर्कयामास भैमीति कारणैरुपपादयन्
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तां | समीक्ष्य | विशाल + अक्ष | अधिकं | मलिनां | कृशाम्
तर्कयामास | भैमी + इति | कारणैर् | उपपादयन्
यथेयं मे पुरा दृष्टा तथारूपेयमङ्गना कृतार्थोऽस्म्यद्य दृष्ट्वेमां लोककान्तामिव श्रियम्
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यथा + इदम् | मे | पुरा | दृष्टा | तथारूप + इदम् | अङ्गना
कृतार्थो | अस् + अद्य | दृश् + इदम् | लोक + कान्त | इव | श्रियम्
पूर्णचन्द्राननां श्यामां चारुवृत्तपयोधराम् कुर्वन्तीं प्रभया देवीं सर्वा वितिमिरा दिशः
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पूर्ण + चन्द्र + आनन | श्यामां | चारु + वृत्त + पयोधर
कुर्वन्तीं | प्रभया | देवीं | सर्वा | वितिमिरा | दिशः
चारुपद्मपलाशाक्षीं मन्मथस्य रतीमिव इष्टां सर्वस्य जगतः पूर्णचन्द्रप्रभामिव
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चारु + पद्म + पलाश + अक्ष | मन्मथस्य | रतीम् | इव
इष्टां | सर्वस्य | जगतः | पूर्ण + चन्द्र + प्रभा | इव
विदर्भसरसस्तस्माद्दैवदोषादिवोद्धृताम् मलपङ्कानुलिप्ताङ्गीं मृणालीमिव तां भृशम्
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विदर्भ + सरस् | तस्माद् | दैव + दोष | इव + उद्धृ
मल + पङ्क + अनुलिप् + अङ्ग | मृणालीम् | इव | तां | भृशम्
पौर्णमासीमिव निशां राहुग्रस्तनिशाकराम् पतिशोकाकुलां दीनां शुष्कस्रोतां नदीमिव
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पौर्णमासीम् | इव | निशां | राहु + ग्रस् + निशाकर
पति + शोक + आकुल | दीनां | शुष्क + स्रोत | नदीम् | इव
विध्वस्तपर्णकमलां वित्रासितविहंगमाम् हस्तिहस्तपरिक्लिष्टां व्याकुलामिव पद्मिनीम्
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विध्वंस् + पर्ण + कमल | वित्रासय् + विहंगम
हस्तिन् + हस्त + परिक्लिश् | व्याकुलाम् | इव | पद्मिनीम्
सुकुमारीं सुजाताङ्गीं रत्नगर्भगृहोचिताम् दह्यमानामिवोष्णेन मृणालीमचिरोद्धृताम्
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सुकुमारीं | सुजात + अङ्ग | रत्न + गर्भ + गृह + उचित
दह्यमानाम् | इव + उष्ण | मृणालीम् | अचिर + उद्धृ
रूपौदार्यगुणोपेतां मण्डनार्हाममण्डिताम् चन्द्रलेखामिव नवां व्योम्नि नीलाभ्रसंवृताम्
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रूप + औदार्य + गुण + उपेत | मण्डन + अर्ह | अमण्डिताम्
चन्द्रलेखाम् | इव | नवां | व्योम्नि | नील + अभ्र + संवृ
कामभोगैः प्रियैर्हीनां हीनां बन्धुजनेन देहं धारयतीं दीनां भर्तृदर्शनकाङ्क्षया
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काम + भोग | प्रियैर् | हीनां | हीनां | बन्धु + जन | च
देहं | धारयतीं | दीनां | भर्तृ + दर्शन + काङ्क्षा
भर्ता नाम परं नार्या भूषणं भूषणैर्विना एषा विरहिता तेन शोभनापि शोभते
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भर्ता | नाम | परं | नार्या | भूषणं | भूषणैर् | विना
एषा | विरहिता | तेन | शोभन + अपि | न | शोभते
दुष्करं कुरुतेऽत्यर्थं हीनो यदनया नलः धारयत्यात्मनो देहं शोकेनावसीदति
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दुष्करं | कुरुते | ऽत्यर्थं | हीनो | यद् | अनया | नलः
धारय् + आत्मन् | देहं | न | शोक + अवसद्
इमामसितकेशान्तां शतपत्रायतेक्षणाम् सुखार्हां दुःखितां दृष्ट्वा ममापि व्यथते मनः
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इमाम् | असित + केशान्त | शतपत्त्र + आयम् + ईक्षण
सुख + अर्ह | दुःखितं | दृष्ट्वा | कस्मान् | मन्युर् | न | वर्धते
कदा नु खलु दुःखस्य पारं यास्यति वै शुभा भर्तुः समागमात्साध्वी रोहिणी शशिनो यथा
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कदा | नु | खलु | दुःखस्य | पारं | यास्यति | वै | शुभा
भर्तुः | समागमात् | साध्वी | रोहिणी | शशिनो | यथा
अस्या नूनं पुनर्लाभान्नैषधः प्रीतिमेष्यति राजा राज्यपरिभ्रष्टः पुनर्लब्ध्वेव मेदिनीम्
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अस्या | नूनं | पुनर्लाभ + नैषध | प्रीतिम् | एष्यति
राजा | राज्य + परिभ्रंश् | पुनर् | लभ् + इव | मेदिनीम्
तुल्यशीलवयोयुक्तां तुल्याभिजनसंयुताम् नैषधोऽर्हति वैदर्भीं तं चेयमसितेक्षणा
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तुल्य + शील + वयस् + युज् | तुल्य + अभिजन + संयुत
नैषधो | ऽर्हति | वैदर्भीं | तं | च + इदम् | असित + ईक्षण
युक्तं तस्याप्रमेयस्य वीर्यसत्त्ववतो मया समाश्वासयितुं भार्यां पतिदर्शनलालसाम्
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युक्तं | तद् + अप्रमेय | वीर्य + सत्त्ववत् | मया
नृप + स्नुषा | राजन् + भार्या | भर्तृ + दर्शन + लालस
अयमाश्वासयाम्येनां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् अदृष्टपूर्वां दुःखस्य दुःखार्तां ध्यानतत्पराम्
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गम्भीरः | सत्त्व + सम्पद् | पूर्ण + चन्द्र + निभ + आनन
अदृष्ट + पूर्व | दुःखस्य | दुःख + आर्त | ध्यान + तत्पर
एवं विमृश्य विविधैः कारणैर्लक्षणैश्च ताम् उपगम्य ततो भैमीं सुदेवो ब्राह्मणोऽब्रवीत्
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एवं | विमृश्य | विविधैः | कारणैर् | लक्षणैश् | च | ताम्
उपगम्य | ततो | भैमीं | सुदेवो | ब्राह्मणो | ऽब्रवीत्
अहं सुदेवो वैदर्भि भ्रातुस्ते दयितः सखा भीमस्य वचनाद्राज्ञस्त्वामन्वेष्टुमिहागतः
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अहं | सुदेवो | वैदर्भि | भ्रातुस् | ते | दयितः | सखा
भीमस्य | वचनाद् | राज्ञस् | त्वाम् | अन्वेष्टुम् | इह + आगम्
कुशली ते पिता राज्ञि जनित्री भ्रातरश्च ते आयुष्मन्तौ कुशलिनौ तत्रस्थौ दारकौ ते त्वत्कृते बन्धुवर्गाश्च गतसत्त्वा इवासते
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कुशली | ते | पिता | राज्ञि | जनित्री | भ्रातरश् | च | ते
आयुष्मन्तौ | कुशलिनौ | तत्रस्थौ | दारकौ | च | ते
त्वद् + कृत | बन्धु + वर्ग | च | गम् + सत्त्व | इव + आस्
अभिज्ञाय सुदेवं तु दमयन्ती युधिष्ठिर पर्यपृच्छत्ततः सर्वान्क्रमेण सुहृदः स्वकान्
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अभिज्ञाय | सुदेवं | तु | दमयन्ती | युधिष्ठिर
पर्यपृच्छत् | ततः | सर्वान् | क्रमेण | सुहृदः | स्वकान्
रुरोद भृशं राजन्वैदर्भी शोककर्शिता दृष्ट्वा सुदेवं सहसा भ्रातुरिष्टं द्विजोत्तमम्
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रुरोद | च | भृशं | राजन् | वैदर्भी | शोक + कर्शय्
दृष्ट्वा | सुदेवं | सहसा | भ्रातुर् | इष्टं | द्विज + उत्तम
ततो रुदन्तीं तां दृष्ट्वा सुनन्दा शोककर्शिताम् सुदेवेन सहैकान्ते कथयन्तीं भारत
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ततः | समुद्यतां | दृष्ट्वा | देवेन्द्रेण | महत् + अशनि
सुदेवेन | सह + एकान्त | कथयन्तीं | च | भारत
जनित्र्यै प्रेषयामास सैरन्ध्री रुदते भृशम् ब्राह्मणेन समागम्य तां वेद यदि मन्यसे
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जनित्र्यै | प्रेषयामास | सैरन्ध्री | रुदते | भृशम्
ब्राह्मणं | समुपागम्य | वाक्यं | च + इदम् | उवाच | ह
अथ चेदिपतेर्माता राज्ञश्चान्तःपुरात्तदा जगाम यत्र सा बाला ब्राह्मणेन सहाभवत्
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अथ | चेदि + पति | माता | राज्ञश् | च + अन्तःपुर | तदा
जगाम | यत्र | सा | बाला | ब्राह्मणेन | सह + भू
ततः सुदेवमानाय्य राजमाता विशां पते पप्रच्छ भार्या कस्येयं सुता वा कस्य भामिनी
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ततः | सुदेवम् | आनाय्य | राजन् + मातृ | विशां | पते
पप्रच्छ | भार्या | क + इदम् | सुता | वा | कस्य | भामिनी
कथं नष्टा ज्ञातिभ्यो भर्तुर्वा वामलोचना त्वया विदिता विप्र कथमेवंगता सती
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कथं | च | नष्टा | ज्ञातिभ्यो | भर्तुर् | वा | वाम + लोचन
त्वया | च | विदिता | विप्र | कथम् | एवंगता | सती
एतदिच्छाम्यहं त्वत्तो ज्ञातुं सर्वमशेषतः तत्त्वेन हि ममाचक्ष्व पृच्छन्त्या देवरूपिणीम्
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एतद् | इष् + मद् | त्वत्तो | ज्ञातुं | सर्वम् | अशेषतः
तत्त्वेन | हि | मद् + आचक्ष् | पृच्छन्त्या | देव + रूपिन्
एवमुक्तस्तया राजन्सुदेवो द्विजसत्तमः सुखोपविष्ट आचष्ट दमयन्त्या यथातथम्
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एवम् | उक्तस् | तया | राजन् | सुदेवो | द्विज + सत्तम
सुख + उपविश् | आचष्ट | दमयन्त्या | यथातथम्