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Currently viewing: Parva 3 - Chapter 3.63 (24 verses)
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Chapter 3.63

उत्सृज्य दमयन्तीं तु नलो राजा विशां पते ददर्श दावं दह्यन्तं महान्तं गहने वने
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सुप्तायां | दमयन्त्यां | तु | नलो | राजा | विशां | पते
ददर्श | दावं | दह्यन्तं | महान्तं | गहने | वने
तत्र शुश्राव मध्येऽग्नौ शब्दं भूतस्य कस्यचित् अभिधाव नलेत्युच्चैः पुण्यश्लोकेति चासकृत्
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तत्र | शुश्राव | मध्ये | ऽग्नौ | शब्दं | भूतस्य | कस्यचित्
अभिधाव | नल + इति | उच्चैः | पुण्यश्लोक + इति | च + असकृत्
मा भैरिति नलश्चोक्त्वा मध्यमग्नेः प्रविश्य तम् ददर्श नागराजानं शयानं कुण्डलीकृतम्
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मा | भैर् | इति | नलश् | च + वच् | मध्यम् | अग्नेः | प्रविश्य | तम्
ददर्श | नाग + राजन् | शयानं | कुण्डलीकृतम्
नागः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानो नलं तदा उवाच विद्धि मां राजन्नागं कर्कोटकं नृप
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स | प्रह्वः | प्राञ्जलिर् | भूत्वा | विज्ञापयत | माधवम्
उवाच | विद्धि | मां | राजन् | नागं | कर्कोटकं | नृप
मया प्रलब्धो ब्रह्मर्षिरनागाः सुमहातपाः तेन मन्युपरीतेन शप्तोऽस्मि मनुजाधिप
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मया | प्रलब्धो | ब्रह्मर्षिर् | अनागाः | सु + महत् + तपस्
तेन | मन्यु + परी | शप्तो | ऽस्मि | मनुज + अधिप
तस्य शापान्न शक्नोमि पदाद्विचलितुं पदम् उपदेक्ष्यामि ते श्रेयस्त्रातुमर्हति मां भवान्
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तस्य | शापान् | न | शक्नोमि | पदाद् | विचलितुं | पदम्
उपदेक्ष्यामि | ते | श्रेयस् | त्रातुम् | अर्हति | मां | भवान्
सखा ते भविष्यामि मत्समो नास्ति पन्नगः लघुश्च ते भविष्यामि शीघ्रमादाय गच्छ माम्
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सखा | च | ते | भविष्यामि | मद् + सम | न + अस् | पन्नगः
लघुश् | च | ते | भविष्यामि | शीघ्रम् | आदाय | गच्छ | माम्
एवमुक्त्वा नागेन्द्रो बभूवाङ्गुष्ठमात्रकः तं गृहीत्वा नलः प्रायादुद्देशं दाववर्जितम्
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एवम् | उक्त्वा | कुमार + तद् | द्रोणः | स्व + अङ्गुलिवेष्टन
तं | गृहीत्वा | नलः | प्रायाद् | उद्देशं | दाव + वर्जय्
आकाशदेशमासाद्य विमुक्तं कृष्णवर्त्मना उत्स्रष्टुकामं तं नागः पुनः कर्कोटकोऽब्रवीत्
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आकाश + देश | आसाद्य | विमुक्तं | कृष्णवर्त्मना
उत्स्रष्टु + काम | तं | नागः | पुनः | कर्कोटको | ऽब्रवीत्
पदानि गणयन्गच्छ स्वानि नैषध कानिचित् तत्र तेऽहं महाराज श्रेयो धास्यामि यत्परम्
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पदानि | गणयन् | गच्छ | स्वानि | नैषध | कानिचित्
तत् | ते | ऽहं | सम्प्रदास्यामि | यदि | चेद् | अपि | दुर्लभम्
ततः संख्यातुमारब्धमदशद्दशमे पदे तस्य दष्टस्य तद्रूपं क्षिप्रमन्तरधीयत
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ततः | संख्यातुम् | आरब्धम् | अदशद् | दशमे | पदे
तस्य | दष्टस्य | तद् | रूपं | क्षिप्रम् | अन्तरधीयत
दृष्ट्वा विस्मितस्तस्थावात्मानं विकृतं नलः स्वरूपधारिणं नागं ददर्श महीपतिः
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स | दृष्ट्वा | विस्मितस् | स्था + आत्मन् | विकृतं | नलः
स्व + रूप + धारिन् | नागं | ददर्श | च | महीपतिः
ततः कर्कोटको नागः सान्त्वयन्नलमब्रवीत् मया तेऽन्तर्हितं रूपं त्वा विद्युर्जना इति
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ततः | कर्कोटको | नागः | सान्त्वयन् | नलम् | अब्रवीत्
मया | ते | ऽन्तर्हितं | रूपं | न | त्वा | विद्युर् | जना | इति
यत्कृते चासि विकृतो दुःखेन महता नल विषेण मदीयेन त्वयि दुःखं निवत्स्यति
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यत्कृते | च + अस् | विकृतो | दुःखेन | महता | नल
विषेण | स | मदीयेन | त्वयि | दुःखं | निवत्स्यति
विषेण संवृतैर्गात्रैर्यावत्त्वां विमोक्ष्यति तावत्त्वयि महाराज दुःखं वै निवत्स्यति
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विषेण | संवृतैर् | गात्रैर् | यावत् | त्वां | न | विमोक्ष्यति
विषेण | स | मदीयेन | त्वयि | दुःखं | निवत्स्यति
अनागा येन निकृतस्त्वमनर्हो जनाधिप क्रोधादसूययित्वा तं रक्षा मे भवतः कृता
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अनागा | येन | निकृतस् | त्वम् | अनर्हो | जनाधिप
क्रोधाद् | असूययित्वा | तं | रक्षा | मे | भवतः | कृता
ते भयं नरव्याघ्र दंष्ट्रिभ्यः शत्रुतोऽपि वा ब्रह्मविद्भ्यश्च भविता मत्प्रसादान्नराधिप
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न | ते | भयं | नर + व्याघ्र | दंष्ट्रिभ्यः | शत्रुतो | ऽपि | वा
ब्रह्मन् + विद् | च | भविता | मद् + प्रसाद | नर + अधिप
राजन्विषनिमित्ता ते पीडा भविष्यति संग्रामेषु राजेन्द्र शश्वज्जयमवाप्स्यसि
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राजन् | विष + निमित्त | च | न | ते | पीडा | भविष्यति
संग्रामेषु | च | राजन् + इन्द्र | शश्वत् + जय | अवाप्स्यसि
गच्छ राजन्नितः सूतो बाहुकोऽहमिति ब्रुवन् समीपमृतुपर्णस्य हि वेदाक्षनैपुणम् अयोध्यां नगरीं रम्यामद्यैव निषधेश्वर
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गच्छ | राजन्न् | इतः | सूतो | बाहुको | ऽहम् | इति | ब्रुवन्
समीपम् | ऋतुपर्णस्य | स | हि | विद् + अक्ष + नैपुण
अयोध्यां | नगरीं | रम्याम् | अद्य + एव | निषध + ईश्वर
तेऽक्षहृदयं दाता राजाश्वहृदयेन वै इक्ष्वाकुकुलजः श्रीमान्मित्रं चैव भविष्यति
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स | ते | ऽक्षहृदयं | दाता | राजन् + अश्व + हृदय | वै
इक्ष्वाकु + कुल + ज | श्रीमान् | मित्रं | च + एव | भविष्यति
भविष्यसि यदाक्षज्ञः श्रेयसा योक्ष्यसे तदा समेष्यसि दारैस्त्वं मा स्म शोके मनः कृथाः राज्येन तनयाभ्यां सत्यमेतद्ब्रवीमि ते
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भविष्यसि | यदा + अक्ष + ज्ञ | श्रेयसा | योक्ष्यसे | तदा
निष्क्रामिता | मया | पूर्वं | मा | स्म | शोके | मनः | कृथाः
तं | विना | न | च | जीवेयं | कचं | सत्यं | ब्रवीमि | ते
स्वरूपं यदा द्रष्टुमिच्छेथास्त्वं नराधिप संस्मर्तव्यस्तदा तेऽहं वासश्चेदं निवासयेः
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स्व + रूप | च | यदा | द्रष्टुम् | इच्छेथास् | त्वं | नर + अधिप
संस्मर्तव्यस् | तदा | ते | ऽहं | वासश् | च + इदम् | निवासयेः
अनेन वाससाच्छन्नः स्वरूपं प्रतिपत्स्यसे इत्युक्त्वा प्रददावस्मै दिव्यं वासोयुगं तदा
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ये | लोक + तद् | हतः | कर्ण | मया | त्वं | प्रतिपत्स्यसे
इति + वच् | प्रदा + इदम् | दिव्यं | वासस् + युग | तदा
एवं नलं समादिश्य वासो दत्त्वा कौरव नागराजस्ततो राजंस्तत्रैवान्तरधीयत
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एवं | नलं | समादिश्य | वासो | दत्त्वा | च | कौरव
तथा + इति + वच् | तु | सा | राजन् + तत्र + एव + अन्तर्धा